देवों का धर्म
प्राचीन काल में काशी में एक राजा राज्य करता था। उसकी पटरानी के दो पुत्र हुए। राजा ने उनके नाम क्रमशः महिंसास और चंद्रकुमार रखे। महिंसास ही बोधिसत्व थे। जब चंद्रकुमार छोटे ही थे, तभी उनकी माता (पटरानी) का स्वर्गवास हो गया।
राजा ने दूसरा विवाह किया और नई रानी पटरानी बनी। रानी बहुत सुंदर थी और राजा उससे बहुत प्रेम करते थे। राजा भी उनका बहुत आदर करते थे। समय आने पर नई पटरानी को एक पुत्र हुआ, जिसका नाम सूर्यकुमार रखा गया। राजा ने रानी से कहा— "इस नामकरण संस्कार के अवसर पर तुम जो चाहो वह वरदान माँग लो!"
तब रानी ने कहा— "जब आवश्यकता होगी, तब मैं वर माँग लूँगी।" कुछ वर्षों बाद सूर्यकुमार युवा हुआ और राजा के योग्य सभी विद्याओं में निपुण हो गया। तब उसकी माँ ने राजा से कहा— "आपने मुझे पहले एक वरदान दिया था। क्या वह आपको याद है? मैं उसे अब माँगना चाहती हूँ!" राजा ने कहा— "माँग लो!" रानी बोली— "मेरे पुत्र को ही गद्दी का उत्तराधिकारी नियुक्त किया जाए।"
परंतु राजा ने कहा— "दो बड़े और पराक्रमी पुत्रों के होते हुए मैं छोटे को उत्तराधिकारी कैसे बना दूँ?" फिर भी राजा को रानी की बात माननी ही पड़ी। लेकिन राजा को डर था कि कहीं रानी बड़े पुत्रों को हानि पहुँचाने की दुर्बुद्धि न पाल ले, इसलिए उन्होंने अपने दोनों बड़े पुत्रों को बुलाया और समझाया— "पुत्रों! मैंने सूर्यकुमार की माँ को उसके जन्म के समय एक वरदान दिया था। आज उसने उस वरदान के बदले अपने पुत्र को उत्तराधिकारी बनाने की जिद की है। स्त्री जब जिद पर अड़ जाए, तो वह कुछ भी कर सकती है। इसलिए मैंने उसके पुत्र को ही उत्तराधिकारी बनाने का निर्णय लिया है। तुम दोनों को कोई नुकसान न पहुँचे, इसलिए तुम घर छोड़कर कहीं गुप्त स्थान पर चले जाओ। मेरे मरने के बाद सूर्यकुमार को हराकर राज्य जीत लेना।"
दोनों भाइयों ने पिता की आज्ञा मानी और उनका आशीर्वाद लेकर निकल पड़े। सूर्यकुमार को जब यह पता चला, तो उसने भी साथ जाने की जिद की और वह भी उनके साथ चल दिया।
वे तीनों भाई हिमालय पर्वत पर पहुँचे। बोधिसत्व ने छोटे भाई सूर्यकुमार से कहा— "उस सरोवर पर जाकर पीने के लिए पानी ले आओ।"
वह सरोवर एक यक्ष का था। कुबेर ने वह सरोवर उस यक्ष को एक शर्त पर दिया था— "जिन्हें 'देवों का धर्म' क्या है, यह पता है, उन्हें तुम किसी भी प्रकार का कष्ट मत देना। लेकिन यदि कोई अन्य इस सरोवर में कदम रखे, तो उसे पकड़कर खा जाना। परंतु यदि कोई सरोवर में कदम न रखे, तो तुम उसके मार्ग में बाधा मत डालना।"
उस दिन से वह यक्ष सरोवर में कदम रखने वाले हर व्यक्ति से प्रश्न पूछता— "देवों का धर्म क्या है?" और यदि कोई सही उत्तर नहीं देता, तो वह उसे खा जाता। जैसे ही सूर्यकुमार ने सरोवर में कदम रखा, यक्ष ने पूछा— "क्या तुम्हें देवों का धर्म पता है?" सूर्यकुमार ने कहा— "हाँ, पता है! सूर्य और चंद्रमा ही देवों का धर्म हैं!" यक्ष बोला— "तुम्हे देवों के धर्म की कल्पना तक नहीं है।" ऐसा कहकर यक्ष ने सूर्यकुमार को कैद कर लिया।
