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पसे-मर्ग मेरे मजार पर
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हम तो चलते हैं लो ख़ुदा हाफ़िज़
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कीजे न दस में बैठ कर
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लगता नहीं है जी मेरा
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सुबह रो रो के शाम होती है
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थे कल जो अपने घर में वो महमाँ कहाँ हैं
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वो बेहिसाब जो पी के कल शराब आया
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या मुझे अफ़सर-ए-शाहा न बनाया होता
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जा कहियो उन से नसीम-ए-सहर
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शमशीर बरहना माँग ग़ज़ब बालों
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खुलता नहीं है हाल किसी पर कहे बग़ैर
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हमने दुनिया में आके क्या देखा
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यार था गुलज़ार था बाद-ए-सबा थी
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दिल की मेरी बेक़रारी
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तुम न आये एक दिन
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बात करनी मुझे मुश्किल कभी
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बीच में पर्दा दुई का था जो
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भरी है दिल में जो हसरत
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देख दिल को मेरे ओ काफ़िर
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देखो इन्साँ ख़ाक का पुतला
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गालियाँ तनख़्वाह ठहरी है
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है दिल को जो याद आई
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हम ने तेरी ख़ातिर से दिल-ए-ज़ार
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हम ये तो नहीं कहते के
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हवा में फिरते हो क्या
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हिज्र के हाथ से अब
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इश्क़ तो मुश्किल है ऐ दिल
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इतना न अपने जामे से
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जब कभी दरया में होते
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जब के पहलू में हमारे
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जिगर के टुकड़े हुए जल के
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काफ़िर तुझे अल्लाह ने सूरत
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करेंगे क़स्द हम जिस दम
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ख़्वाह कर इंसाफ़ ज़ालिम ख़्वाह
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क्या कहूँ दिल माइल-ए-ज़ुल्फ़-ए-दोता
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क्या कुछ न किया और हैं क्या
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क्यूँकर न ख़ाक-सार रहें
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क्यूँके हम दुनिया में आए
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मैं हूँ आसी के पुर-ख़ता कुछ हूँ
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मर गए ऐ वाह उन की
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मोहब्बत चाहिए बाहम हमें
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न दाइम ग़म है नै इशरत
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न दरवेशों का ख़िर्क़ा चाहिए
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न दो दुश्नाम हम को
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न उस का भेद यारी से
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नहीं इश्क़ में उस का तो रंज
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निबाह बात का उस हीला-गर
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पान खा कर सुरमा की तहरीर
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क़ारूँ उठा के सर पे सुना
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रुख़ जो ज़ेर-ए-सुंबल-ए-पुर-पेच-ओ-ताब
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सब रंग में उस गुल की
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शाने की हर ज़बाँ से सुने कोई
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तफ़्ता-जानों का इलाज ऐ
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टुकड़े नहीं हैं आँसुओं में दिल के
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वाँ इरादा आज उस क़ातिल के
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वाँ रसाई नहीं तो फिर क्या है
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वाक़िफ़ हैं हम के हज़रत-ए-ग़म
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ये क़िस्सा वो नहीं तुम जिस को
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ज़ुल्फ़ जो रुख़ पर तेरे ऐ
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