जिस जख़्म की हो सकती हो तदबीर रफ़ू की

जिस ज़ख़्म की हो सकती हो तदबीर[1] रफ़ू[2] की
लिख दीजियो, या रब उसे ! क़िस्मत में अ़दू[3] की

अच्छा है सर-अनगुश्त-ए-हिनाई[4] का तसव्वुर[5]
दिल में नज़र आती तो है, इक बूंद लहू की

क्यों डरते हो उ़शशाक़[6] की बे-हौसलगी से
यां[7] तो कोई सुनता नहीं फ़रियाद किसू[8] की

दश्ने[9] ने कभी मुंह न लगाया हो जिगर को
ख़ंज़र ने कभी बात न पूछी हो गुलू[10] की

सद हैफ़[11] ! वह ना-काम, कि इक उ़मर से ग़ालिब
हसरत में रहे एक बुत-ए-अ़रबदा-जू[12] की

--एक अनछपी पंक्ति--

गो ज़िंदगी-ए-ज़ाहिद-ए[13]-बे-चारा अ़बस[14] है
इतना है कि रहती तो है तदबीर वुज़ू[15] की

शब्दार्थ:
  1. संभावना
  2. सिल कर ठीक करना
  3. दुशमन
  4. मेंहदी लगी अंगुली के सिरा
  5. विचार, खयाल
  6. आशिकों
  7. यहाँ
  8. किसी
  9. चाकू
  10. गरदन
  11. बहुत अफसोस
  12. झगड़ालू प्रेयसी
  13. धार्मिक उपदेशक
  14. निरर्थक
  15. स्नान