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षष्ठम अध्याय

अर्थादिविचार प्रकरण

श्लोक-1. अर्थानाचर्यमाणाननर्था अप्यनद्भवन्त्यनुबंधाः संशयाश्च।।1।।

अर्थः धनोपार्जन के लिए कोशिश करती हुई वेश्याओं को कई प्रकार के अनर्थ अनुभव और संशयों का सामना करना पड़ता है।

श्लोक-2. ते बुद्धिदौर्बल्यादतिरागादत्यभिमानादतिदम्भादत्यार्जवा-दतिविश्चासादति-क्रोधात्प्रमादात्साहमाद्दैवयोगाश्च स्युः।।2।।

अर्थः वे अनर्थ उनके अनुबंध तथा संशय, बेवकूफी से अधिक प्रेम करने से, अधिक गर्व करने से, निहायत आसानी से, अधिक यकीन करने से, अधिक गुस्सा करने से, प्रमाद से, बिना सोचे-समझे काम करने से तथा देवयोग से वेश्याओं पर टूट पड़ते हैं।

श्लोक-3. तेषां फलं कृतस्य व्ययस्य निष्फलत्वमनायतिरागमिष्यतोऽर्थस्य निवर्तन माप्तस्य निष्क्रमणं पारुष्यस्य प्राप्तिर्गम्यता शरीरस्य प्रघातः केशानां छेदनं पातनमंगवैकल्यापत्तिः।।3।।

अर्थः इनके बुरे परिणाम ये निकलते हैं- चिकित्सा आदि में खर्च किया धन बेकार हो जाता है। नायक पर प्रभाव भी नहीं रह जाता है। तो धन प्राप्त होता है वह भी नहीं मिलता तथा संक्षिप्त धन भी निकल जाता है। अक्सर आपस में कलह के कारण मृत्यु भी हो जाती है। या गुस्से में आया हुआ प्रेमी बालों को पकड़कर वेश्या को नीचे गिराकर मारता है और हाथ-पैरों को तोड़ देता है।

श्लोक-4. तस्मात्तानादित एव परिजिहीर्षेदर्थभूयिष्ठांश्चोपेक्षेत्।।4।।

अर्थः इस कारण से वेश्या को चाहिए कि आरम्भ से ही बेवकूफी आदि को दूर करने की कोशिश करें।

श्लोक-5. अर्थो धर्मः काम इत्यर्थत्रिवर्गः।।5।।

अर्थः अर्थ, धर्म तथा काम यह अर्थ त्रिवर्ग है।

श्लोक-6. अनर्थोऽधर्मो द्वेष इत्यनर्थत्रिवर्णः।।6।।

अर्थः अनर्थ, अधर्म तथा ईर्ष्या- यह अनर्थ त्रिवर्ग है।

श्लोक-7. तेष्वाचर्यमाणेष्वन्यस्यापि निष्पत्तिरनुबंधः।।7।।

अर्थः अर्थ आदि छहो को सिद्ध हो जाने पर उसके साथ दूसरा भी स्वतः साबित हो जाता है वह अनुबंध है।

श्लोक-8. संदिग्धायां तु फलप्राप्तौ स्याद्वा न वेति शुद्धसंशयः।।8।।

अर्थः यह होगा या नहीं इस तरह के फल नें संदेह होना शुद्ध संशय है।

श्लोक-9. इर्द वा स्यादिदं वेति संकीर्णः।।19।।

अर्थः यह फल होगा या वह फल होगा- यह संकीर्ण संदेह है।

श्लोक-10. एकस्मिन् क्रियमाणे कार्ये कार्यद्वयस्योत्पत्तिरुभयतोयोगः।।10।।

अर्थः यह कार्य करते हुए दूसरे कार्य की उत्पत्ति हो जाए तो वह उभय योग कहलाता है।

श्लोक-11. समन्तादुत्पत्तिः समन्ततोयोग इति तानदाहरिष्यामिः।।11।।

अर्थः चारों ओर से उत्पत्ति हो तो यह समन्वत योग है। इन सभी के उदाहरण आगे दिये जाएंगे।

श्लोक-12. विचारितरूपोऽर्थत्रिवर्णः। तद्विपरीत एवानर्थत्रिवर्गः।।12।।

अर्थः जिसके स्वरूप का विचार किया जा चुका है वह अर्थ त्रिवर्ग है, उसी के विपरीत अनर्थ त्रिवर्ग है।

श्लोक-13. यस्योत्तमस्याभिगमने प्रत्यक्षतोऽर्थलाभो ग्रहणीयत्वमायतिरागमः प्रार्थनीयत्वं चान्येषां स्यात्सोऽर्थोऽर्थानुबंधः।।13।।

अर्थः प्रेमी के सभी गुणों से युक्त उत्तम नायक के साथ सेक्स करने से वेश्या को शीघ्र ही उससे धन की प्राप्ति होती है। इस कारण से वह वेश्या दूसरों के लिए आकर्षक चीज बन जाती है। इससे उसका प्रभाव बढ़ जाता है। उससे सेक्स करने के लिए लोग प्रार्थना करते हैं। इस तरह का अर्थ दूसरे तरह के अर्थों से संबंधित होने से अर्थानुबंध होता है।

श्लोक-14. लाभमात्रे कस्यचिदन्यस्य गमनं सोऽर्थो निरनुबंधः14।।

अर्थः लाभ की दृष्टि से किसी भी सेक्स करना अनुबंध रहित अर्थात् निरनुबन्ध है।

श्लोक-15. अन्यार्थपरिग्रहे सक्तादायतिच्छेदनमर्थस्य निष्क्रमणं लोकविद्विष्टस्य वा नीचस्य गमनमायतिघ्न मर्थोऽनर्थानुबंधः।।15।।

अर्थः जो निर्धन प्रेमी दूसरे का धन अपहरण करके वेश्या को दे देता है। तो ऐसा धन लेने से वेश्या का प्रभाव घटता है तथा वह धन निकल भी जाता है। अथवा लोकद्रोही या नीच के साथ सेक्स करने से भी प्रभाव घट जाता है। ऐसा अर्थ-अनर्थ उत्पन्न करता है। इसीलिए इसे अर्थोऽनर्थानुबंध कहते हैं।

श्लोक-16. स्वेन व्ययेन शूरस्य महामात्रस्य प्रभवतो वा लुब्धस्य गमनं निष्फलमपि

अर्थः किसी शूर-वीर अथवा प्रभावशाली, लोभी या राजमंत्री के लिए स्वयं खर्च करने पर भी प्रयोजन सिद्ध न हो तो तब भी मौके पर संकटों, अनर्थों के प्रतिकार के लिए और लोगों में प्रभाव जमाने के लिए वह मिलना लाभदायक होता है। एक प्रयोजन के न सिद्ध होने पर भी दूसरा प्रयोजन तो सिद्ध हो ही जाता है।

श्लोक-17. कदर्यस्य सुभगमानिनः कृतघ्नस्य वातिसंधानशीलस्य स्वैरपि व्ययैस्तथाराधनमंते निष्फलं सोऽनर्थों निरनुबंधः।।17।।

अर्थः स्वयं को खूबसूरत समझने वाले दुराचारी, कृतघ्न प्रेमी से जब वेश्या अपना धन खर्च कर काफी खुशामद करके सेक्स कराती है तो उसका धन तथा अनुराग निष्फल हो जाता है। ऐसा धन अनर्थोनिरनुबंध होता है।

श्लोक-18. तस्यैव राजवल्लभस्य क्रौर्यप्रभावाधिकस्य तथैवाराधनमंते निष्फलं निष्कासनं च दोषकरं सोऽनर्थानुबंधः।।18।।

अर्थः उसी प्रकार क्रूर राजपुरुष अथवा राज्याधिकारी के साथ सेक्स करना भी निष्फल होता है तथा उसे निकाल देना भी काफी बड़ी गलती है। इसलिए दूसरे अनर्थों को साथ लिए यह अनर्थोऽनुबंध है।

श्लोक-19. एवं धर्मकामयोस्प्युनबंधान्योजयेत्।।19।।

अर्थः इस तरह धर्म तथा काम के अनुबंधों की योजना बना लेनी चाहिए।

श्लोक-20. परस्परेण च युक्तया संकिरेदेत्यनुबंधाः।।20।।

अर्थः इन्हें आपस में युक्तिपूर्वक मिलना चाहिए। ये अनुबंध पूरे होते हैं।

श्लोक-21. परितोषितोऽपि दास्यति न वेत्यर्थसंशयः।।21।।

अर्थः राजी हो जाने के बाद भी देगा अथवा नहीं, इस तरह के संदेश को अर्थसंशय के नाम से जाना जाता है।

