रुद्र
यम की पत्नी वसु से आठ वसु उत्पन्न हुए, जिनमें सबसे ज्येष्ठ धर थे। धर के पुत्र रुद्र थे।
रुद्र के ग्यारह कुल चले। इन ग्यारह कुल के प्रवर्तक थे—1. अज एकपाद, 2. अहिर्ब्रध्न्य, 3. विरूपाक्ष, 4. त्वष्टा, 5. वीरभद्र, 6. भैरव, 7. हरमहेश्वर (शिव), 8. त्र्यम्बक, 9. सावित्र (कपाली), 10. शम्भू और 11. शर्व (पिनाकी)।
रुद्र के चार स्थान प्रसिद्ध हैं। प्रथम मूल स्थान मूजवान पर्वत हेमकूट (हिन्दू-कुश) का प्रत्यन्त पर्वत, जो पश्चिम कोहसुलेमान से बहुत उत्तर सफेद कोह (श्वेत गिरि-धवल) से भी उत्तर में है। यहां ही सोम होता था। इसी के पूर्व की ओर क्रौंचगिरि है, जिसे अब ‘कराकुरम’ कहते हैं। इसी का विदारण कुमार कार्तिकेय ने किया था। उमावन—शरवन इसी स्थान के आसपास है। यहां के आगे की वायु बहुत प्रचण्ड है। इसी से रुद्र को तूफानों का देवता कहा है। इस प्रदेश में मूजवान, महावृष, वाहलीक तथा मारुत् जातियां रहती थीं, जो आर्य न थीं। परन्तु मारुत् लोग देवराट् इन्द्र के सहायक हुए। दूसरा भद्रवट, कैलाश के पूर्व की ओर, लौहित्यगिरि के ऊपर है। उसके नीचे ब्रह्मपुत्र नदी बहती है। तीसरा कैलाश हिमाचल प्रदेश का—मानसरोवर के निकट का स्थान।
पर्शिया के एक प्रान्त में ‘शंकरा’ जाति अब भी निवास करती है। पुराणों में रुद्र को मरुतों का पूर्वज माना गया है। रुद्र को वृषभ के समान शक्तिमान् तथा दुर्धर्ष तेजवाला बताया गया है। यह जरारहित, स्थिर-यौवन तथा सर्वाधिपति माना गया है। ऋग्वेद से यह भी पता लगता है कि उसके होंठ सुन्दर थे, रंग बादामी था, वह सिर पर बड़े-बड़े बाल रखता था, शरीर उसका सूर्य के समान देदीप्यमान था, वह प्रचण्ड धनुर्धारी योद्धा था।
असीरिया के फ्रीजिया देश में ‘सेवा’ या ‘सेवाजियः’ नाम के देवता की उपासना होती है। वहां तथा मिस्र में भी ‘सेवा’ देवता के साथ सर्प का सम्बन्ध जोड़ा गया है। अमेरिका के पेरु प्रदेश में सिवु देवता पूजा जाता है। यह सब शिव की ही पूजा है। पैलेस्टाइन देवों का ‘पाल’ नामक धाम था, जो दैत्यों ने छीन लिया था, उसी के उद्धार के लिए शिव ने त्रैपुर युद्ध किया था। डेड-सी—मृत्यु सागर ही वह स्थान है जहां त्रैपुर के मृत वीरों का जल-प्रवाह किया गया था।
मसीह से पूर्व 2189 में मिस्र के महिदेव कपोत थे, जो मिश्राइज्म के नेता भी थे। इन्हें वहां के फरोहा ने देश-निकाला दिया था। तब शिस्तान के राजा शिवि ने उन्हें आश्रय दिया था। इस प्रसिद्ध ऐतिहासिक घटना को पुराणों की इस विख्यात आख्यायिका से मिलाइए कि शिवि ने कबूतर के बदले अपना मांस दिया। कपोत जाति को कबूतर बना दिया गया। यह शिवि राजा भी रुद्रों के वंश में थे। शेष रुद्रों का विस्तार सारी सुर और असुर-भूमि में हुआ और वे सभी सुरों और असुरों में समान भाव से पूजित हुए।