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ईश्वर की सत्ता

समस्त सृष्टि का संचालन नियमित रूप से करनेवाला कोई एक सर्वशक्ति संपन्न विशिष्ट चेतन है या नहीं, यह बहुत ही पुराना प्रश्न है और प्रारंभ से ही इसका उत्तर दोनों ही रूप में अब तक दिया जाता है। इस सृष्टि के मूल में कोई ऐसा चेतन है, इस विषय में मतैक्य कभी नहीं हुआ। एक दल जहाँ ऐसे चेतन का पक्षी है जहाँ दूसरा उसका विपक्षी भी पाया जाता है। यह भी नहीं कि जिस चार्वाक या लोकायतिक को नास्तिक-शब्द से स्पष्टतया संबोधित करते हैं, केवल वही ईश्वरीय सत्ता का विपक्षी है। हिंदुओं के जिन मीमांसा और सांख्य-दर्शनों को साधारणतया आस्तिक ही समझा जाता है उन्होंने भी ईश्वर की सत्ता मानने से इनकार किया है। हिंदुओं के छ: दर्शनों में न्याय तथा वैशेषिक को पृथक मानने के लिए कोई वैसा विशेष आधार नहीं है जैसा कि सांख्य, योगादि के लिए। उन दोनों में कोई मौलिक भेद (Fundamental difference) नहीं है। अतएव नवीन तार्किकों ने दोनों को एक ही मानकर या दोनों को मिलाकर ही अपने ग्रंथ लिखे हैं। इस तरह अब पाँच ही दर्शन स्पष्ट रूप से रह जाते हैं। इनमें जहाँ दो ईश्वर-सत्ता के विपक्षी हैं वहाँ दो ही (योग और न्याय) उसके स्पष्ट रूप से समर्थक हैं। क्योंकि वेदांत-दर्शन की गति निराली है। उसका झुकाव दोनों ओर है। यों तो उस दर्शन में ईश्वर ओत-प्रोत पाया जाता है और उपनिषदों, व्याससूत्रों तथा गीता से लेकर आधुनिक ग्रंथों तक में ईश्वर का निरूपण और उस संबंध में विपक्षियों के मत का, खंडन पाया जाता है। अतएव उसे अनीश्वरवादी कह नहीं सकते। फिर भी वेदांत की चरम गति जो जीवा-भिन्न या अद्वैत ब्रह्म है, उससे और साधारण ईश्वर-वाद से क्या संबंध है? जिस अभेद को वेदांती चरम लक्ष्य समझते हैं और जिसके सिवा शेष की वास्तविक सत्ता नहीं मानते, वह सर्वसाधारण दार्शनिक व्यवहार का न तो जीव ही है और न ईश्वर ही। इसी से वेदांत को हमने बीच में माना है। इतना ही क्यों? नैयायिकों के ईश्वर को तो वेदांती भी अंत में वैसे ही अस्वीकार करते हैं जैसे अन्य विपक्षी। इस तरह स्पष्ट है कि ईश्वरवाद के बारे में हिंदू-दर्शनों की तराजू का पलड़ा दोनों ही ओर है।

एक बात और। ईश्वर-सत्ता के विपक्षियों को दो दलों में विभक्त किया जा सकता है। एक तो वे हैं, जो एकदम किसी भी रूप में उसे मानने को तैयार नहीं, उसे अमान्य कहते हैं और इस श्रेणी में मीमांसक, चार्वाक तथा आजकल के हेगल और निअशे आदि को ले सकते हैं। लेकिन उनकी एक श्रेणी और भी है जिसका कहना है कि यदि ईश्वर हो भी तो उसके जानने का कोई साधन हमारे पास न होने के कारण हम इससे जान नहीं सकते - वह अज्ञेय है। सांख्य-सूत्रों के भाष्यकार विज्ञान भिक्षु के मत से सांख्य-दर्शन इसी कोटि का है जैसा कि उसके 'ईश्वरासिद्ध:' आदि सूत्रों के भाष्य से सिद्ध है। हालाँकि दूसरे लोग सांख्य को भी प्रथम श्रेणी में ही मानते हैं। वर्तमान युग के हर्बर्ट स्पेन्सर और ह्यूम आदि का अज्ञेयवाद का सिद्धांत भी उसी प्रकार का है। और यदि हम अपने - अतएव संसार भर के - प्राचीन ग्रंथ - क्योंकि अब तो सभी मानते हैं कि दुनिया में ऋग्वेद से प्राचीन कोई ग्रंथ नहीं है - ऋग्वेद को देखते हैं तो उसमें भी ईश्वर की इस अज्ञेयता का स्पष्ट आभास पाया जाता है। उसके 'नासदासीत्' इत्यादि नासदीय सूक्त के निम्नलिखित दो मंत्रों के पढ़ने से यह बात ध्या्न में आ जाती है। वे मंत्र हैं -

को अद्धा वेद क इहं प्रेवोचत् कुत आजाता कुत इयं विसृष्टि:। अर्वाग्वेदा अस्य विसर्जने- नाथा को वेद यत आबभूव॥ इयं विसृष्टिर्यत आबभूव यदि वा दधे यदि वा न। यो अस्याध्यक्ष: मरमेव्योमन् सो अंग यदि वा न वेद॥

इन दो मंत्रों में पहले में कहा गया है कि इस सृष्टि के मूलतत्त्व उस विशिष्ट-चेतन (ईश्वर) के जानने का कोई साधन है ही नहीं। अतएव उसे कौन जान सकता है? दूसरे मंत्र में कहा गया है कि यद्यपि उसके जानने के साधन नहीं हैं तथापि वह स्वयमेव अपने को जान सकता है। अथवा नहीं भी जान सकता है। विस्तारभय से इन मंत्रों के बारे में हम अधिक न लिख केवल इतना ही कह देना चाहते हैं कि इनमें जो ईश्वरीय सत्ता के मानने-न-मानने का विचार है वह आजकल की दार्शनिक रीति का है, अतएव अत्यंत युक्तियुक्त है जैसा कि उसके 'अर्वाग्देवा अस्य विसर्जनेन' तथा 'सो अंग यदि वा न वेद' से स्पष्ट है। अतएव आजकल अज्ञेयतावादी ह्यूम आदि तथा अमान्यतावादी हेगल आदि और उनके अनुयायियों की बाढ़ देखकर हमें चौकन्ना या बेचैन न होना चाहिए, क्योंकि यह कोई नई बात नहीं है।

यदि ईश्वर इंद्रियग्राह्य होता तब शायद उसके बारे में ऐसा विवाद नहीं होता। हालाँकि प्रत्यक्ष पदार्थों के बारे में भी विवाद होता ही है और यह प्रश्न होता है कि जब आँखों के दोष से श्वेत शंख भी पीला प्रतीत होता है तब हल्दी की पीतिमा भी क्या वस्तु सत्ता रखती है या वैसी ही है? फिर भी ये बहुत दूर की बातें हैं साधारणत: प्रत्यक्ष में विवाद नहीं होता। हाँ, अनुमेय पदार्थों में तो विवाद होता ही है। यही कारण है कि ईश्वरीय-सत्ता बहुत बड़े विवाद का विषय है। उसी विवाद का थोड़ा बहुत दिग्दर्शन हो जाने से इस विषय की गंभीरता का पता लग सकता है। साधारणतया अनीश्वरवादियों को दो दलों में विभक्त किया जा सकता है। एक तो दल ऐसों का है जो एकमात्र प्रत्यक्ष-प्रमाण के माननेवाले हैं इसीलिए वे ईश्वर को स्वभावत: स्वीकार नहीं कर सकते। दूसरे दल में ऐसे लोग हैं जो अनुमान को भी यद्यपि मानते और अनुमेय पदार्थों की सत्ता स्वीकार करते हैं, फिर भी ईश्वरीय सत्ता को मानने में असमर्थ हैं। पहले दल में अग्रणी चार्वाक है और दूसरे में सांख्य, मीमांसक और हेगल आदि। प्रत्यक्ष नहीं होने से उसकी सत्ता न मानने वालों के मत में सबसे बड़ा और स्थूल दोष यह है कि वे अपने वंश के मूलपुरुष या अपने से दस-पाँच पीढ़ी पूर्व के किसी पुरुष की सत्ता मान नहीं सकते। क्योंकि उस पुरुष को प्रत्यक्ष करने का कोई भी साधन नहीं। वह तो केवल अनुमानगम्य है परंतु प्रत्यक्ष न होने से ही उस पुरुष की सत्ता का अपलाप नहीं हो सकता। यदि कोई मूल-पुरुष न था तो वे हजरत जन्मे कहाँ से? इस तरह जो अपने ही पूर्वजों की सत्ता नहीं मान सकता वह संसार के पूर्वज (ईश्वर) की सत्ता न माने तो आश्चर्य ही क्या?

लेकिन जो अनीश्वरवादी अनुमान-प्रमाण को भी मानते हैं, न कि केवल प्रत्यक्ष को ही, उनकी दलीलें अवश्य ही निस्सार नहीं होती हैं। फलत: ईश्वरवादियों की जबर्दस्त भिड़ंत उन्हीं के साथ होती है। सांख्यों ने पुरुष (जीव) और प्रकृति को अनुमानगम्य ही माना है और मीमांसकों का स्वर्ग, परलोक या अदृश्य भी अनुमेय ही है। इसी प्रकार वर्तमान विज्ञान के कट्टर भक्त हेगल प्रभृति के ईथर (Ether) और कललरस (Protoplasm) का वस्तुगम्या अनुमेय पदार्थ ही समझना चाहिए। चुंबक की आकर्षण शक्ति दूरस्थ लोहे पर जब काम करती है तो चुंबक से निकलकर लोहे में जाने के लिए बीच में उसका कोई आधार चाहिए, क्योंकि कोई शक्ति निराधार टिक नहीं सकती! बस, वही आधार-द्रव्य वैज्ञानिकों का ईथर है। एक पदार्थ से दूसरे में विद्युत-शक्ति आदि के गमनागमन का आधार भी वही है। यद्यपि वैज्ञानिक उस ईथर को सर्वव्यापी, गति-शक्ति का अनंत भंडार और निष्क्रिय तथा अखंड मानते हैं, फिर भी उसका वास्तविक रूप क्या है यह बात अभी तक विवादग्रस्त ही है और उसकी सर्वव्यापिता आदि केवल अनुमान सिद्ध ही हैं। इसी प्रकार कललरस (Protoplasm) की भी बात है। वैज्ञानिक इतना ही कह सके हैं कि वह कारबन, ऑक्सिजन, नाइट्रोजन और हाइड्रोजन के विलक्षण मेल से बना है जिसमें जल, गंधक आदि का भी अंश है। मगर वह विलक्षण संयोग कैसा है इसका पता उन्हें नहीं है, नहीं तो अपनी प्रयोगशाला में उसी विलक्षण सम्मिश्रण के द्वारा कललरस बनाकर वे लोग भी सजीव सृष्टि कर लेते। अतएव उनकी यह कल्पना भी केवल अनुमान मात्र ही है। इस प्रकार केवल अनुमान के ही बल पर लंबी उड़ान भरनेवाले वैज्ञानिक भी ईश्वर की कल्पना से घबराकर भयभीत हो जाते हैं। यदि यह कहा जाए कि उनका अखंड एकरस ईथर (Ether) ईश्वर या ब्रह्म का ही नामांतर है तो कोई अत्युक्ति नहीं। क्योंकि दोनों ही अनंत शक्ति के भंडार माने गए हैं और जिस प्रकार ब्रह्मवादी उसकी शक्ति या माया (प्रकृति) का ही परिणाम संसार को मानते हैं उसी प्रकार वैज्ञानिक भी उसी शक्ति का ही रूपांतर-द्रव्य मानते हैं! ऐसी विलक्षण समता के रहते हुए भी उन्हें ईश्वर में विवाद है! इसी तरह जब बाल से तेल नहीं पैदा होता तो फिर निर्जीव से सृष्टि के आरंभ में या कभी भी हेगल का सजीव पदार्थ कैसे उत्पन्न होगा? यदि दो परस्परविरोधी पदार्थों का उपादान-उपादेय (कार्य-कारण) भाव माना जाए तो नीम के बीज से आम की या सभी से सबकी उत्पत्ति क्यों न मानी जाए? ऐसी बे-सिर-पैर की कल्पना करने वाले वैज्ञानिक यदि जीवात्मा या ईश्वर के मानने में नाक-भौं सिकोड़ते हैं तो यह उनकी लीला ही ठहरी! अतएव निराधार (Protoplasm) आदि की कल्पना के लिए भी हारकर उन्हें यही मानना होगा कि चेतना इस जगत के प्रत्येक अणु में व्याप्त या ओतप्रोत है और उन्हीं चेतनाविशिष्ट अणुओं के सम्मिश्रण से कललरस की प्रक्रिया द्वारा सजीव सृष्टि का विकास होता है। इस तरह सर्वत्र व्याप्त चेतन रूप ईश्वर (ब्रह्म) को तो उन्होंने स्वीकार कर ही लिया, चाहे इस बात को स्पष्टतया वे न कहें!

ईश्वरवादियों ने ईश्वर की कल्पना में बे-सिर-पैर की उड़ान से काम न लेकर बहुत ही युक्तियुक्त एवं वैज्ञानिक सरणी का अवलंबन किया है। एक मकान, घड़ी या पुस्तक को देखते ही बिना आगा-पीछा के एकाएक यह निश्चय हो आता है कि हो-न-हो इन सभी पदार्थों के मूल में कोई बुद्धिपूर्वक कार्य करने वाला चतुर चेतन शिल्पी है। इसके विपरीत दूसरा भाव कभी भी किसी के भी मन में उदय नहीं होता। इसी प्रकार घड़ी की चाल (क्रिया) को देखकर भी यही खयाल होता है कि इस निर्जीव पदार्थ की क्रिया के मूल में भी चेतन शिल्पी का ही हाथ है। एक बहुत बड़े कारखाने में जहाँ सैकड़ों प्रकार के कल-पुर्जे अलग-अलग काम करते हैं, जाने पर पता लगता है कि या तो उन सभी को चलानेवाली कोई विद्युत्शक्ति है तो उस शक्ति के मूल में चेतन शिल्पी वर्तमान है। इसी तरह इस ब्रह्मांड रूपी भव्य भवन, बड़ी जबर्दस्त घड़ी या बड़े कारखाने को देखकर जिसकी रचना निराली है और ग्रह, तारे आदि की चाल (क्रिया) बराबर जारी है, सहसा यह ध्याइन प्राचीनों को हो आया कि इसके मूल में कोई असाधारण चातुरी एवं सामर्थ्यवाला चेतन शिल्पी मौजूद है। बस, उसी शिल्पी का नाम उन्होंने ईश्वर रख दिया। जिस तरह धूम और अग्नि की व्याप्ति नियम (Law Inseparable Connexion) देखकर धूम से अग्नि का अनुमान होता है, ठीक ऐसी ही व्याप्ति यहाँ भी है। अतएव यह अनुमान निर्दोष तथा बिलकुल ही वैसा ही स्वाभाविक है जैसा कि धुएँ से आग का अनुमान।

इस व्याप्ति में बहुत-से अनीश्वरवादियों ने व्यभिचार या दोष (Fallacy) दिखाने का प्रयत्न किया है। उनका कहना है कि जब अग्नि-संपर्क से बारूद में भड़ाका होता है और वह एक तरह की क्रिया ही है और जब चुंबक के संसर्ग से लोहे में क्रिया होती है - वह चलने लगता है, हालाँकि आग और बारूद तथा चुंबक एवं लोहा सभी अचेतन ही हैं। तब यह कैसे माना जाए कि अचेतन की क्रिया का मूल कारण साक्षात या परंपरा या चेतन ही होता है? लेकिन ऐसा कहनेवाले यह भूल जाते हैं कि बारूद या लोहे की क्रियाएँ अनियमित एवं आकस्मिक हैं। इसके विपरीत ईश्वरवादियों ने जिन क्रियाओं को व्याप्ति का आधार माना है वे नियमित और सदा होनेवाली हैं। यदि हम चाहें कि लोहे की क्रिया भी उसी तरह सदा होती रहे जिस प्रकार हमारे हाथ-पाँव या चंद्र-तारे आदि तथा अणुओं की, तो यहाँ भी मध्यतस्थ चेतन की आवश्यकता पड़ेगी, जो या तो बराबर लोहे को चुंबक में सटने के बाद हटा दिया करे या दूसरी ओर एक दूसरा बड़ा चुंबक लगा दिया करे या ऐसा ही कोई प्रबंध करे। बारूद के भड़ाके के बारे में भी बार-बार आग और बारूद के संयोग के लिए चेतन-प्राणी अपेक्षित होगा।

इतना ही नहीं, दो जड़ पदार्थों के संसर्ग जो क्रिया होती है वह एक ही प्रकार की होती है। जब चुंबक लोहे को अपनी ओर खींचता है तो यह संभव नहीं कि ठीक उसी समय उसको अपनी ओर से अलग करे। यही नहीं, दूसरे समय भी वह अपने से उसे अलग नहीं कर सकता। मगर सृष्टि के पदार्थों की क्रिया में यह बात नहीं है। जो अणु आपस में अपनी ही क्रिया से मिलकर किसी द्रष्ट की रचना करते हैं वही कालांतर में जुदा होकर उसका नाश भी करते हैं। इस प्रकार सृष्टि की उत्पत्ति और विनाश का क्रम जारी है। यदि उनमें मिलने की शक्ति मानी जाए तो जुदाई की शक्ति न रहेगी और पृथक होने की शक्ति मानने पर मेल की शक्ति असंभव है। दो विरुद्ध शक्तियों का एक ही जड़-पदार्थ में बराबर रहना असंभव है। समय-भेद से दोनों विरुद्ध शक्तियों का एक में समावेश हो नहीं सकता। क्योंकि जब एक शक्ति के अस्तित्व के समय दूसरी उसमें न थी तो पीछे आई कहाँ से? क्योंकि जहाँ जो चीज सूक्ष्म या शक्ति रूप से भी नहीं रहती वहाँ वह कभी भी व्यक्त नहीं हो सकती जैसे बालू से तेल कभी नहीं निकलता। जड़-पदार्थों का काम तो अंधे का-सा है। वह किसी नियम के सहारे चला करते हैं। उनमें दो विरोधी नियम स्वयं-सिद्ध रूप से रह नहीं सकते। मगर चेतन के लिए यह बात लागू नहीं है। वह तो इच्छा या उद्देश्य-शक्ति के बल से सब कुछ कर सकता है और जड़ों को भी चाहे जैसे नचा सकता है। अतएव जड़-सृष्टि की क्रिया के मूल में चेतना-विशिष्ट संचालक अपेक्षित है। नहीं तो समय-समय पर विरोधी क्रियाएँ उसमें हो नहीं सकतीं।

