वज्रपाणि दैत्येन्द्र
वज्रपाणि दैत्येन्द्र
दैत्यबाला के रमण से तृप्त और लातों के आघात से प्रहृर्षित रावण लम्बी-लम्बी डगें भरता हुआ नगर की दक्षिण दिशा में स्थित समुद्र-तट की ओर बढ़ता चला गया। समुद्र-तट से कुछ हटकर छोटी-बड़ी चट्टानों की ओट में वन के एक दुर्गम प्रदेश में उसका शिविर था। शिविर तक आने में बहुत रात बीत गई। आकर उसने देखा—आग पर समूचा भैंसा भूना गया है, और दैत्य-दानव अब भोजन की तैयारी कर केवल उसी की प्रतीक्षा में बैठे हैं। मद्य-भाण्ड भरे धरे हैं। बड़ी-बड़ी अग्निराशि यत्र-तत्र जल रही है। रावण के वहां पहुंचते ही एक वृद्ध दैत्य ने आगे बढ़कर उसका कन्धा थामकर कहा—“इतना विलम्ब करके तूने हमें चिन्ता में डाल दिया, पुत्र!”
“चिन्ता काहे की, मातामह?”
“पुत्र, अपना देश नहीं है? वन, वाट, वीथी अज्ञात हैं, और तू हमारे प्राणों से भी अधिक मूल्य का है।”
तरुण ने हंसकर वृद्ध का हाथ पकड़ लिया। कहा—“बहुत श्रम करना पड़ा, मातामह, भोजन दो।”
“पहले कण्ठ सिक्त कर।” वृद्ध दैत्य ने एक असुर को संकेत किया। असुर ने मद्य-भाण्ड लाकर प्रस्तुत किया। समूचा भाण्ड एक ही सांस में पीकर एक बड़ा-सा छुरा ले तरुण भैंसे की ओर बढ़ा। उसने मांसखण्ड काटा। फिर तो सभी असुर भैंसे पर पिल पड़े। वे अन्धाधुन्ध मद्य पीने और मांस खाने लगे। वे हर्ष-आवेग से चीखने-चिल्लाने, छीना-झपटी करने और आपस में रेलमपेल करने लगे। देखते-ही-वह समूचा भैंसा और वे सब के सब मद्य-भाण्ड उनकी उदरदरी में समा गए। खा-पीकर निवृत्त होकर वृद्ध दैत्य तरुण के निकट खिसक आया। वह सुमाली था। उसने खींचकर तरुण को अंक में भरकर छाती से लगाकर कहा—“पुत्र, बहुत दिन के हमारे मनोरथ अब पूरे होंगे। ये सब द्वीप-समूह हमने जय कर लिए। यह बाली द्वीप भी आज रात जय हुआ समझ! परन्तु अब तू सामने इस स्वर्ण-लंका को देख। मेरी इस लंका में अब तेरा भाई कुबेर रहता है। वह हमारा नहीं, देवों-आर्यों का बान्धव है। आर्यों और देवों ने उसे धनेश बनाकर अपना लोकपाल नियुक्त कर दिया है। वह हमारे ही धन से सम्पन्न है। हमारी ही लंका में सुप्रतिष्ठित है। यह मैं अब नहीं सह सकता। विष्णु का अब हमें भय रहा ही नहीं। अब यदि कुबेर धनपति राजी से मेरी लंका तेरे लिए छोड़ दे तो ठीक है, नहीं तो हम उसे शस्त्र से मार तुझे लंकाधीश्वर बनाएंगे। पुत्र, तू ही डूबते हुए दैत्य वंश का सहारा है।”
तरुण रावण नाना की बात सुनकर चुप हो गया। वह गहरे सोच में पड़ गया। इस पर सुमाली ने कहा—“अब क्या सोच रहे हो, पुत्र? तुझे चिन्ता किस बात की है!”
रावण ने कहा—“मातामह, कुबेर मेरा बड़ा भाई है, कैसे मैं उससे ऐसा प्रस्ताव करूं?”
