दाशराज-संग्राम

नाहुषों द्वारा देवलोक को अधिकृत करने की बात पाठक भूले न होंगे। नहुष को जब अपमानित करके देवों ने देवलोक से निकाल दिया तो उसके भाई रजि ने नाहुषों को लेकर बलात् उस पर अधिकार कर लिया। रजि और देवों में घनघोर युद्ध हुआ, जिसमें असुरों-दैत्यों ने रजि का साथ दिया। असल में दैत्यों का असुर-भूमि—अपवर्त—से एक प्रकार से बहिष्कार ही हो गया था। इससे देवों के प्रति असुर इस प्रकार खीझ गए थे कि वे युद्ध का कोई अवसर ही न चूकते थे। नाहुषों के प्राबल्य और असुरों के सब राज्यों की सहायता से बलिष्ठ नाहुष देवभूमि को छोड़ते न थे। उनके भय और अत्याचारों से तंग प्रताड़ित देव मारे-मारे फिरते थे। इन्द्र की भी बड़ी दुर्दशा हो गई थी। वह सर्वत्र मुंह छिपाता फिर रहा था। अब उसने पैजवन सुदास को उभारा। पाठक जानते हैं कि वृत्र-युद्ध में सुदास को इन्द्र ने मित्रवत् माना तथा उसे राज्याधिकार दिया था। सुदास इन्द्र के इस उपकार को भूला न था। फिर इन्द्र ने वशिष्ठ को समझा-बुझाकर सुदास के पास भेज दिया था। वशिष्ठ के कहने से सुदास इन्द्र के लिए युद्ध करने को सन्नद्ध हो गया। परन्तु केवल इन्द्र ही के लिए नहीं सुदास ययाति-पुत्रों के राज्य-विस्तार को भी सहन नहीं कर सकता था।

रावी नदी का नाम उन दिनों परुष्णी था। परुष्णी के दोनों किनारों पर सुदास का राज्य था, जो उत्तर पांचाल राज्य कहाता था। सुदास पिजवन के पुत्र थे। पिजवन राजा न थे, परन्तु प्रचण्ड युद्धकर्ता थे। सुदास को प्रसिद्ध वैदिक विजयी महाराज दिवोदास ने गोद लिया था तथा अपना पुत्र बनाया था। दिवोदास मुद्गल के पुत्र वध्र्यश्व के पुत्र थे। ये वध्र्यश्व विदर्भ के राजा नल के नवासे थे। पांचाल देश में मुद्गल, सृञ्जय, बृहद्रिपु, कृमिलाश्व और जयीनर के खण्डराज्य थे, जिनके प्रमुख सुदास थे। सुदास को गौरव इन्द्र की सहायता से ही प्राप्त हुआ था। अब वही इन्द्र देवलोक से भ्रष्ट हो मारा-मारा फिर रहा था। संवर्ण का राज्य इनकी राज्य-सीमा से मिला हुआ था। उधर आर्यावर्त पर ही देवलोक की भांति नाहुषों का प्राबल्य हो रहा था। जो सीमाएं ययाति ने पुत्रों को दी थीं, वे उनसे सन्तुष्ट न थे। इन सब कारणों से दाशराज महासंग्राम की भूमिका बंधी। नहुषवंशियों ने यदु, तुर्वशु, अनु और द्रुह्यु थे तथा नाहुषों के सहायतार्थ मनुर्भरत और बहुत-से अनार्य राजा एकत्र हुए थे। इन अतिरिक्त नाहुषों के झण्डे के नीचे भार्गव, पुरोदास, पक्थ, भलान, आलन, शिव, विशात; कवष, युध्यामधि, अज, शिग्रु और चक्षु आए थे। दानव वार्चिन अपने एक लाख दानवों को लेकर आया था। बहुत से सिम्यु जाति के मुखिया भी आए थे। केवल पौरवों ने इस युद्ध में भाग नहीं लिया था। दस्युराज वार्चिन ही इस संयुक्त महासैन्य का नेता था।

