शबनम ब-गुल-ए-लाला न ख़ाली ज़-अदा है

शबनम ब-गुल-ए-लाला[1] न ख़ाली ज़-अदा[2] है
दाग़-ए-दिल-ए-बेदरद नज़र-गाह-ए-हया है[3]

दिल ख़ूं-शुदा-ए[4] कशमकश-ए-हसरत-ए-दीदार
आईना ब दस्त-ए बुत-ए बद-मसत हिना है[5]

शोले से न होती हवस-ए-शोला ने जो की
जी[6] किस क़दर अफ़सुर्दगी-ए-दिल पे जला है

तिम्साल[7] में तेरी है वह शोख़ी कि ब सद-ज़ौक़
आईना, ब अनदाज़-ए-गुल[8] आग़ोश-कुशा है

क़ुमरी[9] कफ़-ए-ख़ाकसतर[10]-ओ-बुलबुल क़फ़स-ए-रंग[11]
ऐ नाला, निशान-ए जिगर-ए सोख़ता[12] क्या है?

ख़ू[13] ने तेरी अफ़सुर्दा[14] किया वहशत-ए दिल को
माशूक़ी-ओ-बे-हौसलगी तुरफ़ा[15] बला है

मजबूरी-ओ-दावा-ए गिरफ़्तारी-ए-उल्फ़त
दसत-ए-तह-ए-संग-आमद[16] पैमान-ए-वफ़ा है

मालूम हुआ हाल-ए-शहीदान-ए, गुज़िश्ता[17]
तेग़-ए सितम[18] आईना-ए-तस्वीर-नुमा[19] है

ऐ परतव-ए-ख़ुरशीद-ए-जहां-ताब[20], इधर भी
साये की तरह हम पे अ़जब वक़्त पड़ा है

ना-करदा[21] गुनाहों की भी हसरत की मिले दाद
या रब! अगर इन करदा गुनाहों की सज़ा है

बेगानगी-ए ख़ल्क़[22] से बेदिल न हो 'ग़ालिब'
कोई नहीं तेरा तो मेरी जान ख़ुदा है

शब्दार्थ: