उत्तरकोशल: The Kingdom and its Conflicts

अयोध्या की मुख्य उत्तर कोशल की गद्दी पर जिस समय दशरथ अबाध शासन कर रहे थे, उसी समय उत्तर कोशल-वंश के कुछ शाखा-राज्य भी बहुत सम्पन्न थे, जिनका उल्लेख हम कर चुके हैं। इन्हीं में एक राज्य अनरण्य ने स्थापित किया था। यह अनरण्य राजा दशरथ से छहः-सात पीढ़ी प्रथम सिन्धु द्वीप राजा का पुत्र था। यह राज्य कान्यकुब्ज के निकट कहीं था। इस शाखा का त्रैयारुण राजा वेदज्ञ और प्रतापी था। त्रैयारुण का पुत्र सत्यव्रत था, जिसका त्रिशंकु नाम युवराज-काल ही में प्रसिद्ध हो चुका था। इसका कारण यह था कि उससे तीन गुरुतर अपराध हो चुके थे। प्रथम तो उसने एक ऋषि की नवपरिणीता वधू के साथ बलात्कार किया। दूसरे, चाण्डालों के साथ रहने तथा खाने-पीने लगा। तीसरे, कुलगुरु वशिष्ठ की एक गाय मारकर वह खा गया। इन तीन गुरुतर अपराधों के कारण उसके पिता ने उसे त्रिशंकु का दुर्नाम दिया और कुलगुरु वशिष्ठ की सलाह से उसे यौवराज्य-पद से च्युत कर दिया। त्रिशंकु पिता का कोपभाजन तथा राज्याधिकार से च्युत होकर वन में भाग गया।

कालान्तर में त्रैयारुण की मृत्यु हुई परन्तु त्रिशंकु को राज्य नहीं मिला। मंत्री, वशिष्ठ ही राज चलाने लगे। इसी समय एक भयंकर बारह वर्ष का अकाल पड़ा, जिससे प्रजा वशिष्ठ से असन्तुष्ट हो गई। इस समय घात पाकर कान्यकुब्ज नरेश विश्वामित्र ने इस राज्य पर आक्रमण कर दिया। वशिष्ठ ने शबरों और म्लेच्छों की सेना संग्रह कर विश्वामित्र को पराजित किया। युद्ध में पराजय से लज्जित और लांछित होकर विश्वामित्र अपने राज्य में नहीं लौटे—वन में चले गए। राज्य पर उनका पुत्र अधिकारी हो गया। वन में त्रिशंकु ने विश्वामित्र की अच्छी आवभगत की। उन्हें बहुत सहायता पहुंचाई। उनके परिवार का पालन किया। इसके बाद विश्वामित्र और त्रिशंकु के सम्मिलित उद्योगों से त्रिशंकु अपने पिता की गद्दी पर आसीन हुआ। इस पर वशिष्ठ त्रिशंकु और विश्वामित्र दोनों ही के वैरी बन गए, परन्तु राज्य के मंत्री और पुरोहित बने ही रहे। कुछ दिन बाद त्रिशंकु ने यज्ञ करना चाहूँ, परन्तु वशिष्ठ ने यज्ञ कराने से साफ इन्कार कर दिया। इस पर त्रिशंकु ने विश्वामित्र से ऋत्विज बनकर यज्ञ कराने को कहा। विश्वामित्र राजी हो गए। परन्तु वशिष्ठ का विरोध साधारण न था। वे एक सहस्र बटुकों के कुलपति थे। वेद-निर्माता ऋषि थे। राजमन्त्री थे। उनके प्रभावों से कोई ऋषि और देवता त्रिशंकु के यज्ञ में नहीं आया। इस पर विश्वामित्र ने कुपित होकर कहा—‘मैं नए देवताओं की स्थापना करूंगा।’ अन्त में देवताओं ने यज्ञ-भाग ग्रहण किया, परन्तु इस राज्य की पुरोहिताई वशिष्ठ ने छोड़ दी—विश्वामित्र उसके पुरोहित हो गए।

