लघु अभियान
दैत्यों का वह छोटा-सा दल निःशब्द, नीरव, समुद्र-तट से तनिक हटकर घाटी में टेढ़े-तिरछे मार्ग से तीव्र गति से नगर की ओर बढ़ रहा था। दल के आगे रावण कन्धे पर भीमकाय परशु रखे चल रहा था। उसके पीछे वृद्ध व्याघ्र दैत्य सेनापति सुमाली था। दैत्य दल की ये काली-काली छायाएँ चतुर्थी की चन्द्र-ज्योति में हिलती हुई-सी विचित्र प्रतीत हो रही थीं। दैत्यों के इस दल को विकट निर्जन तथा ऊबड़-खाबड़ मार्ग में चलने से कुछ भी कष्ट नहीं हो रहा था। दल का प्रत्येक भट विजय के विश्वास से ओत-प्रोत था।
सुमाली ने आगे बढ़कर रावण के कन्धे पर हाथ रखा। रावण ने तनिक कान पीछे झुकाकर कहा—“कुछ और आदेश है, मातामह?”
“नहीं पुत्र, सब पूर्व-नियोजित है। किन्तु तेरे भट यथासमय उपस्थित मिलेंगे न? ऐसा न हो कि वे सब उत्सव के हड़कंग में मद्यपान कर मत्त हो जाएं।”
“ऐसा न होगा, मातामह! उनका नेतृत्व मातुल अकम्पन कर रहे हैं।”
“तब ठीक है, हमारे मद्य-भाण्ड भी नागराज को समय पर मिल जाएंगे। परन्तु पुत्र, ठीक क्षण आने तक धैर्य रखना। इन नागों को मैं भली-भांति जानता हूं। विष और मद्य इन्हें अभिभूत नहीं करते। ये दिव्यौषधि सेवन करते हैं तथा सोमपान करते हैं। इसी से एक प्रकार से वे सब मृत्युंजय हैं।”
“चिन्ता न कीजिए, मातामह, रावण का यह परशु किसी मृत्युंजय की आन नहीं मानता और फिर हमें उनके प्राण लेने से क्या प्रयोजन है! हम तो द्वीप पर अधिकार चाहते हैं। यदि नाग हमारी रक्ष-संस्कृति को स्वीकार कर लें, तो हमारी ओर से वे ही द्वीप पर शासन करें।”
“यह पीछे देखा जाएगा, पुत्र—पहले युद्ध, पीछे राजनीति। यह देखो, सामने ही पुर है। आशा करता हूं नगर-द्वार पर हमें अपने भट मिल जाएंगे।”
“द्वार के निकट ही हमारे भट छिपे हुए हैं।”
“तो अब हमें सावधान रहना चाहिए।”
“आप केवल दल का पृष्ठभाग संभालिए। मैं सब निबट लूंगा। नगर में हमारे मित्र बहुत हैं। राजसभा में भी हमारे मित्र हैं। सब दैत्य, असुर, दानव और राक्षस तो अपने मित्र हैं ही। यक्ष, देव और गन्धर्व भी विरोध न करेंगे। फिर नर, नाग ही रहे। सो उनका बल ही क्या है!”
“ठीक है, पर पुत्र, शत्रु को कभी लघु न गिनना, सावधान रहना!”
उत्तर में रावण ने वृद्ध नाना का हाथ कसकर पकड़ तनिक मुस्कुरा दिया। दैत्य आश्वस्त हो गया।
कुछ ठहरकर रावण ने हंसकर कहा—“मातामह, आप तो नागपति के पिता के मित्र हैं। वज्रनाभ आपका तो स्वागत ही करेगा।”
“नहीं तो क्या! और जब मैं उससे कहूंगा कि यह दिक्पति धनेश कुबेर का अनुज-दशानन रावण है, तो वह ससम्भ्रम तुझे अभ्युत्थान देगा।”
“स्वस्ति, तो हमारे सर्वोपरि अस्त्र ये मद्य-भाण्ड हैं।”
“ये रत्नमणि भी अस्त्र ही समझ, पुत्र! जब हम यह सब स्वर्ण, रत्नमणि और मद्य-भाण्ड उसे मैत्रीभाव से भेंट करेंगे, तो आनन्द से उन्मत्त होकर वह हमारी ही लाई हुई सुरा का सब सचिव-सहित पान करेगा। इन नागों को हमारे मसालेदार मद्य बहुत प्रिय हैं, और मेरी बनाई हुई सुवासित मद्य जो एक बार पी लेगा, उसे भूलेगा नहीं, वह असंयत हो जाएगा। बस, हम ज्योंही उन सबको मदमत्त और असावधान देखेंगे, अपने कार्य सम्पूर्ण कर लेंगे।”
“इससे उत्तम युक्ति क्या हो सकती है, मातामह! किन्तु आप क्या नागपति वज्रनाभ को पहचानते हैं?”
