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धोखे का खाता

रामनाथ और शिवराम हर साल होड़ लगाकर एक उत्तर देश की यात्रा करता तो दूसरा दक्षिण देश की। पर रामनाथ ज्यों ही यात्रा से लौटता, त्यों ही यात्रा का पूरा खर्च तथा रास्ते में धोखे व दगे के शिकार हो खोने वाले धन का हिसाब करके मन ही मन बड़ा दुखी हो जाता; पर शिवराम एकदम अविचल रहता। रामनाथ से रहा न गया, शिवराम के व्यवहार पर रामनाथ चकित था। इसे देख एक दिन वह शिवराम से पूछ ही बैठा— "शिवराम, मैं हर साल यात्रा के समय तरह-तरह के धोखों का शिकार हो काफी धन खो जाया करता हूँ और दुखी होता रहता हूँ! तुम इस दुख से बचने के लिए क्या किया करते हो?" इस पर शिवराम मुस्कुराकर बोला— "यात्रा के प्रदेशों में हम जैसे नये लोगों को वहाँ के लोग किसी न किसी तरह से धोखा दिया करते हैं! इस मुसीबत से हम बच नहीं सकते। इसीलिए मैं यात्रा के समय खाने का खाता, किराये का खाता, पूजा-अर्चना का खाता, इसी तरह के अन्य खातों जैसे 'धोखे का खाता' पहले ही तैयार करके तब घर से निकल पड़ता हूँ। इस कारण मुझे बाद में दुखी होने की ज़रूरत नहीं पड़ती।" तब जाकर रामनाथ को असली बात मालूम हो गई।