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तृतीय अध्याय

अर्थागमोपाय प्रकरण

श्लोक-1. सक्ताद्वित्तादानं स्वाभाविकमुपायतश्च।।1।।

अर्थः जो व्यक्ति वेश्या के प्रति आकर्षित होते हैं। वेश्या उनसे दो तरीके से धन प्राप्त कर सकती है। पहला तो स्वाभाविक ढंग से और दूसरा कोशिश करने पर।

श्लोक-2. तत्र स्वाभाविकं संकल्पात्समधिकं वा लभमाना नोपायान् प्रयुज्जीतेत्याचार्याः।।2।।

अर्थः आचार्यों का कहना है कि यदि वेश्या को अपने से मिलने वाले से जितना धन चाहिए होता है उतना अगर उसे आसानी से मिल जाता है तो वेश्या को अधिक धन ऐंठने के उपाय नहीं करने चाहिए।

श्लोक-3. विदितमप्युपायैः परिष्कृतं द्विगुणं दास्यतीति वात्स्यायनः।।3।।

अर्थः आचार्य वात्स्यायन कहते हैं कि यदि वेश्या अपने ग्राहक से तय हुए धन से अधिक धन लेना चाहती है तो उसे इसके लिए उपाय करना चाहिए जिससे वह दोगुने पैसे तक प्राप्त कर लेती है।

श्लोक-4. अलंकार भक्ष्यभोज्यपेयमाल्यवस्त्रगंधद्रव्यानिदीनां व्यवहारिक कालिकमुद्धारार्थमर्थप्रतिनयनेन।।4।।

अर्थः अलंकार भक्ष्य (लड्डू, जलेबी आदि), भोज्य (अन्न आदि), पेय (शराब, जूत आदि), वस्त्र (रेशमी, ऊनी, सूती आदि), गंध (कुंकुम आदि) फूलों के हार, पान, सुपारी आदि चीजें जब वेश्या किसी निश्चित समय पर पैसे देने के वायदे पर खरीदे या चीजों के बदले में गहने आदि अमानत में रख दिये हों तो निश्चित समय पर दाम चुकता करने या दाम देकर गहने छुड़ाने के बहाने वह प्रेमी या मिलने वालों से रुपया ले ले, लेकिन केवल अमानत पर रखे हुए गहने छुड़ाने के लिए रुपये न ले।

श्लोक-5. तत्समक्षं तद्वित्तप्रशंसा।।5।।

अर्थः प्रेमी अथवा मिलने वाले के सामने वेश्या को उसके धन-दौलत की प्रसंसा करनी चाहिए।

श्लोक-6. वृतवृक्षारामदेवकुलतडागोद्यानोत्सवप्रीतिदायव्यपदेशः।।6।।

अर्थः उपवास के बहाने, पूजा और आराधना की चीजें खरीदने के लिए, बाग-बगीचा लगाने के बहाने, मंदिर आदि की स्थापना कराने के बहाने, कुंआ-तालाब बनवाने, उत्सव के बहाने तथा अपने किसी प्रेमी या मेहमान को उपहार देने के बहाने वेश्या अपने मिलने वालों से रुपया प्राप्त कर सकती है।

श्लोक-7. तदभिगमननिमित्तो रक्षिभिश्चौरैर्वालंकारपरिमोषः।।7।।

अर्थः या फिर वेश्या को प्रेमी से यह बहाना करना चाहिए कि वह आपसे मिलने जा रही है और रास्ते में पुलिस या चोरों ने गहने छीन लिए।

श्लोक-8. दाहात्कुडय्च्छेदात्प्रमादाभ्द्रवने चार्थनाशः।।8।।

अर्थः या फिर घर में आग लग जाने पर, नकब हो जाने से असावधानी के कारण धन समाप्त हो जाने का बहाना प्रेमी से करना चाहिए।

श्लोक-9. तथा याचितालंकाराणां नायकालंकाराणां च तदभिगमनार्थस्य व्ययस्य प्रणिधिर्भिर्निवेदनम्।।9।।

