देवासुर-संग्राम
देवों, दैत्यों तथा उनके मित्रों के राज्यों का ज्यों-ज्यों विस्तार होने लगा, त्यों-त्यों ऐसे राजनीतिक और आर्थिक कारण उत्पन्न होने लगे कि इन दायाद बान्धवों का मित्र-भाव से मिल-जुलकर रहना असंभव हो गया।
हिरण्यकशिपु की राजधानी हिरण्यपुरी काश्यप सागर तट पर थी। पर्शिया का लूट या लट प्रदेश जहां है और जिसे कबीर भी कहते हैं, वही कालान्तर में नन्दनवन प्रसिद्ध हुआ। काश्यप सागर की जो भूमि आजकल औक्सस या पार-दरिया कहाती है, उसी के ऊपरी भाग में दाह-स्थान या नन्दनवन था। इसी महामरुभूमि को ग्रेट डेज़र्ट और साल्ट डेज़र्ट भी कहते हैं। यहीं सर्वप्रथम स्वर्ण की खान का पता लगा, जिसे प्राप्त कर दैत्य का नाम हिरण्यकशिपु पड़ा। इसी के कारण प्रथम देवासुर-संग्राम हुआ, जिसकी परम्परा लगभग तीन सौ वर्षों तक चलती रही। चौदह दारुण देवासुर-संग्राम इस बीच में हुए तथा देव, दैत्य, आदित्य जो परस्पर दायाद बान्धव थे, चिरशत्रु हो गए।
बहुत-सा स्वर्ण पाकर और अपने बलवान् भाई हिरण्याक्ष की सहायता से हिरण्यकशिपु ने चारों ओर अपने राज्य की सीमाएं बढ़ानी आरम्भ कीं। अनेक देवलोकों को विजित किया। देवों को मार भगाया। इससे देवों पर हिरण्यकशिपु का भारी आतंक छा गया। इस समय तक सम्पूर्ण उत्तर-पश्चिम का फारस और समूचा अफगानिस्तान हिरण्यकशिपु के अधीन हो चुका था। बेबीलोन और उसके आसपास के प्रदेश उसके भाई हिरण्याक्ष के अधिकार में थे। देवगण चारों ओर से दबते चले जा रहे थे और विष्णु इससे बहुत चिंतित थे। वे देवों का संगठन करके प्रत्येक मूल्य पर स्वर्णस्थान तथा दैत्यभूमि को अधिकृत करना चाह रहे थे।
इस समय यूरोप के उत्तरी-पश्चिमी प्रदेश में जो नारवे द्वीप है, उसे उस काल में कोलावराह या केतुमाल द्वीप कहते थे—आजकल भी उस अंचल को कोला पैनिन्सुला (द्वीप) कहते हैं। यहां कोला-वराह-वंशियों का राज्य था। अतिप्राचीन काल से यहां यह जाति रहती थी। आज तक भी यहां के निवासी कोल-कोल्ट-कैल्ट कहाते हैं। उनके नाम भी वाराह के नाम पर होते हैं। प्रलय-काल के बाद वराह-राज से वरुणदेव को एकार्णव के जल से पृथ्वी को उबारने में बड़ी सहायता मिली थी। तभी से देवों के इस जाति से मैत्री-सम्बन्ध हो गए थे। अब देवों के उकसाने से वराहों ने आक्रमण करके हिरण्यकशिपु के वीर भाई हिरण्याक्ष को मार डाला और बेबीलोन पर सूर्यपुत्र मनु के द्वितीय पुत्र नृग का आधिपत्य हो गया। वराहों के वंश की एक शाखा नृग के साथ मिल गई और उसकी उपाधि देवपुत्र कहलाई। आगे चलकर ईरान के क्षत्रप इसी वंश में हुए, जो देवपुत्र कहाते तथा वाराह की मूर्ति पूजते थे। यही सूर्यवंशी नृग नृसिंहदेव के नाम से विख्यात हुए और हिरण्याक्ष के निधन से दुर्बल हिरण्यकशिपु को नृसिंह ने अपने प्रबल पराक्रम से आक्रान्त करके मार डाला। नृसिंह या नृग के वंशज आज भी ईरान में रहते हैं और नृग्रिटो कहाते हैं। नृसिंह के सैन्य-संचालन के शिलाचित्र और शिलालेख लुलवी और बेबीलोनिया प्रान्त में मिले हैं। नृग्रिटो जाति के लोग काश्यप सागर के उत्तरी तुर्किस्तान से फारस की खाड़ी तक फैले हुए थे। ईरानी इतिहासकार नृगवंशियों के अधिनायक का नाम ‘नरमसिन’ बताते हैं, वहां नरमिसिन की अर्धसिंह मूर्ति है। नरमिसिन एक प्रान्त का नाम भी प्रसिद्ध हुआ जो इस्तखर के निकट परसा प्रान्त में है। वास्तव में खरों के इस्ट हिरण्यकशिपु ही थे। इस्टखर का अर्थ है—मूलपुरुष। यही इस्टखर हिरण्यकशिपु की दूसरी राजधानी थी। इस्टखर में इस्तखारी जाति अब भी रहती है। नरमसिर या नरमसिन नृसिंहदेव ही का अपभ्रंश है।
हिरण्यकशिपु का वध सुमना पर्वत पर हुआ था। यह पर्वत काश्यप सागर के निकट ही है। इसी के पास देमाबन्द स्थान है, जिसे इरानियन स्वर्ग कहा जाता है। पर्शिया के प्राचीन इतिहास में नृसिंह के इस अभियान को नरमसिन के नेतृत्व में नृग्रिटों का विजय-अभियान कहा गया है, जिसका एक भित्तिचित्र लुलवी प्रान्त में बगदाद व करमनशाह के मध्यवर्ती देश में मिला है। इसमें नृसिंह सूर्य का झण्डा लिए सैन्य-संचालन कर रहे हैं। परसा प्रान्त ही में परसी राजधानी है जहां यमराज का सिंहासन जमशेद का तख्त है, जिस पर सिंह और गिरगिट के चित्र बने हैं। नृगों का चिह्न गिरगिट था। पुराण में संकेत भी है कि नृग शापवश गिरगिट हो गए थे।
दैत्यों ने दानवों को अपने साथ मिलाकर अपना बल बढ़ाया। उसी प्रकार नागों और गरुड़ों को आदित्यों ने अपने साथ मिलाकर संगठित किया। वरुण इस समय ईरान के सबसे बड़े कर्ता, धर्ता, विधाता और राजा थे। सभी लोग उन्हें अपना ज्येष्ठ मानते थे। इन्हीं का नाम ब्रह्मा, अल्लाह, इलाही, इलौही, कर्तार आदि था। आजकल जिसे करमान प्रदेश कहते हैं, वही उनकी राजधानी सुषा थी। उधर क्षीरसागर—पर्शिया की खाड़ी में उनके छोटे भाई सूर्य का आधिपत्य था, तथा अपवर्त में उनके भतीजे सूर्यपुत्र यम का अधिकार था, एवं यवन यूनान में उनके दूसरे भतीजे शनैश्वर का राज्य था।
नागों के राज्य सीरिया, कोचारिस्तान, हसनअब्दाल, पाताल, अबीसीनिया और तुर्किस्तान में थे। तुर्किस्तान उनकी सबसे बड़ी राजधानी थी। गरुड़ों का देश गरुड़-धाम था, जिसे आजकल गरडेशिया कहते हैं। यह तुर्किस्तान के ऊपर है। यद्यपि गरुड़ और नाग दोनों ही जातियां आदित्यों की मित्र और सहायक रहीं, पर ये दोनों जातियां परस्पर शत्रु रहीं। गरुड़ नागों के लिए कालस्वरूप ही रहे।
दैत्यों के साथ इस विग्रह के नेता विष्णु ही थे। वरुण मिलकर रहना ही ठीक समझते थे। इस बढ़ती हुई कलह को रोकने के लिए वरुणदेव ने एक प्रयत्न किया। उन्होंने एक महायज्ञ का आयोजन किया जिसमें सब दैत्यों, दानवों और देवों को आमन्त्रित किया गया। उस समारोह में मरीचि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु आदि याजक और दक्ष प्रजापति, बारहों आदित्य, ग्यारहों रुद्र, दोनों अश्विनीकुमार, आठों वसु, मरुद्गण, शेष, वासुकि आदि बड़े-बड़े नाग, तार्क्ष्य, अरिष्टनेमि, गरुड़, वारुणि आदि युगपुरुष आए। अभि, चन्द्र, बृहस्पति और पितृजन भी आए। शनैश्वर, यम-धर्मराज तथा विप्रचित्ति, शिवि, शकु, केतमान, राहु, वृत्र आदि अनेक दानव आए।
यहां देव-दैत्यो में राजलक्ष्मी के सम्बन्ध में बहुत कुछ विवाद हुआ। दैत्यों ने कहा—“हमारा अपराध नहीं है। देवों ने हम पर अन्याय से आक्रमण किया और हमारी स्वर्णलक्ष्मी छीन ली है। हमारे छोटे भाई होने पर भी देवों ने दैत्यों का रक्त बहाया है। ये सदैव हमसे अपमानित होते और मारे जाते रहेंगे परन्तु आप हमारे सबके पितामह हैं। आपके यज्ञ में हम चुपचाप यज्ञ को देखेंगे। देवों से विग्रह नहीं करेंगे। यज्ञ समाप्त होने पर स्वर्णलक्ष्मी के विषय में हमारा देवों से विरोध-विग्रह होगा। अभी हमें आप आज्ञा कीजिए कि यज्ञ में हम क्या सेवा करें। अपने कर्त्तव्य का निर्णय करने में हम समर्थ हैं—स्वतन्त्र हैं।”
दैत्यों के इन गर्वीले तथा रोषपूर्ण शब्दों को सुनकर विष्णु ने रुद्र से सलाह ली। तब रुद्र ने कहा—“इस समय आप चुप रहें। ये सब दैत्य, ब्रह्मा-वरुण से नियन्त्रित हैं। हमारे बान्धव हैं। इस समय आप कुछ बोलेंगे तो ये क्रुद्ध हो सकते हैं। आपने इनकी लक्ष्मी हरण की है। अतः इन्हें क्रुद्ध करना उचित नहीं है। यज्ञ की समाप्ति पर युद्ध, विग्रह या सन्धि जो कुछ होगा, देखा जाएगा।”
वरुण ने भी दैत्यों को समझा-बुझाकर शान्त किया और कहा—“देवों के साथ विरोध-भावना त्याग दो और मित्रभाव से यज्ञ में भाग लो।” दैत्यों ने कहा—“देव हमारे छोटे भाई हैं, उन्हें यहां हमारी ओर से कोई भय नहीं है। आप अपना यज्ञ सम्पन्न कीजिए।” अन्ततः बहुत वाद-विवाद के बाद दैत्यों के नेता हिरण्यकशिपु के पुत्र प्रह्लाद से देवों की सन्धि हुई। विष्णु ने वचन दिया कि अब दैत्यों का रक्त पृथ्वी पर नहीं गिरेगा। इसके बाद प्रह्लाद ने भी विष्णु की मित्रता का वचन दिया। इस प्रकार देवों और दैत्यों में एक बार सन्धि हो गई।