सुदास की सहायता इन्द्र और अनेक आर्य राजाओं ने की। इस तुमुल संग्राम में नाहुषों ने रावी नदी को दो भागों में विभक्त करके उसे पार करने की चेष्टा की, किन्तु सुदास ने तत्काल धावा बोल दिया जिससे दबाव में पड़कर नाहुषों की बहुत-सी सेना नदी में डूब मरी। कवष और द्रुह्यु वंशी डूब मरे। अनु और द्रुह्युओं के छियासठ सेनानायक और छह हजार वीर सेनापति खेत रहे। राजा वार्चिन के एक लाख पांच सौ सैनिक मारे गए। इस युद्ध में सात दुर्ग सुदास के हाथ लगे। युध्यामधि का उसने युद्धस्थल में वध किया। अब शिग्रु और चक्षु ने अधीनता स्वीकार कर ली। भृगु लोग सर्वथा परास्त हो गए। तुर्वशु, और याह्व का अहंकार चूर्ण हुआ। कुछ नाहुषों ने कर देना स्वीकार किया। पुरोदास, भृगु और द्रुह्यु ने अधीनता स्वीकार कर ली। इस युद्ध में इक्कीस जातियों के वैकर्ण पराजित हुए। सुदास ने शत्रुओं के सात दुर्ग और जीती हुई सामग्री त्रस्यु को दे दी। अज, शिग्रु और चक्षु ने सुदास को कर दिया।

प्रिव के पचास हजार मनुष्य मारे गए। इस युद्ध में धनुष, बाण, खड्ग, ढाल, कवच, शिलाप्रक्षेपक और आग्नेयास्त्रों का प्रयोग हुआ। बरछों और भालों का भी प्रयोग हुआ। निशित बाण चलाए गए। इस युद्ध को जय कर सुदास ने पूर्व की ओर बढ़कर भेद से युद्ध किया। भेद के साथ अज, शिग्रु और पक्थों ने यमुना के कछार में सुदास का सामना किया, परन्तु पराजित हुए। भेद का भारी खजाना लूट लिया गया और किले छीन लिए गए। युद्ध की समाप्ति पर विजयोत्सव हुआ, जिसमें पराशर, वशिष्ठ और सत्ययात को बहुत-सा दान दिया गया। देववात अभ्यावर्तिन चायमान ने यव्यावती नदी पर वृचीवनों को हराया तथा सृञ्जय को तुर्वशु का देश दिया। चायमान ने बीस घोड़े तथा दासियां भारद्वाज को दीं। ये चायमान मनुर्भरतों में पृथुवंशी थे। दिवोदास ने भी भरद्वाज को धनी बना दिया। सृञ्जय के पुत्रों ने भी भरद्वाज को दान-मान से सत्कृत किया। इस प्रकार यह उस काल का सबसे बड़ा युद्ध समाप्त हुआ, जिसका बड़ा भारी सांस्कृतिक प्रभाव आर्यों और आर्यावर्त पर पड़ा।

वशिष्ठ ने इस युद्ध में सुदास की बहुत सहायता की थी। सुदास ने भी उन्हें बहुत धन, गौ-दान दिया। परन्तु किसी कारण से वशिष्ठ उनसे नाराज होकर पौरव संवर्ण के पास चले गए। संवर्ण को एक बार सुदास हरा चुके थे। वही वैर उभाड़कर वशिष्ठ उसे सुदास पर चढ़ा लाए। तब संवर्ण ने युद्ध क्षेत्र में सम्मुख युद्ध में सुदास का वध किया।

अब उत्तर पांचाल में अजमीढ़ के पुत्र बृहदश्व ने दक्षिण पांचाल का नया राज्य स्थापित किया। भरत के पौत्र सुहोत्र ने काशी में एक पौरव राज्य की स्थापना की थी, जिसे दुर्दम हैहयों ने आक्रान्त किया। पीछे प्रतापी प्रतर्दन तालजंघ के पुत्र वीतिहव्य को हैहयों की राजधानी में घुसकर हराया। पीछे वीतिहव्य ऋषि हो गए। प्रसिद्ध वेदर्षि गृत्समद् वीतिहव्य के दत्तक पुत्र हुए। प्रतर्दन राम के राज्यारोहण में भी आए थे। प्रतर्दन के पुत्र वत्स ने प्रतिष्ठानपुर के कौशाम्बी प्रान्त को अपने राज्य में मिला लिया। काशी की शाखा में सुहोत्र के पुत्र बृहत् ने कान्यकुब्ज में पौरव राज्य की स्थापना की। इन्हीं के पुत्र जह्नु थे, जिन्हें प्रतापी सूर्यवंशी मान्धाता की पौत्री ब्याही थी। यदु को चम्बल, बेतवा और केन वाला प्रदेश मिला था। इससे दो पुत्र हुए—क्रोष्टु और सहस्रजित्। इनके दो वंश चले—पहले से यादव-वंश, दूसरे से हैहय-वंश। वे यज्ञ नहीं करते थे तथा उन्होंने असुरों से विवाह-संबंध स्थापित किए थे। यदुवंशी हर्यश्व मधु दैत्य का दामाद हुआ। पीछे इस वंश में शशिबिन्दु प्रसिद्ध यज्ञकर्ता हुआ। इसके पुत्र ज्यामघ ने दक्षिण में ऋक्ष पर्वत पर मृत्तिकावती बसाकर राजधानी बनाई। हैहयों ने अपने भाई-बन्द यादवों से उनके पैतृक राज्य छीनकर सांहजनी और माहिष्मतीपुरी बसाई। पीछे सूर्यवंशी शर्यात भी इन्हीं में मिल गए। इसके बाद भार्गवों से हैहयों का विग्रह हुआ। तुर्वशु का वंश उत्तरी बिहार में राज्य करने लगा। इस वंश में प्रसिद्ध यज्ञकर्ता मरुत् चक्रवर्ती हुआ। इन्होंने दीर्घतमा ऋषि के चाचा संवर्त से यज्ञ कराया। इन्हें ही हिमालय में भारी खजाना मिला। मरुत् से कुछ ही पूर्व मान्धाता ने पौरव कुल को राज्यच्युत किया था। अब मरुत् ने अपना तुर्वशु वंश राजकुमार दुष्यन्त को गोद लेकर पौरव कुल में मिला दिया। इस वंश की शाखाएं—पाण्ड्य, चोल और केरल—दक्षिण में फैल गईं।

