देवेन्द्र-नहुष
इन्द्र के इस प्रकार पलायन करके छिप जाने से देव-लोक में अव्यवस्था फैल गई। अन्त में देवों ने नहुष को ही ऐन्द्राभिषेक कराकर इन्द्रासन पर बैठा दिया। सभी दैव-दैत्य, ऋषि, पितृगण, दानव और असुरों ने एकमत हो चक्रवर्ती नहुष को इन्द्र स्वीकार कर लिया। इन्द्र-पद पाकर अब राजर्षि नहुष त्रिभुवन के स्वामी हो गए। वे अप्सराओं के साथ नन्दनवन में विहार करने लगे। उन्होंने कैलास, हिमवान्, मन्दराचल, श्वेतपर्वत, सह्याद्रि, महेन्द्र, मलय आदि पर्वतों, समुद्रों, नदियों में विविध भांति विहार किया। सब प्रकार ऐश्वर्य और विलास के साधन पा, दिव्यांगनाओं और अप्सराओं से सान्निध्य में रहकर महावीर्यवन्त नहुष क्रीड़ा और कामभोग में रत रहने और सोमपान करने लगे।
अब उन्होंने इन्द्राणी पौलोमी शची को शृंगार करके अपनी शय्या पर आने की आज्ञा दी। परन्तु पौलोमी शची ने नहुष की अंकशायिनी होना स्वीकार नहीं किया। उसने कहा—“मैं अपने प्रिय देवराट् इन्द्र की पत्नी हूं। मैं उसी की शय्या पर आ सकती हूं।”
नहुष ने कहा—“मैं ही अब देवराट् इन्द्र हूं। मैं देवलोक और मनुष्य-लोक का स्वामी हूं। इन्द्राणी अब मेरी भोग्या है। यह मर्यादा के विपरीत नहीं है।”
इन्द्राणी ने कहा—“आपने मेरे पति को न युद्ध में जीता है, न उसने मुझे जुए के दांव में हारा है। फिर कैसे आप मुझ पर अधिकार रखते हैं?”
किन्तु नहुष ने अपना हठ नहीं छोड़ा। देवों ने समझा-बुझाकर पौलोमी शची को नहुष के पास भेजने का निश्चय कर लिया। देव-याजक आंगिरस बृहस्पति ने भी नहुष को समझाया कि पौलोमी शची के साथ बलात्कार करना ठीक नहीं है। परन्तु नहुष ने यही कहा—“वह मेरी विजित वस्तु है। उस पर मेरा वैसा ही अधिकार है, जैसा इन्द्र के इन्द्रासन पर।”
आंगिरस बृहस्पति ने कहा—“देवराज, प्रसन्न होकर क्रोध रोकिए। प्रसन्न हूजिए। इन्द्राणी पुलोमा दैत्यराज की पुत्री है। उसने देवराट् का वरण किया था। इसलिए आप उस पर बलात्कार न करें।”
नहुष ने कहा—“देवराट् बड़ा ही निन्दित, गर्हित पुरुष था। उसने पितृवध किया, यतियों को कुत्तों को खिलाया और ब्रह्महत्या की। मैं देवराट् हूं, फिर क्यों नहीं शची मुझे पतिभाव से ग्रहण करेगी? क्या मैं इन्द्र नहीं हूं?”
बृहस्पति ने कहा—“आप महातेजवान् हैं, इन्द्र से भी बढ़कर हैं?”“तो शची को मेरी शय्या पर आना चाहिए।”
विवश देवों ने शची को नहुष के पास भेज दिया। क्रोध और शोक से अभिभूत शची पौलोमी आंसू बहाती नहुष के पास जा खड़ी हुई। परन्तु उसने नहुष की शय्या का आरोहण स्वीकार नहीं किया। नहुष के आग्रह और अनुनय सभी को उसने अस्वीकार कर दिया।
उधर नहुष के इस कार्य से देव, दैत्य, ऋषि सभी अप्रसन्न हो गए। अन्त में देवों ने मिलकर नहुष को इन्द्रपद से च्युत कर दिया और उसे देवलोक से निष्कासित कर दिया।
नहुष का छोटा भाई रजि बड़ा पराक्रमशील तरुण था। उसने देवासुर-संग्राम में देवों का पक्ष लेकर विकट युद्ध किया था। देवासुर-संग्राम से प्रथम रजि से दैत्यों ने अपने पक्ष में होकर युद्ध करने की प्रार्थना की थी। तब रजि ने यह शर्त रखी थी कि यदि दैत्य मुझे अपना इन्द्र बनाएं तो मैं अपने सौ परिजनों सहित उनका पक्ष लेकर देवों से युद्ध करूं। परन्तु दैत्यों ने स्पष्ट कह दिया कि हमारा इन्द्र प्रहलाद है और हम उसी के इन्द्रपद के लिए देवों से युद्ध करते हैं। इस पर रजि ने देवों का पक्ष लिया। इन्द्र ने रजि से कहा—“आप ही सब देवों के इन्द्र हैं और मैं आपका पुत्र हूं। इससे प्रसन्न होकर रजि ने इन्द्र के लिए युद्ध किया। पर पीछे इन्द्र के भाग जाने और त्रिशिश को मरवा डालने के कारण देवों और ऋषियों ने उसके बड़े भाई नहुष को ही इन्द्र बना दिया था। अब नहुष को इन्द्रासन से च्युत कर देवलोक से निकाल देने पर क्रुद्ध होकर रजि ने इन्द्रासन पर जबर्दस्ती अधिकार कर लिया और अपने सौ परिजनों को देवलोक की सारी व्यवस्था दे दी। उसके भय से इन्द्र इधर-उधर मारा-मारा फिरने लगा। तब उसने आंगिरस बृहस्पति से कहा—“हे देवगुरु, आप किसी तरह रजि से मेरा इन्द्रासन मुझे दिलाइए।” बृहस्पति ने तब युक्ति कर चार्वाक-दर्शन का निर्माण किया, जिसमें वाद-प्रतिवाद-प्रयोजन से संयुक्त, वेद-विरोधी तर्कों और अतितर्कों से संयुक्त हेतुवाद निहित था। उसने उसी के अनुसार राज-काज चलाने की रजि को सलाह दी। इसके परिणामस्वरूप रजि से सब देव-ऋषि बिगड़ गए और उसके परिजनों में भी रागद्वेष उत्पन्न हो गया, उनमें फूट पड़ गई। फलस्वरूप फिर बारहवां देवासुर-संग्राम हुआ।
इस प्रकार बारह देवासुर-संग्राम होने के बाद रजि की जय के साथ उनकी समाप्ति हुई। ये देवासुर-संग्राम तीन सौ वर्षों तक निरन्तर चलते रहे और परिणाम अन्त में यह हुआ कि देवों तथा दानवों का सारा भाईचारा टूट गया। वे दायाद-बान्धव न रहकर अब पृथक् स्वतंत्र जातियों में विभाजित हो गए। उनके पारस्परिक रोटी-बेटी-सम्बन्ध भी बन्द हो गए।