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दो चोर

भवानीपुर पर राजा चित्रसेन राज्य करते थे। उस समय राज्य में रूपम नाम का एक चोर था। उसने राजधानी के कई घरों में लूटपाट की थी। वह पहरेदारों की नजरों से बचकर राजधानी की सड़कों पर घूमता रहता था। एक बार रूपम ने एक अधिकारी के घर की दीवार में छेद किया और अंदर घुस गया। वहाँ उसे कई कीमती सामान मिले। रूपम और उसके साथियों को अपने घर में देखकर वह अधिकारी बहुत डर गया। अपनी जान बचाने के लिए उसने बिना कुछ कहे सारा सामान रूपम के हवाले कर दिया। रूपम खुशी-खुशी वह सामान लेकर चला गया। इसके ठीक एक हफ्ते बाद, रूपम एक व्यापारी के घर में घुसा। उसने चाकू दिखाकर व्यापारी को डराया और घर में जो भी सामान मिला, उसे एक पोटली में बांधकर निकल गया। इसके बाद उसने एक किसान के घर में सेंध लगाई। वहाँ उसे कुछ कीमती गहने मिले। उन्हें भी एक थैली में भरकर रूपम भाग गया। कुछ दिनों बाद उसने एक पुजारी के घर में प्रवेश किया। जो कुछ भी मिला, उसकी पोटली बनाकर अपने साथियों के हाथ में दे दी और उनके साथ गायब हो गया। रूपम ने जब चुराए हुए सारे सामान की जांच की, तो उसे पता चला कि राजा के अधिकारी के घर से जो माल मिला था, वह बाकी जगहों से मिले सामान की तुलना में कहीं अधिक कीमती था। रूपम ने एक और आश्चर्यजनक बात पर गौर किया। वह यह कि—अपने घर में हुई चोरी के बारे में उस अधिकारी को छोड़कर बाकी सभी ने राजा के पास शिकायत दर्ज कराई थी। रूपम के लिए यह एक पहेली थी कि सिर्फ वही एक व्यक्ति चुप क्यों रहा। दो महीने बाद रूपम ने फिर से उसी अधिकारी के घर में चोरी की; और इस बार तो उसे पहले से भी ज्यादा कीमती माल मिला! इसके बाद उसने क्रम से फिर से व्यापारी, किसान और पुजारी के घरों में चोरी के लिए प्रवेश किया। लेकिन उसे इस बार कहीं भी कोई कीमती सामान नहीं मिला। वे तीनों तो बेचारे पहली चोरी के सदमे से अभी तक उबर भी नहीं पाए थे! इस बार भी उस अधिकारी को छोड़कर बाकी सबने फिर से चोरी के प्रयास की शिकायत की। इस बार भी अधिकारी की चुप्पी पर रूपम को बड़ा आश्चर्य हुआ। वह समझ गया कि यहाँ जरूर कुछ 'दाल में काला' है! एक बार एक अमीर आदमी के घर लूटपाट करते समय रूपम पकड़ा गया। जब मालिक ने चोर से पूछताछ की, तो उसे पता चला कि उसके नौकरों ने जिस चोर को पकड़ा है, वह कुख्यात डाकू रूपम है! मालिक ने नौकरों को शाबाशी देते हुए कहा— "अरे, जिसे राजा के सिपाही तमाम कोशिशों के बाद भी नहीं पकड़ सके, उस कुख्यात चोर को तुमने पकड़ लिया है। अब इसे सावधानी से ले जाकर राजा के सिपाहियों के हवाले कर दो। इसके अपराधों के लिए राजा स्वयं जांच करेंगे और उचित सजा देंगे।" नौकरों ने रूपम को राजा के सिपाहियों को सौंप दिया। सिपाहियों ने जब उसे राजा के सामने पेश किया, तो राजा ने उससे पूछा— "चोर चाहे कितना भी चतुर क्यों न हो जाए, एक न एक दिन पकड़ा ही जाता है, यह बात आखिर तुम्हारे मामले में सच साबित हो गई! अब बोलो, चोरी का सारा माल हमारे हवाले करते हो या हमारी विशेष सजा भुगतने के लिए तैयार हो?" "महाराज, एक बार पकड़े जाने के बाद जिद करने का क्या फायदा! मैंने जो कुछ भी चुराया है, वह सब आपके हवाले करने के लिए तैयार हूँ," रूपम ने कहा। जैसे ही उसने चोरी का सामान छिपाने की जगह सिपाहियों को बताई, वे जाकर सारा माल ले आए। व्यापारी, किसान और पुजारी को जैसे ही चोर पकड़े जाने की खबर मिली, वे राजा के पास आए और विनती की कि 'हमारा सामान हमें वापस दिलाया जाए।' राजा ने रूपम से कहा कि वह सारा सामान जिसका है, उसके अनुसार अलग-अलग कर दे। रूपम ने व्यापारी, किसान और पुजारी का सामान अलग कर दिया और अधिकारी का सामान एक तरफ रखकर कहा— "महाराज, ये चीजें मैंने राजमार्ग के कोने पर स्थित कुएं के पास रहने वाले आपके एक अधिकारी के घर से चुराई हैं।" यह सुनकर राजा को बहुत आश्चर्य हुआ! "इतनी कीमती चीजें किसी सामंत राजा के घर तो मिल सकती हैं, लेकिन एक साधारण अधिकारी के घर में नहीं मिल सकतीं! तुम्हारी बात पर कैसे विश्वास करूँ, मुझे समझ नहीं आ रहा; और उसने तो चोरी के बारे में हमारे पास कोई शिकायत भी दर्ज नहीं की!" इस पर रूपम हँसकर बोला— "महाराज, मुझे भी यही आश्चर्य हुआ था कि केवल उसी ने चोरी की शिकायत क्यों नहीं की? बाद में मुझे समझ आया कि यह अधिकारी पहले नंबर का रिश्वतखोर आदमी है। लोगों से रिश्वत लेने के काम में वह इतना आगे बढ़ गया है कि वह मुझसे भी बड़ा चोर है! अपनी जबरदस्ती और लूटपाट का पता न चले, इसलिए उसने अपने घर हुई चोरी की बात भी छिपाकर रखी!" "मेरे दरबार में रिश्वतखोरी?" राजा ने आश्चर्य से कहा और सिपाहियों के जरिए उस अधिकारी को बुलवाया। कड़े शब्दों में धमकी देकर राजा ने अधिकारी से उसका जुर्म कबूल करवा लिया। उसे तुरंत जेल की सजा सुनाई गई। फिर राजा ने रूपम से कहा— "तुम्हारी वजह से एक भ्रष्ट अधिकारी को सजा मिली है। अब इस उदाहरण से दूसरे अधिकारी भी सीधे हो जाएंगे। ठीक है; बोलो, अब तुम्हें क्या सजा दी जाए?" इस पर हाथ जोड़कर रूपम बोला— "प्रभु, मैंने सबसे कुख्यात चोर (अधिकारी) को पकड़वाया है, इसके लिए तो वास्तव में मुझे कुछ इनाम मिलना चाहिए, और आप सजा की बात कर रहे हैं?" उसकी इस बात पर हँसते हुए राजा बोले— "ओहो! तुम्हें इनाम चाहिए? तो सुनो—आज से तुम और तुम्हारे साथी चोरी करना छोड़ दोगे और कुछ अच्छा काम करके अपनी जिंदगी बिताओगे। हाँ, अगर फिर से तुम्हारे चोरी करने की खबर मिली, तो सबको सूली पर चढ़ा दूँगा।" इस तरह चेतावनी देकर राजा ने रूपम को तुरंत आजाद कर दिया।