श्लोक-22. निष्पीडितार्थमफलमुत्सृजन्त्या अर्थमलभमानाया धर्मः स्यात्र वेति धर्मसंशयः।।22।।

अर्थः वेश्या ने जिस प्रेमी को अपने जाल में फंसाकर सारा धन ले लिया हो और उससे धन न मिलने से उसे त्याग देने को उद्यत हो तो उसका इस प्रकार त्याग करना वेश्या का धर्म होगा अथवा नहीं।

श्लोक-23. अभिप्रेतमुपलभ्य परिचारकमन्यं वा क्षुद्रं गत्वा कामः स्यात्र वेति कामसंशयः।।23।।

अर्थः इच्छित प्रेमी को पाकर वेश्या जब आत्मीय सेवक अथवा किसी निम्न व्यक्ति के पास जाकर यह शक करती है कि काम होगा अथवा नहीं, वेश्या का यही सोचना काम-संशय है।

श्लोक-24. प्रभावान् क्षुद्रोऽनभिगतोऽनर्थं करिष्यति न वेत्यनर्थसंशयः।।24।।

अर्थः प्रभावशाली नीच-संभोग न होने पर अनर्थ करेगा अथवा नहीं। यह अनर्थसंशय है।

श्लोक-25. अत्यंतनिष्फलः सक्तः परित्यक्तः पितृलोकं यातात्तत्राधर्मः स्यात्र वेत्यधर्मसंशयः।।25।।

अर्थः सेक्स करने के लिए इच्छुक धनहीन प्रेमी को सारहीन समझकर छोड़ देना चाहिए। फिर यह न सोचना कि कभी वह वियोगी मर जाएगा तो अधर्म होगा। अथवा नहीं- इस प्रकार सोचना अधर्मसंशय है।

श्लोक-26. रागस्यापि विवक्षायामभिप्रेतमनुपलभ्य विरागः स्यात्र वेति द्वेषसंशयः। इति शुद्धसंशयाः।।26।।

अर्थः सेक्स क्रिया से दुःखी वेश्या अपने मनचाहे प्रेमी को न पाकर अपनी काम-व्यथा की शक्ति के लिए जब तड़पती है तो उस समय उसे विरोग होना अथवा नहीं यही द्वेष का संशय है। शुद्ध संशय समाप्त होते हैं।

श्लोक-27. अर्थ संकीर्णः।।27।।

अर्थः इसके अंतर्गत संकीर्ण संशय कहते जाते हैं।

श्लोक-28. आगंतोरविदितशलस्य वल्लभसंश्रयस्य प्रभविष्णोर्वा समुपरिस्थितस्याराधनमर्थोऽनर्थ इति संशयः।।28।।

अर्थः आश्रित प्रेमी अथवा प्रभावशाली प्रेमी की उपस्थिति में यदि अपरिचित व्यक्ति मिलने के लिए आता है तो वेश्या के सामने संशय की स्थिति होती है कि वह उस व्यक्ति से सेक्स करे अथवा न करे।

श्लोक-29. श्रोत्रियस्य ब्रह्मचारिणो दीक्षितस्य व्रतिनो लिंगिनो वा मां दृष्टा जातारागस्य मुमूर्षोर्मित्रवाक्यादाननृशंस्याश्च गमनं धर्मोंऽधर्म इति संशयः।।29।।

अर्थः प्रेमिका को देखकर श्रेयित्र, ब्रह्मचारी, दीक्षित, व्रती, साधु-संयासी अथवा मरने की इच्छा रखने वाले लोगों के साथ दोस्तों के कहने पर अथवा अपनी दयालुता के कारण से सेक्स करना धर्म होगा अथवा अधर्म- यह संदेह धर्माधर्म संकीर्ण है।

श्लोक-30. लोकादेवाकृतप्रत्ययादगुणो गुणवान्वेत्यनवेक्ष्य गमनं कामोद्वेष इति संशयः।।30।।

अर्थः प्रेमी के गुण, अवगुण पर खुद कोई विचार न करके सिर्फ लोगों से सुनकर कि यह गुणवान है- प्रेमिका उससे जब संभोग करती है तो उसे शक उत्पन्न होता है कि इस तरह का समागम कार्य होगा अथवा द्वेष- इस शक को कामद्वेष संकीर्ण संशय कहते हैं।