“न, उसका पिता मेरा कृपापात्र तथा मित्र था, उसकी एक बार असुरों के विरुद्ध सम्मुख युद्ध में मैंने सहायता की थी। वज्रनाभ यह जानता है और हमें मित्र-भाव से आया जान, हमारा सत्कार करेगा।”
“तो हम उसे जय करके मित्र ही बना लेंगे, मातामह!”
“जैसा संयोग होगा। वध भी करना पड़ सकता है। देख, यह सम्मुख ही तो नगरद्वार है। अब सब कोई सावधान हो जाओ। मैं आगे चलकर द्वार खुलवाता हूं।”
वृद्ध असुर आगे बढ़ा। अवरुद्ध द्वार पर आकर उसने पुकारा—“अनवरुद्ध कपाटं द्वारं देहि, द्वारं देहि, द्वारं देहि!”
द्वारपाल ने गोखे से सिर निकालकर कहा—“कौन हो तुम?”
“नागराज के सम्माननीय अतिथि हैं। क्या तू नहीं जानता, आज नागराज हमारी अभ्यर्थना करेगा? बोल, तुझे आदेश मिला है?”
“आदेश नहीं मिला है। चिह्न है?”
“चिह्न भी देख ले।” बूढ़े दैत्य ने बगल से एक नरसिंहा निकालकर जोर से फूंका। इधर-उधर छिपे बहुत-से दैत्यों ने आकर उस सुभट का सिर काट लिया और द्वार खोल दिया।
सभी दैत्य नगर में घुस गए। द्वार-अवरोधकर्ता युद्ध करने लगे। परन्तु रावण द्वार पर रुका नहीं, वेग से अपने सुभटों को संग लिए राजप्रासाद की ओर बढ़ता चला गया। जो दो-चार नाग सुभट द्वार-रक्षा में उपस्थित थे, उन्हें मारकर असुरों ने द्वार अधिकृत कर लिया। किसी को यह बात कानों-कान न सुनाई दी।
अब भेरी और नगाड़े बजाते हुए दैत्य राजद्वार में घुस गए। प्रासाद में किसी ने उनका विरोध नहीं किया। कुछ इधर-उधर बिखरकर भीड़ में मिल गए। प्रासाद में बहुत भीड़-भाड़ थी। बहुत लोग प्रासाद में आ-जा रहे थे। लोग ठौर-ठौर मद्यपान करके कोलाहल मचा रहे थे। ये असुर भी जहां-तहां इनमें घुसकर कोलाहल मचाने और मद्य पीने-पिलाने लगे। वास्तव में आज नाग संवत्सर-समारोह मना रहे थे। राजप्रासाद खूब सजा था। विविध वाद्यों के निनाद और लोगों के शोर से कान नहीं दिए जाते थे। सभा-भवन और मण्डप खूब ठाठ से सजाए गए थे। सारे सभा-मण्डप में रंग-बिरंगी पताकाएं फहरा रही थीं। बीच में रत्न-जटित मण्डप था, उस पर स्वर्णतार-खचित वस्त्र पड़ा था। सभा में नर, नाग, दैत्य, दानव, असुर, देव, सभी उपस्थित थे। नागराज का सिंहासन सिंहल के बड़े-बड़े मुक्ताओं से सजाया गया था। वहां अनेक प्रकार के सुगन्ध-द्रव्य जल रहे थे।
सभा-मण्डप के एक कोने में वादकों का एक दल मधुर वाद्य बजा रहा था। कुछ देर बाद एक प्रौढ़ पुरुष स्वर्ण-विमान पर सवार सभामण्डप में आया। दिव्यांगनाएं वह स्वर्ण-विमान उठाए हुए थीं। बहुत-सी वारवनिताएं उसके आगे मंगलगान करती आ रही थीं। विमान के चारों ओर शुभ्रवसना कुमारिकाएं मंगलचिह्न लिए लाज-विसर्जन करती चल रही थीं। यही भोगिराज नागराज वज्रनाभ था।