अर्थः मांगे गये गहनों और प्रेमी के द्वारा दिये गये गहनों को इस तरीके से नष्ट हुआ बताने से प्रेमी अपने दिये हुए गहनों को मांगता नहीं है। इसके बाद वेश्या को अपने विश्वास के नौकरों से प्रेमी के पास के संदेश भेजकर उससे जो मिलने के समय खर्च हुआ हो उसे भी मांग लेना चाहिए।

श्लोक-10. तदर्थमृणग्रहणम्। जनन्या सह तदुद्भवस्य व्ययस्य विवादः।।10।।

अर्थः वेश्या को प्रेमी का स्वागत सत्कार कर्ज लेकर करना चाहिए। फिर उस कर्ज के विषय में मां से झगड़ा करें।

श्लोक-11. सुहृत्कार्येष्वनभिगमनभिहारहेतोः।।11।।

अर्थः प्रेमी के दोस्त के यहां किसी उत्सव के होने पर प्रेमी जब वेश्या से भी वहां भी चलने के लिए बोले तो उसे यह कहकर मना कर देना चाहिए कि वहां जाकर उपहार देने के लिए मेरे पास कुछ भी नहीं है।

श्लोक-12. तैश्च पूर्वमाहृता गुरवोऽभिहाराः पूर्वमुपनीताः पूर्वं श्राविताः स्यूः।।12।।

अर्थः जब प्रेमी दोस्त के जलसे में उपहार देने के लिए राजी हो जाए तो उपहार ले आने से पहले उसे यह सुनाकर कहे कि तुम्हारे यहां उन्होंने कीमती उपहार दिये हैं और तुमने रख लिए हैं।

श्लोक-13. उचितानां क्रियाणां विच्छित्तिः।।13।।

अर्थः वेश्या को अपने शरीर का दैनिक श्रृंगार इसलिए बंद कर देना चाहिए ताकि प्रेमी को यह महसूस हो कि पैसों की कमी के कारण उसकी यह हालत हुई है। इससे प्रेमी उसे श्रृंगार करने के लिए पैसे देगा।

श्लोक-14. नायकार्थ च शिल्पिषु कार्यम्।।14।।

अर्थः वेश्या को शिल्पियों से ऐसी वस्तुओं को बनवा लेना चाहिए कि जिससे कि प्रेमी को पैसे खर्च करने पड़ जाएं।

श्लोक-15. वैद्यमहामात्रयोरुपकारक्रिया कार्यहेतोः।।15।।

अर्थः वेश्या राजपुरुषों तथा वैद्यों को अपने कार्यों से इस प्रकार से प्रसन्न कर दे कि वह उसके मनचाहे प्रेमी से मिलने या फिर प्रेमी को उस पर खर्च करने में उसे उसकी सहायता कर सके।

श्लोक-16. मित्राणां चोपकारिणां व्यसनेष्वभ्युपपत्तिः।।

अर्थः प्रेमी के दोस्तों और उसका उपकार करने वालों पर यदि किसी प्रकार की मुसीबत आ जाए तो वेश्या को उनकी सहायता करनी चाहिए।

श्लोक-17. गृहकर्म संख्याः पुत्रस्योत्सञ्जनम् दोहदो व्याधिर्मित्रस्य दुःखापनयनमिति।।17।।

अर्थः प्रेमी से धन प्राप्त करने के लिए वेश्या को घर बनवाने का, सहेली के पुत्र के किसी संस्कार का, गर्भावस्था की उत्कट इच्छा का अथवा किसी रोग का दुःख दूर करना के बहाना करें। इसके परिणामस्वरूप उसे प्रेमी से धन प्राप्त हो जाएगा।

श्लोक-18. अलंकरैकदेशविक्रयो नायकस्यार्थे।।18।।

अर्थः यदि प्रेमी के किसी कार्य के लिए धन की आवश्यकता हो तो वेश्या को अपने कुछ गहनों को बेचकर उसे धन देना चाहिए।

श्लोक-19. तया शीलितस्य चालंकारस्य भाण्डोपस्यकरस वा-वणिजो विक्रयार्थ दर्शनम्।।19।।

अर्थः उसे अपने प्रिय गहनों को, घर के बर्तन तथा सजावट की चीजों को प्रेमी के सामने ही व्यापारी को बेचने के लिए दिखाने का बहाना करें।

श्लोक-20. प्रतिगणिकानां च सदृशस्य भाण्डस्य व्यतिकरे प्रतिविशिष्टस्य ग्रहणम्।।20।।

अर्थः या उसी के समान दूसरी अन्य गणिकाओं के बर्तनों से अपने बर्तन बदल जाने के कारण से अपने बर्तनों को बड़े कराने का बहाना करें।

श्लोक-21. पूर्वोपकाराणामविस्मरणमनुकीर्तनं च।।21।।

अर्थः प्रेमी द्वारा किए गये उपकारों को न भूलकर उसका वर्णन करें।

श्लोक-22. प्रणिधिभिः प्रतिगणिकानां लाभातिशयं श्रावयेत्।।22।।

अर्थः अपने विश्वास के नौकरों द्वारा दूसरी गणिकाओं को होने वाले अधिक लाभ प्रेमी को सुनवायें।

श्लोक-23. तासु नायक समक्षमात्मनोऽभ्यधिकं लाभं भूतमभूतं वा व्रीडिता नाम वर्णयेत्।।23।।

अर्थः यदि दूसरी गणिकाएं उस वेश्या के यहां आई हो तो प्रेमी के सामने लाभ को बढ़ा-चढ़ाकर उनसे बताएं। यदि फिर भी कुछ लाभ न हो तो प्रेमी की ओर शर्म से देखकर कहे।

श्लोक-24. पूर्वयोगिनां च लाभातिशयेन पुनः सन्धाने यतमानानामाविष्कृतः प्रतिषेधः।।24।।

अर्थः वेश्या के वे प्रेमी जो उनका साथ छोड़ चुके हैं तथा अधिक धन देकर फिर से वह वेश्या से संभोग करना चाहते हों, तो प्रेमी के सामने ही उसे साफ मना कर देना चाहिए।

श्लोक-25. तत्स्पर्धिनां त्यागयोगिनां निदर्शनम्।।25।।

अर्थः प्रेमी से स्पर्धा करने वाले उन लोगों को प्रेमी को दिखाये जो अधिक पैसे देकर वेश्या से सेक्स करने की इच्छा करते हो।

श्लोक-26. न पुनरेष्यतीत बालयाचितकमित्यर्थागमोपायाः।।26।।

अर्थः यदि यह जानकारी प्राप्त हो जाए कि अब यह दोबारा नहीं आएगा तो बच्चों की भांति हठ करके उससे धन मांगे।

विरक्तिपाति प्रान्ति प्रकरण

श्लोक-27. विरक्तं च नित्यमेव प्रकृतिविक्रियातो विद्यात् मुखवर्णाश्च।।27।।

अर्थः वेश्या अनुराग न रखने वाले लोगों को उसके परिवर्तित स्वभाव तथा चेहरे के बनते- बिगड़ते भावों को देखकर जानकारी प्राप्त कर लें।

श्लोक-28. ऊनमतिरक्तं वा ददाति।।28।।

अर्थः जब प्रेमी के मन में वेश्या के प्रति लगाव कम होने लगता है तो वह कभी कम तो कभी अधिक धन वेश्या को दे देता है।

श्लोक-29. प्रतिलोमैः सम्बध्यते।।29।।

अर्थः प्रेमी के विरोधियों से संबंध बनाने लगता है।

श्लोक-30. व्यपदिश्यान्यत्करोति।।30।।

अर्थः जिस कार्य को कहे उसे न करके दूसरा करने लगता है।

श्लोक-31. उचितमाच्छिनत्ति।।31।।

अर्थः जो सही काम होता है उसे भी वह रोक देता है।

श्लोक-32. प्रतिज्ञातं विस्मरति। अन्यथा वा योजयति।।32।।

अर्थः केवल प्रेमी देने का वायदा करके भी मना कर देता है। या फिर कहता है कि मैने तो ऐसा वायदा ही नहीं किया है।

श्लोक-33. स्वपक्षैः संज्ञया भाषते।।33।।

अर्थः अपने निजी व्यक्तियों से संकेतों के द्वारा बातें करनी चाहिए।

श्लोक-34. मित्रकार्यमपदिश्यान्यत्र शेते।।34।।

अर्थः किसी दोस्त के काम का बहाना करके दूसरे स्थान पर जाकर सो जाता है।

श्लोक-35. पूर्वसंसृष्टायाश्च परिजनेन मिथः कथयति।।35।।

अर्थः पहली प्रेमिका के नौकरों से इस प्रेमिका की सभी गुप्त बातों को बता देना चाहिए।

श्लोक-36. तस्य सारद्रव्याणि प्रागवबोधादन्यापदेशेन हस्ते कुर्वीत्।।36।।

अर्थः जब उसे यह बात मालूम हो जाए कि उसके प्रेमी का लगाव धीरे-धीरे करके खत्म हो रहा तो जितना शीघ्र हो सके उसे प्रेमी से अधिक से अधिक धन प्राप्त करने की कोशिश करनी चाहिए।

श्लोक-37. तानि चास्या हस्तादुत्तमर्णः प्रसह्य गृह्वीयात्।।37।।

अर्थः या फिर प्रेमिका का सिखाया हुआ साहूकार जिसने उसे कर्ज दिया हो उसे चाहिए कि उसके प्रेमी द्वारा एकत्र किये गये धन को वह अपने कब्जे में कर लें।

श्लोक-38. विवदमानेन सहधर्मस्थेषु व्यवहरेदिति विरक्तप्रतिपत्ति।

अर्थः यदि प्रेमी साहूकार से झगड़ा कर ले तो उसे अदालत तक जाना चाहिए। विरक्तिपात्ति समाप्त होता है।

निष्कासन-क्रम प्रकरण

श्लोक-39. सक्तं तु पूर्वाकारिणमप्यफलं व्यलीकेनानुपात्।।39।।

अर्थः वेश्या को चाहिए कि थोड़ा देने वाले के पहले परोपकारी प्रेमी के अपराध करने पर भी उसे धक्का देकर न निकाले।

श्लोक-40. असारं तु निष्प्रतिपत्तिकमुपायतोऽपवाहयेत्। अन्यमवष्टभ्य।।40।।

अर्थः धनहीन लेकिन खाली प्रेमी को किसी धनवान, अनुरक्त व्यक्ति को प्रतिपक्षी बनाकर निकालना चाहिए। स्वयं नहीं।

श्लोक-41. तदनिष्टसेवा। निन्दिताभ्यासः। ओष्ठनिर्भोगः। पादेन भूमेरभिघातः। अविज्ञातविषस्य संकथा। तदिज्ञातेष्वविस्मयः समानदोषाणां निंदा। रहसि चावस्थानम्।।41।।

अर्थः प्रेमी को एकांत या प्रकट में निकालने के लिए प्रेमिका को ये उपाय करने चाहिए- जिसे प्रेमी नहीं चाहता। उसकी सेवा करना, निन्दनीय कार्यों को जान-बूझकर बार-बार करना, होंठों को चबाना, धरती पर पैर पटकना, जिन बातों को नहीं जानता हो उन बातों की बार-बार चर्चा करना, जिन विषयों के बारे में प्रेमी को जानकारी न हो उन पर आश्चर्य प्रकट करना तथा उसकी निंदा करना, उसके अभिमान पर चोट करना, उसके गुरुजनों के साथ रहना, उसकी हर तरफ उपेक्षा रखना, प्रेमी में जो दोष हों उन्हीं के समान दोषों की बुराई करना तथा एकांत में बैठना।

श्लोक-42. रतोपचारेषूद्वेगः। मुखस्यादानम्। जघनस्य रक्षणम्। नखदशनक्षतेभ्यो जुगुप्सा। परिष्वंगे भुजमय्या सूच्चा व्यवधानम्। स्तब्धता गात्राणाम् सक्थ्रोर्व्यत्यासः। निद्रापरत्वं च। श्रान्तमुपलभ्य चोदना। अशक्तौ हासः। शक्तावनभिनन्दनम् दिवापि। भावमुपलभ्य महाजनाभिगमनम्।।42।।

अर्थः जिस व्यक्ति को वेश्या अपने पास से भगाना चाहती हो तो सेक्स के समय में उसके साथ यह आचरण करे- सेक्स के लिए दिये जाने वाले पान, सुगंधि आदि को स्वीकार न करें। चुंबन न करने दें। जांघों पर हाथ न फेरने दें। यदि उसने पहले कभी सेक्स के समय दांतों अथवा नाखूनों से काटा हो तो उसकी निंदा करें। बांहों में भरते समय हाथों को सीने से ढक लें। शरीर के अंगों को तन कर लें। जिससे प्रेमी खींच न सके। दोनों जांघों को एक-दूसरे के ऊपर चढ़ा ले। सेक्स के समय नींद आने का बहाना करें। यदि सेक्स के समय प्रेमी शीघ्र ही स्खलित हो तो उसकी आलोचना करें। यदि प्रेमी की संभोग शक्ति क्षीण पड़ रही हो तो उसकी हंसी उड़ाये तथा अधिक उत्तेजना हो तो उसका कोई भी महत्व न दें। दिन में सेक्स करने पर उसे गधा कहकर पुकारें। यदि प्रेमी की इच्छा सेक्स करने की हो तो उसे बेडरूम से बाहर निकालकर किसी बड़े आदमी से मिलने जाएं।

श्लोक-43. वाक्येषु च्छलग्रहणम्। अनर्मणि हासः। नर्मणि चान्यमपदिश्य हसति वदति तस्तिमन्कटाक्षेण परिजनस्य प्रेक्षणं ताडनं च। आहत्य चास्य कथामन्थाः कथा। तद्वलीकानां व्यसनानां चापारिहार्याणामनुकीर्तनम्। मर्मणां च चेटिकयोपक्षेपणम्।।43।।

अर्थः प्रेमी को अपने ऊपर से हटाने के लिए निम्न बातें प्रेमिका को छेड़नी चाहिए। छल-कपट भरी बातें, बिना खेल के उपहास, खेल में दूसरे के बहाने उपहास करना, उसके कुछ कहने पर उसी को लक्ष्य करके अपने परिजनों की ओर कनखियों से देखना या ताड़ना। उसकी बात को बीच में काटकर दूसरी बात कह देना। प्रेमी की उन आदतों की बुराई करे जो उसकी कमजोरी हो। उसकी गुप्त बातों को अपनी सेविका से बताना।

श्लोक-44. आगते चादर्शनम्। अयाच्ययाचनम्। अंते स्वयं मोक्षश्चेति परिग्रहस्येति दत्तकस्य।।44।।

अर्थः प्रेमिका उपर्युक्त बातें कहकर प्रेमी को मानसिक रूप से प्रताड़ित करे। इसके बाद निम्न कार्य करें- जब भी प्रेमी उससे मिलने आये तो उसे मिलने से इंकार कर देना चाहिए। उससे किसी भी चीज की मांग न करें और उसे नौकरी से निकाल दें। ये सभी बातें आचार्य दत्तक ने कही हैं।

श्लोक-45. परीक्ष्य गम्यैः संयोगः संयुक्तस्यानुरञ्जनम्। रक्तादर्थस्य चादानमंत मोक्षश्च वैशिकक।।45।।

अर्थः इस विषय के दो श्लोक हैं- वेश्या अपने मिलने वालों की परीक्षा करके उससे सेक्स करे। सेक्स करने के बाद उससे सेक्सी बातें करके अधिक से अधिक धन प्राप्त करे। जब उसे धन प्राप्त हो जाए तो प्रेमी को घर से बाहर निकाल दें।

श्लोक-46. एवमेतेन कल्पेन स्थिता वेश्या परिग्रहे। नातिसंधीयते गम्यैः करोत्यर्थांश्च पुष्कलान्।।46।।

अर्थः उपर्युक्त विधि से यदि वेश्या चाहे तो वह अपने प्रेमियों से अधिक से अधिक धन प्राप्त कर सकती है।

           यह वैशिक अधिकरण वीरसेना नामक वेश्या के विशेष आग्रह करने पर आचार्य दत्तक ने लिखा था जिसे वात्स्यायन ने कामसूत्र में शामिल किया है। आचार्य दत्तक वेश्या को देखकर उसके शील, स्वभाव तथा आचरण के बारे में समझ जाते थे। उन्होंने इस अधिकरण के अंतर्गत वेश्याओं के बारे में जो जानकारी दी है। वह संक्षिप्त होते हुए भी अपने आप में परिपूर्ण है।

