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अनुपस्थिति में

सीताराम की अरुणा इकलौती बेटी थी। वह बहुत ही सुशील और सुंदर थी। पास के गाँव के वीरदास से खबर मिली कि उन्हें अपने बेटे जयंत के लिए अरुणा पसंद है। लेकिन वीरदास खुद कैसा है और उसकी परिस्थिति कैसी है, यह जानने के लिए सीताराम उसके गाँव गया। सीताराम ने देखा कि वीरदास संपन्न होने के साथ-साथ सुशिक्षित भी है। गाँव में उसका काफी मान-सम्मान था। उसने सीताराम का उत्तम स्वागत किया और कहा, "मेरे जान-पहचान के कई लोगों से मैंने सुना है कि आपकी अरुणा बहुत अच्छी है। मुझे दहेज वगैरह कुछ नहीं चाहिए। बस शास्त्रोक्त विधि से विवाह संपन्न कराकर बहू को मेरे घर भेज दीजिए, मेरे लिए उतना ही काफी है।" जयंत भी दिखने में होनहार लगा। सीताराम को यह रिश्ता बहुत पसंद आया। गाँव लौटकर उसने घर वालों को सब बताया। तभी शांताराम नाम का एक व्यक्ति कहने लगा, "सुना है वीरदास किसी से कह रहा था कि सीताराम का खानदान दरिद्र है। उसकी बेटी का उद्धार हो जाए, केवल इसीलिए मैं बिना दहेज लिए उसे बहू बनाने को तैयार हुआ हूँ। भला भिखारियों से भी कभी कोई पैसे लेता है क्या?" वह बार-बार सीताराम के परिवार का मजाक उड़ा रहा था! शांताराम की बातें सुनकर सीताराम को बहुत बुरा लगा। उसके पिता रघुराम ने बीच में टोकते हुए कहा, "यूँ ही किसी की बातों पर विश्वास करने के बजाय तुम्हारा खुद जाकर वीरदास से मिलना ही उचित होगा।" सीताराम को उनकी सलाह सही लगी। उसने निश्चय किया कि यदि सुनी हुई बातें सच निकलीं, तो वह रिश्ता तोड़कर वापस आ जाएगा। रास्ते में सीताराम को एक किसान मिला। उस किसान ने अपने खेत का एक हिस्सा वीरदास को सस्ते में बेचा था। लेकिन उसे किसी ने बताया था कि— "वीरदास लोगों से कह रहा था कि वह जमीन बंजर थी और किसान गरीब था, इसलिए उसने वह जमीन खरीदी है। वीरदास की नजर में यह एक तरह का दान ही था!" इसी बारे में बात करने वह किसान वीरदास के पास जा रहा था। सीताराम ने किसान से कहा, "अच्छा हुआ, हम दोनों साथ ही चल रहे हैं।" वे दोनों थोड़ा आगे बढ़े ही थे कि उन्हें अपनी घोड़ागाड़ी ठीक करवाता हुआ एक आदमी दिखा। जब उसकी स्थिति बहुत खराब थी, तब वीरसिंह (वीरदास) ने उसे एक हजार रुपये कर्ज दिए थे। उस पूँजी से उसने शहर में व्यापार किया और बहुत धन कमाया। व्यापारी ने बाद में वीरसिंह को उसकी रकम लौटा दी और हर साल वह उसे कीमती उपहार भी भेजता रहा। पर अब उसने सुना था कि वीरदास उसे 'कृतघ्न' (अहसान फरामोश) कहकर उसकी निंदा करता है। इसी की पूछताछ करने वह भी वीरदास के गाँव निकला था। जब व्यापारी को पता चला कि सीताराम और किसान भी इसी तरह की पूछताछ के लिए वीरसिंह के पास जा रहे हैं, तो उसने कहा, "थोड़ा रुकिए! मेरी गाड़ी अभी ठीक हो जाएगी। हम तीनों गाड़ी से ही साथ चलेंगे।" वे तीनों आगे बढ़े ही थे कि रास्ते में उन्हें एक कवि मिला। वह कहने लगा, "इस वीरदास ने मेरा परिचय एक जमींदार से कराया था। उसकी वजह से मुझे धन और कीर्ति दोनों मिले। पर अब मैंने सुना है कि उसकी तारीफ में मैंने एक भी कविता नहीं लिखी, इसलिए वह मुझसे नाराज है। सच तो यह है कि शुरुआत में मैंने उसके बारे में एक कविता लिखी थी, लेकिन उसे सुनकर उसने कहा था कि— मैं एक साधारण आदमी हूँ और मुझ पर कोई कविता लिखे, मेरी ऐसी योग्यता नहीं है। और आज वही मेरी निंदा कर रहा है! मैं अब उससे जवाब माँगने ही जा रहा हूँ।" अब कवि भी बाकी तीनों के साथ घोड़ागाड़ी में बैठ गया। वीरदास के घर पहुँचते-पहुँचते शाम हो गई। उस समय वीरदास बाहर बरामदे में बैठा किसी से बात कर रहा था। गाड़ी से उतरे चारों लोगों को देखकर उसने बड़े प्रेम से स्वागत किया और कहा, "अरे, आप सबको एक साथ देखकर मुझे बहुत खुशी हुई।" वह उन्हें घर के अंदर ले गया और नौकरों को आज्ञा दी कि— ये चारों मुझे अपने रिश्तेदारों से भी