श्लोक-31. संकिरेच्च परस्परेणेति संकीर्णसंशयाः।।31।।

अर्थः जो आपस में मिलते समय संशय हो वह संकीर्ण है। संकीर्ण संशय पूरे होते हैं।

श्लोक-32. यत्र परस्याभिगमनेऽर्थः सक्ताच्च संघर्षतः उभयतोऽर्थः।।32।।

अर्थः किसी दूसरे प्रेमी के साथ धन लेकर सेक्स करने से वेश्या पर आकर्षित प्रेमी भी दूसरे नायक का संबंध विच्छेद करने के लिए धन दे देता है तो दोनों ओर से धन का योग होने से यह उभयतोऽर्थयोग कहलाता है।

श्लोक-33. यत्र स्वेन व्ययेन निष्फलमभिगमनं सक्ताच्चमर्षिताद्वित्तप्रत्यादानं स उभयतोऽनर्थः।।33।।

अर्थः अपना धन खर्च करके भी वेश्या जिस प्रेमी से सेक्स करती है तथा उसे कुछ भी नहीं मिलता है और रुष्ट प्रेमी से उसके दिये गये धन के छिन जाने का डर भी बना रहता है तो उसे उभयतोऽनर्थ कहते हैं।

श्लोक-34. यत्राभिगमनेऽर्थो भविष्यति न वेत्याशंका सक्तोऽपि संघर्षाद्दास्यति न वेति स उभयतोऽर्थसंशयः।।34।।

अर्थः जिसके साथ सेक्स करने से वेश्या को धन की प्राप्ति होती है या नहीं यह संदेह हो, धनहीन आसक्त संघर्ष में पड़कर धन देगा अथवा नहीं- दोनों ओर से ऐसा शक होने पर उभयोतोर्थसंशय होता है।

श्लोक-35. यत्र परस्याभिगमनेऽर्थः सक्ताच्च संघर्षतः उभयतोऽर्थः।।32।।

अर्थः किसी दूसरे प्रेमी के साथ धन लेकर सेक्स करने से वेश्या पर मोहित प्रेमी भी दूसरे नायक का संबंध विच्छेद करने के लिए धन देता है तो दोनों ओर से धन का योग होने से यह उभ्यतोऽर्थ कहलाता है।

श्लोक-36. बाभ्रवीयास्तु।।36।।

अर्थः और बाभ्रवीयास्तु सम्प्रदाय के आचार्य तो इन संशयों को जिस प्रकार का कहते हैं। वैसा सुनते भी हैं।

श्लोक-37. यत्राभिगमनेऽर्थोनभिगमने च सक्तादर्थः स उभयतोऽर्थः।।37।।

अर्थः जिस उभयतोयोग में वेश्या अपने पहले के प्रेमी से बिना सेक्स किये ही दूसरे के साथ सेक्स करके धन प्राप्त कर ले तथा बाद में पुराने प्रेमी को खुश करके उससे भी धन प्राप्त कर ले तो यह उभयतोऽर्थ कहलाता है।

श्लोक-38. यत्राभिगमने निष्फलो व्ययोऽनभिगमने च निष्प्रतीकारोऽनर्थः।।38।।

अर्थः जिस सेक्स में बेकार ही खर्च हो और सेक्स न करने से अनिवार्य संकट उपस्थित होने का डर हो और सेक्स करने पर पुराना प्रेमी गुस्से में आकर कुछ अनर्थ कर बैठे तो यह उभयतोऽनर्थ होता है।

श्लोक-39. यत्राभिगमने निर्व्ययो दास्यति न वेति संशयोऽनभिगमने सक्तो दास्यति वेति स उभयतोऽर्थसंशयः।।39।।

अर्थः जिसके सेक्स से कुछ अपना खर्च नहीं लेकिम वह कुछ देगा या नहीं देगा। यह संशय बना हो और अपना आसक्त प्रेमी भी बिना मिले देगा अथवा नहीं, यह भी संदेह हो तो यह उभयतोऽर्थ संदेह है।

श्लोक-40. यत्राभिगमने व्ययवति पूर्वो विरुद्धः प्रभाववान् प्राप्स्यते न वेतिसंशयोऽनभिगमने च क्रोधादनर्थ करिष्यति न वेति स उभयतोऽनर्थ संशयः।।40।।

