Swarna-Lanka Mein
सम्पूर्ण वसन्त बीत गया। उसी मनोरम द्वीप में ताल, तमाल, हिन्ताल की सघन छाया वाले स्थलों से परिपूर्ण उस रम्यस्थली में नववधू दानवनन्दिनी मन्दोदरी के साथ रावण ने स्वच्छन्द मधुकाल व्यतीत किया। कभी मणिमहल के प्रतिबिम्बित कक्ष में, कभी उज्ज्वल फेनराशि से भरे हुए समुद्र-तट पर, कभी विहंगजन-कूजित वनस्थली में, कभी किसी शीतल पर्वत की उपत्यका में, कभी उस शान्त-स्निग्ध झील के निर्मल जल में प्रतिबिम्बित चन्द्र के कांपते हुए प्रतिबिम्ब के सान्निध्य में, युगल प्रेमियों ने अपने मधु-दिवस यापन किए। दोनों ने दोनों में प्राणों का विलय किया। दोनों ने दोनों को अपना आत्मार्पण किया। रावण और मन्दोदरी का संयोग—शौर्य और शृंगार का संयोग था। अभाव में भाव की पूर्ति थी। कुलिश-कठोर पौरुष नारी की आंच पाकर पिघलकर मोम हो गया। यह रक्षपति रावण, जिसने अब तक अपने उदग्र जीवन में परशु और धनुष ही स्पर्श किया था, इस रमणीरत्न दानव-नन्दिनी कृशोदरी मन्दोदरी को स्पर्श कर आप्यायित हो गया।
सम्पूर्ण वसन्त की मधुयामिनी सुवासित मद्य, सुधा-संगीत और पुष्पवल्लरी-सी प्रिया के मृदु-मधुर आलिंगन में व्यतीत हुई। यहीं उसने मातुल प्रहस्त द्वारा कुबेर धनपति का निमन्त्रण पाया। उसने अपने नाना से परामर्श कर सब मनोरथ संकल्प सोच-विचार लंका में प्रवेश करने का निर्णय किया। धूर्त सुमाली ने देखा, यही वह स्वर्णक्षण है। अब सभी पार्श्ववर्ती द्वीप जय कर लिए गए थे। सभी जगह रावण की रक्ष-संस्कृति की दुहाई फिर गई थी। देव, दैत्य, दानव, नाग, असुर, यक्ष, जो रावण की रक्ष-संस्कृति स्वीकार कर लेता था, वही राक्षस नाम से अपने को सम्बोधित करता था। इस प्रकार राक्षसों की एक नई संयुक्त महाजाति संगठित हो चली थी, जिसमें भारतीय महासागर के दक्षिणांचल में फैले हुए द्वीपों में बसने वाले देव, दैत्य, दानव, नाग, असुर, यक्ष—सभी सम्मिलित थे। सभी का एक ही नारा था—“वयं रक्षामः!” इसी नारे के नाद पर रावण के विकराल परशु के नीचे दक्षिणांचल में फैली हुई सारी ही असुर जातियां एक सूत्र में गुंथ रही थीं। यह सूत्र था ‘रक्ष-संस्कृति’ और उसका प्रस्तोता था रावण पौलस्त्य—राक्षसों का अधिपति।
उसने उन द्वीपों के राज्य-प्रबन्ध, व्यवस्था और सुरक्षा का उत्कृष्ट प्रबन्ध किया। दानवों के इस द्वीप-समूह का राज्याधिकारी मामा अकम्पन को बनाया, तथा बाली द्वीप, यव द्वीप, मलय द्वीप का राज्यभार विश्वस्त राक्षसों को देकर, सुमाली को संग ले, रावण ने बहुत-से विश्वस्त और सुभट राक्षसों के साथ तरणियों में बैठ, द्वीपों से प्राप्त बहुत-सा स्वर्ण रत्न साथ ले लंका की ओर प्रस्थान किया। सुमाली दैत्य की चिर अभिलाषा सम्पूर्ण हुई। लंका में रावण का कुबेर ने यथावत् सत्कार किया। उसे पृथक् महल रहने को दिया। प्रेम और सौहार्द से सब सुविधाएं प्रस्तुत कर दीं। साथ ही बहुत-सी धन-सम्पदा भी दी। उसने स्पष्ट कहा—“भाई, यह लंका जैसी मेरी है, वैसे ही तुम्हारी भी है। इसलिए मेरे राज्य में तुम सुख से रहो।”
परन्तु रावण के तो उद्देश्य और दृष्टिकोण ही कुछ और थे। वह न केवल दक्षिण की इन सब अनार्य जातियों को एक सूत्र में बांधकर एक सम्मिलित नई जाति राक्षसों की बनाना चाहता था, वरन् वह आर्यों और अनार्यों के भेद को भी नष्ट कर देना चाहता था, वास्तव में उसमें आर्य और अनार्य दोनों ही रक्तों का मिश्रण था, इसलिए वह चाहता था कि दोनों जातियां सब भेदभाव भूलकर एक हो जाएं। इसीलिए उसने वैदिक-अवैदिक सारी प्रथाओं और परम्पराओं को मिला-गलाकर ‘रक्ष-संस्कृति’ की स्थापना की थी।
‘वयं रक्षामः’ उसका नारा था। वह कोई राज्य का वैसा लोलुप न था, परन्तु शौर्य-विक्रम उसमें बहुत था। वह जानता था, जब तक लंका पर राक्षसों का अकंटक राज्य न हो जाएगा, राक्षसों की यह जाति प्रतिष्ठित नहीं होगी। इसी से वह सुमाली के बढ़ावा में आ गया।
परन्तु अब, जब उसने लंका की समृद्धि देखी, कुबेर का वैभव देखा, सौध, हर्म्य, वीथी, राजमार्ग देखे, मणिरत्न और स्वर्ण के भण्डार देखे, नगर-कोट राज-प्रासाद, नन्दन वन, अशोक वन, और हाट देखे, तो वह लंका पर मोहित हो गया। उसने यह दृढ़ निश्चय कर लिया कि लंका की केवल भौगोलिक स्थिति ही नहीं, उसकी राजनीतिक स्थिति भी ऐसी है कि इसी द्वीप से सारे दक्षिण-तट पर राक्षसों का अनुशासन कायम किया जा सकता है।
परन्तु कुबेर उसकी सबसे बड़ी बाधा था। कुबेर ही क्यों, यक्ष जाति भी उसके उद्देश्य की पूर्ति में बहुत बड़ी बाधा थी। रावण ही की भांति कुबेर दिक्पाल ने भी यक्षों की एक नई जाति देव, दैत्य, दानव, असुर और नागों में से संगठित की थी। उसका नारा था—‘वयं यक्षामः’ अर्थात्, हम भोगेंगे। इसका अभिप्राय यह था कि विश्व के भोग-ऐश्वर्य हम भोगेंगे। यह नारा बुरा न था। फिर धनपति कुबेर किसे नहीं रुचेगा! बस, बहुत-से नाग, देव, दैत्य, असुर उसकी यक्ष-संस्कृति के अधीन हो गए। यक्षों का काम खूब भोग-विलास करना, मद्य पीना, खूब खाना-पीना और मौज करना था। कुबेर ने सभी यक्षों को धन-सम्पदा से सम्पन्न कर दिया था। इसी से लंका में यक्ष खूब मौज-मजा करते थे। दिक्पति कुबेर की छत्रछाया में उन्हें किसी बात का भय न था। परन्तु रावण ने आकर उनकी सारी व्यवस्था ही भंग कर दी। उसके नव-दीक्षित राक्षस ‘वयं रक्षामः’ का नारा लगाते, जहां-तहां उपद्रव करते, यक्षों को चिढ़ाते, कभी-कभी मारपीट भी कर बैठते थे। शस्त्राघात भी होने लगे। यक्षपति ने समझा था कि जैसे शान्तिपूर्वक हम यहां रहते हैं उसी तरह रावण भी रहे, खाए-पिए, मौज-मजा करे। सभी तो कहते हैं—वयं यक्षामः! बहुत अच्छा मूलमन्त्र है। तभी तो नाग, असुर, देव, दैत्य, दानवों ने अपने कुलधर्म का यक्ष जाति में संगठित होना पसन्द किया है। फिर यह रावण क्यों नए उपद्रव खड़ा करता है? यह नई ‘रक्ष-संस्कृति’ क्या बला है?
