वाचे पुरुषमालभेत
ज्यों ही दोनों की मूर्च्छा भंग हुई, उन्होंने देखा—सूर्य की चमकती हुई सुनहरी धूप में दोनों तीर की रेती पर पड़े हैं, और बहुत-से दानवों ने उन्हें घेर रखा है।
रावण उठकर बैठ गया। तरुणी को सम्बोधित करके उसने कहा—“हम कहां हैं?”
“सम्भवतः दानवों के द्वीप में।”
रावण ने आंख उठाकर अपने चारों ओर खड़ी भीड़ को देखा। उनमें आबाल-वृद्ध सभी थे। बहुतों का रंग गोरा और मुख सुन्दर था। अपने को बन्धनरहित देख रावण हंसा; उसने हंसकर युवती से कहा—“देखना यह है कि हम बन्दी हैं या अतिथि।”
इस समय शस्त्रधारी दानवों की एक टोली वहां आई। टोली के नायक ने अपना शूल रावण के वक्ष पर रखकर कहा—“चलो, दानवेन्द्र की सेवा में।”
रावण ने संगिनी की ओर देखा और चुपचाप खड़ा हुआ। दानवों की एक टोली दोनों बन्दियों को घेरकर ले चली। टेढ़े-मेढ़े रास्ते पार करते हुए वे एक पर्वत पर चढ़ने लगे। बन्दियों के पीछे बहुत-से दानव आबाल-वृद्ध थे। सभी कौतूहल से पूर्ण थे। शीघ्र ही यह दल उस छोटी-सी पहाड़ी के शिखर पर चढ़ गया। शिखर पर एक छोटा-सा मैदान था। मैदान के बीचों-बीच जलदेव की विकराल मूर्ति थी। उसके आगे दो यूप थे। दानवों ने दोनों बन्दियों को यूपों से कसकर बांध दिया। थोड़ी देर में दानवेन्द्र मकराक्ष गाजे-बाजे के साथ आया। दानवेन्द्र के साथ ही उसकी महिषी भी थी। महिषी प्रौढ़ावस्था की थी। कभी वह सुन्दरी रही होगी। उसके अंग पर रत्न-मणि-स्वर्ण का बाहुल्य था। वह सुकोमल चर्मसज्जा से सज्जित थी। दानवपति मकराक्ष ने भी मस्तक पर, भुजाओं पर, वक्ष पर स्वर्ण धारण किया था। उसके एक हाथ में स्वर्ण-दण्ड था, दूसरे में मणिकलश। वह धीरे-धीरे कोई मन्त्रपाठ करता आ रहा था। उसके साथ एक ठिगने कद का वृद्ध पुरुष था। उसकी खूब बड़ी लम्बी सफेद दाढ़ी थी। वह कमर में व्याघ्रचर्म पहने था। उसके हाथ में बहुत बड़ा खड्ग था।
दोनों पुरुष यूप के आगे आकर रुक गए। दानवेन्द्र ने महिषी-सहित देवता का पूजन किया। फिर दोनों बन्दियों को मुक्त कर स्नान कराकर उन्हें नवीन वस्त्र धारण कराए। हविष्यान्न खाने को दिया। इसके बाद दानवेन्द्र ने महिषी सहित हवन किया। अग्नि-प्रदक्षिणा करके उसने बलि का पूजन किया। वृद्ध दाढ़ीवाला व्यक्ति चरक था। उसने मन्त्रपाठ करते हुए कहा :
“वाचे पुरुषमालभेत।”
दैत्येन्द्र ने अंजलि में जल भरकर कहा—“वाग्देवतायै पुरुषं पूरकम् आलभेत।” इतना कहकर उसने अंजलि का जल रावण के सिर पर छिड़क दिया।
दाढ़ीवाले पुरुष ने फिर प्रदक्षिणा कर कहा—“प्रतीक्षायै कुमारीम्।”
दैत्येन्द्र ने उसी भांति अंजलि में जल भरकर कहा—“प्रतीक्षायै लब्धव्यस्य वस्तुनो लाभाप्रतीक्षणाभिमानिन्यै कुमारीमनूढां कन्यामालभेत।”
इसके बाद दाढ़ीवाले पुरुष ने पुकारकर कहा—“पशु लाओ।”
तुरन्त ही गाय, घोड़ा आदि सात ग्राम्य पशु और हरिण आदि सात जंगली जीव रस्सियों से बांधकर लाए गए। दाढ़ीवाले पुरुष ने मन्त्रपाठ किया :
“पशूनेवावरुन्धे सप्त ग्राम्याः पशवः सप्तारण्याः सप्तछन्दांस्युभयस्यावरुद्ध्यै।”
इसके बाद उसने रस्सी लेकर मन्त्रपाठ करते हुए बलि-जीवों को बांधना आरम्भ किया।
पुरुष ने मन्त्रपाठ किया :
“आददे ऋतस्य त्वा देव हविः पाशेनाऽऽरभे सावित्रेण रशनामादाय पशोर्दक्षिणा बाह्वौ परिवीयोर्ध्वमुत्कृष्य आददे।”
