जल-देव
दानवों का यह दल अपने बन्दियों और लूटे हुए माल को लेकर तरणियों में बैठ तेज़ी से समुद्र-गर्भ में अग्रसर होने लगा। बन्दियों के बीच रस्सियों से बंधी हुई अपनी प्रेयसी उस तरुणी को रावण ने अपने परिजनों के साथ बैठे देख लिया। रावण को देखते ही तरुणी की आंखें चमकने लगीं। उसने पास बैठे एक बूढ़े दैत्य के कान में कुछ कहा। दैत्य ने आंख उठाकर रावण को देखा।
छाती में करारी चोट लगने और रक्त-वमन के कारण रावण अस्वस्थ और श्रमित हो रहा था। परन्तु उसने अकेले ही दानवेन्द्र से, रथारूढ़ होने पर भी विरथ होकर, युद्ध किया था। इसलिए दानवेन्द्र ने उसे आदरपूर्वक सब बन्दियों से पृथक् बैठाया तथा पीने को एक भाण्ड मद्य भी दिया। परन्तु रावण ने अस्वीकार करते हुए कहा—“सभी बन्दियों के समान मैं भी हूं, अनुग्रह मुझे नहीं चाहिए!” दानवेन्द्र ने फिर आग्रह नहीं किया। धीरे-धीरे सूर्य अस्त होने लगा और सागर में भी तूफान के चिह्न प्रकट होने लगे। तरणियों पर सभी पाल चढ़ा दिए गए। बन्दी स्त्रियां और धन की मंजूषाएं बीच में रख ली गईं। सभी तरणियों को एक में बांध दिया गया। देखते-ही-देखते वायु का वेग बढ़ गया। प्रचण्ड वायु हल्की वस्तुओं को उठाती और भारी वस्तुओं को गिराती प्रलय-गर्जना करने लगी। सागर में चट्टानों की भांति बड़ी-बड़ी लहरें उठकर क्षुद्र तरणियों को आकाश में उछालने और गिराने लगीं। बन्दी और अबन्दी सभी जन चीत्कार करने लगे। सबके कोलाहल से वह समुद्र का गर्जन-तर्जन और भी भयावह हो उठा। चर्म-रज्जुओं के सुदृढ़ बन्धन टूटने लगे। तरणियां दूर-दूर बहने और उलट-पलट होने लगीं। दानवेन्द्र ने बन्दियों को बन्धनमुक्त करके अपनी-अपनी सुरक्षा करने को उत्साहित किया। इसी क्षण वह तरणी जिसमें असुर बन्दी थे, एक पर्वत के समान लहर पर बहुत ऊंची चढ़कर पलट गई। लहर के थपेड़ों से उसके टुकड़े-टुकड़े हो गए। तरणी के सब आरोही महासागर के उस प्रलय-तूफान में खो गए। सबसे पृथक् बंधे रहने के कारण रावण बन्धनमुक्त न हो सका। रावण की अभिसार-सखी उस दैत्यबाला ने गिरते-गिरते यह देखा। पर्वत-समान विशाल एक लहर ने उसे बहुत ऊंचा उछालकर दूर फेंक दिया था। वह उस अनन्त सागर के सघन अन्धकार में आंखें फाड़-फाड़कर अपने चारों ओर अपने रमण को देखने लगी। समुद्र-जल की सारी बौछारें चारों ओर से उसकी आंखों को अन्धा कर रही थीं। लहरों के थपेड़े उसे स्थिर रहने नहीं देते थे। वह बार-बार अपना वक्ष ऊपर उठा अपने प्रियतम को निहार रही थी। एकाएक एक तरंग ने रावण को उछाला और फिर वही जल-गर्भ में उसे ले गई। यह देख दैत्यबाला ने अपनी कमर में छुपा हुआ छुरा दांतों में दबाया और डुबकी ली। दुर्धर्ष प्रयास के बाद उसने रावण को पकड़ा। रावण मूर्छित था। उसने झट उसके बन्धन काटे और वेग से धकेलती हुई लहरों के सहारे उसे ले चली। इसी समय एक काष्ठ फलक बहता हुआ उसके हाथ लग गया। उसने ज़ोर लगाकर रावण के शरीर को उस पर टेक दिया, और एक भुजा से उसे संभालती हुई तथा दूसरी से लहरों को काटती हुई वह महासागर से कठिन जीवन-युद्ध करने लगी।
थोड़ी ही देर में रावण की मूर्च्छा भंग हुई। इससे दैत्यबाला अत्यन्त आशान्वित हो उसके बिल्कुल निकट आकर बोली—“साहस कर रमण, और अपने भार को ठीक तरह से इस काष्ठ-फलक पर रख!”
