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चतुर्थ अध्याय

दूतीकर्म प्रकरण

श्लोक (1)- दशितेगिंताकारां तु प्रविरलदर्शनामपूर्वां च दूत्योपसर्पयेत्।।

अर्थ- जो स्त्री पुरुष पर अपने भाव संकेतों को तो प्रकट कर चुकी हो  लेकिन फिर भी मिलने-जुलने से डरती हो तो उसे दूती द्वारा प्राप्त करना ही सही रहता है।

श्लोक (2)- सैनां शीलतोऽनुप्रविश्याख्यानकपटैः सुभंगकरणयोगैलोकवृत्तान्तैः कविकथाभिः पारदारिककथामिश्च तस्याश्च रूपविज्ञानदाक्षिण्यशीलानुप्रशंसाभिश्च तां रञ्ञयेत्।।

अर्थ- दूती जिस स्त्री को पुरुष के लिए पटा रही हो उसके घर के अंदर अच्छे बर्ताव का परिचय देकर प्रवेश करना चाहिए। इसके अलावा कहानियों से, सुंदरता को बढ़ाने वाले तरीकों से, बातचीत से उसको खुश करना चाहिए।

श्लोक (3)- कथमेवंविधायास्तवायमित्थंफभूतः पतिरिति चानुशयं ग्राहयेत्।।

अर्थ- दूती को स्त्री के दिल में उसके पति के लिए बुरी बातें बोलकर नफरत आदि पैदा करनी चाहिए जैसे कि तुम तो रूप का खजाना हो तुमने क्या सोचकर ऐसे पति से विवाह कर लिया।

श्लोक (4)- न तव सुभगे दास्यमपि कर्तुं युक्त इति ब्रूयात्।।

अर्थ- तुम्हारा पति तो तुम जैसी खूबसूरत स्त्री का नौकर बनने लायक भी नहीं है।

श्लोक (5)- मन्दवेगतामीर्ष्यालुतां। शठतामकृतज्ञतां चासंभोगशीलतां कदर्यतां चपलतामन्यानि च यानि तस्मिन् गुप्तान्यस्या अभ्याशे सति सद्धावेऽतिशयेन भाषेत्।।

अर्थ- दूती को स्त्री से उसके पति के बारे में जितनी भी बुरी से बुरी बातें है कहनी चाहिए कि तुम्हारा पति कितना ठंडा है, वह सबसे जलता है, धूर्त है, वह सारे गंदे काम करता है आदि।

श्लोक (6)- येन च दोषेणोद्विगां लक्षचेत्तनैवानुप्रविशेत्।।

अर्थ- अपने पति के जिस दोष को सुनकर स्त्री को बेचैनी होती नजर आए उसी दोष को ज्यादा बढ़ा-चढ़ाकर बताना चाहिए।

श्लोक (7)- बदासौ मृगी तदा नैव शशतादोषः।।

अर्थ- यदि वह स्त्री हो तो उसके पति पर शक होने का इल्जाम न लगाएं।

श्लोक (8)- एतेनैव वाडवाहस्तिनीविषयश्चोक्तः।।

अर्थ- अगर स्त्री की योनि कम गहराई वाली होती है तो उसके पति पर छोटे लिंग होने का दोष नहीं लगाना चाहिए। उस समय पति के लिंग को बड़ा बताना ही दोष होगा। इस तरह अगर स्त्री बड़वा या हस्तिनी हो तो उसके पति को अश्व या वृष न बोलकर शश कहना ही सही होगा।

श्लोक (9)- नायिकाया एव तु विश्वास्यतामुपलभ्य दूतीत्वेनोपसर्पयेत्प्रथमसाहसायां सूक्ष्मभावायां चेति गोणिकापुत्रः।।

अर्थ- गोणिकापुत्र के मतानुसार दूती को स्त्री का विश्वासपात्र बनकर अपने दूतकार्य से उसे अपने घर पर बुलाना चाहिए लेकिन उसी स्त्री को जो पहली बार किसी पराए पुरुष से मिलने की हिम्मत करती हो या अपनी गूढ़ भाषा को जाहिर न करती हो।

श्लोक (10)- सा नायकस्य चरितमनुलोमतां कामितानि च कथयेत्।।

अर्थ- स्त्री को अपने घर पर बुलाकर पुरुष के अच्छे स्वभाव और गुणों के बारे में बताना चाहिए। उसके मन के भावों को बताना चाहिए और संभोग के आदि में क्या भाव होता है, बीच में कैसा होता है और आखिरी में कैसा होता है।

श्लोक (11)- प्रसृतसद्धावायां च युक्तया कार्यशरीरमित्थं वदेत्।।

अर्थ- अगर स्त्री को अपने पति धर्म से हटता हुआ सा प्रतीत हो तो उससे इसी तरह से बात करनी चाहिए।

श्लोक (12)- श्रृणु विचिमिदं सुभगे, त्वां किल दृष्दवामुत्रासावित्थं गोत्रपुत्रो नायकश्चित्तोन्मादमनुभवति। प्रकृत्या सुकुमारः कदाचिदन्यत्रापरिक्लिष्टपूर्वस्तपस्वी। ततोऽधुना शक्यमनेन मरणमप्यनुभवितुमिति वर्णयेत्।।

अर्थ- दूती को स्त्री से कहना चाहिए कि तुम्हारी खूबसूरती पर एक पुरुष बहुत ही ज्यादा फिदा हो चुका है। वह बहुत ही अच्छे स्वभाव का है और अगर उसने तुझे हासिल नहीं किया तो वह तड़प-तड़प कर अपनी जान दे देगा।

श्लोक (13)- तत्र सिद्धा द्वितीयेऽहनि वाचि वक्रे दृष्टयां च प्रसादमुपलक्ष्य पुनरपि कथां प्रवर्तयेत्।।

अर्थ- अगर दूती की ऐसी बातों को सुनकर स्त्री रोमांचित हो जाती है तो दूती को दूसरे दिन फिर से उसके मूड के अनुसार बातचीत करनी चाहिए।

श्लोक (14)- श्रृण्वत्यां चाहल्याविमारकशाकुन्तलादीन्यन्यान्यपि लौकिकानि च कथयेत्तद्युक्तानि।।

अर्थ- जब स्त्री दूती की बातों को सुनने में पूरी तरह से मशरूफ हो जाए तो उसी समय उसे पुराने समय की ऐसी स्त्रियों के किस्से-कहानियां सुनाने चाहिए जो पराए पुरुष के साथ संबंध रखती हो।

श्लोक (15)- वृपतां चतुःषष्टिविज्ञतां सौभाग्यं च नायकस्य। श्र्लाघनीयतां (या) चास्य प्रच्छन्नं संप्रयोगं भूतमभूतपूर्व वा वर्णयेत्।।।

अर्थ- स्त्री के संभोग करने की जोरदार शक्ति, संभोग कलाओं में उसकी कुशलता, उसकी सौभाग्यशीलता तथा अच्छाईयों के बारे में बताकर ऐसी खूबसूरत स्त्री नाम लेकर बताना चाहिए कि वह उससे संभोग करा चुकी है।

श्लोक (16)- आकारं चास्या लक्षयेत्।।

अर्थ- स्त्री को इतना बताकर फिर उसकी भाव आदि को भी परखना चाहिए।

श्लोक (17)- सविहसितं दृष्ट्वा संभाषते।।

अर्थ- अपनी जिन कोशिशों के बल पर दूती स्त्री के भावों को पता कर लेती है उन्हे बताते हैं।

     देखकर हंसती हुई बोलती है।

श्लोक (18)- आसने चोपनिमन्त्रयते।।

अर्थ- आसन आदि पर आदरपूर्वक बैठने के लिए कहती है।

श्लोक (19)- क्वासितं क्व शयितं भुक्तं क्व चेष्टितं किं वा कृतामिति पृच्छति।।

अर्थ- कहां भोजन किया, कहां पर क्या किया, कहां बैठी, कहां पर सोई आदि पूछती है।

श्लोक (20)- विवक्ते दर्शयत्यात्मानम्।।

अर्थ- एकांत में अपने आप को दिखाती है।

श्लोक (21)- चिन्तयन्ती निःश्वसिति विजृम्भते च।।

अर्थ- कुछ सोचते हुए लंबी-लंबी सांसे लेती हुई, जंभाई लेती है।

श्लोक (22)- प्रीतिदायं च ददाति।।

अर्थ- प्यार का तोहफा देती है।

श्लोक (23)- इष्टेपूत्सवेषु च स्मरति।।

अर्थ- अपने घर के खास कामों और पार्टी आदि में उसे बुलाती है।

श्लोक (24)- पुनर्दर्शनानुबन्धं विसूजति।।

अर्थ- दुबारा से आने के वादे पर वह उसे विदा करती है।

श्लोक (25)- नायकस्य शाठ्यचापल्यसंवद्धान्दोपान्ददाति।।

अर्थ- पुरुष की चंचलताओं तथा धूर्तता को दोष कहती हुई दूती बताती है कि वह एक स्त्री पर तो कभी टिकता ही नहीं है।

श्लोक (26)- पूर्वप्रवृत्तं च तत्संदशेन कथाभियोगं च स्वयमकथयन्ती तयोच्यामानमाकाक्षति।।

अर्थ- स्त्री मन ही मन में यह सोचती है कि पुरुष के देखने-वेखने की बात दूती स्वयं ही छेड़े।

श्लोक (27)- नायकमनोरथेपु च कथ्यमानेपु सपरिभवं नाम हसति। न च निर्बदतीति।।

अर्थ- दूती जब पुरुष के मन की बात बताती है तो धत कहकर हंस देती है लेकिन यह नहीं कहती कि तुम्हारी चाहत पूरी हो जाएगी।

श्लोक (28)- दूत्येनां दर्शिताकारां नायकाभिज्ञानैरुपवृंहयेत्।।

अर्थ- इस तरह की भाव-भंगिमाओं को देखकर दूती को स्त्री को पुरुष की उन्हीं पुरानी विशेषताओं को बताना चाहिए।

श्लोक (29)- असंस्तुतां तु गुणकथनैरनुरागकथाभिश्चावर्जयेत।।

अर्थ- जो स्त्री पुरुष के बारे में जानती न हो उसे प्रेमी के गुण बताकर और उसकी प्रेम कहानियां सुनाकर अपनी बातों के जाल में फंसाना चाहिए।

श्लोक (30)- नासंस्तुतादृष्टाकारयोर्दूत्यमस्तीतयौद्दालकिः।।

अर्थ- श्वेतकेतु औद्यालिक के मतानुसार जो स्त्री पुरुष से पूरी तरह से परिचित न हो उसके साथ दूतीकार्य नहीं हो सकता है।

श्लोक (31)- असंस्तुतयोरपि संसृष्टाकारयोरस्तीति बाभ्रवीयाः।।

अर्थ- बाभ्रवीय आचार्यों के मुताबिक एक-दूसरे को न जानने पर भी अगर भाव-भंगिमा, संकेत मिल चुके हो तो दूतीकार्य हो सकता है।

श्लोक (32)- संस्तुतयोरप्यसंसृष्टाकारयोरस्तीति गोणिकापुत्रः।।

अर्थ- गोणिकापुत्र के मतानुसार बिना जान-पहचान और संकेत के भी दूतीकार्य हो सकता है।

श्लोक (33)- असंस्ततयोरदृष्याकारयोरपि दूतीप्रत्ययादिति वात्स्यायनः।।

अर्थ- आचार्य वात्स्यायन के मतानुसार बिना जान-पहचान और संकेत के भी दूतीकार्य हो सकता है।

श्लोक (34)- तासां मनोहराण्युपायनानि ताम्बूलमनुलेपनं स्त्रजमगंलीयकं वासो वा तेन प्रहितं दर्शयेत्।।

अर्थ- बिना जान-पहचान के पुरुष स्त्री के लिए मनपसंद चीजें, पान, केशर, माला, अंगूठी और अच्छे कपडे़ भेजने चाहिए।

श्लोक (35)- वाससि च कुगंमागंमञ्ञलिं निदध्यात्।।

अर्थ- उपहार में दिए जाने वाले कपड़ो पर केसर के थापे और छाप मारनी चाहिए।

श्लोक (36)- पत्रच्छेद्यानि नानाभिप्रायाकृतीनि दर्शयेत्। लेखपत्रगर्भाणि कर्णपत्राण्यापीगंश्च।।