रचना के बारे में हेगल ने अपनी 'विश्वपहेली' (Riddle of the universe) नामक पुस्तक में लिखा है कि यदि यह सृष्टि किसी चेतन की रची होती तो वह बहुत-सी व्यर्थ की चीजें क्यों बनाता। दृष्टांत के लिए पुरुषों के स्तन-चिह्न आदि को उसने लिखा है। उसके मत से जड़ प्रकृति के बारे में तो यह प्रश्न हो नहीं सकता। कारण, वह तो रचना के प्रयोजन का विचार नहीं कर सकता। परंतु ऐसा लिखते समय शायद उसे याद नहीं रहा कि जड़ के तो सभी काम किसी व्यवस्थित नियम के ही अनुसार चलते हैं। उसमें जरा भी फेरफार होने से सारी क्रिया ही चौपट हो जाती है। रेल की पटरी छोड़ते ही इंजिन नीचे जा गिरता है। मगर चेतन का काम तो किसी नियम में बँधा नहीं है। अतएव इच्छा होने पर उसमें उलट-फेर भी हो सकता है। ऐसी दशा में तो जड़वादियों के लिए उन स्तनों आदि की उत्पत्ति का प्रयोजन बताना अपरिहार्य हो जाता है, न कि ईश्वरवादियों के लिए। यह तो एक बात हुई। वस्तुगत्या तो विज्ञान अभी शैशवावस्था में ही है और उसे अभी सृष्टि की बहुत-सी पहेलियाँ सुलझानी हैं। ऐसी दशा में जब वह प्रौढ़ होगा तो शायद पुरुषों के स्तनचिह्नों आदि का भी उपयोग मालूम हो जाए। अभी अधीर होने की कोई बात नहीं। उन स्तनों को व्यर्थ कहना वैसा ही है जैसा आत्म-तत्त्व-विवेक में उदयनाचार्य के भूताविष्ट मनुष्य का दूर से हाथी देखकर पहले उसके बारे में ऊल-जलूल तर्क करना और अंत में यह कह देना कि यह कुछ नहीं है! सृष्टि के रहस्यों की अनभिज्ञता तो हेगल ने अपनी उक्त पुस्तक के अंत में उपसंहार करते हुए स्वयं स्वीकार की है और एक प्रकार से ईश्वरवाद का समर्थन ही किया है। जैसा कि 'प्रकृति-परिज्ञान की उन्नति होने से इधर जगत-संबंधी बहुत-से गुप्त भेद खुल गए हैं अब केवल परमतत्त्व का भारी भेद रह गया है। वह सत्ता कैसी है जिसे वैज्ञानिक विश्व या प्रकृति कहते हैं, दार्शनिक परमतत्त्व कहते हैं और भक्तजन ईश्वर या कर्त्ता कहते हैं? क्या हम कह सकते हैं कि आधुनिक विज्ञान की अपूर्व उन्नति से इस 'परमतत्त्व' का भेद खुल गया है, या कुछ खुलने वाला है? इस अंतिम प्रश्न के विषय में यही कहना पड़ता है कि यह आज भी उसी प्रकार बना हुआ है जिस प्रकार ढाई हजार वर्ष पहले के तत्त्वज्ञों के सामने था। बल्कि यों कहना चाहिए कि इस परमतत्त्व के अनेकानेक व्यक्त रूपों का जितना ही अधिक ज्ञान हमें होता जाता है उसका रहस्य हमारे लिए उतना ही अभेद्य और अपार होता जाता है। इस नाम-रूपात्मक दृश्य-जगत की ओट में वस्तुत: क्या है यह हम न जानते हैं और न जान सकते हैं। पर, इस 'वस्तुत:' के फेर में हम क्यों पड़ने जाएँ जब कि हमारे पास उसके जानने का कोई साधन नहीं, जब कि यह भी नहीं कहा जा सकता कि उसका अस्तित्व तक है या नहीं।'

