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नारायण और नारियल

बलभद्र नामक युवक की गुरुकुल की शिक्षा पूरी हो गई और वह वापस अपने गाँव रहने चला गया। उसके पिता भी अच्छे विद्वान थे। अपनी खेती करते-करते वे कुछ लेखन कार्य भी करते थे। बलभद्र के वापस आने पर उन्होंने उसे सुझाव दिया कि वह उनके साथ ही रहकर लेखन कार्य में उनकी मदद करे। बलभद्र के पिता कुछ संस्कृत ग्रंथों का हिंदी अनुवाद करके उन्हें शहर के जमींदार के पास भेजते थे। यह अनुवाद का काम बलभद्र को बहुत पसंद आया। उसकी मदद से काम तेजी से होने लगा। उसके पिता ने हंसपुराण नामक ग्रंथ का अनुवाद पूरा किया और बलभद्र से कहा, "बेटा, यह अनुवाद जमींदार के पास ले जाओ।" वह ग्रंथ लेकर बलभद्र शहर की ओर निकल पड़ा। रास्ते में उसे एक आदमी मिला। वह बोला, "अरे, तुम बलभद्र ही हो ना? कहीं जा रहे हो ऐसा लग रहा है?" उस आदमी के सवालों के जवाब तो बलभद्र ने दे दिए; लेकिन वह आदमी कौन है, यह उसे समझ नहीं आ रहा था! उस आदमी ने यह बात ठीक से भाँप ली और कहा, "अरे भूल गए क्या? मैं नारायण हूँ!?" अब बलभद्र को ठीक से याद आ गया। उन दिनों नारायण छोटे बच्चों को इकट्ठा करके उन्हें अच्छी-अच्छी कहानियाँ सुनाया करता था। लेकिन कहानी चलते समय ही कहीं से उसकी पत्नी आकर उसे डांटती और बच्चों को वहाँ से भगा देती। लेकिन फिर से उन्हें इकट्ठा करके नारायण कहानी पूरी करता था। कहानी बीच में कहाँ रुकी थी, यह बच्चों से ज्यादा नारायण को ही याद रहता था। नारायण इस पर हँसकर बोला, "ठीक है, छोड़ दो! अच्छा, तुम कल शाम तक वापस आने वाले हो, तो मेरे लिए शहर से एक नारियल ले आना! परसों सुबह पूजा के समय मंदिर में मुझे नारियल फोड़ना है। अपने गाँव में अच्छे नारियल मिलते ही नहीं हैं!" "आपके लिए कल शाम को मैं जरूर एक नारियल लाऊँगा। विश्वास रखिए।" बलभद्र ने कहा। फिर भी नारायण दोबारा बोला, "भूलना मत हाँ! इस गाँव में मैं किसी को कुछ करने के लिए कहता हूँ, तो सब बस सिर हिला देते हैं। लेकिन करता कोई भी नहीं है! मुझे उम्मीद है कि कम से कम तुम उनके जैसे नहीं होगे!" बलभद्र ने हँसकर उसे वचन दिया कि कल उसे नारियल जरूर मिलेगा। फिर शाम तक शहर पहुँचकर उसने ग्रंथ जमींदार के हाथ में दे दिया। हंसपुराण का वह अनुवाद देखकर जमींदार ने आश्चर्य से पूछा, "अरे! यह अनुवाद इतनी जल्दी करना कैसे संभव हुआ?" बलभद्र ने अपनी गुरुकुल की शिक्षा और उसके बाद अपने पिता को उनके अनुवाद में की जा रही मदद आदि के बारे में जमींदार को बताया। तब जमींदार ने उसे एक श्लोक सुनाया और उसका अर्थ पूछा। बलभद्र ने जमींदार से कहा कि इस संस्कृत श्लोका का एक नहीं, बल्कि कई अर्थ होते हैं; और उसने श्लोक के कुल अठारह अर्थ बताए। यह