द्रुह्यु के वंशधर अंगार को आगे मान्धाता ने पराजित किया। इससे यह वंश और पीछे हटकर गान्धार तक पहुंचा। पीछे इन्होंने मान्धाता के पुत्र पुरुकुत्स को सपरिवार बन्दी बनाया। बन्दी-अवस्था में ही त्रसदस्यु का जन्म हुआ। समय आने पर इसी त्रसदस्यु ने द्रुह्युओं को चम्बल के किनारे करारी हार दी। इसके बाद यह वंश और भी पश्चिम की ओर हटकर म्लेच्छ देश में चला गया। कुछ द्रुह्यु वंशी महाभारत में आ बसे, जहां वे भोज कहलाए। अनु को गंगा-यमुना के द्वाबे का उत्तरी भाग मिला था। इस वंश का राजा महामनस पंजाब की ओर बढ़ा। वह चक्रवर्ती तथा सात समुद्रों का स्वामी प्रसिद्ध हुआ। इसने सिन्धु, सौवीर, कैकेय, मद्र, वाह्लीक, शिव और अम्बष्ठ राज्यों की स्थापना की। इस वंश के राजकुमार तितिक्षु ने पूर्व की ओर आकर अंग राज्य वर्तमान भागलपुर के निकट स्थापित किया। इसी वंश के राजा बलि की रानी सुदेष्णा को अन्धे वेदर्षि दीर्घतमा ने वीर्यदान दे पांच पुत्र उत्पन्न किए जो क्रमशः अंग, बंग, कलिंग, सुम्ब और पौण्ड्र राज्यों के संस्थापक हुए। इसी वंश के प्रसिद्ध नरेश लोमपाद दशरथ के मित्र थे।

दीर्घतमा, वीतिहव्य, जमदग्नि, राम, परशुराम, शिवि, यदु, द्रुह्यु, अनु और तुर्वशु नाम वेद में बहुत विख्यात हैं। गान्धार में रावलपिण्डी और पेशावर के जिले लगते थे। उसमें तक्षशिला और पुष्करावती प्रमुख थे। आजकल इसे चारसद्दा कहते हैं। कैकेय लोग गान्धार और व्यास के मध्यवर्ती क्षेत्र में थे। उशीनर, कैकेय और मद्रक आनव ही थे। यह वंश देर तक मध्य पंजाब में राज्य करता रहा। उत्तर मद्र हिमालय के उस पार था। दक्षिण मद्र का राज्य स्यालकोट के निकट था। इन राज्यों की पांच श्रेणियां थीं—साम्राज्य, भौज्य, स्वराज्य, वैराज्य और राज्य। उन दिनों राजाओं की रानियों की भी चार श्रेणियां थीं—स्वराज्य, महिषी, परिवृत्ता, बावाता, पालागली—मुख्य रानी महिषी, प्रेमहीना परिवत्ता, मुख्य प्रेमिका बावाता और अन्तिम—मन्त्री की कन्या—पालागली। महान सम्राट का ऐन्द्राभिषेक होता था। इन बड़े-बड़े राजवंशों के अतिरिक्त उस काल में गान्धार, मूजवन्त, मत्स्य तृत्सु, भरत, भृगु, उशीनर, चेदि, क्रिवि, पांचाल, कुरु, सृञ्जया, धर, पारावत आदि वंशों की अनेक छोटी-बड़ी गद्दियां भरतखण्ड में स्थापित थीं।