ऊपर के उद्धरण से सिद्ध है कि अंत में हेगल भी, जिसे अनीश्वरवादियों का आचार्य कहा जाता है, ईश्वर की अमान्यता को छोड़कर अज्ञेयता का ही पक्षपाती हो जाता है, उसे अपनी पहुँच के बाहर की वस्तु समझता है और इस सृष्टि के रहस्यों के संबंध में आधुनिक विज्ञान को अबोध बालक की ही तरह समझता है जिसका ज्ञान बहुत ही परिमित है। हमारे विचार से तो कोई भी वस्तुगत्या अनीश्वरवादी हो ही नहीं सकता जैसा कि हेगल-जैसे कट्टर जड़वादी कहे जानेवाले के उक्त कथन से पता लगता है। किसी भी पदार्थ को हम तीन ही दृष्टियों से देखते हैं - मित्रदृष्टि, शत्रुदृष्टि और उदासीनदृष्टि से। इनमें भी यद्यपि उदासीन पुरुष उस पदार्थ के अत्यंत निकट नहीं पहुँचता तथापि यह नहीं कहा जाता कि एकदम पहुँचता ही नहीं। फिर भी मित्र और शत्रु तो उस पदार्थ के अत्यंत निकट पहुँच ही जाते हैं। बल्कि यों कहना चाहिए कि पक्का प्रेमी या मित्र भी शायद उतना निकट नहीं पहुँचता जितना निकट पक्का या कट्टर शत्रु पहुँचता है। मित्र या प्रेमी तो शायद कभी भूल भी जाता है, मगर सच्चा शत्रु तो निद्रा काल में भी नहीं भूलता। इसीलिए मानना पड़ता है कि यदि आस्तिकजन भक्त के रूप में उसे याद करते हैं जपते हैं, नहीं भूलते हैं, तो नास्तिकजन शत्रु के रूप में इसे भक्तों की ही तरह, बल्कि उनसे भी ज्यादा याद करते, जपते और नहीं भूलते हैं और यह मानी हुई बात है कि ईश्वर तो उसी का निकटवर्ती है, उसे ही सद्गति देता है जो उसे निरंतर याद करे, कभी न भूले। उसके दरबार में तो आस्तिक-नास्तिक का विभाग (Label) नहीं है। यह विभाग तो मनुष्यों का बनाया हुआ है। वह तो मन की प्रवणता, मनोवृत्ति, मन:प्रवाह या लगन को देखता है और वह लगन मंदिर, मस्जिद आदि में जाने, कंठी-माला, गेरुआ पहनने, आँख-नाक मूँदने या आस्तिक कहाने में नहीं है। वह तो मन का धर्म है, हृदय का व्यापार है, न कि शरीर का धर्म। इसीलिए इतिहास-पुराणों के आख्यानों से पता लगता है कि यदि ध्रुव, प्रह्लादादि भक्तों को भगवान ने सद्गति दी तो रावण, कंस, हिरण्यकशिपु आदि को दुर्गति न देकर परमलोक ही प्रदान किया। यदि भक्ति या भक्त के वही लक्षण होते जिन्हें हमने मान रखा है और यदि एकमात्र भक्तों को ही भगवान सद्गति देते, तो फिर भगवद्विरोधियों (नास्तिकों के भी दादाओं) दानवों और राक्षसों का कल्याण कैसे हुआ रहता जिसका उल्लेख धर्म-ग्रंथों में पाया जाता है? हमारे जानते उस उल्लेख का यही रहस्य है। अतएव हमारे विचार से ईश्वरवादियों को - सच्चे आस्तिकों को - सच्चे निरीश्वरवादियों से भयभीत होने का कोई कारण नहीं है, दोनों के मार्ग दो होने पर भी लक्ष्य और पहुँच एक ही है, जैसा कि 'यं शैवा: समुपासते शिव इति' इत्यादि वचनों से भी सिद्ध है और पुष्पदंताचार्य के 'नृणामेको गम्यस्त्वमसि पयसामर्णव इव' का भी तात्पर्य है। हाँ, यदि भय का कोई कारण है तो केवल यही कि ईश्वरवादी और अनीश्वरवादी दोनों सच्चे और पक्के न होकर बनावटी और दिखावटी हों। नामधारी आस्तिक और नामधारी नास्तिक दोनों ही समानरूप से भगवत-द्रोही और धार्मिकों के लिए भय के कारण हैं? अतएव उन्हीं से बचना तथा सजग रहना चाहिए। इसीलिए ईश्वरवाद का अद्वितीय ग्रंथ 'न्यायकुसुमाजंलि' लिखकर उसके अंत में उपसंहार करते हुए उदयनाचार्य लिखते हैं कि -

इत्येवं श्रुतिनीति संप्ल वजलैर्भूयोमिराक्षालिते

येषां नास्पदमादघासि हृदये ते शैलसाराशया:।

किंतु प्रस्तुत विप्रती पविधयोऽप्युच्चैर्मव च्चिंत का:

काले कारुणिक त्वयैव कृपया ते मावनीया नरा:॥

इसका भावार्थ यह है कि हे भगवन! हमने आपके विरोधियों (नास्तिकों) के अत्यंत मलिन हृदयों को धोने के लिए इस तरह के तर्क, युक्ति और आगम-प्रमाण-स्वरूप निर्मल सोते का जल यद्यपि तैयार किया है, तथापि इतने पर भी यदि उनके अत्यंत मलिन हृदयों में पवित्रता तथा कोमलता न आकर आपके लिए स्थान नहीं मिलता, तो हम यही कहेंगे कि वे वज्रहृदय हैं। फिर भी इतना तो मानना ही होगा कि वे नास्तिक लोग भी आपके प्रचंड शत्रु बनकर आपका चिंतन (आपकी याद) बहुत अच्छी तरह करते ही हैं। साथ ही, आप ठहरे कृपालु। अतएव समय पाकर उन लोगों का भी उद्धार आपको कृपा करके करना ही होगा।

(यह लेख अगस्त 1932 ई. में कल्याण के ईश्वर अंक में छपा था। इस समय तक स्वामी जी पर मार्क्सवाद का प्रभाव नहीं पड़ा था। और वे एक सच्चे धार्मिक की तरह प्रवंचना के ढोंग के, रूढ़ि के खिलाफ थे।)