इन मन्त्रों को पढ़कर दानवेन्द्र ने रावण की तथा महिषी ने दैत्यबाला की दाहिनी भुजा रस्सी से बांधकर ऊपर को खींची।
चरक ने फिर मन्त्रपाठ किया :
“दक्षिणेऽधःशिरसि पाशेनाक्ष्णया प्रतिमुच्य धर्षा मानुषा नित्यमुक्तवतो यूपस्य नियुनक्ति दक्षिणत एकादशाननान्।”
यह मन्त्रपाठ होने पर उन्होंने वही रस्सी सिर की तरफ ले जाकर पीछे से पैरों को भी बांध दिया। वध्यों का अंग जकड़ गया।
चरक ने अन्य पशुओं को भी इसी भांति दूसरे यूपों से बांध दिया, जिससे वे हिल-डुल न सकें।
अब उन्होंने मन्त्रपाठ कर फिर अग्निहोत्र किया।
चरक ने उठकर खड्ग उठाया और मन्त्र पढ़ा :
“वज्रो वै स्वधितिः शान्त्यै पार्श्वत्...।”
और एक पशु का सिर एक ही बार में धड़ से जुदा कर दिया। उसका मांसखण्ड लेकर यजमान दैत्येन्द्र और महिषी ने आहुति दी।
इसी प्रकार मन्त्रपाठ करके एक-एक कर सभी पशुओं को मार-मारकर यज्ञ करना आरम्भ कर दिया।
इस समय बहुत-से दानव वहां आ जुटे थे। उनमें बहुत-से उन मारे हुए पशुओं की खाल उधेड़-उधेड़कर उनका मांस साफ करके बड़े-बड़े भाण्डों में भरकर चूल्हों पर चढ़ाने लगे। चरक ने मन्त्रपाठ किया—“सुकृताच्छमितारः कृण्वन्तूत मेघं शृतपाकं पचन्तु।”
इसके बाद अब दानवेन्द्र मकराक्ष विकराल खाण्डा हाथ में लेकर रावण के सम्मुख आया। उसने कहा—“अरे विश्रवा मुनि के पुत्र, वाणी के देवता के लिए, जलों के देवता के लिए, अलभ्य वस्तु उपलब्ध होने के लिए मैं तेरी बलि देता हूं। अन्तरिक्ष के देव प्रसन्न हों! जल के देवता प्रसन्न हों। तुझे स्वर्ग मिले। यह पूत खड्ग तुझे पूत करे।”
महिषी ने दैत्यबाला के सम्मुख आकर कहा :
“लब्धप्रतीक्षा देवता के लिए तुझे बलि देती हूं।”
उसने अपने खड्ग की नोक से उसे छूते हुए अक्षत उस पर फेंके। इसके बाद चरक ने उन्हें पुष्पमाला अर्पित की और सौत्रामणि सुरा दी। बहुत-से बाजे जोर से बज उठे।
सुरा पीकर रावण चेतन हुआ। आसन्न विपत्ति को उसने देखा। सामने दूर समुद्र के शान्त जल पर क्षितिज के उस छोर पर जाकर उसकी आंखें ठहर गईं। आशा और उल्लास से उसका हृदय धड़कने लगा। उसने देखा—नील जल-राशि पर सुदूर क्षितिज के पास श्वेत-श्वेत धब्बे दीख रहे हैं। उसने नेत्रों के संकेत से दैत्यकुमारी को भी बता दिया। उसके होठों के स्फुरण से तथा नेत्रों के आह्लाद से वह समझ गई कि कुछ आशाजनक संदेश है। थोड़ी ही देर में उसने देखा—बहुत-से पोत अपने पाल उड़ाए इधर बढ़े आ रहे थे।
दानवों का उधर ध्यान न था। वे जोर-जोर से बाजे बजा और चिल्ला रहे थे। चरक मन्त्रपाठ कर रहा था। नरबलि की पूरी तैयारी हो चुकी थी। खड्ग मन्त्रपूत किए जा रहे थे। कुण्ड में बहुत-सी चर्बी, तिल, मांस और ईंधन जल रहा था। बड़े-बड़े भाण्डों में बलि हुए पशुओं का मांस पकाया जा रहा था। उस भीड़भाड़ में सब कुछ अव्यवस्थित-सा दीख रहा था।
अब चरक की आज्ञा से दैत्येन्द्र खड्ग लेकर रावण का वध करने आगे बढ़ा। यूप से बद्ध रावण ने अपनी आंखें फैलाकर फिर विस्तृत समुद्र की ओर देखा। अनगिनत तरणियां तीव्र गति से चली आ रही थीं। रावण ने कहा :
“दानवेन्द्र से मेरा एक अनुरोध है। वह धर्मानुबन्धित है।”
“वह क्या है, कह?”
