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जिस दिल को तुमने देख लिया दिल बना दिया
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कब तक आख़िर मुश्किलाते-शौक़ आसाँ कीजिए
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दिले हजीं की तमन्ना दिले-हजीं में रही
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सोज़ में भी वही इक नग़्मा है जो साज़ में
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जह्ले-ख़िरद ने दिन ये दिखाए
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पाँव उठ सकते नहीं मंज़िले-जानाँ के ख़िलाफ़
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मुमकिन नहीं कि जज़्बा-ए-दिल कारगर न हो
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मोहब्बत की मोहब्बत तक ही जो दुनिया समझते हैं
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अब तो यह भी नहीं रहा अहसास
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ये हुजूमे-ग़म ये अन्दोहो-मुसीबत देखकर
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दिल गया रौनके हयात गई
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निगाहों से छुप कर कहाँ जाइएगा
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दिल को मिटा के दाग़े-तमन्ना दिया मुझे
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इक लफ़्ज़े-मोहब्बत का
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दिल में किसी के राह
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दुनिया के सितम याद ना
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हर दम दुआएँ देना
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हर सू दिखाई देते हैं वो जलवागर मुझे
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दर्द बढ कर फुगाँ ना हो जाये
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लाख बलाये एक नशेमन
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ये सब्जमंद-ए-चमन है
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जान कर मिन-जुमला-ऐ-खासाना-ऐ-मैखाना मुझे
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तेरी खुशी से अगर गम में भी खुशी न हुई
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याद
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साक़ी की हर निगाह पे बल खा के पी गया
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कहाँ से बढ़कर पहुँचे हैं
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काम आखि़र जज्बा-ए-बेइख्तियार आ ही गया
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कोई ये कहदे गुलशन गुलशन
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तबीयत इन दिनों बेगा़ना-ए-ग़म होती जाती है
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वो काफ़िर आशना ना आश्ना यूँ भी है
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आदमी आदमी से मिलता है
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आँखों में बस के दिल में समा कर चले गये
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दिल में तुम हो नज़्अ का हंगाम है
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इश्क़ लामहदूद जब तक रहनुमा होता नहीं
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हाँ किस को है मयस्सर ये काम कर गुज़रना
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इस इश्क़ के हाथों से हर-गिज़ नामाफ़र देखा
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इश्क़ फ़ना का नाम है इश्क़ में ज़िन्दगी न देख
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हमको मिटा सके ये ज़माने में दम नहीं
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इश्क़ की दास्तान है प्यारे
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इश्क़ को बे-नक़ाब होना था
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कहाँ वो शोख़, मुलाक़ात ख़ुद से भी न हुई
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कभी शाख़-ओ-सब्ज़-ओ-बर्ग पर
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इश्क़ में लाजवाब हैं हम लोग
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मुद्दत में वो फिर ताज़ा मुलाक़ात का आलम
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इसी चमन में ही हमारा भी इक ज़माना था
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दिल को जब दिल से राह होती है
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कुछ इस अदा से आज वो पहलू-नशीं रहे
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नियाज़-ओ-नाज़ के झगड़े मिटाये जाते हैं
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मुझे दे रहें हैं तसल्लियाँ वो हर एक ताज़ा
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साक़ी पर इल्ज़ाम न आये
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ओस पदे बहार पर आग लगे कनार में
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बुझी हुई शमा का धुआँ हूँ
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बराबर से बचकर गुज़र जाने वाले
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दास्तान-ए-ग़म-ए-दिल उनको सुनाई न गई
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तुझी से इब्तदा है तू ही इक दिन इंतहा होगा
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शायर-ए-फ़ितरत हूँ मैं जब फ़िक्र फ़र्माता हूँ मैं
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अगर न ज़ोहरा जबीनों के दरमियाँ गुज़रे
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आ कि तुझ बिन इस तरह ऐ दोस्त! घबराता हूँ मैं
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ज़र्रों से बातें करते हैं दीवारोदर से हम
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वो अदाए-दिलबरी हो कि नवाए-आशिक़ाना
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न जाँ दिल बनेगी न दिल जान होगा
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दिल को सुकून रूह को आराम आ गया
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न ताबे-मस्ती न होशे-हस्ती कि शुक्रे-नेमत अदा करेंगे
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अल्लाह अगर तौफ़ीक़ न दे इंसान के बस का काम नहीं
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मोहब्बत में क्या-क्या मुक़ाम आ रहे हैं
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यादे-जानाँ भी अजब रूह-फ़ज़ा आती है
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आँखों का था क़ुसूर न दिल का क़ुसूर था
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मरके भी कब तक निगाहे-शौक़ को रुसवा करें
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यही है सबसे बढ़कर महरमे-असरार हो जाना
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फ़ुर्सत कहाँ कि छेड़ करें आसमाँ से हम
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हर इक सूरत हर इक तस्वीर मुबहम होती जाती है
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निगाहों का मर्कज़ बना जा रहा हूँ
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साक़ी से ख़िताब(एक नज़्म)
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