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दरस म्हारे बेगि दीज्यो जी
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मोहन गिरवरधारीको म्हारो प्रणाम
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मीरा शरण गही चरणन की लाज रखो महाराज
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मीरा के प्रभु गिरधर नागर काटो जम का फंदा
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दूर नगरी बड़ी दूर नगरी-नगरी कैसे आऊं मैं तेरी गोकुल नगरी
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आज मोहिं लागे वृन्दावन नीको
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पायो जी म्हे तो राम रतन धन पायो
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राणोजी रूठे तो म्हारो कांई करसी म्हे तो गोविन्दरा गुण गास्यां हे माय
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तेरो कोई नहिं रोकणहार मगन हो मीरा चली
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मैं गिरधर के घर जाऊं
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स्याम मने चाकर राखो जी गिरधारी लाला चाकर राखो जी
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सहेलियां साजन घर आया हो
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हे मेरो मनमोहना आयो नहीं सखी री
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गोबिन्द कबहुं मिलै पिया मेरा
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