बढ़कर प्रिय हैं, इनके स्वागत-सत्कार में कोई कमी नहीं रहनी चाहिए। उसके चेहरे पर सच्चा प्रेम और पवित्रता देखकर वे चारों चुप हो गए। पर मन में अब भी गुस्सा सुलग रहा था, इसलिए उन्हें घर में सहज महसूस नहीं हो रहा था। तभी चबूतरे पर बैठा दूसरा आदमी वीरदास से बोला, "अरे, तुमने अभी तक मेरी बात पर कोई फैसला नहीं दिया?" "फैसला देने की जरूरत ही क्या है? मैंने एक बार जो जुबान दे दी, सो दे दी। मैं उसे किसी भी हाल में निभाऊँगा! यही मेरा नियम है। मैं अपनी बात से पीछे नहीं हटता," वीरदास ने उत्तर दिया। तब वह आदमी चबूतरे से उतरकर इन चार मेहमानों के पास आया और कहने लगा, "अगर आप इनके अपने हैं, तो जरा इन्हें समझाइए न? मुझ पर इतना उपकार कीजिए।" असल में क्या हुआ है, यह जानने के लिए वे चारों उत्सुक थे। तब वह आदमी बताने लगा— गाँव में वीरदास का एक और घर है। पहले वह उसी घर में रहता था। अमीरी आने पर अब वह इस बड़े घर में रहने लगा है। वह अक्सर शादी-ब्याह में आए मेहमानों को उसी पुराने घर में ठहराता था। पर अब उसका उपयोग कम होने से वह घर सुनसान पड़ा है। सूरज नाम के एक किसान को वह घर खरीदना था। वीरदास ने भी मान लिया कि वह घर उसे सस्ते में दे देगा। सूरज अब पैसे जमा करने में लगा है। उसी गाँव के गणनाय ने सूरज के भाग्य की प्रशंसा की और साथ ही वीरदास की उदारता की भी तारीफ की। तो उल्टा सूरज तिरस्कार से बोला, "हाँ, घर में भूतों का डेरा है। मुफ्त में भी कोई उसे नहीं लेगा। पर मैं ही हूँ जो पैसे देकर उसे खरीद रहा हूँ! इसमें उसकी भलाई कैसी? इसमें न तो मेरा कोई बड़ा भाग्य है और न ही वीरदास की उदारता! मुझे जरूरत थी, मैंने ले लिया, बस बात खत्म!" अब गणनाय कह रहा है कि ऐसे कृतघ्न आदमी को तुम सस्ते में घर क्यों दे रहे हो? उससे अच्छा तो वह घर गणनाय को दे दो, वह उम्र भर वीरदास का ऋणी रहेगा; यहाँ तक कि उसकी पूजा करेगा। पर वीरदास अपनी बात पर अड़ा है। वह किसी भी हाल में अपनी जुबान नहीं तोड़ना चाहता। सीताराम और बाकी तीनों के कुछ बोलने से पहले ही वीरदास बोला, "जब इंसान सामने नहीं होता, तब अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए लोग उसके खिलाफ कई शिकायतें करते हैं, तरह-तरह की मनगढ़ंत कहानियाँ रचते हैं और इंसान की अनुपस्थिति में उसे बुरा साबित करने की कोशिश करते हैं। मैं ऐसी बातों और खबरों पर कभी विश्वास नहीं करता। मेरी नजर में किसी की पीठ पीछे कही गई बातों की कोई कीमत नहीं है। जो सामने घटता है, वही मुख्य है। हाँ, सुनी-सुनाई बातें कभी-कभी सच हो सकती हैं; पर उन पर ध्यान देना और उन पर विश्वास करना मेरा स्वभाव नहीं है। ये मेरे लोग हैं न, ये मेरी ही बात का समर्थन करेंगे। वे कभी भी अपना मत आपके पक्ष में नहीं देंगे, यह समझ लीजिए। अब आप जा सकते हैं।" वीरदास की यह बात सुनकर इन चारों के चेहरे देखने लायक हो गए! अब तक वे केवल वीरदास के बारे में सोच रहे थे, खुद के बारे में नहीं! उन्होंने पहचान लिया कि वीरदास किसी की अनुपस्थिति में उसके बारे में क्या बोलता है, इस पर विश्वास करना गलत है। अब वे भी सोचने लगे कि हमने भी दूसरों की बातों में आकर वीरदास को बुरा क्यों समझा? 'कुछ जरूरी काम है' कहकर सीताराम और बाकी तीनों वहाँ से खिसक गए। वीरदास को समझ नहीं आया कि ये चारों अचानक कैसे आए और बिना कुछ बोले क्यों चले गए। यदि काम इतना जरूरी नहीं था, तो वे आए ही क्यों? इससे वीरदास को बड़ा आश्चर्य हुआ। सीताराम और बाकी तीनों असल में पूछताछ और फैसला करने आए थे। पर अब उन्हें अपनी शंका का जवाब अपने आप मिल गया। अब उल्टा उन्हें वीरदास जैसे सच्चे, ईमानदार और आदर्श व्यक्ति का संबंधी होने पर गर्व महसूस होने लगा। उसके स्वभाव का उन पर बहुत अनुकूल प्रभाव पड़ा। उन्हें समझ आ गया कि किसी की पीठ पीछे कही गई बातों पर विश्वास करना कोरी मूर्खता है। यह आदत बहुत घातक है।