राजकुमार का दूषण

दिग्दिगन्त में घूम-फिरकर रावण ने पृथ्वी की राजनीतिक और सामरिक सत्ताओं को अपने मन में तोल लिया। कहां कैसे किससे लोहा लिया जाएगा, इसकी योजना उसने मन-ही-मन बना ली। फिर उसने दोनों भारतीय सैनिक-सन्निवेशों—दण्डकारण्य और नैमिषारण्य—का सूक्ष्म निरीक्षण किया। दण्डकारण्य के रक्षपाल खर-दूषण और नैमिषारण्य के रक्षपाल मारीच और सुबाहु को आवश्यक गुप्त आदेश दिए। फिर वह खूब सावधानी से लंका में लौट आया।

लंका में उसका धूमधाम से स्वागत हुआ। नृत्य, वाद्य और दीपावली से उसकी अभ्यर्थना हुई। राक्षस कुलवधुओं ने उस पर अक्षत-लाजा बरसाईं। राक्षस-प्रमुख नागरों ने उसका जय-जयकार किया। हर्ष और उत्साह से अभिभूत हो रावण ने अपने स्वर्ण-महालय में प्रवेश किया।

रावण ने अपने पीछे अपने छोटे भाई विभीषण को यौवराज्य दे, अपने नाना सुमाली को प्रधानमंत्री और सेनानायक बना दिया था। अब सबसे प्रथम इन्हीं दोनों ने खिन्न मन आकर उसका अभिनन्दन किया। उन्हें खिन्न देखकर रावण ने कहा—“मातामह, क्या कारण है कि आप खिन्नमनस्क हैं? अरे विभीषण भ्राता, क्यों तेरा मुख वर्षोन्मुख मेघ के समान हो रहा है?”

इस पर विभीषण तो मुख नीचा कर मौन हो रहा, परन्तु सुमाली दैत्य ने कहा—

“पुत्र, हमारा कुल दूषित हो गया। घर का छिद्र हम तुझसे कैसे कहें?”

“क्या हुआ मातामह?”

“तेरी अनुपस्थिति में हम अमर्यादित हो गए।”

“किन्तु किस प्रकार?”

“प्रमाद ही कहना चाहिए। और किस प्रकार?”

“किसका प्रमाद मातामह?”

“मेरा ही पुत्र, तूने मुझे ही तो लंका और राजपरिवार की रक्षा का भार सौंपा था। विभीषण तो अभी निपट बालक ही है।”

“सो लंका में कहीं कुछ दोष उत्पन्न हो गया?”

“लंका में नहीं पुत्र, राजकुल में!”

“राजकुल में क्या हुआ?”

“अनर्तराज मधु लंका आया था।”

“अनर्तराज मधु दैत्य तो हमारा सम्बन्धी है, आपका परिजन है, सुप्रतिष्ठित राजवर्गी है, योद्धा है। क्या उसका लंका में यथावत् स्वागत नहीं हुआ? राजकुल ने कहीं अविनय किया उस सम्मान्य अतिथि के प्रति?”

“नहीं पुत्र, आतिथ्य ही तो राजकुल का दूषण हो गया।”

“किन्तु कैसे?”

“हमने उसका लंका में भव्य स्वागत किया।”

“सुष्ठु!”

“राज-महालय और अन्तःपुर में उसे आत्मीय की भांति प्रतिष्ठित किया।”

“आप राजकुल की मर्यादा जानते हैं, आपने राजकुल की मर्यादा के अनुकूल ही किया।”

“किन्तु राजकुल की मर्यादा भंग हो गई।”

“किसने भंग की?”

“इसी अतिथि चोर ने?”

“क्या कहते हैं आप मातामह?”

“वह चोर मेरे भाई माल्यवान् की पुत्री, तेरी बहन कुम्भीनसी में अनुरक्त हो गया।”

“सुपात्र है मधु दैत्य। उसे कुम्भीनसी देकर हमारा कुल सुपूजित होगा।”

“यह बात ही न रही पुत्र!”

“कैसे, क्या हमारी बहन कुम्भीनसी मधु को नहीं चाहती?”

“वह तो उसे हरण कर ले गया।”

“क्या मधु?” रावण के दोनों नेत्र जल उठे। उसके नथुने फूल गए। उसने विषधर सर्प की भांति फुफकार मारकर कहा—“क्या आपके रहते मातामह?”

“पुत्र, मैं तो भ्रम ही में रहा। फिर उस समय मैं एक गुरुतर राज-काज से द्वीप-समूहों में चला गया था।”

“और भाई कुम्भकर्ण?”

“वह सो रहा था।”

“विभीषण?”

“वह आकण्ठ जल में तप कर रहा था।”

“पुत्र मेघनाद?”

“यज्ञ में दीक्षित बैठा था।”

“मन्त्रिगण, राक्षस योद्धा, हमारे सेनापति?”

“उन्होंने विकट युद्ध किया, पर मधु ने सभी को परास्त किया। वह हमारे सुपूजित राजकुल के मस्तक पर लात मारकर बलात् हमारी कन्या का हरण कर ले गया, पुत्र!”

“वह हमारे सुरक्षित अन्तःपुर से बलपूर्वक हमारी बहन कुम्भीनसी को हरण कर ले गया, आप यह कहना चाहते हैं?”

“हां, पुत्र!”

“और भी कुछ है?”

“हां, विद्युज्जिह्व!”

“विद्युज्जिह्व? कौन है वह?”

“एक तरुण दानव है।”

“उसके सम्बन्ध में आप क्या कहना चाहते हैं?”

“वह लंका में आया है।”

“तो अवश्य ही आपने उसका समुचित सत्कार किया होगा।”

“नहीं किया, पुत्र!”

“नहीं किया?”

“हमारे ऊपर तुम गुरु भार सौंप गए थे—लंका से भी बढ़कर राजकुल की रक्षा का।”

“सो फिर?”

“राजकुल हमारी ही असावधानी से दूषित हुआ। मधु दैत्य...”,

“सो तो सुना, विद्युज्जिह्व की ही बात कहिए।”

“यह कहता हूं, वह इधर बहुधा आता-जाता रहा। उसने कहा—मृगया में मेरी अभिरुचि है।”

“इसमें दोष क्या है?”

“नहीं है। दोष की बात दूसरी है।”

“क्या?”

“वह शूर्पणखा में साभिप्राय दृष्टि रखता है।”

“तो?”

“हम मधु दैत्य का कटु अनुभव ले चुके थे। हमने विद्युज्जिह्व को अन्तःपुर से दूर ही रखा।”

“वह अब कहां है?”

“लंका ही में कहीं है।”

“शूर्पणखा बहन यदि उसे पसन्द करती है तो हम उसे विद्युज्जिह्व को दे देंगे।”

“आपकी बात दूसरी है, हम ऐसा करने में स्वतन्त्र न थे, हमने सावधानी रखी।”

“क्या आपने शूर्पणखा से भी बात की?”

“नहीं पुत्र, हम केवल मर्यादा रक्षक हैं।”

“क्या वह कभी यहां आता है?”

“छिपकर। शूर्पणखा से मिलने।”

“किन्तु आप?”

“उसे रोक नहीं सकते। बड़ा चतुर है, चपल भी।”

“मैं शूर्पणखा से बात करूंगा और जिसने मेरा कुल दूषित किया है, उसे दंड दूंगा। पुत्र मेघनाद कहां है?”

“निकुम्भला-उद्यान में यज्ञ-दीक्षित है।”

“तो वहीं मैं उससे मिलने जाऊंगा। मेरा रथ मंगवाइए।”

सुमाली ने कहा-‘अच्छा’ और वह वहां से चला गया। रावण ने विभीषण की पीठ पर हाथ फेरकर कहा—“भाई, कातर न हो। जाओ, तुम विश्राम करो।” और वह पुत्र मेघनाद से मिलने को उठा।