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कृष्णभूपति (कृष्ण राजा)

बहुत समय पहले मंदाकिनी नदी के तट पर 'मलयद्वीप' नाम का एक देश था। गोपालभूपति वहाँ के शासक थे और कृष्णभूपति उनके दत्तक (गोद लिए हुए) पुत्र थे। जब वह दस वर्ष के थे, तब उनके पिता का देहांत हो गया। वह राज्य के इकलौते उत्तराधिकारी थे, लेकिन ईश्वर की इच्छा के आगे किसकी चलती है? एक दिन घुड़सवारी करते समय घोड़े से गिरने के कारण कृष्ण के सिर पर गहरी चोट लगी। वैद्यों के बहुत उपचार के बाद भी कृष्ण की मृत्यु हो गई। रानी सुनंदादेवी अत्यंत दुखी हुईं, लेकिन राजमाता का कर्तव्य निभाना आवश्यक था। उन्होंने अपने एक सिपाही के बेटे को गोद लिया और उसका नाम भी कृष्णभूपति ही रखा। वह लड़का छोटा था, इसलिए उसे राजनीति के दांव-पेंचों का ज्ञान नहीं था। राज्य चलाने की क्षमता उसमें नहीं थी, इसलिए राजमाता सुनंदादेवी को ही सारी जिम्मेदारी संभालनी पड़ी। ऐसे कठिन समय में सुनंदादेवी के बड़े भाई चंदनबर्मा ने उनकी बहुत सहायता की। चंदनबर्मा कुशद्वीप के राजा थे। बहन के पति की मृत्यु की खबर मिलते ही वह मलयद्वीप आए और केवल सांत्वना देकर ही नहीं रुके, बल्कि राज्य की रक्षा का भार भी उठाया। एक शुभ मुहूर्त पर चंदनबर्मा ने अपने भांजे कृष्णभूपति का राज्याभिषेक किया और उसके नाम से स्वयं जिम्मेदारी संभालने लगे। वह कृष्णभूपति के गुरु बने और उसे राजनीति, शस्त्र-विद्या और युद्धकला में निपुण बनाया। कृष्णभूपति बुद्धिमान था और कुछ ही वर्षों में उसने सभी विद्याओं में महारत हासिल कर ली। उसे कला और कविता का भी शौक था। जब चंदनबर्मा को विश्वास हो गया कि उनका भांजा अब राज्य संभालने के योग्य है, तो उन्होंने कार्यभार उसे सौंप दिया और अपने देश वापस लौट गए। वहाँ जाकर उन्हें पता चला कि उनकी अनुपस्थिति में 'मूल्यवंत' नाम के व्यक्ति ने विश्वासघात कर राज्य हड़प लिया है। चंदनबर्मा को कैद कर लिया गया, जहाँ सदमे से उनकी मृत्यु हो गई। उनकी पत्नी और बेटी जोत्स्नादेवी किसी तरह मलयद्वीप पहुँचीं। सुनंदादेवी ने उन्हें आश्रय दिया। एक दिन उन्होंने कृष्णभूपति से दो वरदान माँगे: पहला, उस विश्वासघाती मूल्यवंत को दंड देना और दूसरा, मामा की बेटी जोत्स्नादेवी से विवाह करना। कृष्णभूपति ने सहर्ष इसे स्वीकार किया और युद्ध में मूल्यवंत को पराजित कर कुशद्वीप पर विजय प्राप्त की। युद्ध के दौरान कृष्णभूपति की मुलाकात 'कलापूर्ण' नाम के एक चतुर लड़के से हुई, जिसने सुइयों के अपने अचूक निशाने से सबको दंग कर दिया। युद्ध के बाद पता चला कि वह लड़का असल में एक लड़की थी, जिसका नाम 'कलाकौमुदी' था।