श्रेय और प्रेय
विप्रचित्त दानव की कन्या मालिनी भी नीलाम होने को आई थी। दानव-कन्या का रंग तपाए हुए स्वर्ण के समान और मुख शतदल कमल के समान था। कन्या की देहश्री उषा के आलोक की भांति मनोरम थी। उसके सुचिक्कण पद-चुम्बी केश भौंरों के समान काले थे। नेत्रों की उज्ज्वल ज्योति शुक्र नक्षत्र के समान थी और उसका मृदु हास शारदीय पूर्णिमा की अमल चांदनी-सा निर्मल था। उसका कण्ठ-स्वर वीणाविनिन्दित था, श्वास में पारिजात कुसुम का सौरभ था। वह षोडशी बाला वसन्त में खिले हुए फूलों से लदी-फदी एक लतिका के समान सुषमा रखती थी।
आसुरायण रैक्व असुर-याजक थे, वेदर्षि थे। श्रेय और प्रेय के रहस्य के ज्ञाता प्रसिद्ध थे। उनकी बड़ी भू-सम्पत्ति थी। विशाल हर्म्य, भूमि, हाथी, घोड़े, स्वर्ण, रत्न और बहुत-सी सुन्दरी, रूप-यौवन-सम्पन्न बालाएं उनके पास थीं। विविध भोगों का ऋषिवर आनन्द से उपभोग करते और दानवों, असुरों की सब सेवा-अर्चना ग्रहण करते थे।
रैक्व बहुत बूढ़े और कुरूप थे। दांत उनके सबके सब सड़-गल गए थे। शरीर का मांस लटक गया था। नेत्रों की ज्योति भी धुंधली पड़ गई थी, परन्तु काम-भोग में उनकी बड़ी रुचि थी। वे बहुत बढ़िया कौशेय के वस्त्र पहनते, स्वर्ण-आसन पर बैठते, उत्तम सुवासित सोमपान करते तथा तरुणी बालाओं का सान्निध्य-सुख भोगते थे। नए-नए यौवन उन्हें बहुत पसन्द थे।
कुमारिकाओं की जो नीलामी असुरों के माया नगर में वर्ष-नक्षत्र पर होती थी, उसमें याजकों तथा राजाओं के लिए सबसे प्रथम अपनी पसन्द की कुमारिकाएं चुनकर खरीद लेने की छूट होती थी। उनके चुन लिए जाने के बाद बची हुई कुमारिकाओं का सार्वजनिक नीलाम होता था। परन्तु एक नियम का पालन तो सर्वत्र ही होता था कि यदि कुमारिका खरीदार को स्वयं नापसन्द करे तो नीलाम रद्द हो जाता था। याजकों और राजाओं का भी कुमारिका की स्वीकृति के बिना नीलाम मंजूर नहीं होता था। आसुरायण रैक्व ने मालिनी को अपने लिए चुन लिया और नियत स्वर्ण-राशि नीलाम के अफसर के पास जमा कर दी, परन्तु कुरूप और बूढ़े रैक्व को मालिनी ने अस्वीकार कर दिया। फलतः उनकी बोली रद्द हो गई। इस पर आसुरायण रैक्व असंतुष्ट होकर चले गए। कोई अन्य कुमारिका उन्होंने नहीं खरीदी। इसी मालिनी को रैक्व से द्विगुण स्वर्ण देकर एक दानव राजा जानश्रुति ने खरीद लिया। जानश्रुति सुन्दर और तरुण था। उसकी बहुत भारी भू-सम्पत्ति थी। मालिनी ने मुस्कुराकर उसके हाथ बिकना स्वीकार कर उसे उपकृत कर दिया।
कालान्तर में जानश्रुति की इच्छा हुई कि श्रेय और प्रेय के रहस्य को जाने। उन दिनों असुरों और देवों को इस प्रकार के रहस्यों को जानने की बड़ी इच्छा रहती थी, परन्तु ये ऋषिगण उसे सदा एक गोपनीय रहस्य बनाए रहते थे। उसे बड़ी टाल-टूल और भारी दक्षिणा लेकर बड़ी अटपटी भाषा में बताया करते थे। वह राजा रैक्व के पास छः सौ गायें और बहुत-सा स्वर्ण, मणि, रथ, कौशेय और धन लेकर गया और उन आसुरायण रैक्व से याचना की कि वह यह भेंट स्वीकार करें और श्रेय और प्रेय का भेद उसे बता दें। पर रैक्व उस कुमारिका को भूले न थे। उसे राजा ने दुगुनी डाक देकर खरीद लिया था, इस कारण वे इस राजा से जले-भुने बैठे थे। उन्होंने उसकी मूल्यवान भेंट की ओर आंख उठाकर भी नहीं देखा और क्रुद्ध होकर कहा—“अरे शूद्र, जा भाग। यह हमको नहीं चाहिए।”
राजा निराश होकर लौट गया और ऋषि का अभिप्राय जान दोबारा एक हजार गाय, बहुत-सा धन और उस गांव का पट्टा, जिसमें ऋषि रहते थे तथा वही कुमारिका मालिनी लेकर ऋषि के पास फिर पहुंचा और प्रणाम कर कहा—“हे ऋषि, यह भेंट आपके लिए है। मुझे श्रेय और प्रेय का भेद बताइए।” कुमारिका का मुंह देखते ही बूढ़े ऋषि खुशी से खिल गए। उन्होंने कहा—“अरे शूद्र, आ बैठ, इस सुन्दर मुख-कमल की बदौलत सुन, श्रेय और प्रेय दो मार्ग हैं। श्रेय को विद्या और प्रेय को अविद्या कहते हैं। दोनों परस्पर-विरुद्ध हैं। श्रेय से निवृत्ति और निवृत्ति से मोक्ष होता है तथा प्रेय से प्रवृत्ति और प्रवृत्ति से जन्म-मरण होता है। धन, ऐश्वर्य आदि लौकिक सुखों का समावेश प्रेय में है और इन सबका त्याग श्रेय है। जा भाग, यह रहस्य इतना ही यथेष्ट है।”