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आँखें खुल गईं
ससुराल में कदम रखते ही रमा को लगा कि उसकी सास उससे घर का सारा काम कमर टूटने तक करवाएगी। लेकिन रमा की सास स्वभाव से बहुत सीधी-सादी थी। वह रमा से उसकी माँ से भी अधिक प्रेम करती थी। सास के इस नरम स्वभाव का रमा ने गलत फायदा उठाया। उसने घर के काम को हाथ न लगाने का निश्चय कर लिया और सारा काम उसकी सास ही करती थी।
एक दिन उसका बड़ा भाई उससे मिलने आया। उसकी पत्नी (रमा की भाभी) भी हाल ही में ससुराल आई थी। रमा ने अपने भाई से पूछा— "भैया! मालती भाभी घर का सारा काम करती होंगी न? माँ को बुढ़ापे में थोड़ा आराम मिल रहा होगा न?"
"नहीं रमा! मालती एक भी काम नहीं करती। माँ पर ही काम का सारा बोझ है!" उसके भाई ने कहा। भाई ने उससे पहले यह देख लिया था कि रमा खुद ससुराल में कैसा व्यवहार कर रही है। रमा ने गुस्से में भाई से कहा— "तो फिर भैया, भाभी को मायके भेज दो! तभी उनकी आँखें खुलेंगी।"
भाई ने जवाब दिया— "मैं भी यही सोच रहा था। लेकिन यहाँ आकर तुम्हारा संसार देखा तो मेरा विचार बदल गया। क्योंकि जिस दिन मैं मालती को मायके भेजूँगा, उसी दिन तुम्हारे पति (मेरे जीजाजी) तुम्हें हमारे घर भेज देंगे। मैं देख रहा हूँ कि तुम्हारे कारण तुम्हारी सास का काम कम होने के बजाय और बढ़ गया है।" यह सुनकर रमा की आँखें खुल गईं और वह घर का सारा काम करने लगी।