धीरे-धीरे लंका में बहुत उपद्रव होने लगे। वहां का वातावरण बहुत क्षुब्ध हो उठा। यक्ष लोग राक्षसों से डरकर घर में छिपकर बैठने लगे। राक्षस जहां किसी इक्के-दुक्के यक्ष को देखते, वे ‘वयं रक्षामः’ का नारा उठाते। समर्थन न होने पर परिघ, शूल, परशु चलाकर उसे मार डालते थे। फिर भून-पकाकर खा डालते थे, धीरे-धीरे राक्षसों के ये अत्याचार इतने बढ़ गए कि एक बार धनपति कुबेर ने रावण से बातचीत की। कुबेर ने कहा—आयुष्मान् रावण! तू यह क्या अनर्थ करता है! नगर के शान्त जीवन को अशान्त बनाता है! तुझे चिन्ता क्या है? रहने को तेरे पास महालय है। धन-धान्य, दास-दासों का अभाव नहीं। खा-पी और मौज कर। हम यक्षों की यही संस्कृति है। यही नारा है—‘वयं यक्षामः’।
रावण ने कहा—आप ज्येष्ठ हैं, पूज्य हैं, परन्तु हम आपसे सहमत नहीं हैं। खाना-पीना, मौज करना जीवन का ध्रुव ध्येय नहीं। मेरा नारा है—‘वयं रक्षामः’। हम प्रजापति के वंशधर हैं। एक ही पिता कश्यप से भिन्न-भिन्न माताओं से दैत्य, दानव, नाग, असुर और आदित्यों की उत्पत्ति हुई। हम दायाद बान्धव हैं। मैं नहीं चाहता कि आदित्य, देव, दैत्य, दानव, नाग, असुर अपनी पृथक् जाति बनाएं, उनमें संघर्ष हो, युद्ध हो। मैं विश्व में नृजाति को एक ही संस्कृति के अधीन करना चाहता हूं और वह संस्कृति मेरी स्थापित की हुई रक्ष-संस्कृति है। हम कहते हैं—‘वयं रक्षामः’ और हमारी संयुक्त जाति है—‘राक्षस’।
“परन्तु हम तो यक्ष हैं। हमारा नारा भी पृथक् है। हम तुमसे सहमत नहीं हैं।”
“आप मेरे ज्येष्ठ भ्राता हैं, पूज्य हैं, इसी से आपको छोड़ता हूं। नहीं तो मेरा एक यह भी नियम है कि हमसे—हमारी रक्ष-संस्कृति से—जो सहमत है, वह अभय। जो सहमत नहीं है, उसका उसी क्षण हम परशु से शिरच्छेद करते हैं; जैसा कि हमने नागराज वज्रनाभा और दानवेन्द्र मकराक्ष का किया।”
“तो आयुष्मान्! यह तो स्पष्ट युद्ध-निमन्त्रण है। मैंने तुझे इसलिए तो लंका में बुलाया नहीं है।”
“आपने मुझे लंका में बुलाकर अपनी ही मर्यादा की रक्षा कर ली। आप यदि ऐसा न करते तो मैं स्वयं आता—उसी प्रकार जैसे मैं अन्य द्वीपों में गया हूं।”
“समझ गया, आयुष्मान्, मुझसे युद्ध चाहता है।”
“नहीं, बस आप हमारी रक्ष-संस्कृति स्वीकार कर लें।”
“परन्तु मैं यक्षपति, दिक्पाल धनेश कुबेर हूं।”
“सो ठीक है, वह रहें। केवल आप कहिए—‘वयं रक्षामः’।”
“नहीं, तुम्हीं कहो—‘वयं यक्षामः’।”
“वयं रक्षामः।”
“वयं यक्षामः।”
“नहीं।”
“नहीं।”
“तो आपकी सेवा में मेरा यह परशु है।” रावण ने अपना विकराल परशु कुबेर के सम्मुख हवा में घुमाया।
कुबेर ने भी अपना वज्र लेकर उसे वायु में घुमाकर कहा—“तुम्हारे इस परशु का जवाब मेरी यह गदा है।”
इसी समय सुमाली झपटता हुआ आकर दोनों क्रुद्ध सरदारों के बीच में खड़ा हो गया। उसने दोनों के शस्त्रों का निवारण करके कहा—“ऐसा नहीं रक्षपति! ऐसा नहीं यक्षपति!”
