Android app on Google Play iPhone app Download from Windows Store

 

अध्याय 2

बग़दाद उस समय तुर्क साम्राज्य की राजधानी था। मुसलमानों ने बसरा से यूनान तक विजय प्राप्त कर ली थी और सम्पूर्ण एशिया ही में नहीं, यूरोप में भी उनका-सा वैभवशाली और कोई राज्य नहीं था। राज्य विक्रमादित्य के समय में उज्जैन की और मौर्यवंश राज्य काल में पाटलिपुत्र की जो उन्नति थी वही इस समय बग़दाद की थी। बग़दाद के बादशाह खलीफा कहलाते थे। रौनक और आबादी में यह शहर शीराज़ से कहीं चढा बढा था। यहाँ के कई ख़लीफा बड़े विद्याप्रेमी थे। उन्होंने सैकड़ों विद्यालय स्थापित किये थे। दूर-दूर से विद्वान लोग पठन-पाठन के निमित्त आया करते थे। यह कहने में अत्युक्ति न होगी कि बग़दाद का सा उन्नत नगर उस समय संसार में नहीं था। बड़े-बड़े आलिम, फाजि़ल, मौलवी, मुल्ला, विज्ञानवेत्‍त और दार्शनिकों ने जिनकी रचनायें आज भी गौरव की दृष्टि से देखी जाती हैं बग़दाद ही के विद्यालय में शिक्षा पायी। विशेषत: 'मद्रसए नज़मिया' वत्‍तमान आक्सफोर्ड या बर्लिन की यूनिवर्सिटियों से किसी तरह कम न था। सात-आठ, सहस्र छात्र उनमें शिक्षा पाते थे। उसके अध्‍यापकों और अधिष्ठाताओं में ऐसे-ऐसे लोग हो गये हैं जिनके नाम पर मुसलमानों को आज भी गर्व है। इस मद्रसे की बुनियाद एक ऐसे विद्या प्रेमी ने डाली थी जिसके शिक्षा प्रेम के सामने शायद कारनेगी भी लज्जित हो जायं। उसका नाम निज़ामुलमुल्कतूसी था। जलालुद्दीन सलजूकी के समय में वह राज्य का प्रधानमंत्री था। उसने बग़दाद के अतिरिक्त बसरा, नेशापुर, इसफ़ाहन आदि नगरों में भी विद्यालय स्थापित किये थे। राज्यकोष के अतिरिक्त अपने निज के असंख्य रुपये शिक्षोन्नति में व्यय किया करता था। 'नजामिया' मद्रसे की ख्याति दूर-दूर तक फैली हुई थी। सादी ने इसी मद्रसे में प्रवेश किया। यह निश्चित नहीं है कि वह कितने दिनों बग़दाद में रहे। लेकिन उनके लेखों से मालूम होता है कि वहाँ फिक़ह (धर्मशास्त्र), हदीस आदि के अतिरिक्त उन्होंने विज्ञान, गणित, खगोल, भूगोल, इतिहास आदि विषयों का अच्छी तरह अध्‍ययन किया और 'अल्लामा' की सनद प्राप्त की। इतने गहन विषयों के पण्डित होने के लिए सादी से दस वर्ष से कम न लगे होंगे।

काल की गति विचित्र है। जिस समय सादी ने बग़दाद से प्रस्थान किया उस समय उस नगर पर लक्ष्मी और सरस्वती दोनों ही की कृपा थी, लेकिन लगभग बीस वर्ष बाद उन्होंने उसी समृध्दशाली नगर को हलाकू खां के हाथों नष्ट-भ्रष्ट होते देखा और अन्तिम ख़लीफा जिसके दरबार में बड़े-बड़े राजा रईसों की भी मुश्किल से पहुंच होती थी, बड़े अपमान और क्रूरता से मारा गया।

सादी के हृदय पर इस घोर विप्लव का ऐसा प्रभाव पड़ा कि उन्होंने अपने लेखों में बारम्बार नीतिरक्षा, प्रजापालन तथा न्यायपरता का उपदेश दिया है। उनका विचार था और उसके यथार्थ होने में कोई सन्देह नहीं कि न्यायप्रिय, प्रजा वत्सल राजा को कोई शत्रु पराजित नहीं कर सकता। जब इन गुणों में कोई अंश कम हो जाता है तभी उसे बुरे दिन देखने पड़ते हैं। सादी ने दीनों पर दया, दुखियों से सहानुभूति, देशभाइयों से प्रेम आदि गुणों का बड़ा महत्व दर्शाया है। कोई आश्‍चर्य नहीं कि उनके उपदेशों में जो सजीवता दिख पड़ती है वह इन्हीं हृदय विचारक दृश्यों से उत्पन्न हुई हो।