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प्रेम की कीमत

मगध राज्य के सिंहासन पर जैसे ही चंद्रसेन नाम का राजा बैठा, उसके साथ पढ़ने वाले (सहपाठी) चार मित्र इस आशा से उसके पास आए कि राजा कुछ मदद करेगा। राजा ने उनसे पूछा— "तुम्हें नौकरी दूँ या धन की सहायता चाहिए?" एक मित्र बोला— "मुझे धन की सहायता ही दे, ताकि मैं अपने साथ-साथ चार और लोगों को भोजन दे सकूँ।" राजा चंद्रसेन ने उस मित्र को उतना धन दिया जितना उसने माँगा था और उसे विदा किया। दूसरा बोला— "धन लेकर आगे उस पूंजी पर और पैसे कमाने लायक मुझे कोई व्यापार नहीं आता। इसलिए मुझे अपने यहाँ नौकरी ही दे दो।" चंद्रसेन ने उसे एक पद पर नियुक्त कर अच्छे वेतन की व्यवस्था कर दी। तीसरा बोला— "खेती-बाड़ी का काम करके मैं अपने परिवार का निर्वाह कर सकूँगा।" राजा चंद्रसेन ने उसे जितनी चाहिए थी उतनी जमीन दे दी। चौथा बोला— "राजन, मुझे तुम्हारे प्रेम के अतिरिक्त और किसी चीज की जरूरत नहीं है। उतना मिल गया तो समझो मुझे अष्टसिद्धि और नवनिधि मिल गई। इसके अलावा, मेरे जैसा मित्र मिलने से तुम्हारे जैसे राजा को भी कुछ न कुछ फायदा ही होगा।" उसका नाम रामदास था। अपने प्रेम का रामदास को क्या उपयोग होता है, यह देखने के विचार से राजा चंद्रसेन ने उसे स्वीकार कर लिया। राजा चंद्रसेन रोज शाम को अपने बगीचे में विहार (सैर) करने के लिए रथ में बैठकर जाते थे। तब वे रामदास को भी अपने साथ बिठाकर ले जाते। यह देखकर नागरिकों, व्यापारियों और अधिकारियों को लगा कि वह राजा का कोई बहुत करीबी आत्मीय व्यक्ति है। एक दिन जब रथ बाजार से गुजर रहा था, रामदास राजा से बोला— "मुझे थोड़ा काम है, यहाँ के एक-दो व्यापारियों से मिलना है," ऐसा कहकर वह रथ से उतर गया। तुरंत बड़े-बड़े व्यापारी रामदास के चारों ओर घेरा बनाकर खड़े हो गए। रामदास ने उन्हें बताया कि राजा जल्द ही नए कर (Tax) लगाने वाले हैं। तुरंत व्यापारियों ने रामदास को कई उपहार भेंट किए और विनती की कि राजा उन पर नए कर न लगाएँ, इसके लिए वे हर संभव प्रयास करें। रामदास ने मना नहीं किया। व्यापारी हर हफ्ते होने वाले मुनाफे का कुछ हिस्सा रामदास को लाकर देने लगे। थोड़े ही दिनों में राजधानी के अमीरों में रामदास की गिनती होने लगी। यह सारा व्यवहार बड़े गुप्त तरीके से होता था। व्यापारियों के हिसाब की जाँच करने वाले सरकारी अधिकारी और न्यायाधीश, सबको उनका हिस्सा अपने आप पहुँच जाता था। कुछ दिनों बाद रामदास ने राजधानी में ही एक बड़ा महल बनवाया और गृहप्रवेश के समय राजा, मंत्रियों, अधिकारियों और प्रमुख व्यापारियों को निमंत्रण भेजा। उसने एक बड़ी दावत दी और उस समय नाच-गाने की व्यवस्था की। राजा ने चकित होकर रामदास ने पूछा— "क्यों रे, इतने कम समय में तूने इतने पैसे कैसे कमाए?" "महाराज, आपकी कृपा हो तो बड़े-बड़े राज्य भी मिल जाएँगे!" रामदास ने कहा। "क्या तुम बताओगे कि तुमने यह सारा वैभव कैसे प्राप्त किया?" राजा ने उससे पूछा। "कल रात आप मेरे घर में मेरे कमरे के बगल वाले कमरे में छिपकर बैठें और सारी बातें देखें व सुनें। आपकी कृपा से मुझे जो लाभ हुआ वह तो आपके सामने ही है, पर आपको जो फायदा होगा वह भी देख लीजिएगा।" रामदास ने कहा। अगले दिन रामदास ने ऐसी अफवाह उड़ाई कि वह हिसाब की जाँच करने वाले अधिकारी और न्यायाधीश तक पहुँच जाए। उस रात राजा रामदास के घर उसके बैठक वाले कमरे के बगल में छिपकर बैठ गया। कुछ समय बाद लेखा परीक्षक (हिसाब जाँचने वाला अधिकारी) आया और बोला— "इस बार का मेरा हिस्सा भी आप ही रख लें और मेरी एक बात में सहायता करें।" "आपको क्या मदद चाहिए?" रामदास ने उससे पूछा। "मैंने सुना है कि महाराज को लगा है कि मैं मन लगाकर काम नहीं कर रहा हूँ, इसलिए उन्होंने मुझे निकालकर किसी और को नियुक्त करने का फैसला किया है। जो आमदनी हो रही थी, वह अचानक बंद हो जाएगी! महाराज के कानों तक यह बात पहुँचा दीजिए कि मैं मन लगाकर काम कर रहा हूँ ताकि मेरी नौकरी पक्की रहे, ऐसा कुछ कीजिए।" अधिकारी ने कहा। "ठीक है, कुछ करता हूँ!" रामदास ने कहा। उसके जाने के थोड़ी देर बाद न्यायाधीश आया और बोला— "इस बार का मेरा हिस्सा भी आप ही रख लीजिए और महाराज जो मेरा तबादला (Transfer) करने वाले हैं, उसे रुकवा दीजिए। जहाँ व्यापारी नहीं हैं और सिर्फ किसान रहते हैं, वहाँ भला क्या आमदनी होगी?" "ठीक है, कुछ करता हूँ!" रामदास ने कहा और उसे विदा करके राजा के पास आकर बोला— "देख लिया महाराज! आपकी मर्जी (निकटता) प्राप्त करके मैंने सभी रिश्वतखोरों को अपनी ओर चुंबक की तरह आकर्षित कर लिया है। आपकी सरकार से भ्रष्ट लोगों को बाहर निकालने में आपके प्रेम का उपयोग हुआ या नहीं?" राजा चंद्रसेन ने इस बात को स्वीकार किया और हिसाब जाँचने वाले अधिकारी तथा न्यायाधीश को उचित कारण बताकर पद से हटा दिया।