रावण ने अपने भार को ठीक तरह काष्ठ-फलक पर डाला। फिर एक हाथ से उसे निकट लाते हुए बोला—“तूने मेरी प्राण-रक्षा की है।”
“मातृचरण को खोकर, हन्त! एक ही क्षण में मुझे तू दिखाई पड़ा और माता भी। मैं एक ही की रक्षा कर सकती थी—सो मैंने तुझे ही सहायता दी। तू चेतन है, स्वस्थ है—मैं इससे प्रसन्न हूं। पर तू इन दानवों में कैसे आ फंसा, रमण?”
“तेरे ही लिए। एक भाण्ड मद्य पीने के लिए तेरा निमन्त्रण था, और तुझे हरण करने का मेरा आग्रह था। इसी से तेरे ग्राम में आया था। पर जब देखा, मेरे अभिसार को कोई और ही हर ले गया तो मैं संयत न रहा, दानवों का मैंने पीछा किया।”
“तू तो रथी था, विरथ क्यों हुआ? रथ पर रहते क्या वे तुझे पराभूत कर सकते?”
“पर वे सब तो विरथ थे। विरथ से रथ लेकर युद्ध करना मेरी मर्यादा नहीं।”
“तेरे पराजय के शौर्य से मैं आनन्दित हूं, रमण।”
“किन्तु पराजित किया किसने?”
“दानवेन्द्र ने तो।”
“न, तूने।”
“वह क्या आज? न-न, उसी विजन वन में सरोवर के तीर पर।”
“उसी की खीझ उतारने तो तेरे ग्राम आया था।”
“सो यहां तक साथ है।” दैत्यबाला हंस दी।
तूफान गर्जन-तर्जन कर रहा था—लहरें आकाश-पाताल एक कर रही थीं, पर ये युगल वीर जलदेव को लातों से तिरस्कृत करते दिल की घुण्डी खोलते जाते थे।
“अभी आगे भी साथ रहेगा।” रावण ने लापरवाही से कहा।
“कब तक भला?”
“इसका उत्तर तो पीछे—इस जलदेव से रक्षा होने पर दिया जाएगा। अभी तू अधिक प्रयास न कर, काष्ठ-फलक पर सहारा ले चुपचाप तैरती चल। चिन्ता न कर।”
“मुझे भय था कि अब कहां तू मिलेगा।”
“एक क्षण भी मैंने तुझे नहीं भुलाया और अवकाश पाते ही मैं तेरे लिए भागा आया हूं।”
“तू वीर है, रमण!”
“किन्तु आज रात ही कहीं जल-समाधि हुई तो?”
“मैं प्रसन्न हूं, हो जाए।”
“नहीं, मेरा कार्य अभी सम्पूर्ण नहीं हुआ। मैं इस दानव को जय किए बिना लौटूंगा नहीं।”
“क्या तू इतना सम्पन्न है, ऐसी तेरी सामर्थ्य है?”
“अभी बहती चल, अपने को डाल दे इस काष्ठ-फलक पर। और मेरे कण्ठ में डाल दे अपने भुज-मृणाल! बस, चिन्ता न कर।”
दोनों ही उस अगम महासागर में उस क्षुद्र काष्ठ-फलक के सहारे तैरते जा रहे थे। आहत और अशक्त रावण थक गया था। पर उसका साहस अपूर्व था। इसी समय अचानक तरुणी ने चीत्कार करके कहा :
“वह काली वस्तु क्या है, देख!”
रावण ने सिर उठाकर देखा, भुनभुनाते हुए कहा—“तरणी है।” दोनों ने प्रयास करके तरणी को अधिकृत कर लिया। वह उलट गई थी। उसे सीधा किया और स्वयं उस पर चढ़कर उसने तरुणी को भी खींच लिया। और फिर गिर गए तरुणी पर निश्चेष्ट, परस्पर संश्लिष्ट, आबद्ध, मूर्छित!
समुद्र शान्त था और तरणी जलतरंगों पर थिरकती अपनी राह पर जा रही थी, तीर की ओर।