अर्थ- मुलायम पत्तों पर कई तरह के अभिप्रायों की शक्लें बनाकर, रति, क्रोध, शोक आदि प्रकट करना चाहिए।

श्लोक (37)- तेषु स्वमनोरथाख्यापनम्। प्रतिप्राभृतदाने चैनां नियोजयेत्।।

अर्थ- उन लेखों के अंतर्गत अपना मकसद और अपनी मनोकामना जाहिर करनी चाहिए।

श्लोक (38)- स तु देवताभिगमने यात्रायामुद्यानक्रीडायां जलावतरणे विवाहे यज्ञव्यसनोत्सवेष्वगनुयुत्पाते चौरविभ्रमे जनपदस्य चक्रारोहणे प्रेक्षाव्यापारेषु तेषु तेषु च कार्येष्वति बाभ्रवीयाः।।

अर्थ- वाभ्रवीय आचार्यों के मुताबिक संभोग तो देवपूजन, देवयात्रा में जाते समय, जंगल में घूमते समय, पानी में तैरते समय, विवाह के मौके पर, यज्ञ, जश्न तथा मृत्यु के मौके पर, आग लग जाने पर, खेल तमाशों में करना संभव होता है।

श्लोक (39)- सखीभिक्षुकीक्षपणिकातापसीभवनेषु सुखोपाय इति गोणिकापुत्रः।।

अर्थ- गोणिकापुत्र के मतानुसार सहेली, सधुवाइन, भिखारिन, तपस्विनी आदि के घर में पुरुष और स्त्री का मिलना-जुलना आसानी से हो सकता है।

श्लोक (40)- तस्या एव तु गेहे विदितनिष्क्रमप्रवेशे चिन्तितात्ययप्रतीकारे प्रवेशनसुपपन्न निष्क्रमणमविज्ञातकालं च तन्नियं सुखोपायं चेति वात्स्यायनः।।

अर्थ- आचार्य वात्स्यायन के मतानुसार अगर स्त्री के घर में घूमने का रास्ता पुरुष को पता हो तो उसके घर में ही संभोग हो सकता है।

श्लोक (41)- निसृष्टार्था परिमितार्था पत्रहारी स्वयंदूती मूढदूती भार्यादूती मूकदूती वातदूती चेति दूतीविशेषाः।।

अर्थ- निसृष्टार्थ परिमितार्थ, पत्रहारी, स्वयंदूती, मूढ़दूती, भार्यादूती, मूकदूती और बातदूती 6 प्रकार की दूती होती है।

श्लोक (42)- नायकस्य नायिकायाश्च यथामनीषितमर्थमुपलभ्य स्वबुद्धया कार्यसम्पादिनी निसृष्टार्था।।

अर्थ- निसृष्टार्थ दूती- जो पुरुष तथा स्त्री के अभिलषित मकसद को जानकर अपने दिमाग से काम करती है उसे निसृष्टार्थ दूती कहते हैं।

श्लोक (43)- सा प्रायेण संस्तुतसंभाषणयोः।।

अर्थ- जिन स्त्री और पुरुषों में जान-पहचान और मेल-मिलाप रहता है उन्हीं का काम करती हैं।

श्लोक (44)- नायिकया प्रयुक्ता असंस्तुतसंभाषणयोरपि।।

अर्थ- स्त्री को भेजने पर बिना जान-पहचान तथा मिलन के भी काम करती है।

श्लोक (45)- कौतुकाच्चानुरूपौ युक्ताविमौ परस्परस्येत्यसंस्तुतयोरपि।।

अर्थ- यदि यह दूती रूप, गुण, शील, उम्र में बराबर वाले स्त्री और पुरुष को अपनी तरफ से मिलाना चाहे तो मिला सकती हैं।

श्लोक (46)- कायैंकदेशमभियोगैकदेशं चोपलभ्य शेषं संपादयतीति परिमितार्था।।

अर्थ- परिमितार्था दूती- स्त्री और पुरुष से मिलन के किसी भी भाग को जानकर बाकी से उपाय खुद ही कर लेने चाहिए तो वह दूती परिमितार्था कहलाती है।

श्लोक (47)- सा दृष्टपरस्पाकारयोः प्रविरलदर्शनयोः।।

अर्थ- जहां पर स्त्री और पुरुष एक-दूसरे के संकेत देख चुके हो लेकिन उनका प्रेम कभी-कभी दिखाई पड़े तो उनको संभोग क्रिया कराने में परिमितार्था दूती काम करती है।

श्लोक (48)- संदेशमात्रं प्रापयतीति पत्रहारी।।

अर्थ- पत्रहारी दूती- स्त्री और पुरुष के संदेश तथा पत्र आदि ले जाने का काम करती हो तो उसे पत्रहारी दूती कहते हैं।

श्लोक (49)- सा प्रगाढसद्धावयोः संसृष्टयोश्च देशकालसंबोधनार्थम्।।

अर्थ- यह दूती उन स्त्री और पुरुषों के मिलने-जुलने या संभोग करने की जगह तय करती है जो आपस में प्रेम के जाल में बंध चुके हो या कितनी बार मिले चुके हो।

श्लोक (50)- दौत्येन प्रहितान्यया स्वयमेव नायकमभिगच्छेदजानती नाम तेन सहोपभोगं स्वप्ने वा कथयेत्। गोत्रस्खलितं भाया चास्य निन्देत्। तद्वयपदेशेन स्वयमीर्ष्या दर्शयेत्। नखदशनचिह्नितं वा किंचिद्दद्यात्। भवतेऽहमादौ दातुं संकल्पितेति चाभिदधीत। मम भार्याया का रमणीयेति विविक्ते पर्यनुयुञ्ञत सा स्वयंदूती।।

अर्थ- स्वयंदूती- जब कोई प्रेमिका अपने प्रेमी के पास किसी दूती को भेजती है तथा वह दूती स्वयं ही उस प्रेमी पर मोहित हो जाती है तो उसे स्वयंदूती कहते हैं। उससे ज्यादा परिचय न होने के बावजूद भी वह सपने में उससे संभोग करने की इच्छा रखती है तथा इस बात की निन्दा करती है कि मेरी तो किस्मत ही खराब है अब तो आप मुझे कभी याद ही नहीं करते और अपनी पत्नी के पास ही भागते रहते हैं। अगर वह खूबसूरत होती तो उसे बुलाना भी सही था। वह इस वह कहती हुई प्रेमी की पत्नी से जलन प्रकट करती है। भाव-भंगिमा जाहिर करने के लिए नाखून और दांतों के निशान बनाकर किसी चीज को पुरुष को देना चाहिए। रात में पान देते समय अपने प्यार का प्रतीक रागात्मक चीजों के द्वारा प्रदान कर दें तथा उससे कहे कि मेरे पिता ने पहले आपके साथ ही मेरी शादी करने का फैसला किया था। वैसे भी मै आपकी पत्नी से कहीं ज्यादा खूबसूरत हूं। वह अकेले में पुरुष से इस प्रकार का अनुयोग करती है।

श्लोक (51)- तस्या विविक्ते दर्शनं प्रतिग्रहश्च।।

अर्थ- खुद दूती को देखने और उससे संदेश लेने-देने में एकांत होना जरूरी है।

श्लोक (52)- प्रतिग्रहच्छेलनान्यामभिसंधायास्याः संदेशश्रावणद्वारेण नायकं साधयेत् तां चोपहन्यात्सापि स्वयंदूती।।

अर्थ- जो प्रेमिका संदेश प्रेमी से लाने के बहाने अभिसंधि करके प्रेमिका का संदेश सुनाने का उपक्रम करके प्रेमी को अपने ऊपर मोहित कर लेती है, प्रेमिका को अपने प्रेमी से मिलने नहीं देती उसको भी स्वयंदूती कहा जाता है।

श्लोक (53)- एतया नायकोऽप्यन्यदूतश्च व्याख्यातः।।

अर्थ- स्वयंदूत- ऐसे ही पुरुष किसी पुरुष का संदेश ले जाने के बहाने स्त्री के पास जाता है और संदेश देने वाले पुरुष के बजाय खुद ही उसे अपने जाल में फंसा लेता है। इसे ही स्वयंदूत कहा जाता है।

श्लोक (54)- नायकभार्या मुग्धां विश्वास्यायन्त्रणयानुप्रविश्य नायकस्य चेष्टितानि पृच्छेत्। योगाञ्शिक्षयेत्। साकारं मंण्डयेत्। कोपमेनां ग्राहयेत्। एवं च प्रतिपद्यस्वेति श्रावयेत्। स्वयं चास्यां नखदशनपदानि निर्वर्तयेत्। तेन द्वारेण नायकमाकारयेत्सा मूढदूती।।

अर्थ- मूढ़दूती- प्रेमी की मुग्धा प्रेमिका को भरोसा दिलाकर, बिना किसी कोशिश के उसके दिल में छुपी हुई प्रेमी की बातें पूछकर, संभोग की क्रियाएं सिखाए। मकसद जाहिर करने वाली श्रंगार रचना कराएं। पति से उसका झगड़ा करा दें, खुद ही उसे शरीर के अंगों में दांतों और नाखूनों से निशान बना दें इसके बाद उस पर अपने मकसद को जाहिर करें। ऐसी स्त्री को मूढ़दूती कहा जाता है।

श्लोक (55)- तस्यास्तेयैव प्रत्युत्तराणि योजयेत्।।

अर्थ- अगर कोई स्त्री ऐसी मूढ़दूती से काम करा रही हो तो पुरुष को उसे बदल देने के लिए उसी के साथ संभोग क्रिया करनी चाहिए।

श्लोक (56)- स्वभार्या वा मूढां प्रयोज्य तया सह विश्वासेन योजयित्वा तयैवाकारयेत्। आत्मनश्च वैचक्षण्यं प्रकाशयेत्। सा भार्या दूती तस्यास्तयैवाकाग्रहणम्।।

अर्थ- भार्यादूती- पुरुष जिस स्त्री से संभोग करना चाहता हो उसके साथ अपनी पत्नी की जान-पहचान कराके उसकी सबसे प्यारी सहेली बना देना चाहिए। फिर उसी से अपने भावों को परिचित कराएं। ऐसे मौके पर अगर वह स्त्री अपनी कुशलता का परिचय देती है तो उसे भार्यादूती कहा जाता है। स्त्री का भाव उसी के द्वारा जाना जाता है।

श्लोक (57)- बालां वा परिचारिकामदोषज्ञामदुष्टेनोपायेन प्रहिणुयात्।

तत्र स्त्रजि कर्णपत्रे वा गूढ़लेखनिधानं नखदशनपदं वा सा मूकदूती। तस्यास्तयैव प्रत्युत्तरप्रार्थनाम्।।

अर्थ- मूकदूती- जिसे अच्छाई और बुराई के बारे में ज्ञान न हो, ऐसी दासी आदि को अपनी प्रेमिका के घर खेलने के लिए भेज देना चाहिए। उस दासी के साथ प्रेमिका की जान-पहचान हो जाने पर कर्णपत्र अथवा माला में प्रेमपत्र रखकर नाखून तथा दांत के निशान बना दें। इस प्रकार काम करने वाली दासी को मूकदूती कहा जाता है।

श्लोक (58)- पूर्वप्रस्तुतार्थलिगंसंबद्धमन्यजनाग्रहणीयं लौकिकार्थ द्वयर्थ वा वचनमुदासीना या श्रावयेत्सा वातदूती। तस्या अपि तयैव प्रत्युत्तरप्रार्थनमिति तासां विशेषाः।।

अर्थ- वातदूती- प्रेमिका की सांकेतिक भाषा, श्लेषभाषा को जो उदासीन रहकर प्रेमिका को सुऩाएं तथा उससे उसी भाषा में जवाब भी मांगें तो उसे वातदूती कहते हैं।

श्लोक (59)- भवन्ति चात्र श्लोकाः-

विधनेक्षणिका दासी भिक्षुकी शिल्पकारिका। प्रविशत्याशु विश्वासं दूतीकार्य च विन्दति।।

अर्थ- इस विषय के श्लोक हैं-

विधवा, घराने वाली, भिखारिन, सगुन, नायन आदि स्त्रियां किसी के साथ भी जल्दी घुल-मिल जाती हैं और विश्वासपात्र बन जाती हैं और फिर दूती का काम करती हैं।

श्लोक (60)- संक्षेपेण दूतीकर्माण्याह-

विद्वेषं ग्राहयेत्पत्यौ रमणीयानि वर्णयेत्। चित्रान्सुरतसंभोगा- नन्यासामपि दर्शयेत्।।

अर्थ- दूती पति से पत्नी को झगड़ा करा दें, प्रेमिका को उससे मिलाना चाहें, उसकी तारीफ करें, दूसरी स्त्रियों के सामने भी अश्लील चित्र आदि दिखाएं।

श्लोक (61)- नायकस्यानुरागं च पुनश्च रतिकौशलम्। प्रार्थनां चाधिकस्त्रीभिरवष्टम्भं च वर्णयेत्।।

अर्थ- प्रेमी के संभोग तथा प्यार आदि का वर्णन करें, प्रेमिका से भी बढ़कर सुंदरी तथा अमीर स्त्रियों का वर्णन सुनाएं कि वह प्रेमी पर मोहित है। इसके साथ ही प्रेमिका के कठोर निश्चय को भी जाहिर करें।

श्लोक (62)- असंकल्पित्मप्यर्थमुत्सृष्टं दोषकारणात्। पुनरावर्तयत्येव दूती वचनकौशलात्।।

अर्थ- दूती अपनी बातों के द्वारा निन्दित, हेय, परित्यक्त तथा अनाहत प्रेमी को भी फिर से प्रेमिकाओं का प्रेमी बना देने में माहिर बना देती है।

जानकारी- इस अध्याय के पहले और दूसरे अध्याय में यह बताया जा चुका है कि पुरुष द्वारा जिस पराई स्त्री को वश में करने में अड़चने आती हो वहां पर उसे दूतियों का सहारा लेना चाहिए।

          कामसूत्र के रचनाकार आचार्य वात्स्यायन 2 प्रकार की दूतियां बताई हैं- साधारण और खास। निसृष्टार्था, परिमितार्था, पत्रहारी, स्वयंदूती, मूढ़दूती, भार्यादूती, मूकदूती और वातदूती समेत 8 तरह की साधारण किस्म की दूतियां होती है।

          दूती को चाहिए कि वह पहले प्रेमिका से बहुत गहरी दोस्ती कर ले, उसकी ज्यादा से ज्यादा तारीफ करे और इसके बाद प्रेमी से बात करनी शुरु करे।

          कामसूत्र में 8 प्रकार की दूतियों के बारे में बताया गया है। इन दूतियों का चुनाव कार्य, जरूरत और मौके की उपयोगिता को ध्यान में रखकर किया गया है। उनके लक्षण इस प्रकार से हैं-

निसृष्टार्था-

          प्रेमी के इरादों को जानकर अपनी ही बुद्धि से जो कार्य को पूरा करती है वह निसृष्टार्था दूती होती हैं। जब प्रेमी और प्रेमिका में आपस में देखा-देखी, बातचीत हो चुकी हो, तब इस प्रेमी की उपयोगिता है।

परिमितार्था-

          जिसको कुछ उपाय बताए जा रहे हो, फिर जो कुछ बाकी रह जाता है उसे वह अपने तजुर्बे से समझकर प्रेमी और प्रेमिका का नजरिया बनाती है उसे परिमितार्था कहते हैं।

          जब प्रेमी और प्रेमिका एक दूसरे को देख तो लेते हैं लेकिन रोजाना नहीं और आपस में मिल भी नहीं पाते हैं तो उस समय परिमितार्था दूती उनको मिलाने की कोशिश करती हैं।

पत्रहारी दूती-

          जो दूती प्रेमी और प्रेमिका के प्रेम पत्रों को एक-दूसरे पहुंचाने का काम करती है उसे पत्रहारी दूती कहते हैं।

          जो प्रेमी और प्रेमिका एक-दूसरे के साथ बहुत ही ज्यादा गहरे प्रेम में बंध चुके हो और आपस में संभोग भी कर चुके हो तो उनके बीच पत्रहारी दूती यही काम करती है कि जिस समय प्रेमी या प्रेमिका की तरफ से संभोग करने का निश्चय किया जाता है वह उसकी सूचना प्रेमी या प्रेमिका को दे देती है।

स्वयंदूती-

          जो स्त्री किसी संदंश आदि का बहाना करके पुरुष के पास में जाती है तथा वहां उससे अपनी तारीफ करके या दूसरे तरीकों से प्रेमी को मोहित करके उससे संभोग करती है उसे स्वयंदूती कहा जाता है। स्वयंदूती का अर्थ है अपने लिए स्वयं दूती बन जाना।

मूढ़दूती-

          स्त्री जब किसी पुरुष को चाहती है तो उसको अपने ऊपर आकर्षित करने के लिए वह चालाक स्त्री प्रेमी की सीधी-सादी पत्नी से प्रेम संबंध बनाकर प्रेमी की पसंद, उसका संभोग का राज आदि जानकर फिर उसी के अनुसार भाव-भंगिमाएं, कटाक्ष-विलास करके अपने मकसद को पूरा कर लेती है। तब प्रेमी की सीधी-सादी पत्नी मूढ़दूती कहलाती है।

भार्यादूती-

          जब कोई प्रेमी अपनी प्रेमिका को फंसाने के लिए उसके पीछे अपनी पत्नी को लगा देता है और फिर अपने मकसद को पूरा करता है तो उस प्रेमी की पत्नी को भार्यादूती कहा जाता है। भार्यादूती मूढ़दूती ही बना करती है।

मूकदूती-

          किसी नादान, अंजान नौकरानी या बालिका से माला या कान के फूल के भीतर छिपाकर प्रेम-पत्रिका भेजी जाए तो उसे मूकदूती कहा जाता है।

वातदूती-

          जो प्रेमी और प्रेमिका अपने बीच की बातों को इशारों या किसी ऐसी भाषा में कहें कि जिसे दूसरे लोग न समझ पाए। इसके साथ ही अपनी बात भी उदासीनों की तरह सुना दें तो उसे वातदूती कहा जाता है।

          दूसरे अधिकरण में आचार्य वात्स्यायन ने ग्राम ब्रज प्रत्यन्त योषिद्विश्च नागरकस्य लिखकर देहाती, ग्वालिन और भीलनी वर्ग की स्त्री के साथ संभोग करने वाले, कामकला में निपुण, नागरक को खलरत करने वाला बताया है। आचार्य वात्स्यायन की इस बात को सिरे से नकारते हुए एक भील युवक अपनी भील प्रेमिका से व्यंजनापूर्ण शब्दों में कहता है कि मुझ गरीब की यही प्रार्थना है कि कुचयुग्मों को पत्तों से न ढको।

श्लोक- इति श्रीवात्स्यायनीये कामसूत्रे पारदारिके पञ्ञमेऽधिकरमे दूतीकर्माणि चतुर्थोऽध्यायः।

कामसूत्र

Vātsyāyana
Chapters
कामसूत्र
कामसूत्र का परिचय
1
नागरकवृन्त प्रकरण 1
नागरकवृन्त प्रकरण 2
विद्या समुदेश प्रकरण 1
विद्या समुदेश प्रकरण 2
विद्या समुदेश प्रकरण 3
विद्या समुदेश प्रकरण 4
त्रिवर्ग प्रतिपत्ति प्रकरण 1
त्रिवर्ग प्रतिपत्ति प्रकरण 2
त्रिवर्ग प्रतिपत्ति प्रकरण 3
शास्त्र संग्रह 1
शास्त्र संग्रह 2
नायक सहायदूतकर्म विमर्श प्रकरण 1
नायक सहायदूतकर्म विमर्श प्रकरण 2
2
प्रथम अध्याय
द्वितीय अध्याय
तृतीय अध्याय
चतुर्थ अध्याय
पंचम अध्याय
षष्ठम अध्याय
सप्तम अध्याय
अष्टम अध्याय
नवम अध्याय
दशम अध्याय
3
प्रथम अध्याय
द्वितीय अध्याय
तृतीय अध्याय
चतुर्थ अध्यायः
पंचम अध्याय
4
प्रथम अध्याय
द्वितीय अध्याय
5
प्रथम अध्याय
द्वितीय अध्याय
चतुर्थ अध्याय
पंचम अध्याय
षष्ठम अध्याय
6
प्रथम अध्याय
द्वितीय अध्याय
तृतीय अध्याय
चतुर्थ अध्याय
पंचम अध्याय
षष्ठम अध्याय
7
प्रथम अध्याय
द्वितीय अध्याय