अर्थः अपना धन खर्च कर देने पर भी जिससे सेक्स करने में यह संदेह हो कि पहला प्रेमी जो प्रभावशाली है इसके साथ सेक्स करने पर गुस्से में आकर कहीं मिलना बंद न कर दे और न मिलने पर यह गुस्से से कुछ अनर्थ करेगा अथवा नहीं इस प्रकार का संदेह उभयतोऽनर्थ संशय है।

श्लोक-41. एतेषामेव व्यतिकरेऽन्तोर्थोऽन्यतोऽनर्थः, अन्यतोऽर्थोऽन्योतोऽर्थसंशयः अन्यतोऽर्थोऽन्यतोऽनर्थसंशयः इति षट्सकीर्णयोगाः।।41।।

अर्थः संयोग से इन्हीं के बारे में एक-एक के 6 संकीर्ण योग बनते हैं। एक से अर्थ एक से अनर्थ, एक से अर्थ एक से अर्थसंशय औऱ एक से अर्थ एक से अनर्थ संशय- ये तीन श्वेतकेतु के मत से और तीन ही बाभ्रवीय मत से दोनों मिलाकर 6 हो जाते हैं। षटंसंकीर्ण योग समाप्त होता है।

श्लोक-42. तेषु सहायैः सह विमृश्य यतोऽर्थभूयिष्ठोऽर्थसंशयो गुरुरनर्थप्रशमो वा ततः प्रवर्तेत।।42।।

अर्थः इनमें से इनके सहायताकारों के साथ विचार करके इससे अधिक अर्थ वाला संशय हो या जिसमें महान अनर्थ की शक्ति हो, उसी के साथ प्रवृत्त होना चाहिए।

श्लोक-43. एवं धर्मकामावप्यनयैव यक्तयोदाहरेत्। संकिरेच्च परस्परेण व्यतिषञ्जयेच्चेत्युभयतोयोगाः।।43।।

अर्थः अर्थ शुद्ध उभयतोयोग के ढंग पर ही धर्म तथा काम के लिए शु्द्ध उभयतोयोग बना लेना चाहिए। जिस प्रकार अर्थ के संकीर्ण योग हैं। उसी तरह परस्पर संकीर्ण योग बना लिया जाए तो तथा फिर उनके विरोधी भाव हटाकर आपस में संश्लिष्ट कर दें।

श्लोक-44. संभूय च विटाः परिगृहणन्त्येकामसौ गोष्ठीपरिग्रहः।।44।।

अर्थः किसी एक वेश्या के साथ जब एक से अधिक विट मिलकर सेक्स करते हैं तो उसे गोष्ठी परिग्रह कहते हैं।

श्लोक-45. सा तेषामितस्यतः संसृज्यमाना प्रत्येकं संघर्षदर्थं निर्वर्तयेत्।।45।।

अर्थः गोष्ठी परिग्रह करने वाली वेश्या इधर-उधर मिलकर अपने मिलने-जुलने वालों से संघर्ष कराकर उनसे धन प्राप्त कर ले।

श्लोक-46. सुवसंतकादिषु च योगे यो मे इमममुं च संपादयिष्यति तस्याद्य गमिष्यति मे दुहितेति मात्रा वाचयेत्।।46।।

अर्थः वेश्या की मां उसके प्रेमियों के पास संदेश भेज दे कि सुवसंतक, कौमुदी महोत्सव, महन महोत्सव आदि निकट आने वाले उत्सव में मेरी पुत्री उसी के साथ सेक्स करेगी, जो इन चीजों को सबसे पहले उसे देगा।

श्लोक-47. तेषां च संघर्षजेऽभिगमने कार्याणि लक्षयेत्।।47।।

अर्थः उस मौके पर वहां जब प्रेमी लोग प्रेमिका से मिलने के लिए आपस में संघर्ष करने लगें उस समय वह अपना लक्ष्य अधिक लाभ पर ही रखे।

श्लोक-48. एकतोऽर्थः सर्वतोऽर्थः एकतोऽनर्थः। अर्धतोऽर्थः सर्वतोऽर्थः अर्धतोऽनर्थः सर्वतोऽनर्थ। इति समन्ततो योगाः।।48।।

अर्थः एक से अर्थ सबसे अर्थ, एक से अनर्थ सबसे अनर्थ, आधे से अर्थ पूरे से अर्थ, आधे से अनर्थ- चारों तरह के योग हैं।

श्लोक-49. अर्थसंशयमनर्थसंशयं च पूर्ववद्योजयेत्। संकिरेच्च तथा धर्मकामावपि। इत्यर्थानर्थानुबंधसंशयविचाराः।।49।।