वज्रनाभ के सभामण्डप में आते ही सब बाजे बड़े जोर से बज उठे। सिंहद्वार पर दुन्दुभि गरजने लगी। सभी लोग जयजयकार करते उठ खड़े हुए और घुटनों पर हाथ टेक खड़े रह गए। भोगिराज के सम्मुख सीधा खड़ा होने का किसी को आदेश न था। ठीक इसी समय मण्डप के बाहर दूसरी ओर दुन्दुभि बज उठी। और एक ही क्षण बाद वज्रवक्ष दशानन रावण हाथ में भीमकाय परशु और दैत्यपति सुमाली विकराल खड्ग लिए लाल वस्त्र पहने सभामण्डप में आ खड़े हुए। इन दो महातेजस्वी पुरुषों को देखकर सभा भीत-चकित रह गई। जो वाद्य सभा में बज रहे थे, स्तब्ध हो गए। आगन्तुक शत्रु हैं या मित्र, यह कोई भी न जान सका। नागराज वज्रनाभि घूर-घूरकर रावण की वज्रमुष्टि में गहे हुए परशु को देखने लगा।
परन्तु इसी समय दैत्य सुमाली ने आगे बढ़कर कहा—“स्वस्ति नागराज, मैं दैत्य सुमाली हूं और यह आयुष्मान् दशानन रावण मेरा दौहित्र तथा दिक्पति धनेश कुबेर का अनुज है। रावण का कुछ अभिप्राय है, जिसे वह अभी निवेदन करेगा। अभी आप हमारी यह स्नेहभेंट स्वीकार कीजिए।” इतना कहकर दैत्य-पति ने संकेत किया। दैत्य अनुचरों ने मद्य-भाण्ड ला-लाकर नागराज के सम्मुख धर दिए। रत्न-मणियों की मंजूषाएं भी नागराज के सम्मुख खोल दीं।
यह मूल्यवान स्नेहभेंट देख नागपति प्रसन्न हो गया। वह सिंहासन छोड़ उठ खड़ा हुआ। आगे बढ़कर उसने रावण को छाती से लगाकर सिर संघा और आंखों में आंसू भरकर गद्गद होकर कहा—“स्वागत भद्र, जैसे लोकपाल धनेश मेरा मित्र है, वैसा ही तू है। तेरे पिता विश्रवा मुनि को मैं जानता हूं।” फिर उसने दैत्येन्द्र की ओर मुंह फेरकर कहा—“दैत्यपति, आप तो मेरे पूज्य पितृव्य ही हैं। पितृ-चरणों ने आपसे मैत्री-लाभ किया है। आपका स्वागत, यह आसन है, विराजिए!”
नागपति ने दैत्येन्द्र सुमाली और दशानन रावण को अपने साथ सिंहासन पर बैठाया। सिंहासन पर बैठते ही वन्दीजन ने नागराज की वन्दना की। किन्नर और गन्धर्व गाने लगे। अप्सराएं नृत्य करने लगीं। इसके बाद नागराज के आदेश से मद्यपान चला। मरकत के पात्रों में मद्य भर-भरकर नागों ने अतिथियों के हाथ में दिए।
मद्य पीकर दैत्य संप्रहृर्षित हुए। अवसर पाकर सुमाली ने दैत्यों को संकेत किया। दैत्यों ने मद्य-भाण्डों से मद्य उंडेल-उंडेल नागों को पिलाना आरम्भ कर दिया। नागराज ने हंसकर सुमाली दैत्य के हाथ से सुवासित मद्य लेकर पिया। धीरे-धीरे पान में संयत भाव लोप होने लगा तथा मद्य भी नागों के मस्तिष्क में पहुंचकर ऊधम मचाने लगा। इसी समय सब बाजे ज़ोर-ज़ोर से बज उठे। नृत्यांगनाओं ने भावनृत्य आरम्भ किया। प्रत्येक नृत्यांगना हाथ जोड़ दोनों हाथों के अंगूठे नाक से लगाकर प्रथम नागराज को और फिर उसके मान्य अतिथियों को प्रणाम करती—तब नृत्य करती। अनेक प्रकार के सज्जा नृत्य, विलास नृत्य और भाव-नृत्य होते रहे। फिर भंगिमा-नृत्य होने लगे। प्रत्येक नृत्य-नाटक में गायक और वादक के साथ कहानी भी चलती थी। इसके बाद युद्धाभिनय हुआ। देवासुर संग्राम की भूमिका चलने लगी। धीरोदात्त पात्र अभिनय करने लगे। मद्यपान धूम-धाम से चल रहा था। नागराज आनन्दातिरेक से बहुत-सा मद्य पी चुके थे। दैत्य उन्हें ढाल-ढालकर और भी मद्य देते जा रहे थे। सुमाली उन्हें बढ़ावा दे रहा था। अकस्मात् बाहर बहुत-सा गोल-माल सुनाई दिया। और सावधान होने से प्रथम ही चारों ओर से दैत्य सुभट भारी-भारी खड्ग, परशु, त्रिशूल, मुद्गर लिए सभा-मण्डप में घुस आए और लगे मार-काट करने! देखते-ही-देखते नागों का विध्वंस होने लगा। चारों ओर कोलाहल मच गया। नागराज ने विस्मित होकर रावण की ओर देखकर कहा—“पुत्र, यह क्या?” रावण ने अपना परशु उठाया। वह उछलकर सिंहासन पर खड़ा हो गया। हवा में उसने चारों ओर परशु हिलाकर जल्द-गम्भीर स्वर से गरजकर कहा—“वयं रक्षामः!”
उसने फिर हवा में परशु हिलाया। संकेत से उसने दैत्यों को रोका। क्षणभर को मार-काट रुक गई। परन्तु दैत्येन्द्र सुमाली अपना विकराल खड्ग नागराज के सिर पर तानकर खड़ा हो गया।
रावण ने कहा—“सब कोई सुने, आज से यह बाली द्वीप रक्ष-संस्कृति के अधीन हुआ। हम राक्षस इसके अधीश्वर हुए। जो कोई हमसे सहमत है, उसे अभय! जो कोई सहमत नहीं है, उसका इसी क्षण शिरच्छेद होगा। पहले तुम, नागराज, अपना मन्तव्य प्रकट करो। यदि तुम हमारी रक्ष-संस्कृति स्वीकार करते हो तो हमारी ओर से इस द्वीप के स्वामी तुम्हीं हो।”
“किन्तु पुत्र यह कैसा अत्याचार है! यह तो विश्वासघात है।”
“इस प्रकार की बातें मित्रता-विरोधी हैं, नागराज! जहां समान बल नहीं होता, वहां पर युक्तियुद्ध ही श्रेयस्कर है, ऐसा नीति का वचन है। कहो तुम, क्या तुम्हें रक्ष-संस्कृति स्वीकार है?”
क्रोध-अभिभूत होकर नागराज ने हाथ झटककर कहा—“नहीं।”
और उसी क्षण वज्रपाल की भांति रावण का कुठार नागराज के कण्ठ पर पड़ा। उसका सिर कटकर दूर जा पड़ा। सज्जित सिंहासन खून से लाल हो गया। इसके साथ ही सब दैत्य नागों पर पिल पड़े। न जाने कहां से दैत्यों के दल बादल जैसे भूमि फाड़कर निकल-निकलकर आने लगे। कुछ क्षणों में ही नागों का सफाया हो गया। बचे हुए नाग, गन्धर्व, यक्षों ने रावण की अधीनता स्वीकार कर ली। नागराज के कटे हुए सिर को उठा, उसी के रक्त से रावण के मस्तक पर तिलक देकर तथा उसे रक्तप्लुत सिंहासन पर बैठाकर दैत्येन्द्र सुमाली ने विकराल खड्ग हवा में हिलाते हुए जोर से चिल्लाकर कहा—“वयं रक्षामः!” दैत्यों, नागों, दानवों, गन्धर्वों, यक्षों ने एक-दूसरे से यही स्वर ध्वनित किया। बाली द्वीप में रावण की आन फिर गई। नागों के उस भव्य प्रासाद को रावण और उसके साथी दैत्यों ने अधिकृत कर, अन्तःपुर पर अपने पहरे बैठा दिए। इस समय तीन पहर रात व्यतीत हुई थी।