वह राज्य त्यागकर वशिष्ठ उत्तर पांचाल-नरेश सुदास के राज्य में पहुंचे और उस राजा के मंत्री और पुरोहित बन गए। दश राजाओं के युद्ध में वशिष्ठ ने सुदास की बड़ी सहायता की। उसे जिताया तथा अपने हाथ से उसका राज्याभिषेक किया। परन्तु कुछ काल बाद यहां भी विश्वामित्र ने बाधा उपस्थित कर दी। सुदास ने यज्ञ कराने को विश्वामित्र को बुलाया। यज्ञ के मध्य में वशिष्ठपुत्र शक्ति ने विश्वामित्र को निरुत्तर कर दिया। इस पर विश्वामित्र ने शक्ति को अवसर पाकर जीवित ही जलवा दिया। झगड़ा इतना बढ़ा कि सुदास ने वशिष्ठ परिवार के सौ पुरुषों को मरवा डाला।

अब वशिष्ठ खिन्न होकर दक्षिण कोशल-नरेश कल्माषपाद के यहां चले गए। वहां विश्वामित्र ने एक विचित्र युक्ति की। किंकर नामक एक राक्षस को राजा का अन्तरंग मित्र बना दिया। उसके संसर्ग से उस राजा को नर-मांस खाने का चस्का लग गया और उस राक्षस की सलाह में आकर राजा कल्माष-पाद वशिष्ठ के सब पुत्रों को खा गया।

वशिष्ठ वहां से भी हटकर अब हस्तिनापुर के राजा संवर्त के राज्य में आए। संवर्त को एक बार सुदास ने युद्ध में हराया था। वही वैर उकसाकर वशिष्ठ ने संवर्त को सुदास से भिड़ा दिया, जिसमें सुदास मारा गया।

इसके बाद वशिष्ठ फिर उत्तर कोशल की अपनी जगह पर आ गए। इस समय तक त्रिशंकु की मृत्यु हो चुकी थी और अब उनके पुत्र हरिश्चन्द्र राज्याधिकारी हुए थे। हरिश्चन्द्र बड़े योद्धा और दानी थे। उन्होंने अश्वमेध यज्ञ किया। यज्ञ में उन्होंने विश्वामित्र को बुलाना चाहा, परन्तु वशिष्ठ ने इसका घोर विरोध किया। विश्वामित्र ने भी वह सुना। इस अपमान को उन्होंने मन ही में रखा। इसी समय एक विचित्र घटना घटी। हरिश्चन्द्र के कोई पुत्र नहीं हुआ। तब उन्होंने वरुण की उपासना की और प्रतिज्ञा की कि मैं प्रथम पुत्र को वरुण को बलि दूंगा। कालान्तर में पुत्र उत्पन्न हुआ और उसका नाम रोहिताश्व हुआ। परन्तु हरिश्चन्द्र ने वरुण को पुत्र की बलि नहीं दी। इससे उसे जलोदर का रोग हो गया और उसका कारण ‘संकल्प-छेदन’ से वरुणदेव का कोप ही माना गया। बहुत सोच-विचार के उपरान्त वशिष्ठ की सलाह से यह निर्णय हुआ कि पुत्र के स्थान पर किसी अच्छे कुल का दूसरा लड़का बलि देने से भी वरुणदेव संतुष्ट हो सकते हैं। इस पर खोज-खाजकर भृगुवंशी अजीगर्त वेदर्षि को लाया गया और उसने एक हजार गाय लेकर अपने मंझले पुत्र शुनःशेप को बलि होने के लिए बेच दिया।

सम्भवतः इस कार्य में वशिष्ठ की अभिसन्धि थी, क्योंकि यह बालक विश्वामित्र का भागिनेय था। बालक विश्वामित्र के पास जाकर बहुत रोया-पीटा और कहा—मेरे दुष्ट लालची पिता ने मुझे बलि होने के लिए बेच दिया है, आप मुझे बचाइए।

विवश विश्वामित्र यज्ञ में आए। चालाकी से वशिष्ठ इस यज्ञ में ऋत्विज नहीं बने थे। अयास्य-आंगिरस को बनाया था। जब बालक को लाल वस्त्र पहनाकर बलिस्थल पर लाया गया, तो कोई पुरोहित उसे यूप से बांधने को राजी नहीं हुआ। जिस पर अजीगर्त वेदर्षि ही और गायें लेकर इस काम को भी तैयार हो गया और उसने लड़के को यूप से बांध दिया। परन्तु विश्वामित्र के प्रभाव से वरुण ने बिना बलि के यज्ञ की पूर्णता मान ली और शुनःशेप बच गया। बच जाने पर अजीगर्त वेदर्षि—‘हा पुत्र! हा पुत्र!’ कहकर उसकी ओर दौड़ा। तब उस बालक ने घृणापूर्वक उसे पिता मानने से इन्कार कर दिया और वह विश्वामित्र का पुत्र बन गया।