“तो फिर कैसा?” कुबेर ने कहा।
“आप दोनों के बीच एक मर्यादा है। रावण आपका अनुज है—छोटा भाई है।”
“इसी से क्षमा करता हूं। इसी से मैंने उसे अपनी लंका में आने दिया।”
“लंका आपकी नहीं, मेरी है। परन्तु इस बात को जाने दीजिए। इस द्वन्द्व का कैसे निराकरण हो, इसका निर्णय अपने पूज्य पिता पर छोड़िए। उनसे जाकर परामर्श लीजिए। वे जैसा कहें वही कीजिए। आप दोनों ही के वे समान हितैषी हैं। पिता हैं।”
कुबेर ने कहा—“तथास्तु!”
रावण ने भी कहा—“तथास्तु!”
कुबेर ने कहा—“वयं यक्षामः।”
रावण ने कहा—“वयं रक्षामः।”
दोनों एक-दूसरे को घूरते हुए क्रुद्ध और क्षुब्ध अपने-अपने निवास पर चले गए। कुबेर सब बातों का आगा-पीछा समझ और रावण तथा उसके साथी राक्षसों का उद्धत स्वभाव देख पुष्पक पर सवार हो अपने पिता विश्रवा मुनि के आश्रम में आन्ध्रालय में पहुँचा। पिता का विधिवत् पूजन कर, बद्धांजलि हो कुबेर ने कहा—“रावण को मैंने अपना अनुज समझ लंका में आदर सहित बुला स्थान दिया था। अब वह वहां नित नए उपद्रव मचा रहा है। उसने वहां एक रक्ष-संस्कृति स्थापित की है, वह परशु ऊंचा करके कहता है—‘वयं रक्षामः’ जो कोई असहमत होता है, उसका तत्काल शिरच्छेद कर देता है। मुझसे वह युद्ध करने को तैयार है और उसके साथी राक्षसों ने यक्षों के नाक में दम कर रखा है। न रावण न उसके ये राक्षस, लंका में किसी की आन मानते हैं। जिनका जी चाहे, उसी का सिर काट लेते हैं। देखते-ही-देखते बहुत-से लंका के शान्त, शिष्ट निवासी देव, दैत्य, असुर, नाग, दानव उसी रक्ष-संस्कृति में सम्मिलित होकर ‘वयं रक्षामः’ का नाद करते और जो विरोध करे उसी का सिर काटते फिरते हैं। बालक और छोटा भाई जानकर मैंने उसे अभी दण्ड नहीं दिया है।”
सारी बातें सुनकर दूरदर्शी विश्रवा मुनि बोले—“पुत्र तुमने जो कहा, वह मैंने सुना। इस सम्बन्ध में सब बातें मैं जानता हूं। अब तुम मेरी बात ध्यान से सुनो! यह रावण बहुत खटपटी, उग्र-स्वभाव और उच्चाकांक्षी है। उसके पास वीरों का अच्छा दल है। उन्हीं की सहायता से उसने भारत सागर के सभी द्वीप-समूहों को जीत लिया है। ऐसी अवस्था में अब लंका में अकेला तुम्हारा रहना सुरक्षा के विचार से ठीक नहीं है।