“मैं मुनिकुमार हूं, मुझे वेदपाठ करना है।”
“सो तू कर, पर अधिक समय मैं ठहर नहीं सकता।”
“वेदपाठ से दानवेन्द्र का भी कल्याण होगा। चरक से पूछो।”
चरक ने दाढ़ी पर हाथ फेरकर कहा—“विश्रवा मुनि का पुत्र ठीक कहता है, वह वेदपाठ करे।”
रावण ने उच्च स्वर से वेदपाठ करना प्रारम्भ किया। परन्तु तरणियां अभी बहुत दूर थीं।
मकराक्ष ने कहा—“बस, अब और नहीं ठहर सकता।” वह खड्ग लेकर आगे बढ़ा।
रावण की दृष्टि में व्यथा व्याप गई। दैत्यबाला की दृष्टि भी उन्हीं तरणियों पर थी। संकट समुपस्थित देखकर उसने कहा—“मैं कुमारी हूं, दैत्यकन्या हूं, लब्धव्य की प्राप्ति के लिए पहले मेरी बलि हो।”
चरक ने हाथ उठाकर कहा—“कुमारीमनूढां कन्यामालभेत।”
उसने महिषी की ओर संकेत किया और यज्ञपूत खड्ग महिषी को दिया। महिषी खड्ग लेकर आगे बढ़ी। रावण कुछ प्रतिक्रिया करे, इससे प्रथम ही दानव-महिषी का खड्ग बलि पर पड़ा। दैत्यबाला का सिर कटकर नीचे लटक गया। धड़ से रक्त की धारा उमड़ चली। रावण के नेत्रों में अन्धकार छा गया। यूप को उखाड़ने और बन्धनमुक्त होने के उसके सारे ही प्रयत्न निरर्थक गए। दानवों ने देखते-ही-देखते दैत्यबाला का सिर काटकर यज्ञ-वेदी पर चढ़ा दिया। चरक ने मन्त्र पढ़ा—“आदद ऋतस्य त्वा देव हविः।”
देखते-ही-देखते दैत्यबाला के छटपटाते शव के दानवों ने टुकड़े-टुकड़े कर डाले। मांस-खण्डों को एक बड़े भाण्ड में भरकर पाक करने के लिए आग पर चढ़ा दिया। चरक ने मन्त्र पढ़ा—“शुक्लोदनः शुक्लपुष्पं शुक्लस्रग्ध्वजाः सप्त प्रदीपाः सप्त स्वस्तिकाः सप्त वाटिकाः सप्त शष्कुलिकाः सप्त जम्बुडिकाः सप्त पुस्तकाः गन्धं पुष्पं ताम्बूलं मांसं, सुराग्रभक्तं च बलिर्दातव्यः। ततः सम्पद्यते शुभम्।”
रावण का सारा अंग जड़ हो गया। इस काम में बहुत समय व्यतीत हो गया। अतः रावण के भाव-परिवर्तन को किसी ने नहीं देखा। अब चरक ने मन्त्र पढ़ा—“वाचे पुरुषमालभेत।” मकराक्ष चरक के हाथ से पूत खड्ग लेने को आगे बढ़ा। परन्तु इसी समय एक बाण चरक के हलक और तालु को फोड़ता हुआ निकल गया।
मकराक्ष ने देखा—अनगिनत राक्षसों ने चारों ओर से वह यज्ञ-स्थल घेर लिया है, और वे चारों ओर से बाण-वर्षा करते तथा दानवों का निर्दय संहार करते बढ़े चले आ रहे हैं। यह देखते ही मकराक्ष ने अपनी बगल में पड़ा नरसिंहा फूंका। पार्वत्य उपत्यकाओं तथा नगरवीथियों से सहस्रों दानवों के दल निकल-निकलकर राक्षसों से भिड़ गए। एक तुमुल संग्राम छिड़ गया। मकराक्ष वही मन्त्र-पूत यज्ञ-खड्ग लिए हुंकार कर शत्रुओं पर पिल पड़ा। अकस्मात् अकम्पन उछलकर शक्ति लेकर मकराक्ष के सम्मुख आया। रावण ने चिल्लाकर कहा—“उसे मेरे लिए छोड़ दो, मातुल! दानवेन्द्र मेरा पशु है।” और क्षण-भर ही में उन्मुक्त होकर रावण ने अकम्पन के हाथ से शक्ति लेकर मकराक्ष के हृदय में हूल दी। परन्तु मकराक्ष उछलकर बगल में हट गया। इससे प्रहार पूरा न पड़ा। अब वह एक परिघ लेकर रावण पर दौड़ा। रावण ने वज्र के समान तोमरों के निरन्तर आघात से मकराक्ष को जर्जर कर दिया। मकराक्ष लहू-लुहान होकर भूमि पर गिर गया। इस पर अनगिनत दानवों ने शक्ति, परिघ, शूल, मुद्गर लेकर रावण पर संयुक्त आक्रमण किया। यह देख सुमाली दैत्य गदा हाथ में ले उन पर टूट पड़ा। दैत्यपति की भीषण गदा की चोट से दानव झटपट मरने लगे। मकराक्ष उनकी लौथों में ढंप गया। परन्तु रावण ने उसका पैर खींचकर बाहर निकाला, फिर उसे अपने सिर के चारों ओर घुमाया और भूमि पर दे मारा। मकराक्ष का सिर फट गया। फिर भी वह मरा नहीं। पड़े-ही-पड़े उसने रावण का पैर खींचकर उसे गिरा दिया। अब दोनों योद्धा परस्पर गुंथ गए। रावण ने मकराक्ष का कवच नाखूनों और दांतों से चीर डाला तथा दोनों वीर निरस्त्र हो मुक्कों और लातों से एक-दूसरे को मारने तथा गुंथकर लुढ़कने लगे। रावण ने क्रोधोन्मत्त होकर इस प्रकार दानव को मथा जैसे आटा गूंधा जाता है। मकराक्ष ने बल लगाकर रावण को दूर धकेल दिया। परन्तु रावण ने उछलकर एक लात दानव की छाती में मारी। लात खाकर दानव रक्त-वमन करने और कराहने लगा। अब रावण ने मुक्के मार-मारकर उसकी पसलियां तोड़ डालीं। दानव की जीभ बाहर निकल आई, वह हांफने लगा। उसके नाक-कान और मुख से रक्त की धार बह निकली। इसी समय रावण ने अपनी वज्र भुजाओं में उसे सिर से ऊपर उठा लिया और धधकते हुए विराट हवन-कुण्ड में फेंक दिया।
दानवेन्द्र मकराक्ष का ऐसा भयानक अन्त देख दानव चारों ओर भयभीत होकर भागने लगे। उन भागते हुए दानवों को राक्षसों ने झटपट मारना आरम्भ कर दिया। शेष दानवों ने शस्त्र भूमि पर रख, भूमि में गिरकर प्रणिपात किया। रावण ने हाथ का खड्ग हवा में ऊंचा उठाकर कहा—“वयं रक्षामः! सब कोई सुनो, आज से यह सुम्बा द्वीप और दानवों के सब द्वीपसमूह रक्ष-संस्कृति के अधीन हुए। हम राक्षस इसके अधीश्वर हुए। जो कोई हमसे सहमत है उसे अभय; जो सहमत नहीं है उसका इसी क्षण शिरच्छेद हो।”
सभी आबाल-वृद्ध दानवों ने भूमि पर लोटकर रक्षपति रावण की अधीनता स्वीकार कर ली। राक्षसों ने वह सुन्दर द्वीप, हर्म्य, सौध, स्वर्ण, रत्न, राज्य अपने अधीन कर लिया। द्वीपों में सर्वत्र रावण की दुहाई फिर गई।