तू न प्रथम है, न अन्तिम
उपत्यका का वह प्रान्त विजन और सघन था। वहां निर्मल जल का सरोवर था, सरोवर में शतदल कमल खिले थे। ताल-तमाल-हिन्ताल की सघन छाया में मध्याह्न की धूप छनकर–शीतल होकर सोना-सा बिखेर रही थी। मन्द पवन चल रहा था। सरोवर में चक्रवाक, सारस, हंस आदि नाना विहंग थे। तरुणी एक विशाल शाल्मली वृक्ष के नीचे सूखे पत्तों पर लेट गई। हंसते हुए उसने कहा–“अब तू आखेट ला।”
तरुण ने धनुष पर हाथ डाला। गर्दन ऊंची कर इधर-उधर देखा। वह लम्बे-लम्बे डग भरता हुआ बन में घुस गया। एक हरिण और कुछ पक्षी मारकर वह लौटा। तरुणी ने फुर्ती से अरणी घिसी–सूखे ईंधन में अग्न्याधान किया। तरुण ने आखेट के मांस-खण्ड किए। दोनों ने मांस भून-भूनकर खाना आरम्भ किया। तरुणी बहुत भूखी थी, वह रुच-रुचकर मांस खाने लगी। कभी आधा मांस-खण्ड खाकर वह तरुण के मुंह में ठूंस देती, कभी उसके हाथों से छीनकर स्वयं खा जाती। खा-पीकर तृप्त होकर वह तरुण की जांघ पर सिर रखकर लेट गई। दोनों भुजाएँ ऊंची करके उसने तरुण की कटि लपेट ली। वह बोली–“बड़ा हस्तलाघव है तुझमें।”
“मुझे प्रयास करना ही न पड़ा। आखेट सहज ही मिल गया।” तरुण ने हंसकर कहा।
“तू किस कुल का आर्य है ?”
“वैश्रवण पौलस्त्य हूं।।”
“तूने कहा था–तेरा मातृकुल दैत्यकुल है।”
“हां।”
“कहां का ?”
“लंका का। लंकापति सुमाली दैत्य का दौहित्र हूं।”
“अरे वाह प्रिय!”–तरुणी हर्षोल्लास से चीख उठी। आनन्दातिरेक से उसने धक्का देकर तरुण को भूमि पर गिरा दिया। फिर उसके वज्र-वक्ष पर अपने अनावृत उन्मुख यौवन युगल ढालकर तरुण के अधर चूमकर बोली–“सुपूजित है तू।” उसे अपने में प्रविष्ट-सा करता हुआ युवक बोला–“तू क्या लंकाधिपति सुमाली को जानती है ?”
“सुपूजित है लंकाधिपति दैत्येन्द्र सुमाली का कुल। मेरा पिता दैत्येन्द्र का सेनापति था। हिरण्यपुर के देवासुर-संग्राम में उसने विष्णु से युद्ध किया था।”
तरुण ने दोनों भुजाओं में उसे लपेट वक्ष में दबोच लिया और उसके सघन जघन को अपनी सुपुष्ट जंघाओं में आवेष्टित करते हुए बोला–“तब तो तू मेरी ही है।”
उसने अपना शिथिल गात्र जैसे तरुण को अर्पण करते हुए सुरा-सुरभित आवेशित गर्म श्वास लेते हुए कहा–“आज मैं तेरी हूं। तू स्वच्छन्द रमण कर।”
“और आज के बाद ?” तरुण ने अपने दांत तरुणी के दांतों पर रगड़ते हुए कहा।
“जैसा मेरा मन होगा। जैसा मुझे रुचेगा।” उसने नेत्र निमीलित कर लिए।
तमाल की सघन छाया में से छनकर अपराह्न की सुनहरी धूप उनके अनावृत, विवसन सम्पुटित अंगों पर पड़ रही थी। सरोवर में पक्षी कलरव कर रहे थे। दोनों निश्चल, निस्पन्द उस विजन वन में पर्णशय्या पर एक-दूसरे में समाए हुए से, आनन्दातिरेक से तृप्त-सुप्त-विस्मृत पड़े थे। तरुणी ने तरुण के कान में अधर लगाकर कहा–“अब उठा”
तरुण ने तरुणी के होंठों पर होंठ रखकर वक्ष पर भार डालते हुए होंठों ही में कहा–“ठहर तनिक।”
“अब नहीं। देखता नहीं, सूर्य की किरणें तिरछी हो चलीं।”
उसने धकेलकर तरुण को अपने से पृथक् किया और हंसती हुई उसे खींचकर जल में धंस गई।
दोनों विवसन विजन वन के अगम जल में क्रीड़ा करने लगे। अमल नील जल आन्दोलित हो उठा। दोनों एक-दूसरे के पूरक–एक-दूसरे के एकान्त साक्षी थे। दोनों के मुक्त यौवन कभी जल-तल पर और कभी जल-गर्भ में मिथुन मीन-से विचरने लगे। कभी तरुणी जल में डुबकी लगाती–तरुण उसे ढूंढ लाता। कभी दोनों तैरने चले जाते दूर तक। कभी दोनों संश्लिष्ट हो तैरते। कभी उनके वक्ष परस्पर टकराते, कभी अधरोष्ठ। कभी तरुणी जल की बौछार तरुण पर मारती। कभी तरुण उसके विवसन-अनावृत गात्र को दोनों बलिष्ठ भुजाओं में सिर से ऊंचा उठाकर ज़ोर से किलकारी मारता।
सूर्य क्षितिज पर झुक चला। श्रान्त-क्लान्त तरुणी तरुण का हाथ थाम जल से निकली। जल-बिन्दु दोनों के अंगों पर ढर-ढरकर मोती की भांति इधर-उधर भूमि पर बिखरने लगे।
वह एक शिलाखण्ड पर अलस भाव से उत्तान लेट गई। अपराह्न की पीली धूप उसके सम्पूर्ण विवस्त्र गात्र पर फैल गई। तरुण भी वहीं आ खड़ा हुआ। जल उसके लौहगात से टपक रहा था। उसके बाहुपाश में बहुत-से शतदल कमल पुष्प थे। उन्हें उसने तरुणी पर बिखेर दिया। तरुणी ने उसके गात को भरपूर दृष्टि से पीते हुए कहा–“कमनीय है तू रमण, प्रिय है, प्रियतम है। आ, शृंगार दे मुझे। कपोलों पर लोध्र-रेणु मल दे, कुचों को शैलेय से चित्रित कर, सघन जघन को अरविन्द-मकरन्द से सुरभित कर, चरणतल को लाक्षारंजित कर, कुन्तल वृत्त में ये शतदल कमल गूंथ, पिंडलियों में मृणाल मसल। आ, मेरे निकट आ, परिरम्भण दे मुझे, विश्रान्त कर, ओ प्रिय-प्रियतम !”
तरुण ने विधिवत् रमणीय रमणी को शृंगारित किया। कुचों को शैलेय से चित्रित किया। कपोलों से लोध्र-रेणु मला, अधरों पर लाक्षारस दे केशों में कमल गूंथे। जघन को मकरन्द से सुरभित किया। भुजाओं में मृणाल-वलय लपेट दिए। वह रमणीय रमणी शृंगारित हो, मूर्तिमती सान्ध्य-वनश्री-सी दिप उठी। तरुणी का शृंगार सम्पन्न करके तरुण ने हंसते-हंसते पूछा–“अब और तेरा क्या प्रिय करूं ?” तरुणी ने अपनी भारी-भारी पलकों में बंकिम कटाक्ष भरकर, तरुण को आपाद विवसन देख, दांतों में लाल-लाल जीभ को दबाकर सीत्कार-सा करते हुए मन्द स्वर में कहा–“अब परिरम्भण दे, आप्यायित कर, चुम्बन कर, सर्वांग चुम्बन कर।” उसने दोनों भुज-मृणाल ऊंचे फैला दिए। तरुण ने आह्लाद-अतिरेक से आवेशित-सा हो सान्ध्य-वनश्री-सी उस कमनीय कामिनी को अपनी बलिष्ठ बाहुओं में अधर उठाकर वक्ष में समेट लिया और उसके प्रत्येक अंग के अगणित चुम्बन ले डाले। आनन्दविभोर हो रमणी ने अपनी भुजवल्लरी तरुण के कण्ठ में लपेट शत-सहस्र प्रतिचुम्बन लिए। वह जैसे तरुण के अंग-प्रत्यंग में सम्पूर्ण धंस गई। जगत् जैसे खो गया।
अस्तंगत सूर्य की रक्तिम रश्मियां वनश्री को रंजित करने लगीं। तरुण ने धीरे से रमणी को शिलाखण्ड पर बैठाकर अधोवस्त्र दे नीवी बन्धन किया। स्वयं कटिबन्ध पहना–मुगाजिन धारण किया, फिर उसके लाक्षारंजित चरणयुगल गोद में लेकर कच्छप चर्म-निर्मित उपानत् चरणों में डाल चर्मरज्जु बांधने लगा। तरुणी ने चरण-नख का तरुण के वक्ष पर आघात करके कहा–
“कमनीय है तू रमण।”
“सच ?”
“सच, ऐसा और नहीं देखा।”
“और भी देखे हैं तूने ?”
“बहुता”
“कितने।”
“मैंने गिने तो नहीं।”
“इतने ही से यौवन में ?”
“मुझे इसमें अभिरुचि है।”
“काहे में ?”
“नित नए यौवनो के आस्वादन में।”
“पर अब तो तू मेरी है?”
“वाह, ऐसा भी कभी होता है? मैं दैत्यकन्या हूँ, दैत्यबाला की यह मर्यादा नहीं है।”
“कैसी मर्यादा ?”
“जहां मेरा मन होगा, रमण करूंगी।”
“और मैं ?”
“तू कमनीय है, रमणीय है, तेरा मातृकुल और पितृकुल वरिष्ठ है, तेरा सहवास सुखकर है, तू भी आ जब जी चाहे।”
“मैं तुझे प्यार करता हूं।”
“प्यार क्या होता है ?”
“जो प्राणों में प्राणों का विलय करता है।”
“तो तू प्यार कर, अनुमति देती हूं। किन्तु तू ही पहला पुरुष नहीं है, तुझसे पहले बहुत आ चुके हैं, तू ही अन्तिम नहीं है, और अनेक आएंगे।”
तरुण के नेत्रों से अग्निस्फुलिंग निकलने लगे। क्रोध से उसके नथुने फूल गए। उसने तरुणी के चरण गोद से गिराकर उसे ज़ोर से शिलाखण्ड पर धकेल दिया और खड़े होकर कहा–“नहीं, अब और नहीं आएंगे। अब जो तुझे छुएगा उसी के साथ तेरा भी मैं तत्क्षण वध करूंगा। मेरी यह मर्यादा है कि एक स्त्री एक ही पुरुष की अनुबन्धित हो।”
धक्का खाकर गिरने से तरुणी को आघात लगा। उसका शृंगार खण्डित हो गया। उसने सर्पिणी की भांति चपेट खाकर उठते हुए वेग से तरुण के वक्ष पर पदाघात किया। पदाघात खाकर तरुण लुढ़कता हुआ भूमि पर गिर गया। उसके उठने से प्रथम ही तरुणी ने फिर पदाघात किया–फिर किया–फिर किया। तरुण का सारा शरीर धूल में भर गया। उसके मुख से खून झरने लगा। इससे तनिक भी विचलित न होकर तरुणी ने भुजंगिनी की भांति फूत्कार करते हुए कहा–“दैत्यकुलपति की कुमारी पर मर्यादा बांधने वाला तू होता कौन है रे अधम ?” पदाघात के लिए फिर उसने चरण उठाए।
तरुण उछलकर एक ओर खड़ा हो गया। मुख का रक्त पोंछकर उसने कहा–“तेरे साथ मैंने रमण किया है–अब तेरा वध नहीं करूंगा। पर तू मेरी है–केवल मेरी। स्पर्श तो दूर, अब तू किसी पुरुष का ध्यान भी नहीं कर सकती।”
“रमण किया है तो रमण की भांति बात कर, मूर्खता न कर। मुझे भी तेरा विग्रह स्वीकार नहीं है, मैं तुझ पर प्रसन्न हूं।”
“तो मांग ले।”
“क्या ?”
“जो तुझे चाहिए।”
“मुझे देगा तू ?” वह ज़ोर से अट्टहास कर उठी।
“दूंगा, मांग ले।” तरुण ने आवेश में कहा।
“इस मरकत-मेखला पर इतराता है तू !” तरुणी ने उसकी कमर में बंधी महार्घ मरकतमणि की मेखला को हाथ से छूकर कहा।
“तो यही ले।”
“धिविपन्न, तू दाता है कि याचक ?”
“तेरे प्यार का याचक हूं।”
“तो याचक ही रह। दाता का दम्भ न कर।”
उसने आगे बढ़कर तरुण की कमर में बांह डाल दी और हंसकर कहा–“आ चल, ग्राम चल, एक भाण्ड मद्य पी आ।”
“ग्राम आऊंगा, पर मद्य पीने नहीं, तुझे हरण करने।”
“यह कैसी बात ?”
“यह मेरी संस्कृति है-रक्ष-संस्कृति। कुमारी का हरण हमारे लिए वैध है–हरण की हुई कुमारियां हमारी अनुबन्धित होती हैं।”
“और तू मुझे अनुबन्धित करेगा? तेरा साहस तो कम नहीं है रे, रमण।”
“मैं रमण नहीं, रावण हूं, पौलस्त्य वैश्रवण रावण। भूलना नहीं यह नाम।”
वह तेज़ी से एक ओर को चल दिया। तरुणी अकेली उस विजन वन में खड़ी, उसे अनिमेष देखती रही। अन्धकार उपत्यका को अपने अंक में समेट रहा था।