दानव मकराक्ष

भोर होते ही रावण ने रक्ताम्बर धारण किया। गोह-चर्म के दस्ताने पहने। कृष्णाजिन वक्ष पर बांधा। सिर पर किरीट, पैरों में चर्म-रज्जु के दृढ़ उपानह। कमर में दुकूल और उस पर मरकतमणि का कटिबन्ध। कन्धे पर धनुष और हाथ में वही विकराल परशु—जिसका नाग-रक्त अभी सूखा न था।

उसने अपने मामा अकम्पन को बुलाकर कहा—“मातुल, नागपति की अश्वशाला से सर्वश्रेष्ठ चार अश्वतरियां छांट लो, और नागराज का स्वर्णरथ मेरे लिए तैयार करो। उसे शक्ति, शूल, परिघ, बाण और तोमर से सज्जित कर शीघ्र उपस्थित करो।”

अकम्पन के जाने पर उसने वृद्ध दैत्य सुमाली से कहा—“मातामह, एक छोटा-सा अभियान है, मैं जाता हूं, बाली द्वीप और नागराज के अवरोध का आप यथरुचि विघटन कर लीजिए।”

सुमाली ने कहा—“तुझे क्या कुछ भट चाहिए, पुत्र?”

“नहीं, मातुल अकम्पन मेरे साथ हैं।”

सुसज्जित रथ आ उपस्थित हुआ। वह मणि-कांचन के सहयोग से, विचित्र चित्रकला द्वारा, विश्वकर्मा ने बनाया था। चर्मफलक और चर्मरज्जुओं से वह बंधा था। उसमें सहस्त्र स्वर्णघंटिकाएं लगी थीं, जिनकी क्वणनध्वनि शत-सहस्त्र भ्रमरों के गुंजन की भांति कर्णप्रिय थी।

काले रंग की चार अश्वतरियां, जो उसमें जुती थीं, वे विद्युत् की भांति चपल थीं। उनके कान खड़े थे और थूथनें बड़ी-बड़ी थीं। वे अपने खुरों से भूमि को खोद अपनी आतुरता प्रकट कर रही थीं।

रावण रथ पर सवार हुआ और अकम्पन ने वल्गु ली। अश्वतरियां वायुवेग से चलीं। रावण के संकेत पर, पर्वत की उपत्यका की दिशा में अर्जना-तट की ओर।

देखते-ही-देखते वन, वीथी, हाट, मार्ग, पीछे रहते चले गए। पार्श्व में समुद्र को गर्जन करते छोड़ समुद्र-गर्जना से होड़-सी करती हुई रथ की स्वर्ण-घंटिकाएं क्वणन-ध्वनि करती हुई चली जा रही थीं—धनुष से छूटे हुए साठ टंक के बाण के समान वेग से, सीधे अर्जना-तट की ओर—जहां रावण की अभिसार-नायिका—वही, उन्मुख, अनावृत यौवन वाली दैत्यबाला थी, जिसने रावण के वक्ष पर स्तन-विक्षेप के बाद लात मारकर उसे सम्पन्न किया था, और जिसने उसके महार्घ मरकत के कटिबन्ध के दान को अस्वीकार कर, कल अस्तंगत सूर्य के सान्निध्य में एक भाण्ड मद्य पीने के लिए उससे अनुरोध किया था।

वह उन्मुख, अनावृत यौवन, वह चरणाघात, वह उन्मुक्त हास और जलगर्भ का विलास, जैसे शतसहस्त्र मुख से रावण के वज्रवक्ष को आन्दोलित कर रहा था। उसे एक-एक क्षण का विलम्ब भी सह्य न था। वह असंयत-सा कह रहा था—“सर्प, मातुल! सर्प!” और दैत्य अकम्पन की चर्मरज्जु के कड़े आघात शपाशप अश्वतरी की पीठों पर पड़ रहे थे, जिनसे प्रताड़ित हो उनके खुर जैसे भू-स्पर्श छोड़ वायु में अधर उड़े चले जा रहे थे।

अर्जना का तट आया। तट पर एक सघन मनोरम वन था। वन में अनेक ताल, तमाल, हिन्ताल के वृक्ष थे, हरिण थे, पक्षी थे, उनका कलरव था। स्थान-स्थान पर वहां इस समय अग्निदाह हो रहा था। कुछ हाथ-पैर-गर्दन कटे शव पड़े थे। स्त्रियों के शंखचूड़, गुंजामाल, वस्त्रखण्ड, स्वर्णवलय टूटे-फूटे इधर-उधर पड़े थे। टूटे हुए शक्ति, परशु, खड्ग और मरे-अधमरे पशु सिसक रहे थे।

रावण ने रथ से उतरकर देखा। उसने कहा—“मातुल, यहाँ तो विकट संग्राम हुआ प्रतीत होता है। सभी शव गर्म हैं। युद्ध सम्भवतः अभी हुआ है। देखो तो, कोई जीवित पुरुष भी है जिससे घटना का ज्ञान हो।”

अकम्पन ने बारीकी से देखा। एक बूढ़े असुर में अभी प्राण थे। उसी ने टूटे-फूटे स्वर में बताया कि दानवों के एक दल ने आक्रमण करके उनका ग्राम-गोत्र लूट लिया है। ग्राम का सब स्वर्ण, अन्न और स्त्रियाँ वे लूट ले गए हैं तथा सब जीवित पुरुषों को बांधकर बन्दी बना ले गए हैं। दैत्य ने बताया—“वे दक्षिण दिशा में समुद्रतीर-तीर गए हैं।”

रावण ने हुंकृति भरी। रथ पर खड़े होकर दक्षिण दिशा की ओर देखा। उसने उसी दिशा की ओर परशु उठाकर कहा—“चलो तो मातुल! देखो, वह धूल उठ रही है।”

और अश्वतरियां उसी दिशा में उड़ चलीं। अधीर होकर रावण रथ पर खड़ा होकर व्यग्र भाव से उधर देखने लगा। देखते-देखते धूल का बवंडर निकट होता गया। थोड़ी ही देर में देखा—दानवों का एक सम्पन्न संगठित दल सब दैत्य-स्त्री-पुरुषों को रस्सियों में बाँधे, उनका अन्न-स्वर्ण गठरियों में लादे, उनका पशु-धन आगे कर परिघ, शूल, कृपाण, शक्ति, खड्ग हवा में उछालता वन के गहनतम प्रदेश में बढ़ता जा रहा है।

आगे बढ़कर रावण ने ललकारा। साथ ही उसने दश बाण दस-दस टंक के छोड़े। बाणविद्ध होकर दानवदल घूमा। उन्होंने देखा—एक दुर्धर्ष तरुण योद्धा दिव्य रथ पर आरूढ़ धंसा चला आ रहा है।

दलपति ने दानवों को तुरन्त व्यूहबद्ध खड़े होने की आज्ञा दी। बन्दियों और आहतों को दूर खड़ा किया। पलटकर उसने पुकारकर कहा—“यह अकारण हम पर आक्रमण करके वैर करने वाला महाभाग कौन है? इस अकारण के वैर का कारण क्या है? वह कहे कि हम उसका बाणों से सत्कार करें, या मधुपर्क से?”

रावण ने कहा—“मैं रक्षाधिप वैश्रवण रावण हूं—इन सब द्वीप समूहों का स्वामी! तुमने मेरे द्वीप पर अनाचार किया है। कहो तुम्हारा ग्राम, गोत्र कहां है?”

“इसी द्वीप के उस ओर हमारा द्वीप है और गोत्र भी है। परन्तु तुम कैसे इस द्वीप के स्वामी हो? द्वीप का अधिपति वज्रनाभ है। वह हमारा मित्र है।”

“वज्रनाभ का सिर इसी परशु से मैंने गत रात्रि काटकर द्वीप पर अपना अधिकार किया है। सो अब तक तुमने यदि राक्षसपति रावण दशग्रीव का नाम न सुना हो, तो अब सुनो, और जान लो, कि आज से यह बाली द्वीप रक्ष-संस्कृति के अधीन है। हम राक्षस इसके अधीश्वर हैं। जो कोई हमसे सहमत है, उसे अभय! जो कोई सहमत नहीं है, उसका इसी परशु से, इसी क्षण शिरच्छेद होगा!”

दानवेन्द्र का नाम मकराक्ष था। वह बाली द्वीप के आस-पास के छोटे-छोटे द्वीपों का स्वामी था। नागराज का वह मित्र था। वह एक तेजस्वी योद्धा था। उसने कहा—“अरे, विश्रवा के पुत्र, तू तो बड़ा ही धृष्ट दीख पड़ता है। क्या दानवों से भी तू भय नहीं खाता? तू वीर और प्रियदर्शन है, पर तूने हमारे मित्र नागपति वज्रनाभ को मारा है, इसका दंड मैं तुझे दूंगा। इसके अतिरिक्त तूने मेरे काम में प्रत्यवाय किया है। आज मैं तेरे ही स्वादिष्ट मांस का भोजन करूंगा। बोल, मरने से प्रथम तू क्या चाहता है? मैं मकराक्ष दानवराज हूं। कह, तुझ शत्रु का क्या प्रिय करूं?”

“दानवराज मकराक्ष, भले मिले। आपका नाम मैंने सुना है। युद्धं देहि! मैं आपसे युद्ध मांगता हूं। पर आप विरथ हैं, इसलिए मैं रथ पर नहीं लड़ूंगा।”

रावण रथ से कूद पड़ा। दानव ने कहा—“नहीं, विश्रवा के पुत्र, तू रथ पर ही रह! हम विरथ हैं, पर संख्या में बहुत हैं। तू एकाकी है, सो रथ पर अयुक्त नहीं है।”

परन्तु रावण ने स्वीकार नहीं किया। अकम्पन की बात भी नहीं मानी। उसने कहा—“मातुल, तुम खड़े रहकर मेरा युद्ध देखो!”

