इन्द्र

यदि आप ध्यान से पर्शिया के नक्शे के पश्चिम की ओर झुकते हुए उत्तर में काश्यप सागर के निकटवर्ती भूखण्ड पर नजर डालेंगे, तो आप देखेंगे कि काश्यप सागर का सम्पूर्ण दक्षिणी तट काकेशस पर्वत-श्रेणियों की श्रृंखला से आच्छादित है। यहीं पर जार्जिया प्रदेश है और उसी के नीचे उपत्यकाओं में एक स्थान ‘अजरबेजान’ है, जो आजकल सोवियत राज्य की सीमा में है। इसका प्राचीन नाम ‘आर्यवीर्यान्’ था।

प्रलय के बाद इस स्थान का नाम आर्यवीर्यान् इसलिए पड़ा कि प्रलय के बाद ही इस भूखण्ड पर वरुण के नेतृत्व में आदित्यों ने प्रलय में बचे हुए परिवारों को स्थापित किया था। यहीं पर अत्रि नदी है, जिसके तट पर प्रलय के बाद अत्रि ऋषि ने अपना उपनिवेश स्थापित किया था। अत्रि भृगुपुत्र शुक्र के पुत्र थे। शुक्र भी दैत्यों के याजक थे। आजकल, काकेशस पार्वत्य प्रान्त प्राचीन काल में ‘देमाबन्द’ कहलाने लगा था, जो देवस्थान का बिगड़ा हुआ रूप था, और जिसके सम्बन्ध में इस परिच्छेद में चर्चा की जाएगी।

जिस स्थान पर अत्रि का उपनिवेश था, उसका नाम अत्रिपत्तन था। आज वह स्थान ‘एट्रोपेटन’ के नाम से प्रसिद्ध है। इस प्रदेश में जो नदी ‘आट्रीक’ प्रसिद्ध है, वह नदी हमारे पुराणों में विख्यात अत्रि नदी थी। अत्रि की यह भूमि तपोवन या तपोभूमि कहाती थी। इसी स्थान पर आज भी ‘वन’ नाम का प्राचीन नगर है। मार्के की बात है कि इस ‘एट्रोपेटन’ प्रदेश का ‘देमाबन्द’ पर्वत सारे संसार में एक ऐसा स्थान है जहां रात-दिन सूर्य अस्त नहीं होता। रात-दिन प्रकाश रहता है। इस तपोभूमि को आजकल ‘तपुरिया’ प्रान्त कहते हैं, जो वास्तव में तपुपुरी का बिगड़ा हुआ रूप है। ईरान के निवासी इस स्थान को ‘पैराडाइज’ या स्वर्ग कहते हैं। इसके आस-पास का प्रदेश ‘मीडिया’ प्रदेश के नाम से प्रसिद्ध है। पुराणों में अत्रि का स्थान—‘परेण हिमवन्तम्’ कहा है। इसका अर्थ ‘अपवर्त’ है। पर्शियन इतिहास में एट्रोपेटन और अजरबेजान को आट्रीक नदी के तीर पर काश्यप सागर के निकट बताया गया है। यहीं पर बैकुण्ठ, बहिश्त और सत्यलोक भी था। पुराणों में इस भूमि को ‘कामधराधरा’ कहा गया है। जिसके समर्थन में पर्शियन इतिहासकार इसे उपजाऊ फलों से लदी हुई बताते हैं। यहीं सोम पैदा होता था। यहीं कल्पतरु थे, जो यथेष्ट फल देते थे। यहां के निवासियों की जाति और गोत्र आज भी अत्रियस है।

यहीं पर, अपवर्त में तपोभूमि के निकट काश्यप सागर-तट के किसी ग्राम में किसी कौशिक ग्रामपति के वीर्य से एक कन्या को गर्भ रह गया। उसने अपवाद के भय से छिपकर किसी गोशाला में चुपचाप पुत्र को प्रसव किया। बालक के जन्म के बाद उसके पिता ने न पुत्र को स्वीकार किया, न उस कन्या को। उसने बालक को मार डालने की चेष्टा की।

आयु पाकर उस बालक ने पैर पकड़कर पिता को मार डाला और स्वयं उस ग्राम का पति बन गया। शीघ्र ही यह साहसी, पराक्रमी वहां के आदित्यों का नेता बन गया।

वरुण और विष्णु को उसने अपने ऊपर प्रसन्न कर लिया, और अपने इलाके के पश्चिम प्रदेश के मित्तन्नु और उरु, उमा, आदि बेबीलोनिया जाति के जत्थेदारों से उसने मित्रता कर ली। परन्तु उत्तर के दैत्य और दानव उसके विरोधी हो गए और उनसे उसके विग्रह भी प्रारम्भ हो गए।

इस साहसी तरुण ने इन्द्र की पदवी धारण की। उसने अपने पड़ोसी और मित्र बेबीलोनियन सम्राटों की भांति अपने को देव कहना प्रारम्भ कर दिया। बेबीलोनियन सम्राट देव कहाते थे तथा सोमपान का भारी उत्सव किया करते थे; उन्हीं की देखा-देखी इन्द्र ने देवभूमि में अपनी पूजा प्रचलित की तथा बेबीलोनियन लोगों की भांति सोमपान की परिपाटी देवों में चलाई। अब तक उस प्रान्त के सब अदिति-पुत्र आदित्य ही कहाते थे; अब उसने उस भूमि का नाम देवभूमि रखकर देवभूमि के सब निवासियों को ‘देव’ संज्ञा दे दी, और वह स्वयं देवराट् बन गया।

इस समय तक वेदों की कुछ ऋचाओं का निर्माण हो चुका था, और कुछ ऋषि ऋचाओं का निर्माण करते जाते थे। इसी काल में मैत्रावरुण वशिष्ठ ने ऋग्वेद की कुछ ऋचाओं का निर्माण किया था और एक विशिष्ट वैदिक विधि आदित्यों में प्रचलित की थी। परन्तु वशिष्ठ के ही सौतेले भाई नारद ने—जो वरुण का पुत्र था—भृगुओं से सम्पर्क में आकर कुछ ऋचाएं बनाकर वेदों की वामविधि प्रचलित की। धीरे-धीरे वशिष्ठ और नारद, दोनों में वैदिक विधि और ऋचाओं को लेकर अच्छा-खासा विवाद होने लगा। नारद एक भुक्खड़ और आवारागर्द मनमौजी प्रकृति के ऋषि थे। शीघ्र ही वे वशिष्ठ का विरोध करने और वेदविधि में वामविधि की स्थापना करने के कारण वामदेव के नाम से भी प्रसिद्ध हो गए। इन्द्र ने इन नारद अथवा वामदेव को अपना मित्र बना लिया, और उसे मधु और पुरस्कार देकर उनसे अपनी स्तुति में एक समूचे-सूक्त की रचना करा ली, जो आगे चलकर ऋग्वेद का एक सूक्त हो गया। नारद वामदेव को जब, दूसरे ऋषियों ने, जो वैसे ही भुक्खड़ थे, इन्द्र के द्वारा पुरस्कृत होते देखा, तो उन्होंने भी इन्द्र की स्तुति में रचनाएं रचीं। इस प्रकार इन्द्र ने नारद और दूसरे मित्रों की सहायता ले देवभूमि में एक नई वैदिक संस्कृति की नींव डाली। यद्यपि इन्द्र का यह प्राधान्य आदित्यों को पसन्द न था। परन्तु इन्द्र एक खटपटी और धूर्त व्यक्ति था। उसने आदित्यों के नेता मित्रावरुण को लल्लो-चप्पो के द्वारा और दूसरे आदित्यों को मान-पुरस्कार देकर अपने अनुकूल कर लिया, और उसका यह ढंग देवलोक में इतना पसन्द किया गया कि उसके अनुकरण पर मित्र, वरुण, यम, अग्नि आदि दिक्पालों ने भी अपनी-अपनी स्तुति की ऋचाएं ऋषियों से बनवाईं।

इन्द्र का यह राज्य दैत्यों और दानवों की राज्य-सीमाओं से लगा हुआ था, जो काश्यप सागर-तट पर दूर तक फैले हुए थे। यद्यपि ये देव, दैत्य, दानव परस्पर सम्बन्धी और दायाद बान्धव थे, तथापि उनमें सांस्कृतिक एकता न थी—विग्रह ही था। परन्तु फिर भी कौटुम्बिक सम्बन्ध उनमें प्रचलित थे। इन्द्र ने पुलोमा दैत्य की पुत्री से विवाह किया था। फिर भी दैत्य और दानवों से उसके युद्ध-विग्रह चलते ही रहे। दैत्य लोग दितिपुत्र होने के कारण अपने को श्रेष्ठ और ज्येष्ठ समझते थे। आदित्यों में वरुण की नीति तो समन्वयमूलक ही थी। परन्तु आदित्य विष्णु से, जो कि अत्यन्त महत्त्वाकांक्षी था, दैत्यों के संघर्ष-विग्रह स्वर्ग-प्राप्ति पर आरम्भ हो चुके थे, जिसमें इन्द्र ने यथेष्ट आग्रह प्रदर्शित करके विष्णु को प्रभावित किया था। इसी विग्रह के फलस्वरूप हिरण्यकश्यप का वध हुआ। यद्यपि प्रहलाद से विष्णु ने संधि कर ली थी, परन्तु विग्रह बढ़ते ही गए और इस समय तक चार देवासुर-संग्राम हो चुके थे। अब अकस्मात् ही पांचवें देवासुर-संग्राम का संयोग आ जुटा।