अर्थः सबसे पहले अर्थ संशय तथा अनर्थ संशय की योजना बनानी चाहिए। इसके साथ ही संकीर्ण को भी जान लेना चाहिए। इसी तरह धर्म तथा काम के समन्तोयोग समझने चाहिए।

श्लोक-50. कुम्भदासी परिचारिका कुल्टा स्वैरिणी नटी शिल्पकारिका प्रकाशविनष्टा रूपाजीवा गणिका चेति वेश्याविशेषः।।50

अर्थः वेश्याएं कुम्भदासी, परिचारिका, कुल्टा, स्वैरिणी, नटी, शिल्पकारिका, प्रकाश, विनष्टा, रूपाजीवा तथा गणिका आदि प्रकार की होती हैं।

श्लोक-51. सर्वासां चानुरूपेण गम्याः सहायास्तुदुपरञ्जनमर्थागमोपाया निष्कासनं पुनः संधानं लाभविशेषानुबंधा अर्थानर्थानुबंधसंशयविचाराश्चेति वैशिकम्।।51।।

अर्थः उपर्युक्त सूत्र में जितनी प्रकार की वेश्याओं के बारे में बताया गया है उतने ही प्रकार के उनसे सेक्स करने के लिए आने वाले भी होते हैं। इस वैशिक अधिकरण में वेश्याएं, वेश्याओं के प्रेमी, उनके सहायक अनुरुक्त करने के उपाय, धन खींचने के उपाय, प्रेमी को निकालने का तरीका तथा निकालकर फिर मिलाने का तरीका, लाभ विशेष अर्थ, अनर्थ, अनुबंध तथा संशय विचार मुख्यतया इन्हीं के बारे में वर्णन किया गया है।

श्लोक-52. भवतश्चात्र श्लोकौ-

रत्यर्थाः पुरुषा येन रत्यर्थाश्चैव योषितः। शास्त्रस्यार्थप्रधानत्वात्तेन योगोऽत्र योषिताम्।।52।।

अर्थः इसके संबंध में दो श्लोक हैं-

          स्त्री तथा पुरुषों के मिलन का प्रमुख उद्देश्य सेक्स सुख की प्राप्ति होता है। स्त्री तथा पुरुषों के सेक्स सुख का उद्देश्य ही इस शास्त्र का प्रतिपाद्य विषय है, इसलिए वैशिक अधिकरण में स्त्रियों के रतिप्रयोजन पर विस्तार से विचार किया गया है।

श्लोक-53 संति रागपरा नार्यः संति चार्थपरा अपि। प्राक्तत्र वर्णितो रागो वेश्यायोगाश्च वैशिके।।53।।

अर्थः अनेक औरतें विशुद्ध अनुरागिणी होती हैं, बहुत सी औरतें सेक्स के साथ धन की भी इच्छा रखती हैं। विशुद्ध अनुरागिणी स्त्रियों का वर्णन प्रारम्भ में ही किया जा चुका है और जो औरते रति राग के साथ अर्थ की भी कामना करती हैं। उनका उल्लेख इस प्रकरण में किया जा रहा है।

          स्त्री हो या पुरुष, सती हो या वेश्या, गृहस्थ हो या विरक्त, संवेग के कारण सभी की क्रियाएं परिवर्तित होती हैं। एक ही स्थिति पर हमेशा रहने से सुंदरता नष्ट होने लगती है। इस प्रकार यह तय है कि एक विषय से उत्पन्न संवेग में परिवर्तन अवश्य ही होते हैं। विष्णुपुराण के अंतर्गत एक ही विषय पर दो भाव या संवेग एक साथ ही उत्पन्न हो सकते हैं क्योंकि जब एक ही वस्तु से दुःख, सुख, ईर्ष्या आदि उत्पन्न होते हैं तब वह वस्तु दुख देती है। यही एक समय प्रेम को उत्पन्न करता है, दुख, क्रोध तथा प्रसन्नता को उत्पन्न करता है।

          ठीक यह प्रवृत्ति, यही वेश्याओं तथा उनके प्रेमियों की भी होती है। जिसे कामसूत्र से व्यवहारिक मनोवैज्ञानिक आधार पर समझाया गया है। वेश्याओं की सुंदरता पर अपनी जान देने को तैयार रहने वाले प्रेमी उससे अपमानित होकर, उसकी ठोकरें खाकर, उससे लुट जाने पर भी पीछा नहीं छोड़ते। उन्हें अपने प्रेमिका की जुदाई पल भर के लिए भी बर्दाश्त नहीं होती है। धर्मशास्त्र भी इसका समर्थन करता है।