इस पर रावण का मामा प्रहस्त उत्तेजित होकर बोला—“अरे भागिनेय, वीर पुरुषों में भाईचारा नहीं होता।”
सुमाली ने भी उसे बढ़ावा देते हुए कहा—“निसन्देह, दिति और अदिति दोनों सगी बहनें ही तो थीं। दोनों ही प्रजापति कश्यप की पत्नी थीं। पर अदिति से देवों और दिति से दैत्यों का कुल चला। अपने पराक्रम से तथा मातृपक्ष से ज्येष्ठ होने से सारी पृथ्वी दैत्यों ही के अधिकार में थी। पर विष्णु ने छल-बल से दैत्यों का नाश करके देवों को आगे बढ़ाया। इसीलिए हम यह कोई नई मर्यादा नहीं स्थापित कर रहे हैं।”
इतना कहकर सुमाली ने अपने ज्येष्ठ पुत्र प्रहस्त की ओर मर्मभेदिनी दृष्टि से देखा। प्रहस्त ने कहा—“यही तो बात है, भागिनेय, फिर तेरे साथ तो हमारा—सब दैत्य-दानवों का रक्त भी है, बल भी है। फिर लंका तो हमारी ही है। न्यामतः उस पर तो हमारा ही अधिकार है। अतः इस सम्बन्ध में तुझे सोचने-विचारने की कोई बात नहीं है।”
मामा के ये वचन सुनकर रावण ने कहा—“तो मातुल, तुम्हीं अब हमारे दूत बनकर लंका जाओ और जिस प्रकार ठीक समझो, कुबेर धनपति से प्रस्ताव करो।”
सुमाली ने कहा—“ऐसा ही हो। पुत्र प्रहस्त, तू यह मत भूलना कि यदि लंका हमारे हस्तगत न हुई—तो फिर दैत्यों को कहीं खड़े रहने को स्थान नहीं है। मैंने बड़ी साधना की है और बहुत दूर तक विचार किया है। अब मेरी जीवन-भर की तपस्या को फलीभूत करना तेरा काम है, प्रहस्त!”
प्रहस्त ने कहा—“आज ही, अभी मैं लंका को तरणी द्वारा प्रस्थान करता हूं, और आशा करता हूं, आगामी ज्वार से पहले ही आ उपस्थित होऊंगा। तब तक आप सब बाली द्वीप पर ही रहना तथा बाली द्वीप को अधिकृत करने में विलम्ब न करना।”
“विलम्ब कैसा, पुत्र, हम तो आज रात ही यह अभियान कर रहे हैं।”
सुमाली ने साभिप्राय पुत्र को देखा, और फिर रावण की ओर देखकर कहा—“नगर तो तूने देख ही लिया?”
रावण ने हंसकर कहा—“देख लिया, सब राह-बाट देख आया हूं। किन्तु मातामह, हमें अभी एक और अभियान करना है।”
“कहां रे?”
“उधर, पर्वत की उपत्यका में, अर्जना-तट पर एक ग्राम है।”
“असुरों का है?”
“न, दैत्यों का।”
“कहां के हैं वे?”
“काश्यप-सागर-तट से आए हैं।”
“परन्तु दैत्यों का है, तो विग्रह क्यों?”
“ऐसे ही। वह फिर कहूंगा। तो मातुल, शुभास्ते सन्तु पन्थानः!”
प्रहस्त ने चर्म का कटिबन्ध कमर में लपेटा और शूल हाथ में लेकर वह खड़ा हुआ।
“एक योद्धा ले ले साथ।” सुमाली ने कहा।
“नहीं, एकाकी ही जाऊंगा, योद्धा यहां कम हैं। यहां उनकी आवश्यकता है।” प्रहस्त यह कहकर अंधकार में विलीन हो गया।
रावण ने खड़े होकर कहा—“चलो, अब हम भी चलें। सब योद्धा तैयार हो जाएं।” उसने अपने साथी सुभटों पर दृष्टि डाली, and परशु कन्धे पर रख चल पड़ा। उसके पीछे दैत्य, दानव, असुर, योद्धा शक्ति शूल, खड्ग, परशु, ऋष्टि, पाश, मूसल, गदा, परिघ, बाण, धनुष, दण्ड ले चले। सबके पीछे वृद्ध व्याघ्र दैत्येन्द्र लंकापति सुमाली—वज्रपाणि था।