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ऊर्वशी

प्राचीन काल में एक बार नर और नारायण तपस्या कर रहे थे। उनकी तपस्या को भंग करने के विचार से इन्द्र ने कुछ अप्सराओं को पृथ्वी-लोक में भेजा। नारायण ने उन अप्सराओं को देखकर अपने ऊरु पर नाखून से खरोंचा और स्वर्ग की सारी अप्सराओं के सौन्दर्य को मात करनेवाली एक सुन्दर युवती की सृष्टि की। उसके अद्भुत सौन्दर्य को देख अप्सराएँ शर्मिन्दा होकर चली गयीं। ऊरु से उत्पन्न होने के कारण उसका नाम ऊर्वशी पड़ा। इसके बाद वह भी इन्द्र की सभा-नर्तकियों में जा मिली। एक दिन चक्रवर्ती पुरूरवा पृथ्वी लोक से स्वर्ग लोक को गये। वहाँ उन्होंने देवताओं की सभा में ऊर्वशी का नृत्य देखा। उसकी कला और सुंदरता से पुरूरवा उस पर मुग्ध हो गये और उन्होंने उसके साथ विवाह करने का निश्चय किया। ऊर्वशी ने भी पुरूरवा का वरण किया। इन्द्र ने भी इस विवाह को अपनी सहर्ष स्वीकृति दी। ऊर्वशी और पुरूरवा विवाह करके पृथ्वी लोक में आये और सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करने लगे। चार वर्ष बीत गये। इस बीच देवताओं को ऊर्वशी का अभाव अखरने लगा। वे उसे किसी भी तरह स्वर्ग में वापस लाने का प्रयत्न करने लगे। एक आंधी-तूफान की रात में कुछ गन्धर्व भूलोक में आये और ऊर्वशी के कक्ष से हिरन-शावकों को चुरा ले गये। उन शावकों की खोज में ऊर्वशी आकाश-मार्ग में संचरण करने लगी। अवसर पाकर गन्धर्व उसे देवलोक में ले गये। इधर पृथ्वी पर ऊर्वशी को न पाकर पुरूरवा व्याकुल हो उठे। उन्होंने सर्वत्र ऊर्वशी की खोज की और अन्त में देवताओं के अनुग्रह से ऊर्वशी से पुनः मिल सके। ऊर्वशी-पुरूरवा सुखपूर्वक रहने लगे।