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पहली 6 तिथियाँ

प्रतिपदा : प्रतिपदा प्रथम तिथि है। प्रतिपदा के स्वामी अग्निदेव हैं। प्रतिपदा को आनंद देने वाली कहा गया है। रविवार एवं मंगलवार के दिन प्रतिपदा होने पर मृत्युदा होती है, लेकिन शुक्रवार को प्रतिपदा सिद्धिदा हो जाती है। मृत्युदा में शुभ कार्य वर्जित जबकि सिद्धिदा में किए गए कार्य सफल होते हैं। शुक्ल पक्ष प्रतिपदा में चन्द्रमा अस्त रहता है, अतः इसे समस्त शुभ कार्यों में त्याज्य माना गया है। कृष्ण पक्ष प्रतिपदा में स्थिति एकदम विपरीत होती है। 

द्वितीया : द्वितीया तिथि को सुमंगल कहा जाता है जिसके देवता ब्रह्मा है। यह तिथि भद्रा संज्ञक तिथि है। भाद्रपद में यह शून्य संज्ञक होती है। सोमवार और शुक्रवार को मृत्युदा होती है। बुधवार के दिन दोनों पक्षों की द्वितीया में विशेष सामर्थ आ जाती है और यह सिद्धिदा हो जाती है, इसमें किए गए सभी कार्य सफल होते हैं।
 
तृ‍तीया : तृतीया तिथि की स्वामिनी गौरी है। बुधवार को मृत्युदा और मंगल को यह तिथि सिद्धदा होती है। शुक्ल और कृष्ण दोनों ही पक्ष की इस तिथि को शिवपूजन निषेध है। यह तिथि आरोग्य देने वाली है।

चतुर्थी व्रत : चतुर्थी के व्रतों का भी पुराणों में उल्लेख मिलता है। चतुर्थी तिथि के स्वामी गणेश हैं। इस तिथि का नाम 'खला' है और यह  तिथि 'रिक्ता संज्ञक' कहलाती है। अतः इसमें शुभ कार्य वर्जित रहते हैं।
 
यदि चतुर्थी गुरुवार को हो तो मृत्युदा होती है और शनिवार की चतुर्थी सिद्धिदा होती है और चतुर्थी के 'रिक्ता' होने का दोष उस विशेष स्थिति में लगभग समाप्त हो जाता है। चतुर्थी तिथि की दिशा नैऋत्य है।
 
चतुर्थी के व्रतों के पालन से संकट से मुक्ति मिलती है और आर्थिक लाभ प्राप्त होता है। प्रत्येक माह में दो चतुर्थी होती है। इस तरह 24 चतुर्थी और प्रत्येक तीन वर्ष बाद अधिमास की मिलाकर 26 चतुर्थी होती है। सभी चतुर्थी की महिमा और महत्व अलग अलग है। 
 
संकट चतुर्थी : माघ मास के कृष्ण पक्ष को आने वाली चतुर्थी को संकष्टी चतुर्थी, माघी चतुर्थी या तिल चौथ कहा जाता है। बारह माह के अनुक्रम में यह सबसे बड़ी चतुर्थी मानी गई है। इस दिन भगवान गणेश की आराधना सुख-सौभाग्य की दृष्टि से श्रेष्ठ है।
 
पंचमी : पंचमी तिथि का स्वामी नाग होता है। यह 'पूर्णा संज्ञक' होकर इसका नाम 'श्रीमती' है। पौष मास के दोनों पक्षों में यह तिथि शून्य फल देती है। पंचमी तिथि की दिशा दक्षिण है।

पंचमी तिथि पर किए गए कार्य शुभफल दायक होते हैं। शनिवार के दिन पंचमी पड़ने पर मृत्युदा होती है जिससे इसकी शुभता में कमी आ जाती है। गुरुवार के दिन यही पंचमी सिद्धिदा होकर विशेष शुभ फलदायी है। शुक्ल पंचमी सुख देवे वाली और कृष्ण पंचमी श्री-प्राप्ति कारक है।
 
षष्ठी : इस छठ भी कहते हैं। इसके स्वामी कार्तिकेय हैं और इसका विशेष नाम कीर्ति है। रविवार को पड़ने वाली षष्ठी मृत्युदा और शुक्रवार की सिद्धिदा होती है। माघ कृष्ण माह में यह शून्य होती है। इसकी दिशा पश्चिम है।