पत्नी की सलाह
कोटिपल्ली के अग्रहार में एक पुरोहित रहा करता था। पुरोहिताई में वह बड़ा ही कुशल था, पर वह हद से ज़्यादा लोभी था। अड़ोस-पड़ोस के गाँव वाले जब भी ज़रूरत पड़ती, उसी को बुलवा ले जाते। यजमान चाहे धनी हो या गरीब, पर पुरोहित सभी लोगों से एक ही प्रकार से धन वसूल करता था। सबको तंग करके गोदान भी करवा लेता था।
एक बार उस प्रदेश के कई गाँवों में भयंकर रूप से छूत की बीमारियाँ फैल गयीं और कई लोग मर गये। इससे क्या था, पुरोहित की पाँचों उंगलियाँ घी में थीं। कर्मकाण्ड करने के लिए कोई दूसरा पुरोहित उस प्रदेश में कहीं न था। इसलिए सब कोई उसी को बुलवा ले जाते थे।
पुरोहित ने सब यजमानों से हठ किया कि कर्मकाण्ड करने के लिए गोदान अवश्य किया जाय। लोगों ने डरकर कि गोदान न देने से कर्मकाण्ड रुक जाएगा, सूखी या बांझ गाय का दान दे दिया। इस तरह बेकार की जो गायें मिलीं, उन सबको बड़ी मेहनत के साथ हांककर पुरोहित अपने घर ले आया।
कुछ ही दिनों में देखते-देखते पुरोहित के पास कई गायें जमा हो गयीं; लेकिन अब उसके सामने एक बड़ी समस्या पैदा हो गयी। इतनी सारी गायों को कैसे चराए! उन्हें चारा कहाँ से लाए? पहले उन गायों को वर्षा में भीगने से बचाने के लिए एक झोंपड़ी बनानी पड़ी। इसके पीछे पुरोहित के द्वारा जमा किये गये धन में से बहुत बड़ा हिस्सा खर्च हो गया।
गायों के वास्ते चारा खरीदना चाहे तो बहुत से रुपये खर्च हो जाएँगे! चारा न दे तो गायें मर जाएँगी। तब उसके सर गोहत्या का पाप लगेगा। इसलिए पुरोहित खुद उन सभी गायों को चराने ले जाने लगा। इससे पुरोहिताई में बाधा पड़ी।
कुछ दिन बाद उसे लगा कि वह दोनों तरफ़ से लुट गया है। कई दिन तक चराने के बाद भी कोई गाय दूध न देती थी। सब या तो बांझ थीं, या सूख गयी थीं। इन बेकार की गायों के पीछे वह अच्छी आमदनी वाली पुरोहिताई को तिलांजलि दे बैठा था। पुरोहिताई के बंद करते ही घर का खर्च चलाना मुश्किल हो गया। वह पुरोहिताई छोड़ मवेशीपालक बना, इससे सब तरह से उसका नुकसान ही होने लगा। उधर परिवार चलाना भी मुश्किल होने लगा।
अगर किसी लड़के को गायें चराने के लिए नियत करना चाहे तो उसे तीनों जून भर पेट खाना खिलाना होगा। पुरोहित की पत्नी बीमार थी। उसने साफ़ कह दिया था कि वह नौकर को रसोई बनाकर खिला नहीं सकती। आखिर लाचार हो नौकर को भी वही पुरोहित रसोई बनाकर खिलाने लगा।
गायें दुधारू न थीं, इसलिए कड़ी मेहनत करने पर भी सब बेकार गयी। वह भगवान को कोसने लगा— "भगवान! मैं आराम से पुरोहिताई करके अपने दिन काट देता था, तुमने कैसी तकलीफें मेरे सर मढ़ दीं?" उसने यह समझने का कभी प्रयत्न नहीं किया कि उसका प्रलोभन ही उसकी तकलीफों की जड़ है और उसने यह तकलीफ जान बूझकर अपने सर मोल ली है।
आखिर पुरोहित की सारी तकलीफों को उसकी पत्नी ने ही दूर किया। वह बड़ी बुद्धिमती थी। इधर कुछ महीनों से वह अपने पति की यातनाओं से परिचित हो गयी थी।
"आप इस तरह चिंता करते बैठे रहेंगे तो कोई फ़ायदा न होगा। हमें इस विपत्ति से बचने का कोई उपाय सोचना चाहिए। मैं एक उपाय बता देती हूँ, ऐसा कीजिए। आपकी सारी तकलीफें दूर हो जाएँगी।" पुरोहिताइन ने समझाया।
"बताओ, ऐसा ही करेंगे।" पुरोहित ने पूछा।
"सुनिये; इन बेकार गायों को जो भी दाम मिले, बेच डालिये। उन रुपयों से अच्छा दूध देनेवाली दो गायों को खरीद लीजिए। अगर कोई गोदान करना चाहे तो वे लोग गाय खरीदने के लिए जितने रुपये खर्च करना चाहते हैं, वे रुपये आप ही लेकर उनसे बताइए कि गाय खरीदकर ले आएंगे। तब हमारी गायों में से एक को ले जाकर तीन दिन पहले उन यजमानों के घर बाँध दीजिए। फिर उसी को दान में लेकर घर ले आइए। इससे गायों को बेचने पर हमें काफी रुपये मिल जाएँगे, और घर में दुधारू गायें भी होंगी, तब उनके चारे और चराने की बातें तो कोई समस्या नहीं रहेगी।" पुरोहिताइन ने समझाया।
ये बातें सुनते ही मानों पुरोहित की जान में जान आ गयी। उसने बेकार की गायों को किसी कसाई के हाथ बेच दिया। इसके बाद अपनी पत्नी के कहे मुताबिक दो दुधारू गायें खरीद लीं, उनसे खूब धन कमाते, पुरोहिताई भी करते, आराम से अपने शेष दिन बिताने लगा।