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Chapters
तराना-ए-हिन्दी (सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोसिताँ हमारा)
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लबरेज़ है शराब-ए-हक़ीक़त
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जवाब-ए-शिकवा
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आम मशरिक़ के मुसलमानों का दिल मगरिब में जा अटका है
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हर मुक़ाम से आगे मुक़ाम है तेरा
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जिस खेत से दहक़ाँ को मयस्सर नहीं रोज़ी
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असर करे न करे सुन तो ले मेरी फ़रियाद
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अगर कज-रौ हैं अंजुम आसमाँ तेरा है या मेरा
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एक आरज़ू
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उक़ाबी शान से झपटे थे जो बे-बालो-पर निकले
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सख़्तियाँ करता हूँ दिल पर ग़ैर से ग़ाफ़िल हूँ मैं
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परीशाँ हो के मेरी ख़ाक आख़िर दिल न बन जाए
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है कलेजा फ़िग़ार होने को
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अक़्ल ने एक दिन ये दिल से कहा
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नसीहत
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ख़ुदी में डूबने वालों
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लेकिन मुझे पैदा किया उस देस में तूने
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सफ़र कर न सका
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हिमाला
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ख़ुदा के बन्दे तो हैं हज़ारों बनो में फिरते हैं मारे-मारे
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फिर चराग़े-लाला से रौशन हुए कोहो-दमन
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न आते हमें इसमें तकरार क्या थी
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आता है याद मुझ को गुज़रा हुआ ज़माना
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अजब वाइज़ की दींदारी है या रब
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गुलज़ार-ए-हस्त-ओ-बू न बेगानावार देख
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कभी ऐ हक़ीक़त-ए- मुन्तज़र नज़र आ लिबास-ए-मजाज़ में
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गेसू-ए- ताबदार को और भी ताबदार कर
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हम मश्रिक़ के मुसलमानों का दिल
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जिन्हें मैं ढूँढता था आसमानों में ज़मीनों में
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ख़िरद के पास ख़बर के सिवा कुछ और नहीं
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ख़ुदा का फ़रमान
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लब पे आती है दुआ बन के तमन्ना मेरी
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चमक तेरी अयाँ बिजली में आतिश में शरारे में
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ख़िरदमंदों से क्या पूछूँ कि मेरी इब्तिदा क्या है
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जब इश्क़ सताता है आदाबे-ख़ुदागाही
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क्या कहूँ अपने चमन से मैं जुदा क्योंकर हुआ
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अनोखी वज़्अ है सारे ज़माने से निराले हैं
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मजनूँ ने शहर छोड़ा है सहरा भी छोड़ दे
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मुहब्बत का जुनूँ बाक़ी नहीं है
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नहीं मिन्नत-कश-ए-ताब-ए-शनीदन दास्ताँ मेरी
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नया शिवाला
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सितारों से आगे जहाँ और भी हैं
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तेरे इश्क़ की इन्तहा चाहता हूँ
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तू अभी रहगुज़र में है
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ज़मीं-ओ-आसमाँ मुमकिन है
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हकी़क़ते-हुस्न
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साक़ी
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परवाना और जुगनू
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जमहूरियत
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राम
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बच्चों की दुआ
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जुगनू
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गुलज़ारे-हस्ती-बूद न बेगानावार देख
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तिरे इश्क की इंतहा चाहता हूँ
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सच कह दूँ ऐ ब्रह्मन गर तू बुरा न माने
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न तू ज़मीं के लिए है न आसमाँ के लिए
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दयारे-इश्क़ में अपना मुक़ाम पैदा कर
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मुझे आहो-फ़ुगाने-नीमशब का
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ये पयाम दे गई है मुझे
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सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा
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चमने-ख़ार-ख़ार है दुनिया
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जुदाई
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मेरी निगाह में है मोजज़ात की दुनिया
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लहू
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अपनी जौलाँ-गाह ज़ेर-ए-आसमाँ समझा
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दिल सोज़ से ख़ाली है निगह पाक नहीं है
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फ़ितरत को ख़िरद के रू-ब-रू कर
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हादसा वो जो अभी पर्दा-ए-अफ़लाक में है
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ख़ुदी की शोख़ी ओ तुंदी में किब्र ओ नाज़ नहीं
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मकतबों में कहीं रानाई-ए-अफ़कार भी है
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मता-ए-बे-बहा है दर्द-ओ-सोज़-ए-आरज़ू-मंदी
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मेरी नवा-ए-शौक़ से शोर हरीम-ए-ज़ात में
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न तख़्त ओ ताज में ने लश्कर ओ सिपाह
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परेशाँ हो के मेरी ख़ाक आख़िर दिल न बन जाए
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तू ऐ असीर-ए-मकाँ ला-मकाँ से दूर नहीं
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वहीं मेरी कम-नसीबी वही तेरी बे-नियाज़ी
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वो हर्फ़-ए-राज़ के मुझ को सिखा गया है जुनूँ
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ज़मिस्तानी हवा में गरचे थी शमशीर की तेज़ी
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मेरा वतन वही है
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