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मुमकिन नहीं कि तेरी मुहब्बत की बू न हो
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रू-ए- अनवर नहीं देखा जाता
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ले चला जान मेरी रूठ के जाना तेरा
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आफत की शोख़ियां हैं
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न बदले आदमी जन्नत से भी बैतुल-हज़न अपना
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रंज की जब गुफ्तगू होने लगी
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दिल को क्या हो गया ख़ुदा जाने
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अजब अपना हाल होता जो विसाल-ए-यार होता
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उज्र् आने में भी है और बुलाते भी नहीं
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दिल गया तुम ने लिया हम क्या करें
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डरते हैं चश्म-ओ-ज़ुल्फ़, निगाह-ओ-अदा से हम
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फिरे राह से वो यहां आते आते
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काबे की है हवस कभी कू-ए-बुतां की है
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लुत्फ़ इश्क़ में पाए हैं कि जी जानता है
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पुकारती है ख़ामोशी मेरी फ़ुगां की तरह
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ख़ातिर से या लिहाज़ से मैं मान तो गया
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उनके एक जां-निसार हम भी हैं
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ग़ज़ब किया, तेरे वादे पे ऐतबार किया
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रस्म-ए-उल्फ़त सिखा गया कोई
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इस अदा से वो वफ़ा करते हैं
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पर्दे-पर्दे में आताब अच्छे नहीं
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न जाओ हाल-ए-दिल-ए-ज़ार देखते जाओ
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कहाँ थे रात को हमसे ज़रा निगाह मिले
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मेरे क़ाबू में न पहरों दिल-ए-नाशाद आया
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मुहब्बत में करे क्या कुछ किसी से हो नहीं सकता
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हर बार मांगती है नया चश्म-ए-यार दिल
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ग़म से कहीं नजात मिले चैन पाएं हम
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सितम ही करना जफ़ा ही करना
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आरजू है वफ़ा करे कोई
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जवानी गुज़र गयी
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बुतान-ए-माहवश उजड़ी हुई मंज़िल में रहते हैं
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फिर शब-ए-ग़म ने मुझे शक्ल दिखाई क्योंकर
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न रवा कहिये न सज़ा कहिये
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हम तुझसे किस हवस की फलक जुस्तुजू करें
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अच्छी सूरत पे
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हसरतें ले गए
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हुस्न-ए-अदा भी खूबी-ए-सीरत में चाहिए
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क्या लुत्फ़-ए-सितम यूँ उन्हें हासिल नहीं होता
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क्यों चुराते हो देखकर आँखें
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तेरी महफ़िल में यह कसरत कभी थी
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शौक़ है उसको ख़ुदनुमाई का
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ये जो है हुक़्म मेरे पास न आए कोई
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दर्द बन के दिल में आना , कोई तुम से सीख जाए
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ज़बाँ हिलाओ तो हो जाए,फ़ैसला दिल का
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