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आए हैं मीर मुँह को बनाए
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कहा मैंने
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बेखुदी ले गयी
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अपने तड़पने की
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हस्ती अपनी होबाब की सी है
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फ़कीराना आए सदा कर चले
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बेखुदी कहाँ ले गई हमको
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अश्क आंखों में कब नहीं आता
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गम रहा जब तक कि दम में दम रहा
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देख तो दिल कि जाँ से उठता है
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दिल-ऐ-पुर खूँ की इक गुलाबी से
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था मुस्तेआर हुस्न से उसके जो नूर था
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इधर से अब्र उठकर जो गया है
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जीते-जी कूचा-ऐ-दिलदार से जाया न गया
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जो इस शोर से 'मीर' रोता रहेगा
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इब्तिदा-ऐ-इश्क है रोता है क्या
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पत्ता पत्ता बूटा बूटा हाल हमारा जाने है
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उलटी हो गई सब तदबीरें, कुछ न दवा ने काम किया
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न सोचा न समझा न सीखा न जाना
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दिल की बात कही नहीं जाती, चुप के रहना ठाना है
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दम-ए-सुबह बज़्म-ए-ख़ुश जहाँ शब-ए-ग़म
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गुल को महबूब में क़यास किया
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होती है अगर्चे कहने से यारों पराई बात
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इस अहद में इलाही मोहब्बत को क्या हुआ
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जो तू ही सनम हम से बेज़ार होगा
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काबे में जाँबलब थे हम दूरी-ए-बुताँ से
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मानिंद-ए-शमा मजलिस-ए-शब अश्कबार पाया
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मिलो इन दिनों हमसे इक रात जानी
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मुँह तका ही करे है जिस-तिस का
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शब को वो पीए शराब निकला
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तुम नहीं फ़ितना-साज़ सच साहब
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क्या कहूँ तुम से मैं के क्या है इश्क़
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आँखों में जी मेरा है इधर यार देखना
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सहर गह-ए-ईद में दौर-ए-सुबू था
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जिस सर को ग़रूर आज है याँ ताजवरी का
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महर की तुझसे तवक़्क़ो थी सितमगर निकला
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बारहा गोर दिल झुका लाया
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आ जायें हम नज़र जो कोई दम बहुत है याँ
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बात क्या आदमी की बन आई
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कोफ़्त से जान लब पर आई है
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मेरे संग-ए-मज़ार पर फ़रहाद
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ब-रंग-ए-बू-ए-गुल, इस बाग़ के हम आश्ना होते
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मीर दरिया है, सुने शेर ज़बानी उस की
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यार बिन तल्ख़ ज़िंदगनी थी
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शिकवा करूँ मैं कब तक उस अपने मेहरबाँ का
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अब जो इक हसरत-ए-जवानी है
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शेर के पर्दे में मैं ने ग़म सुनाया है बहुत
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चलते हो तो चमन को चलिये
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दुश्मनी हमसे की ज़माने ने
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यारो मुझे मुआफ़ करो मैं नशे में हूँ
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दिल से शौक़-ए-रुख़-ए-निको न गया
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आरज़ूएं हज़ार रखते हैं
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रही नगुफ़्ता मेरे दिल में दास्ताँ मेरी
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अंदोह से हुई न रिहाई तमाम शब
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इश्क़ में जी को सब्र-ओ-ताब कहाँ
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हम जानते तो इश्क न करते किसू के साथ
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यही इश्क़ ही जी खपा जानता है
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नाला जब गर्मकार होता है
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उम्र भर हम रहे शराबी से
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मसाइब और थे पर दिल का जाना
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नहीं विश्वास जी गँवाने के
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बेकली बेख़ुदी कुछ आज नहीं
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क़द्र रखती न थी मता-ए-दिल
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राहे-दूरे-इश्क़ से रोता है क्या
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मामूर शराबों से कबाबों से है सब देर
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मरते हैं हम तो आदम-ए-ख़ाकी की शान पर
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कुछ करो फ़िक्र मुझ दीवाने की
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हमारे आगे तेरा जब किसी ने नाम लिया
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आ के सज्जाद
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दिखाई दिये यूँ कि बेख़ुद किया
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ज़ख्म झेले दाग़ भी खाए बोहत
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न दिमाग है कि किसू से हम
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हर जी का हयात है
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चुनिन्दा अश्आर- भाग एक
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चुनिन्दा अश्आर- भाग दो
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चुनिन्दा अश्आर- भाग तीन
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चुनिन्दा अश्आर- भाग चार
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चुनिन्दा अश्आर- भाग पाँच
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चाक करना है इसी ग़म से
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गुल ब बुलबुल बहार में देखा
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अए हम-सफ़र न आब्ले
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