जब बहुत देर तक सूर्यकुमार नहीं लौटा, तो बोधिसत्व ने चंद्रकुमार को भेजा। यक्ष ने उससे भी वही प्रश्न पूछा। चंद्रकुमार ने कहा— "देवों के धर्म का अर्थ है चारों दिशाएँ!" यक्ष ने उसे भी कैद कर लिया।
जब चंद्रकुमार भी वापस नहीं आया, तो बोधिसत्व को संदेह हुआ कि दोनों पर कोई संकट आया है। वे स्वयं वहाँ पहुँचे। उन्होंने देखा कि सरोवर की ओर जाने वाले पैरों के निशान तो हैं, पर लौटने के नहीं। यह देखकर बोधिसत्व समझ गए कि सरोवर में कोई यक्ष या राक्षस है। उन्होंने अपनी तलवार निकाल ली और उसके बाहर आने की प्रतीक्षा करने लगे।
बोधिसत्व को सरोवर में उतरते न देख, यक्ष ने एक जंगली मनुष्य का रूप धारण किया और पास आकर बोला— "अरे! प्यास लगी होगी तो पानी पी लीजिए। बाहर क्यों खड़े हैं?" बोधिसत्व को संदेह हुआ कि यह वही यक्ष है। उन्होंने पूछा— "मेरे दोनों भाइयों को तुम्हीं ने कैद किया है ना?" यक्ष ने कहा— "हाँ!" बोधिसत्व ने पूछा— "क्यों?" यक्ष बोला— "जो भी इस सरोवर में कदम रखता है, वह मेरे वश में हो जाता है।"
"हर व्यक्ति?" बोधिसत्व ने आश्चर्य से पूछा। यक्ष ने कहा— "जो देवों का धर्म जानते हैं, वे मेरे वश में नहीं होते।" बोधिसत्व ने कहा— "मैं बताता हूँ कि देवों का धर्म क्या है।" यक्ष बोला— "तो बताओ!"
"स्वाभिमान, दूसरों की निंदा करने से डरना (पाप-भीरुता), दूसरों का भला करना और शांत स्वभाव ही उत्तम पुरुष का धर्म है!" बोधिसत्व ने कहा।
बोधिसत्व का उत्तर सुनकर यक्ष बहुत प्रसन्न हुआ। उसने बोधिसत्व के भोजन की उत्तम व्यवस्था की और उनका सत्कार करते हुए कहा— "मैं आपके उत्तर से संतुष्ट हूँ। मैं आपके दोनों भाइयों में से किसी एक को मुक्त करने के लिए तैयार हूँ। किसे मुक्त करूँ?"
बोधिसत्व ने कहा— "मेरे सबसे छोटे भाई सूर्यकुमार को मुक्त कर दो।" यक्ष ने संदेह करते हुए पूछा— "आपको देवों का धर्म केवल बौद्धिक रूप से पता है, व्यवहार में ऐसा नहीं दिख रहा। आप अपने सगे भाई (चंद्रकुमार) को छोड़कर सौतेले भाई को मुक्त करने के लिए क्यों कह रहे हैं?"
बोधिसत्व ने कहा— "यक्ष, मैं देवों के धर्म का ही पालन कर रहा हूँ। मैं अपने इस छोटे भाई के लिए ही तो जंगल आया हूँ। मेरी सौतेली माँ ने अपने पुत्र के लिए राज्य माँगा था और हमारे पिता ने हमारे भले के लिए हमें जंगल जाने को कहा था। मैं छोटे भाई को लेकर जंगल की ओर निकला था, पर वह जिद करके हमारे साथ आ गया। ऐसे भाई को मुक्त किए बिना मैं घर कैसे जा सकता हूँ? और घर जाकर क्या यह कहूँ कि उसे किसी पक्षी ने खा लिया?"
यक्ष बोला— "शाबाश! आपको देवों का धर्म केवल पता ही नहीं है, बल्कि आप उसका पालन करना भी जानते हैं।" ऐसा कहकर यक्ष ने सूर्यकुमार और चंद्रकुमार दोनों को बोधिसत्व के सामने खड़ा कर दिया।
कुछ दिनों बाद बोधिसत्व को समाचार मिला कि वृद्ध राजा की मृत्यु हो गई है। तब वे अपने दोनों भाइयों को लेकर राजधानी लौटे। उन्होंने स्वयं का राज्याभिषेक करवाया, चंद्रकुमार को युवराज बनाया और सूर्यकुमार को सेनापति नियुक्त किया। वे सभी न्याय और धर्म के मार्ग पर चलते हुए राज्य करने लगे।