सब सुनकर जमींदार बहुत ही आश्चर्यचित हुआ और बोला, "तुम तो असामान्य ऐसे पंडित हो, अगर तुम यहाँ चार दिन रुक जाओ, तो मैं यहाँ एक पंडित-सभा बुलाना चाहता हूँ।" बलभद्र को अचानक नारायण के नारियल की याद आ गई। लेकिन यह बात जमींदार को कैसे बताए, यह उसे समझ नहीं आ रहा था। उसने तो नारायण को वचन दिया था, और बलभद्र की इच्छा थी कि उसकी वजह से नारायण की भक्ति में कोई बाधा न आए। लेकिन केवल एक नारियल के लिए जमींदार की इच्छा को टालना भी उचित नहीं होता, ऐसा विचार करके उसने एक तरकीब सोची। "महाराज, मेरी दादी अभी बीमार हैं। उनके लिए दवा लेकर मुझे कल शाम तक अपने घर पहुँचना है।" बलभद्र ने जमींदार से झूठ ही कह दिया। "बस, इतना ही? दवा कौन सी है मुझे बताओ, मैं उसे अपने आदमी के हाथों तुम्हारे घर भिजवा दूँगा।" जमींदार तुरंत बोला। अब बलभद्र थोड़ा घबराया; वह बोला, "महाराज, मेरी दादी की बीमारी काफी हद तक मानसिक है। मेरे वहाँ न होने के कारण वह मेरे लिए चिंतित हैं। इसलिए उनके पास रहकर मुझे खुद ही उन्हें दवा पिलानी चाहिए, तब तक सिर्फ दवा का कोई फायदा नहीं होगा, ऐसा वैद्य का कहना है।" जमींदार इस पर कुछ नहीं बोल सका। उसने बस उस रात अपने ही घर आराम करके अगले दिन अपने घर जाने का सुझाव बलभद्र को दिया और उसके रहने व खाने-पीने की सारी व्यवस्था कर दी। उस रात विश्राम करने के बाद अगले दिन सुबह बलभद्र नारियल खरीदने के लिए बाजार गया। परंतु उसी दिन किसी नारियल वाले का निधन हो जाने के कारण नारियल की सारी दुकानें बंद थीं। उसे नारियल खरीदे बिना ही वापस आना पड़ा। वापस घर आने पर उसने जमींदार के रसोइए से नारियल के बारे में पूछा। रसोइया बोला, "यहाँ बोरी भर नारियल हैं; लेकिन जमींदार की अनुमति के बिना मैं किसी को कुछ नहीं दे सकता। तुम्हारा जमींदार से मांगना भी अच्छा नहीं लगेगा, बड़े लोगों से ऐसी छोटी-मोटी चीजें नहीं मांगनी चाहिए।" फिर भी नारायण को दिया हुआ वचन बलभद्र का पीछा नहीं छोड़ रहा था। अंततः जमींदार के पास जाकर वह बोला, "मेरी दादी को नारियल का गोला बहुत पसंद है। और बाजार में तो आज मुझे नारियल मिल ही नहीं सका।" "अरे, इतनी छोटी सी चीज़ की मांग करनी पड़ी तुम्हें मुझसे?" ऐसा कहकर जमींदार ने चार नारियल और दस हजार अशर्फियां देकर बलभद्र को विदा किया। बलभद्र अपने गाँव पहुँचा, तब तक रात हो चुकी थी। रकम पिता को देकर उसने शहर में क्या-क्या हुआ, इसका सारा वृत्तांत कह सुनाया। तब पिता ने उससे कहा, "जमींदार ने आज तक किसी भी ग्रंथ की इतनी बड़ी रकम किसी को नहीं दी। वे तुम पर बहुत ही खुश हुए लगते हैं। अगर तुमने पंडित सभा में भाग लिया होता, तो वे तुम्हें निश्चित ही एक लाख अशर्फियां देते। तुमने जो किया, वह कुछ अच्छा नहीं किया।" "लेकिन गुरुकुल में हमें सिखाया गया था कि धन से ज्यादा वचन का महत्व होता है।" बलभद्र बोला, "हमें जो धन मिलना नसीब में होता है, वह अपने आप चलकर हमारे पास आ जाता है।" तब पिता ने उससे कहा, "लेकिन यह सब तुम नारायण जैसे इंसान के लिए बोल रहे हो, यह मुझे खटक रहा है। तुम्हें सबसे पहले यह बात समझ लेनी चाहिए कि- हमें जो काम करने हैं, उनमें से महत्वपूर्ण कौन से हैं और कौन से गैर-महत्वपूर्ण! अगर यह नहीं हो पाया तो तुम्हारे जीवन में परेशानियों के पहाड़ ही खड़े रहेंगे।" बलभद्र थोड़ी देर नारायण के घर के चबूतरे पर बैठा रहा; लेकिन काफी देर तक नारायण के न आने पर, वह नारियल लाने के बारे में एक चिट्ठी लिखकर उसे ताले पर अटकाकर चला गया। अगले दिन सुबह भी नारियल लेकर वह नारायण के पास गया और फिर से ताला देखकर वह मंदिर गया। वहाँ भी नारायण के न आने का पता चलने पर उसने पुजारी के पास उसके लिए संदेश छोड़ दिया। फिर दोपहर में भी नारायण को नारियल देने का विचार करके बलभद्र भरी दोपहर की कड़ी धूप में उसके पास गया। नारायण घर में कोई किताब पढ़ता बैठा था। बलभद्र को आया हुआ देखकर वह चिढ़कर बोला, "मुझे कोई शांति से पढ़ने भी नहीं देता। बोल क्या चाहिए तुझे?" "आपके लिए मैं नारियल लेकर कल रात आया था, फिर सुबह आया, और अब फिर से आया हूँ। क्या आप कहीं दूसरे गाँव गए थे?" बलभद्र ने पूछा। "दूसरा गाँव? नहीं तो! यहाँ आने वालों की परेशानी से बचने के लिए, मैं आगे के दरवाजे पर ताला लगाकर, फिर पीछे के दरवाजे से अंदर आकर बैठता हूँ।" नारायण ने उत्तर दिया। "ओहो, ऐसा है क्या? तो फिर आज सुबह आपने भगवान के सामने नारियल नहीं फोड़ा?" बलभद्र ने पूछा। "नारियल फोड़ना कोई बहुत महत्वपूर्ण नहीं है; अगर पास हो तो फोड़ लेता हूँ, नहीं तो नहीं! आजकल मेरी तबीयत ठीक नहीं है। वैद्य ने कहा है कि मैं रोज़ अभ्रक भस्म खाऊँ। तुम कभी शहर गए, तो ले आना हाँ अभ्रक भस्म मेरे लिए!" बलभद्र के हाथ में नारियल देखकर भी नारायण ने उस बारे में कुछ नहीं कहा, तब थोड़ा गुस्सा होकर ही उसने नारायण के सामने नारियल रखकर, उसे लाने के लिए खुद को कैसी परेशानी सहनी पड़ी, इसका वर्णन किया। तब नारायण बोला, "अरे मैं भुलक्कड़ नहीं हूँ लड़के! लेकिन मैंने कहा, और किसी ने कुछ ला दिया, ऐसा सिर्फ तुम्हारे ही मामले में हो रहा है। तुम नारियल ले आए, इसका मुझे आश्चर्य ही लग रहा है! जो हुआ सो हुआ! भूल जाओ तुम! लेकिन अभ्रक भस्म मेरे लिए मत लाना हाँ! और किसी दूसरे को लाने के लिए कहना भी मत; क्योंकि वह बहुत महँगा है।" यह सुनकर बलभद्र चकरा ही गया! पिता की बातों की सच्चाई उसकी समझ में आ गई; और वह उचित-अनुचित कामों को पहचानने की बुद्धि प्राप्त करने के प्रयास में लग गया।