“दूसरी बात यह कि सब झगड़ों की जड़ उसका नाना सुमाली और उसके पुत्र उसके साथ हैं। यह लंका तो पुत्र, पहले सुमाली दैत्य ही की थी। जब मैंने वहां तुम्हें बसाया था, तब सुमाली का कुछ पता ही नहीं था। मैं जानता था कि वह हिरण्यपुर के देवासुर-संग्राम में मारा गया। अब यह न जाने कहां से धरती फोड़कर निकल आया। इसकी पुत्री ने मुझसे ऋतुकामना की—सो मैंने धर्म के विचार से वह स्वीकार कर ली। इसी से यह रावण और इसके भाई-बहन उत्पन्न हुए। मैंने इन्हें वेद पढ़ाया, पर ये सब मेरे प्रभाव में नहीं—अपने नाना और मामा के प्रभाव में हैं। वही उसे उकसाकर ले गया और लंका पर उसका दांत है। लंका के निवासी भी सब उन्हीं के भाई-बन्धु दैत्य, असुर, नाग और दानववंशी हैं। इससे पुत्र, तेरे भले की बात मैं तुझसे कहता हूं कि तू इस उपद्रवी से युद्ध के झंझट में न फंस। तू लंका को छोड़ दे और गन्धमादन पर्वत पर अलकापुरी बसा, वहीं सुख से रह। वह स्थान बड़ा मनोरम है। शंकर का सान्निध्य है। मन्दाकिनी-गंगा है, यमुना है। वहां अनेक सरोवर हैं जिनमें अनेक कमल खिले हैं। वहां भांति-भांति के रंगे-बिरंगे पुष्प सुशोभित हैं। देवता, गन्धर्व और किन्नर जो वहां हैं, देवों की उपजातियां ही हैं। उनसे तेरी संस्कृति का मेल भी है। इससे पुत्र, तू यही कर। लंका को छोड़ दे। यह रावण दशग्रीव बड़ा अभिमानी और क्रोधी है। वह न किसी की सुनता है, न किसी मान्य-अमान्य को मानता है। इसीलिए मेरी तुम्हें यह हितकारी सीख है।”
और कुबेर ने यह सीख मान ली। इसका मर्म वह समझ गया। उसने चुपचाप लंका खाली कर दी। अपने यक्षों को तथा सब सम्पदा को लेकर वह पुष्पक विमान में चढ़ गन्धमादन पर्वत पर चला गया और वहां अलकापुरी बसाकर निवास करने लगा।
रावण ने भी उससे अधिक छेड़-छाड़ नहीं की। उसे अपने सब, धन, रत्न और परिजनों सहित चला जाने दिया। कुबेर के लंका छोड़ते ही राक्षस बहुत प्रसन्न हुए। रावण ने आज्ञा दी—जिसे हमारी रक्ष-संस्कृति स्वीकार नहीं, वह लंका छोड़ दे, नहीं तो उसका शिरच्छेद होगा। सभी देव, दैत्य, दानव, असुर, नागों ने उसकी रक्ष-संस्कृति स्वीकार कर ली। ‘वयं रक्षामः’ का मूल मन्त्र लंका का ध्रुव ध्येय बना। अब लंका को सुदृढ़-सुगठित कर विश्वस्त राक्षसों को राज्य के भिन्न-भिन्न भाग दे, अपने ग्यारह मामाओं को राजसचिव बना वह रावण लंकापति, राक्षसेन्द्र पद पर अभिषिक्त हुआ, मन्दोदरी उसकी राजमहिषी।