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Chapters
गांधीनामा
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हंगामा है क्यूँ बरपा
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कोई हँस रहा है कोई रो रहा है
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बहसें फ़ुजूल थीं यह खुला हाल देर से
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दिल मेरा जिस से बहलता
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दुनिया में हूँ दुनिया का तलबगार नहीं हूँ
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समझे वही इसको जो हो दीवाना किसी का
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आँखें मुझे तल्वों से वो मलने नहीं देते
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पिंजरे में मुनिया
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उन्हें शौक़-ए-इबादत भी है
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एक बूढ़ा नहीफ़-ओ-खस्ता दराज़
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अरमान मेरे दिल का निकलने नहीं देते
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जो यूं ही लहज़ा लहज़ा दाग़-ए-हसरत की तरक़्क़ी है
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फिर गई आप की दो दिन में तबीयत कैसी
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कहाँ ले जाऊँ दिल दोनों जहाँ में इसकी मुश्किल है
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किस किस अदा से तूने जलवा दिखा के मारा
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कट गई झगड़े में सारी रात वस्ल-ए-यार की
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शक्ल जब बस गई आँखों में तो छुपना कैसा
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दम लबों पर था दिलेज़ार के घबराने से
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जान ही लेने की हिकमत में तरक़्क़ी देखी
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ख़ुशी है सब को कि आप्रेशन में ख़ूब नश्तर चल रहा है
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आपसे बेहद मुहब्बत है मुझे
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हिन्द में तो मज़हबी हालत है अब नागुफ़्ता बेह
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बिठाई जाएंगी पर्दे में बीबियाँ कब तक
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हस्ती के शजर में जो यह चाहो कि चमक जाओ
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तअज्जुब से कहने लगे बाबू साहब
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सूप का शायक़ हूँ यख़नी होगी क्या
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चश्मे-जहाँ से हालते अस्ली छिपी नहीं
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हास्य-रस -एक
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हास्य-रस -दो
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हास्य-रस -तीन
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हास्य-रस -चार
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हास्य-रस -पाँच
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हास्य-रस -छ:
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हास्य-रस -सात
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ख़ुदा के बाब में
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मुस्लिम का मियाँपन सोख़्त करो
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जिस बात को मुफ़ीद समझते हो
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गाँधी तो हमारा भोला है
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मुझे भी दीजिए अख़बार
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शेर कहता है
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बहार आई
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आबे ज़मज़म से कहा मैंने
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शेख़ जी अपनी सी बकते ही रहे
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हाले दिल सुना नहीं सकता
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हो न रंगीन तबीयत
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मौत आई इश्क़ में
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काम कोई मुझे बाकी नहीं
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तहज़ीब के ख़िलाफ़ है
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हम कब शरीक होते हैं
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मुँह देखते हैं हज़रत
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अफ़्सोस है
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ग़म क्या
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उससे तो इस सदी में
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ख़ैर उनको कुछ न आए
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जो हस्रते दिल है
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मायूस कर रहा है
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वो हवा न रही वो चमन न रहा
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सदियों फ़िलासफ़ी की चुनाँ
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जो तुम्हारे लब-ए-जाँ-बख़्श
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जहाँ में हाल मेरा
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हूँ मैं परवाना मगर
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ग़म्ज़ा नहीं होता के
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चर्ख़ से कुछ उम्मीद थी ही नहीं
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हर क़दम कहता है तू आया है जाने के लिए
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