          शास्त्रकार ने अधिकरण समाप्त करते हुए वेश्याओं के विभिन्न प्रकार बतायें हैं- कुम्भदासी, परिचारिका, कुल्टा, स्वैरिणी, नटी, शिल्पकारिका, प्रकाशविनष्टा, रूपाजीवा, गणिका आदि। प्रसिद्ध टीकाकार यशोधर ने अपनी जयमंगला टीका में इनके लक्षणों को बताते हुए लिखा है कि निकृष्ट कार्य करने वाली स्त्री कुम्भदासी, जो अपने स्वामी की सेवा करती है, ऐसी सेविका, परिचारिका, वेश्या जो पति के डर से दूसरों के घर में जा करके व्यभिचार कराती है, अपने पति का अनादर करके जो अपने घर पर ही अथवा कहीं अन्य जगह पर व्यभिचार करती है। वे स्वैरिणी वेश्या कहलाती हैं।

          सार्वजनिक समारोहों में नाचने वाली, वेश्या, धोबी अथवा दर्जी की पत्नी शिल्पकारिका वेश्या, जो पति के जिंदा रहने पर या मर जाने पर किसी दूसरे के साथ शादी कर लेती है। प्रकाश विनष्टा, परिचारिका, वेश्या से लेकर प्रकाश विनष्टा तक की स्त्रियां रूपाजीवा वेश्या कहलाती हैं।

          इस अधिकरण के छठे अध्याय में वात्स्यायन ने वेश्या के अर्थ-अनर्थ तथा संशय संबंधी आपत्तियां और उनके प्रतिकार के जो उपाय बताये हैं। वह विशुद्ध राजनीति के हैं। आचार्य कौटिल्य ने कौटलीय अर्थशास्त्र के नवें अधिकरण के सातवें अध्याय में राजा के लिए यहीं उपाय बतायें हैं। शत्रु की वृद्धि के विषय में कौटिल्य ने राजा के लिए 1. आपदर्श, 2. अनर्थ, तथा 3. संशय जो तीन बातें बताई गयी हैं वही वात्स्यायन दुश्मन के पैदा होने पर भी वेश्या के लिए बताते हैं।

इति श्रीवात्स्यायनीये कामसूत्रे वैशिके षष्ठेऽधिकरणे अर्थानर्थानुबंधसंशयविचारा वेश्याविशेषाश्च षष्ठोऽध्यायः. समाप्तं चाधिकरणम्।

कामसूत्र

Vātsyāyana
Chapters
कामसूत्र
कामसूत्र का परिचय
1
नागरकवृन्त प्रकरण 1
नागरकवृन्त प्रकरण 2
विद्या समुदेश प्रकरण 1
विद्या समुदेश प्रकरण 2
विद्या समुदेश प्रकरण 3
विद्या समुदेश प्रकरण 4
त्रिवर्ग प्रतिपत्ति प्रकरण 1
त्रिवर्ग प्रतिपत्ति प्रकरण 2
त्रिवर्ग प्रतिपत्ति प्रकरण 3
शास्त्र संग्रह 1
शास्त्र संग्रह 2
नायक सहायदूतकर्म विमर्श प्रकरण 1
नायक सहायदूतकर्म विमर्श प्रकरण 2
2
प्रथम अध्याय
द्वितीय अध्याय
तृतीय अध्याय
चतुर्थ अध्याय
पंचम अध्याय
षष्ठम अध्याय
सप्तम अध्याय
अष्टम अध्याय
नवम अध्याय
दशम अध्याय
3
प्रथम अध्याय
द्वितीय अध्याय
तृतीय अध्याय
चतुर्थ अध्यायः
पंचम अध्याय
4
प्रथम अध्याय
द्वितीय अध्याय
5
प्रथम अध्याय
द्वितीय अध्याय
चतुर्थ अध्याय
पंचम अध्याय
षष्ठम अध्याय
6
प्रथम अध्याय
द्वितीय अध्याय
तृतीय अध्याय
चतुर्थ अध्याय
पंचम अध्याय
षष्ठम अध्याय
7
प्रथम अध्याय
द्वितीय अध्याय