           इस अधिकरण के सभी वेश्यावृत्त का सार हमें दशकुमार चरित के उपहार वर्मा के चरित्र में मुनि मरीच तथा काममंजरी वेश्या के सवाल में मिलता है।

           वेश्याओं की मनोवृत्ति, उसके रहस्यमय चरित्र तथा दुर्भेध व्यवहार के बारे सचित्र जानकारी युक्त काममंजरी में कहा गया है- वेश्याओं की पैदायशी प्रवृत्ति यह होती है कि जैसे ही घर में लड़की का जन्म होता है। उसे बचपन से सबसे अधिक सुंदर बनाने की कोशिश करते हैं। उसके एक-एक अंग को सुंदर तथा आकर्षक बनाने के लिए विभिन्न प्रयोग किये जाते हैं। बचपन से ही लड़कियों को संतुलित भोजन दिया जाता है। जिससे उसका सही तरीके से विकास हो सके।

           यह प्रवृत्ति केवल वेश्या की ही जाति में नहीं दिखाई देती है। बल्कि साध्वी स्त्रियों को छोड़कर लगभग सभी औरतों की यही प्रवृत्ति होती है। अधिकतर स्त्रियां किसी पुरुष पर उसकी विशेषता के कारण आकर्षित होती हैं। चाहे धन की विशेषता हो या रूप और यौवन की।  

           वेश्या हो या कुलवधू हो चूंकि स्त्री होने से दोनों एक ही जाति की हैं। सेक्स, वातावरण तथा परिस्थितियों के प्रभाव के कारण कोई स्त्री वेश्या बनती है तो कोई कुलवधू। लेकिन स्वभाव से रहित दोनों नहीं हो सकती। इसीलिए नीतिकार ने समीक्षक तरीके से कहा है कि केवल स्तनों को छोड़कर तथा न कहीं विष है तथा न कहीं अमृत है। अनुरक्त होने पर वही स्त्री अमृत के समान बनती है तथा विरक्ति होने पर वही स्त्री विष के समान बन जाती है।

नामृतं न विषं किञ्जदेकां मुक्तवा नितम्बिनीम्। सेवामृतलता रक्ता विरक्ता विषवल्लरी।।

इति श्रीवात्स्यायनीये कामसूत्रे वैशिके षष्ठेधिकरणेऽर्थागमोपाया विरलिंगानि चिरक्तप्रतिपत्तिर्निष्कासनक्रमास्तृतीयोऽध्यायः।।

कामसूत्र

Vātsyāyana
Chapters
कामसूत्र
कामसूत्र का परिचय
1
नागरकवृन्त प्रकरण 1
नागरकवृन्त प्रकरण 2
विद्या समुदेश प्रकरण 1
विद्या समुदेश प्रकरण 2
विद्या समुदेश प्रकरण 3
विद्या समुदेश प्रकरण 4
त्रिवर्ग प्रतिपत्ति प्रकरण 1
त्रिवर्ग प्रतिपत्ति प्रकरण 2
त्रिवर्ग प्रतिपत्ति प्रकरण 3
शास्त्र संग्रह 1
शास्त्र संग्रह 2
नायक सहायदूतकर्म विमर्श प्रकरण 1
नायक सहायदूतकर्म विमर्श प्रकरण 2
2
प्रथम अध्याय
द्वितीय अध्याय
तृतीय अध्याय
चतुर्थ अध्याय
पंचम अध्याय
षष्ठम अध्याय
सप्तम अध्याय
अष्टम अध्याय
नवम अध्याय
दशम अध्याय
3
प्रथम अध्याय
द्वितीय अध्याय
तृतीय अध्याय
चतुर्थ अध्यायः
पंचम अध्याय
4
प्रथम अध्याय
द्वितीय अध्याय
5
प्रथम अध्याय
द्वितीय अध्याय
चतुर्थ अध्याय
पंचम अध्याय
षष्ठम अध्याय
6
प्रथम अध्याय
द्वितीय अध्याय
तृतीय अध्याय
चतुर्थ अध्याय
पंचम अध्याय
षष्ठम अध्याय
7
प्रथम अध्याय
द्वितीय अध्याय