Android app on Google Play iPhone app Download from Windows Store

 

परमज्ञानी अष्टावक्र

प्राचीन काल में कहोड नामक एक ब्राह्मण थे। उनकी पत्नी का नाम सुजाता था। समय आने पर सुजाता गर्भवती हुई। एक दिन जब कहोड वेदपाठ कर रहे थे, तभी सुजाता के गर्भ में स्थित शिशु बोला – पिताजी। आप रातभर वेदपाठ करते हैं, किंतु वह ठीक से नहीं होता। गर्भस्थ शिशु के इस प्रकार कहने पर कहोड क्रोधित होकर बोले कि- तू पेट में ही से ऐसी टेढ़ी-मेढ़ी बातें करता है, इसलिए तू आठ स्थानों से टेढ़ा उत्पन्न होगा। इस घटना के कुछ दिन बाद कहोड राजा जनक के पास धन की इच्छा से गए।

वहां बंदी नामक विद्वान से वे शास्त्रार्थ में हार गए। नियमानुसार उन्हें जल में डूबा दिया गया। कुछ दिनों बाद अष्टावक्र का जन्म हुआ किंतु उसकी माता ने उसे कुछ नहीं बताया। जब अष्टावक्र 12 वर्ष का हुआ, तब एक दिन उसने अपनी माता से पिता के बारे में पूछा। तब माता ने उसे पूरी बात सच-सच बता दी। अष्टावक्र भी राजा जनक के दरबार में शास्त्रार्थ करने के लिए गया। यहां अष्टावक्र और बंदी के बीच शास्त्रार्थ हुआ, जिसमें अष्टावक्र ने उसे पराजित कर दिया।

अष्टावक्र ने राजा से कहा कि बंदी को भी नियमानुसार जल में डूबा देना चाहिए। तब बंदी ने बताया कि वह जल के स्वामी वरुणदेव का पुत्र है। उसने जितने भी विद्वानों को शास्त्रार्थ में हराकर जल में डुबाया है, वे सभी वरुण लोक में हैं। उसी समय जल में डूबे हुए सभी ब्राह्मण पुन: बाहर आ गए। अष्टावक्र के पिता कहोड भी जल से निकल आए। अष्टावक्र के विषय में जानकर उन्हें बहुत प्रसन्न हुई और पिता के आशीर्वाद से अष्टावक्र का शरीर सीधा हो गया।