इतना कहकर वह अपना परशु घुमाता हुआ, दानवों के दल में घुस गया और रणोन्मत्त हो दानवों के सिर अपने परशु से काटने लगा। दानव भी तोमर, भिन्दिपाल आदि शस्त्र ले रावण पर टूट पड़े। परन्तु रावण इससे तनिक भी भयभीत न हुआ। यह देख दानवेन्द्र ने पांच तोमरों से रावण पर प्रहार किया। इससे रावण रक्त में सराबोर हो गया। परन्तु उसे तनिक भी संभलने का अवसर न दे दानवेन्द्र ने यमदण्ड के समान भारी मुद्गर घुमाकर रावण के वक्ष पर प्रहार किया। इससे रावण रक्त-वमन करने लगा और थोड़ी ही देर में मूर्छित हो पृथ्वी पर गिर गया। दानव-सेना हर्ष से चीत्कार कर उठी। मकराक्ष ने कहा—“अब इस मत्त गयन्द को लौह-श्रृंखलाओं में बांध लो!” परन्तु इसी समय रावण चेतन हुआ। क्रोध से थरथराता रावण फणी की भाँति हुंकार करके खड़ा हुआ और उसने प्रचण्ड वेग से मकराक्ष पर शक्ति चलाई। शक्ति के छाती पर लगते ही दानवेन्द्र घूमकर पृथ्वी पर गिर गया। यह देख हाय-हाय करते बहुत से दानवों ने अपने राजा को घेर लिया। क्रुद्ध रावण ने उनका इस प्रकार दलन करना प्रारम्भ किया कि वे, जिसका जिधर सींग समाया, भाग खड़े हुए।

इसी समय दानवेन्द्र की मूर्च्छा टूटी। उसने अपनी भागती हुई सेना का निवारण किया। फिर रावण से कहा—“वीर विश्रवापुत्र, तू धन्य है! तेरे वीरत्व पर मैं प्रसन्न हूं। परन्तु तुझ एकाकी विरथ रथी से हम सबका युद्ध करना न्यायसंगत नहीं है। इसलिए वीर, तू हममें से जिसे चाहे, उसी से द्वन्द्वयुद्ध कर।” रावण ने मुंह का रक्त पोंछते हुए कहा—“ऐसा ही सही। तब दानवेन्द्र मकराक्ष स्वयं ही मेरे साथ युद्ध करके मेरी प्रतिष्ठा बढ़ाएं।”

यह सुनकर दानवेन्द्र ने कहा—“तथास्तु!” दोनों वीर गदा लेकर परस्पर गुंथ गए। उनकी गदाएं जब आपस में टकराती थीं तो उनमें से अग्निस्फुलिंग निकलता था तथा बड़ा घोर शब्द होता था। दोनों वीर एक-दूसरे के वक्ष को ताक-ताककर वार करना चाहते थे। परन्तु दोनों में से कोई किसी को अवसर न देता था। बहुत देर तक यह असह्य युद्ध होता रहा। अन्त में अवसर पाकर दानव मकराक्ष ने गदा घुमाकर रावण के वक्ष पर प्रहार किया। प्रहार से गदा के दो टुकड़े हो गए। रावण दर्द से कराहकर भूमि पर गिर गया और रक्त-वमन करता हुआ मूर्छित हो गया। दानवेन्द्र मकराक्ष ने उसे अच्छी तरह रस्सियों से जकड़कर बांध लिया।

यह देख अकम्पन रथ को त्याग हाथ में शूल ले आगे बढ़ा। दानवेन्द्र मकराक्ष ने कहा—“अब तुम्हें प्राण देने से क्या प्रयोजन है, वीर? हमने अपने पराक्रम से द्वन्द्वयुद्ध में वैश्रवण रावण को बन्दी किया है। तुम्हें उचित है अपनी नगरी को लौट जाओ।” रावण ने मूर्च्छा भंग होने पर अपने बंधन देख अकम्पन से कहा—“मातुल, मातामह से कहना—मकराक्ष दानव ने मुझे द्वन्द्वयुद्ध में बन्दी बनाया है।” अकम्पन भी कुछ सोचकर रुक गए। दानव रावण को बांधकर सब बन्दियों के साथ समुद्र-तीर पर ले चले। समुद्र-तट पर तरणियाँ बंधी थीं। अपने बन्दियों और लूटे साज-सामान के साथ दानवेन्द्र मकराक्ष दलबल-सहित तरणियों पर चढ़ अपने द्वीप की ओर चल दिया।