आदित्य

आदित्य

प्रचेता के पुत्र दक्ष ने साठ कन्याओं का दान किया। उसने तेरह कश्यप को, दस यम को, सत्ताईस चन्द्र को, चार अरिष्टनेमि को, दो भृगुपुत्र को, दो कृशाश्व को और दो अंगिरा को दीं। आज के विश्व का सम्पूर्ण नृवंश इन्हीं की संतति है।

अदिति से कश्यप ने बारह पुत्र उत्पन्न किए। ये बारह आदित्यों के नाम से प्रसिद्ध हुए और इनके कुलों का संयुक्त नाम आदित्य-कुल पड़ा। इनमें जो देव-भूमि में रहे, वे देव कहलाए, और जो भारतवर्ष में आए वे आर्य कहलाए। वरुण सबसे ज्येष्ठ थे और विवस्वान् सबसे छोटे। विवस्वान् का ही नाम सूर्य था। असुर याजक भृगुवंशी शुक्र-उशना के पुत्र त्वष्टा ने अपनी पुत्री रेणु सूर्य को ब्याह दी। रेणु का ही नाम संज्ञा और अश्विनी भी था। वह जैसी रूपवती स्त्री थी, वैसी रूपगर्विता भी थी। विवस्वान् का रंग श्याम था और वह सुन्दर भी न था। इससे वह मानिनी सदैव ही सूर्य का तिरस्कार करती रहती थी। काल पाकर सूर्य से इस स्त्री के एक पुत्र हुआ जो वैवस्वत मनु के नाम से प्रसिद्ध हुआ। इसके बाद यम और यमी दो जुड़वां सन्तानें हुईं। अभी ये तीनों बालक ही थे कि किसी बात पर ठिनककर रेणु पति से गुस्सा हो पिता के घर चली गई। तीन बच्चों को अपनी मुंहलगी दासी सवर्णा को सौंप गई। सवर्णा भी बड़ी रूप-लावण्यवती स्त्री थी। वह नव-यौवना भी थी। संज्ञा की मुंहलगी थी। शीघ्र ही यह विवस्वान् की कृपापात्री हो गई और फिर प्रेयसी बन स्वामिनी की ही भांति ठाठ से रहने लगी। समय पाकर विवस्वान् से सवर्णा के गर्भ से एक पुत्र, दो कन्याएं हुईं। पुत्र का नाम शनैश्वर रखा गया, और तपती तथा विष्टि कन्याओं का। वैवस्वत मनु अपनी विमाता के नाम पर सावर्णि मनु भी कहलाया। किन्तु सवर्णा एक तो दासी थी, दूसरे विवस्वान् का प्रेम और आदर पाकर उसका मन बढ़ गया था। फिर यह स्वाभाविक था कि वह संज्ञा की सन्तान की अपेक्षा अपनी ही संतति से अधिक ममता रखती थी। यम उग्र स्वभाव का बालक था। उसे विमाता का यह पक्षपात सहन नहीं हुआ और एक दिन बातों-ही-बातों में गुस्सा होकर यम ने विमाता सवर्णा को लात मार दी। सवर्णा इस पर आपे से बाहर हो उठी और उसने यम की टांग तोड़ दी।

घर की कलह विवस्वान् तक पहुंची। सब बातें सुनकर उसे बड़ा क्रोध आया। उसने सवर्णा को इस बात पर बहुत लानत-मलामत दी कि वह क्यों सब बालकों से समान स्नेह नहीं रखती। अन्ततः विवस्वान् उससे क्रुद्ध होकर रेणु को लाने के लिए उच्चैःश्रवा पर सवार होकर अपने श्वसुर त्वष्टा के घर असुर-भूमि में गया। ससुराल में जाकर उसने अपनी मानवती स्त्री रेणु को अत्यन्त कृश, दीन, जटाधारिणी तथा हाथी के शुण्ड से व्यथित पद्मिनी की भांति मलिन और संतप्त पाया। त्वष्टा ने दामाद का बहुत सत्कार किया, अपनी पुत्री की उपेक्षा करने पर उलाहना भी दिया। रेणु के साथ बहुत मान-मनव्वल हुआ। अन्ततः उस मानवती पत्नी को प्रसन्न कर सूर्य ने उसे शृंगार कराया और स्वयं भी गन्ध, पुष्प, रत्नाभरण धारण कर, अपनी प्रियतमा रेणु को उत्तर कुरु के मनोरम प्रदेश में उसका मन बहलाने और उसके साथ विहार करने के लिए ले गया। आजकल का कुर्दिस्तान आरमीनिया के नीचे का प्रदेश ही उन दिनों उत्तर कुरु कहलाता था और सूर्य विवस्वान् का श्वसुर त्वष्टा, जो विश्वकर्मा के नाम से भी विख्यात शिल्पी था, इस रियासत का स्वामी था। इसकी राजधानी का नाम ‘वन’ था। सूर्य के उस तेजस्वी अश्व को देख रेणु बहुत प्रसन्न हुई और स्वयं उस पर सवार होकर वन-विहार करने लगी। विवस्वान् हंस-हंसकर उसे चिढ़ाने के लिए ‘अश्विनी-अश्विनी’ कहकर पुकारने लगे। यहीं उत्तर कुरु में विहार करते हुए उसने फिर दो जुड़वां बालकों को जन्म दिया, जो आगे चलकर अश्विनीकुमार के नाम से विख्यात हुए और बड़े वीर योद्धा, चिकित्सक तथा ऋषि हुए। ये अत्यन्त रूपवान् थे। इन्होंने करन्ध्र, वय और वशिष्ठ को अपना मित्र बनाया। सुदास को उनकी स्त्री सुदेवी प्राप्त करने में सहायता की। अन्धे और लंगड़े परावृज को चंगा किया। विस्पला की टूटी हुई टांग अच्छी कर दी। बद्धमती को सोने का हाथ लगा दिया। ऋज्रान्व के नकली नेत्र लगाए। रेमा, बन्दन, कण्व, अन्तक, मज्यु, सुचन्त, पृथ्विगु, अत्रि, श्वैत्रर्य, कुत्स, न्वर्य, वसु, दीर्घश्रवस, औशिज, कक्षीवान्, रसा, तृशोक, मान्धाता, भरद्वाज, अतिथिग्व, दिवोदास, कशोजु, तुषदस्यु, वम्र, उपस्तुत, कलि, व्यस्व, पृथुराजर्षि, सपु, मनु, सर्यात्, विमद, आधिग्र, सूभर, ऋतस्तूप, कृशानु, पुरुकुत्स, ध्वशान्ति, पुरुषान्ति, अन्ध्रध्व च्यवन, आदि गण्य-मान्य जनों से मित्रता की। दस्युओं से युद्ध भी किए। ये दोनों अश्विनीकुमार कहाते थे, परन्तु इनके वास्तविक नाम नासत्य और दस्र थे।

विवस्वान् के ज्येष्ठ पुत्र यम माता-पिता दोनों की अपने प्रति उपेक्षा के भाव से बहुत खिन्न हुए। अपने शुभाचरण से देवों में यह धर्मराज कहाने लगे थे। समर्थ होने पर ये अपने ताया वरुण के पास चले गए। उन्होंने इन्हें पितृलोक का अधिपति और लोकपाल बना दिया और ये नरक नामक नगर बसा वहां रहने लगे। अपवर्त वर्तमान ईरान का एक प्रदेश था—जो कलातनादरी के निकट था। आजकल इसे अवर्द या अविवर्द-दोज़ख-कहते हैं। जिस समय यम ने वहां जाकर अपने नवीन राज्य की स्थापना की, उस समय से कुछ पूर्व ही महा जल-प्रलय हो चुका था। वहां के अधिकांश लोग उस जल-प्रलय में मर चुके थे, इसलिए यम के राज्य को मृत्युलोक कहने लगे। इन्होंने प्राचीन ईरान और यूनान की ऋचाएं तैयार कीं। इन्होंने दक्ष प्राचेतस के कुल की दस कन्याओं को ग्रहण किया। इनकी एक पत्नी संध्या से सांध्य जाति के अग्रज हुए जो इतिहास में सीथियन प्रसिद्ध हुए। इन्हीं के वंश के नीप व पाल के वंशधरों ने मिस्र और यूनान में फैलकर मिस्र का प्रथम राजवंश 2188 ई. पु. में और असुरों का प्रथम राजवंश 2059 ई. पु. में स्थापित किया। आगे नीप-वंश को जनमेजय ने विजित किया। समस्त असुर-प्रदेश में फैली हुई वसु, मरु, भानु, घोष, सांध्य, हंस, विश्वकर्मा, मनीषी, द्रविड़, हूण, मंगोल, रमण, धर, हयताल आदि शाकद्वीपी जातियां यम के ही वंश की हैं। ये अपने पूर्वज तथा कुलदेव सूर्य की उपासक थीं। सूर्य ही को ये नृवंश का पूज्य पुरुष मानती थीं। कुशान-हयताल, जो इतिहास में व्हाइट-हुन और तुर्क बताए गए हैं, यम के ही वंशधर हैं।

वसु के आठ पुत्र वसु कहाए। इनमें ज्येष्ठ का नाम धर था। धर का पुत्र रुद्र हुआ, जो देव-दैत्य-पूजित महाबली दुर्धर्ष देव हुआ। द्रविड़ और हव्यवाह, धर के ये दो और पुत्र हुए। अग्नि भी आठ वस्तुओं में एक था। उसका पृथक् अग्निवंश चला। सांध्य के पुत्र हंस संभवतः जर्मन हैं। हयतालों का राज ईरान में था। धर के पुत्र रुद्र के उत्तराधिकारी मरुत् गण हिरात आदि देशों के निवासी थे।

आज भी ईरान का ‘यमथल’ स्थान यम की स्मृति नई करता है। ईरानी इतिहास में ‘यमशिद’ का नाम विख्यात है। ईरानी लोग उसी नाम पर अपने नाम ‘जमशेद’ रखते हैं, यमशिद की पूजा करते हैं।

प्रसिद्ध है कि यमी ने यम से विवाह करने की याचना की थी, जिसे यम ने अस्वीकार कर दिया था। दैत्य-कुल में भाई-बहन, माता-पुत्र में विवाह का प्रचलन था। देवकुल में भी वैयक्तिक विवाह का रिवाज न था। सारी जीवन-प्रणाली सामूहिक थी। सम्पत्ति भी सामूहिक थी। इसलिए यौन-सम्बन्ध भी यौथ थे। यह वास्तव में वेश्यावृत्ति न थी, क्योंकि शरीर का क्रेता और विक्रेता कोई न था। यौन सम्बन्ध पर कोई रोक-टोक न थी। जहां पुरुष के लिए भगिनी-गमन और मातृ-गमन भी कोई दोषपूर्ण नहीं माना जाता था, वहां स्त्री के लिए भ्रातृ-गमन और पितृ-गमन में भी कोई दोष न था। उस युग में एक गर्भ से उत्पन्न होने वाली संतान अपने को भाई-बहन करके न जान सकती थीं। औरस से उत्पन्न भाई-बहनों का आपस में किसी प्रकार का यौन सम्बन्ध नहीं हो सकता था। पर यह कोई जान ही न सकता था कि कौन किस औरस से उत्पन्न है।

यही कारण था कि संतान का परिचय मां के नाम अथवा कुल से होता था। उस युग में देवों और दैत्यों में कोई भी व्यक्ति किसी व्यक्ति का पिता हो सकता था। यों कहना चाहिए कि एक ग्राम के सब लोग पिता कहे जा सकते थे। भगिनी-गमन बाद तक भी जायज़ रहा।

शनि का दूसरा नाम श्रुतिकर्मा भी था। उसे यूनान देश का राज्य मिला। यूनान का हैलीओडे राजवंश शनि ही के खानदान में था। सूर्य की चार राजधानियां थीं : आदित्य नगर, कश्यप नगर, इन्द्रवन और भ्रुण्डार। उसने बेबीलोनिया, सीरिया और मिस्र को जय करके त्रिविक्रम की उपाधि पाई थी। आगे चलकर आदित्यों का यह कुल सारे ही संसार में व्याप गया जिसमें सबसे अधिक विस्तार सूर्य ही का हुआ। सीरिया-निवासी और अरब प्राचीन काल से सूर्य के उपासक हैं। पर्शिया के डेजर्ट के निवासी प्राचीन काल में ‘आदित्य’ कहलाते हैं। अदन में आद का विश्वविश्रुत मन्दिर था जो सोने-चांदी की ईंटों से बना था, और छत में मोती और रत्न जड़े थे। ‘आद’ अरबी भाषा में सूरज ही को कहते हैं। ‘आदम’, जिसकी कथा बाइबल में है, सूर्य का ही नाम था। ‘अरब’ या ‘यारा’ भी अरबी भाषा के सूर्य ही के नाम हैं। अरबी में आद एक गोत्र भी है। संभव है, सूर्यवंशी अरब किसी प्राचीन बात को सूर्य के समान पुरातन कहा करते हों। अरब में एक खोट प्रान्त भी है। खोट सूर्य ही का नाम है। अदन का प्राचीन नाम आदित्यपुर था और यह सूर्य की एक राजधानी थी।