शिकवे के नाम से बेमेहर ख़फ़ा होता है

शिकवे के नाम से बेमेहर[1] ख़फ़ा होता है
ये भी मत कह, कि जो कहिये, तो गिला होता है

पुर[2] हूँ मैं शिकवा से यूँ, राग से जैसे बाजा
इक ज़रा छेड़िये, फिर देखिये क्या होता है

गो समझता नहीं पर हुस्ने-तलाफ़ी[3] देखो!
शिकवा-ए-ज़ौर[4] से सरगर्म-ए-जफ़ा[5] होता है

इश्क़ की राह में है, चर्ख़-ए-मकौकब[6] की वो चाल
सुस्त-रौ[7] जैसे कोई आबला-पा[8] होता है

क्यूँ न ठहरें हदफ़-ए-नावक-ए-बेदाद[9] कि हम
आप उठा लाते हैं गर तीर ख़ता[10] होता है

ख़ूद[11] था, पहले से होते जो हम अपने बदख़्वाह[12]
कि भला चाहते हैं, और बुरा होता है

नाला[13] जाता था, परे अ़र्श से मेरा, और अब
लब तक आता है जो ऐसा ही रसा होता है

ख़ामा[14] मेरा, कि वह है बारबुद-ए-बज़्म-ए-सुख़न[15]
शाह की मदह[16] में यूं नग़्मा-सरा[17] होता है

ऐ शहनशाह-ए-कवाकिब सिपह-ओ-मिहर-`अलम[18]
तेरे इकराम[19] का हक़ किस से अदा होता है

सात इक़्लीम[20] का हासिल[21] जो फ़राहम[22] कीजे
तो वह लश्कर[23] का तेरे, नाल-बहा[24] होता है

हर महीने में जो यह बदर[25] से होता है हिलाल[26]
आस्तां[27] पर तेरे यह नासिया-सा[28] होता है

मैं जो गुस्ताख़ हूं आईना-ए-ग़ज़ल-ख़्वानी[29] में
यह भी तेरा ही करम ज़ौक़-फ़िज़ा[30] होता है

रखियो 'ग़ालिब' मुझे इस तल्ख़-नवाई[31] से मु`आफ़
आज कुछ दर्द मेरे दिल में सिवा[32] होता है

शब्दार्थ: