महरम नहीं है तू ही नवाहाए-राज़ का
महरम[1] नहीं है तू ही नवा-हाए-राज़[2] का
याँ वरना जो हिजाब[3] है, पर्दा है साज़ का
रंगे-शिकस्ता[4] सुबहे-बहारे-नज़ारा है
ये वक़्त है शुगुफ़तने-गुल-हाए-नाज़[5] का
तू, और सू-ए-ग़ैर[6] नज़र-हाए तेज़-तेज़
मैं, और दुख तेरी मिज़गां-हाए-दराज़[7] का
सरफ़ा[8] है ज़ब्ते-आह में मेरा, वगरना मैं
तोअ़मा[9] हूँ एक ही नफ़से-जां-गुदाज़[10] का
हैं बस कि जोशे-बादा[11] से शीशे उछल रहे
हर गोशा-ए-बिसात[12] है सर शीशा-बाज़[13] का
काविश[14] का दिल करे है तक़ाज़ा कि है हनूज़[15]
नाख़ुन पे क़रज़ इस गिरहे-नीम-बाज़[16] का
ताराज-ए-काविशे-ग़मे-हिजरां [17] हुआ 'असद'
सीना, कि था दफ़ीना-ए-गुहर-हाए-राज़[18] का
शब्दार्थ: