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प्रथम अध्याय

स्त्री-पुरुष शीलावस्थापन प्रकरण

श्लोक (1)- तेषु साध्यत्वमनत्ययं गम्यत्वमायतिं वृत्ति चादित एवं परीक्षेत।।

अर्थ- पराई स्त्री के साथ संभोग करने की इच्छा रखने से पहले यह सोच लेना चाहिए कि वह स्त्री मिल सकती है या नहीं, उसको पाने में कहीं किसी तरह का संकट तो नहीं आ सकता, वह स्त्री संभोग करने के लायक है भी या नहीं, उसे अपने वश में करने के बाद उस पर मेरा असर कैसा पड़ेगा और मुझे उससे क्या फायदा होगा।

श्लोक (2)- यदा तु स्थानात्स्थानान्तरं कामं प्रतिपद्यमानं षश्येत्तदात्मशरीरोपघातत्राणार्थं परपरिग्रहनभ्युपगच्छेत्।।

अर्थ- जब पुरुष किसी पराई स्त्री को देखकर उत्तेजना में भर जाता है तो उसे उस समय सोचना चाहिए कि मै क्या कर रहा हूं। जब उसे महसूस हो कि अब मैं उससे संभोग करे बिना नहीं रह सकता तब जाकर उस स्त्री के साथ संभोग करना चाहिए।

श्लोक (3)- दश तु कामस्य स्थानानि।।

अर्थ- व्यवहार के लिए उत्तेजना के 10 स्थान है।

श्लोक (4)- चक्षुःप्रीतिर्मनःसंगः संकल्पोत्सापत्तिर्निद्राच्छेदस्तनुता विषयेभ्यो व्यावृत्तिर्जञ्ञप्रणाश उन्मादो मूर्च्छा मरणमिति तेषां लिंगानि।

अर्थ- स्त्री को देखकर आंखों में प्यार छलक जाना, मन का भटक जाना, उसे हासिल करने की कसम लेना, रात में नींद न आना, शरीर से कमजोर होते जाना, सब चीजों से मन हट जाना, शर्म न करना, पागलपन पैदा हो जाना, बेहोशी छाना और मृत्यु हो जाना उत्तेजना के 10 स्थान हैं।

श्लोक (5)- तत्राकृतितो लक्षणत्श्च युवत्याः शीलं शौचं साध्यतां चण्डवेगतां च लक्षयेदित्पाचार्याः।।

अर्थ- जो पुरुष पराई स्त्री से संभोग करते है वह पहले ही स्त्री की सूरत और उसके हाव-भावों को देखकर पता कर लेते हैं कि वह पवित्र स्त्री है या पराए पुरुषों में दिलचस्पी रखने वाली स्त्री है।

श्लोक (6)- व्यबिचारादाकृतिलक्षणयोगानामिंगताकाराभ्यामेव प्रवृत्तिर्बोद्धव्या योषित इति वात्स्यायनः।।

अर्थ- आचार्य वात्स्यायन के मुताबिक स्त्री के शरीर और शरीर पर पड़े हुए निशानों को देखकर ही पता किया जा सकता है कि वह किस किस्म की स्त्री है।

श्लोक (7)- यं कश्चिदुज्ज्वलं पुरुषं दृष्टा स्त्री कामयते। तथा पुरुषोऽपिर योषितम्। अपेक्षया तु न प्रवर्तते इति गोणिकापुत्रः।।

अर्थ- आचार्य गोपिकापुत्र के अनुसार जिस तरह से स्त्री किसी बहुत ही सुंदर, गुणी, सभ्य और धनवान पुरुष को देखकर उस पर मोहित हो जाती है उसी तरह से पुरुष भी किसी सुंदर स्त्री को देखकर उस पर अपने दिलो-जान छिड़कने लगता है।

श्लोक (8)- तत्र स्त्रियां प्रति विशेषाः।।

अर्थ- वैसे तो स्त्री और पुरुष की यह प्रवृत्ति एक जैसी है लेकिन स्त्रियों में दूसरे पुरूषों की तरफ आकर्षित होने की यह प्रवृत्ति ज्यादा होती है।

श्लोक (9)- न स्त्री धर्ममधर्म चापेक्षते कामयत एव। कार्यपेक्षया तु नाभियुंगेः।।

अर्थ- स्त्री धर्म तथा अधर्म की कोई परवाह नहीं करती वह सिर्फ कामना ही करती है लेकिन मिलने पर अपने अंदर कोई दोष देख लेती है तो फिर नहीं मिलती क्योंकि देखे हुए दोष को देखने का स्त्री का शील होता है।

श्लोक (10)- स्वभावश्च पुरुषेणाबियुज्यमाना चिकीर्षन्त्यपि व्यावर्तते।।

अर्थ- जब कोई पुरुष स्त्री से मिलने की कोशिश करती है तो वह चाहते हुए भी खुद ही पीछे हट जाती है।

श्लोक (11)- पुनःपुनरभियुक्ता सिद्धयति।।

अर्थ- जब पुरुष उस स्त्री से बार-बार मिलने की कोशिश करता है तभी जाकर वह उससे संबंध स्थापित करती है।

श्लोक (12)- पुरुषस्तु धर्मस्थितिमार्यसमयं चापेक्ष्य कामयमानोऽपि व्यावर्तते।।

अर्थ- बहुत से पुरुष ऐसे होते हैं जो पराई स्त्री के साथ संभोग करना तो चाहते है लेकिन समाज आदि के डर के कारण ऐसा नहीं कर पाते।

श्लोक (13)- तथाबुद्धिश्चाभियुज्यमानोऽपि न सिद्धयति।।

अर्थ- ऐसे पुरुष को अगर कोई स्त्री खुद ही संभोग के लिए कहती है तो भी वह उसके साथ ऐसा कुछ नहीं करता।

श्लोक (14)- निष्कारणमभियुंगे। अभियुज्यापि पुनर्नाबियुंगे। सिद्धायां च माध्यस्थ्यं गच्छति।।

अर्थ- स्त्रियां सिर्फ अपने शरीर की आग को मिटाने के लिए ही दूसरे पुरुष के साथ संबंध बनाती है लेकिन पुरुष स्त्री के साथ संभोग करने के बाद फिर से गमगीन हो जाता है।

श्लोक (15)- सुलभामवमन्यते। दुर्लभामाकांगत इति प्रायोवादः।

अर्थ- अगर पुरुष किसी स्त्री को आसानी से पा लेता है तो वह उसको आदर नहीं देता लेकिन अगर कोई स्त्री उसको नहीं मिलती तो वह उसको पाने के लिए कोशिश करता रहता है।

श्लोक (16)- तत्र व्यावर्तनकारणानि।।

अर्थ- व्यावर्तन कारण प्रकरण

          निम्नलिखित कारणों से स्त्रियां दूसरे पुरूषों को पाने की इच्छा नहीं करती है-

श्लोक (17)- प्रत्यावनुराग।।

अर्थ- अगर कोई स्त्री किसी दूसरे पुरुष को चाहती भी है तो भी उसके पति का प्यार उसको उसके पास जाने से रोक लेता है।

श्लोक (18)- अपत्यापेक्षा।।

अर्थ- दूध पीने वाले बच्चे का प्यार भी उसे रोक देता है।

श्लोक (19)- अतिक्रान्तवयस्त्वम्।।

अर्थ- जब स्त्री जवानी को पार कर लेती है तो वह भी दूसरे पुरुष के पास जाने से रुक जाती है।

श्लोक (20)- दुःखाभिभनः।।

अर्थ- अगर स्त्री दुखी है तो भी वह दूसरे पुरुष के पास नहीं जाती।

श्लोक (21)- विरहानुपलम्यः।।

अर्थ- जिस स्त्री का पति उसे अपने से कभी जुदा नहीं करता वह स्त्री भी दूसरे पुरुष के पास नहीं जाती।

श्लोक (22)- अवज्ञयोपमन्त्रयत इति क्रोधः।।

अर्थ- कहीं अपमान करने के लिए तो नहीं बुलाया है, इस तरह का गुस्सा करके भी दूर हो जाती है।

श्लोक (23)- अप्रतर्क्य इति संकल्पवर्जनम्।।

अर्थ- वह जिस पुरुष के पास जाना चाहती है अगर उसे यह लगता है कि मैं उसे हासिल नहीं कर सकूंगी तो भी वह उस पुरुष के पास जाने का ख्याल छोड़ देती है।

श्लोक (24)- गमिष्यतीत्यनायतिरन्यत्र प्रसक्तमतिरिति च।।

अर्थ- वह आदमी किसी और स्त्री से प्रेम कर रहा है या किसी और स्त्री के पास जा सकता है। यह सोचकर भी स्त्री उसके पास जाने का ख्याल अपने मन से हटा देती है।

श्लोक (24)- मित्रेषु निसृष्टभाव इति तेष्वपेक्षा।।

अर्थ- उसे लगता है कि वह पुरुष तो अपने दोस्तों की ही बुराई करता है, उनको अपनी सारी बात बता देता है। इसलिए वह उससे दूर जाने में ही अपनी भलाई समझती है।

श्लोक (25)- चण्डवेगः समर्थो वेति भयं मृग्याः।।

अर्थ- मृगी जाति अर्थात छोटी योनि वाली स्त्री पुरुष को ज्यादा उत्तेजक समझकर या उसके लिंग को बहुत ज्यादा समझकर डर के कारण उसके साथ संभोग करने से हट जाती है।

श्लोक (26)- नागरकः कलासु विचक्षण इति क्रीड़ा।।

अर्थ- उसे लगता है वह पुरुष तो संभोग की हर कला में निपुण है। इसी वजह से शर्म के कारण वह उसके साथ संभोग नहीं करती है।

श्लोक (27)- सखित्वेनोपचरित इति च।।

अर्थ- उसको पुरुष और अपनी दोस्ती याद आ जाती है इसलिए वह पीछे हट जाती है।

श्लोक (28)- परिभवस्थानमित्यबहुमानः।।

अर्थ- उस पुरुष को नीची जाति का समझकर वह उससे दूर होना ही सही समझती है।

श्लोक (29)- चशो मन्दवेग इति च हस्तिन्याः।।

अर्थ- हस्तिनी स्त्री अर्थात ज्यादा गहरी योनि वाली स्त्री को जब यह पता चलता है कि इस पुरुष का लिंग छोटा है अर्थात वह शश जाति का है तो वह उसके साथ संभोग करने का इरादा त्याग देती है।

श्लोक (30)- मत्तोऽस्य मा भूदनिष्टमित्यनुकम्पा।।

अर्थ- उसे लगता है कि मेरे इस पुरुष के साथ संबंध बनाने से उस पर कुछ विपत्ति न आ जाए। यही सोचकर वह उस पुरुष से दूर हो जाती है।

श्लोक (31)- विदिता सती स्वजनबहिष्कृता भविष्यामीति भयम्।।

अर्थ- अगर मेरे पति को या मौहल्ले वालों को इस बात का पता चल गया कि मैं किसी दूसरे पुरुष के साथ नाजायज संबंध बना रही हूं तो मैं घर से निकाली जा सकती हूं। इस डर से भी स्त्री दूसरे पुरुष के साथ संबंध बनाने का इरादा त्याग देती है।

श्लोक (32)- पत्या प्रयुक्तः परीक्षत इति विमर्शः।

अर्थ- उसे लगता है कि इस पुरुष को मेरे पति ने ही मेरे बारे में पता करने के लिए नहीं भेजा है।

श्लोक (33)- धर्मापेक्षा चेति।।

अर्थ- उसके मन में धार्मिक भावना आ जाने के कारण भी वह दूसरे पुरुष का ख्याल अपने मन से हटा देती है।

श्लोक (34)- तेषु यदात्मनि लक्षेयेत्तदादित एवं परिच्छिन्द्यात्।।

अर्थ- स्त्री के अपने से दूर जाने के कारणों के अपने अंदर रहते हुए भी उनको हासिल करने के लिए क्या करना चाहिए- यह निम्नलिखित है-

अपनी चालाकी के द्वारा स्त्री पर अपनी कमजोरियों और दोषों को प्रकट नहीं होने देना चाहिए।

श्लोक (35)- आर्यत्वयुक्तानि रागवर्धनात्।।

अर्थ- जिन कारणों से पुरुष को अपने पास आती हुई स्त्री भी नही मिलती। उसे सबसे पहले अपने अंदर के उन कारणों को दूर करना चाहिए।

श्लोक (36)- अशक्तिजान्युपायप्रदर्शनात्।।

अर्थ- पुरुष की जिस असमर्थता के कारण स्त्री उसे न मिल रही हो उसे उसकी असमर्थता को दूर करने का तरीका बता देना चाहिए।

श्लोक (37)- बहुमानकृतान्यतिपरिचयात्।।

अर्थ- ज्यादातर आत्मसम्मान की रुकावट को स्त्री से ज्यादा परिचय बढ़ाकर दूर कर देना चाहिए।

श्लोक (38)- परिभनकृतान्यतिशौण्डीर्याद्वैचक्षण्याश्च।।

अर्थ- परिभव की भावना से पैदा हुई रुकावट को समझदारी से दूर कर देना चाहिए।

श्लोक (39)- तत्परिभवजानि प्रणत्या।।

अर्थ- पुरुष के प्रति स्त्री में जो अविश्वास की भावना है उन्हें अपनी नम्रता दूर कर देना चाहिए।

श्लोक (40)- भवयुक्तान्याश्चासनादिति।।

अर्थ- भययुक्त रुकावटों को आश्वासनों को दूर कर देना चाहिए।

श्लोक (41)- पुरुषास्त्वमी प्रायेण सिद्धाः- कामसूत्रज्ञः कथाख्यानकुशलो बाल्यात्प्रभृति संसृष्टः प्रवृद्वयौवनः क्रीडनकर्मादिनागतविश्वासः प्रेषणस्य कर्तोचितसंभाषणः प्रियस्त कर्तान्यस्य भूतपूर्वो दूतो मर्मज्ञ उत्तमया प्रार्थितः संख्या प्रच्छत्रः संसृष्टः सुभगाभिख्यातः सहसंवद्धः प्रातिवेश्यः कामशीलस्तथाभूतश्च परिचारको मात्रेयिकापरिग्रहो नववरकः प्रेक्षोद्यानत्यागशीलो वृष इति सिद्धप्रतापः साहसिकः शूरो विद्यारूपगुणोपभोगैः पत्युरतिशयिता महार्हवेषोपचारश्चति।।

अर्थ- पराई स्त्रियों को अपने वश में करने वाले लोग-

            कामसूत्र को जानने वाले, कहानी सुनाने में चालाक, अच्छा खासा जवान, बचपन को दोस्त, सही बोलने वाला, खेल-खेलने में विश्वासी, जो स्त्री कहे वही कहे, मनचाही चीजों को लाकर देने वाला, सौभाग्याशाली हो, पहले दूत का काम कर चुका हो, जिसे चाहता हो उससे गुपचुप तरीके से मिल चुका हो, किसी अच्छी स्त्री का प्यार पा चुका हो, स्त्री के साथ उसका पालन-पोषण भी हुआ हो, पड़ोसी, क्रियाशील नौकर, नया दामाद, धाय की पुत्री का पति, नाच, नौटंकी देखने में रुचि रखने वाला, स्त्रियों को उपहार देने वाला, हट्टा-कट्टा, बहादुर, अपनी प्रेमिका के लिए जान की बाजी लगाने वाला, विद्या, गुण, रूप और भोग में स्त्री से बढ़कर हो, जिसका अच्छा वेश हो, संभोग कलाओं में निपुण हो और मर्मज्ञ हो।

श्लोक (42)- यथात्मनः सिद्धतां पश्येदेवं योषियोऽपि।।

अर्थ- जिस प्रकार पुरुष अपने उपायों की कामयाबी के बारे में सोचता है, उसी तरह उसे यह भी सोच लेना चाहिए कि जिस स्त्री को वह चाहता है उसे वह मिल सकेगी भी या नहीं।

श्लोक (43)- अयन्तसाध्या योषितस्तिवमाः- अभियोगमात्रसाध्याः द्वारदेशावस्थानी। प्रासादाद्राजमार्गावलोकिनी। तरुणप्राति वेश्यगृहे गोष्ठीयोजिनी। सततप्रेक्षिणी। प्रेक्षिता पार्श्चविलोकिनी। निष्कारणं सपत्न्याधिवित्रा। भर्तृद्वेषिणी विद्विष्टा च। परिहारहीना। निरपत्या।

अर्थ- अयवसाध्य योषित प्रकरण

          हर समय घर के दरवाजे पर खड़ी रहने वाली स्त्री, आसानी से वश में आने वाली स्त्री, छत से सड़क की ओर देखने वाली, आने-जाने वालों को देखने वाली, अपने युवा पड़ोसी के यहां पर जाकर गप्पे हांकने वाली, किसी के द्वारा देखने पर टेढ़ी नजर से देखने वाली, अपने पति को पसंद न करने वाली, पति से नफरत करने वाली, बच्चा पैदा न करने वाली।

श्लोक (44)- ज्ञातिकुलनित्या। विपत्रापत्या। गोष्ठीयोजिनी। प्रीतियोजिनी। कुशीलवभार्या। मृतपतिका बाला। दरिद्रा बहूपभोगा। ज्येष्ठभार्या बहूदेवरका। बहुमानिनी न्यूनभर्तृका। कौशलाभिमानिनी भर्तुमौर्ख्येणोद्वग्ना। अविशेषतया लोभेन।।

अर्थ- जो स्त्री हर किसी स्त्री के साथ दोस्ती कर लेती हो, जो अपने मायके में ज्यादातर रहती हो, बचपन में विधवा होने वाली, जिसके बच्चे पैदा होकर ही मर जाते हों, नौटंकी, डांस आदि करने वालों की पत्नियां, जिसके बहुत सारे देवर हो, गरीब होते हुए भी जो बड़ी-बड़ी चीजों का शौक रखती हो, जो अपनी खूबसूरती के आगे अपने पति को भी कुछ न समझती हो, जो अपने पर बहुत ज्यादा घमंड करती हो, अपने पति को छोड़कर पराए पुरुष को चाहती हो।

श्लोक (45)- कन्याकाले यत्नेन वारिता कर्थाचिदलब्धाभियुक्ता च सा तदानीम् समानबुद्धिशीलमेधाप्रतिपत्तिसात्म्या। प्रकृत्या पक्षपातिनी। अनपराधे विमानिता। तुल्यरूपाभिश्चाधः कृता। प्रोषितपतिकेति। ईर्ष्यालुपूतिचोक्षल्कीबदीर्घसूत्रकापुरुषकुब्जवाम नविरूपमणिकारग्राम्यदुर्गन्धि- रोगिवृद्धभार्याश्चेति।।

अर्थ- जो स्त्री बुद्धि, विवेक और शील में पुरुष की बराबरी रखती हो, जिसे अपनी पसंद का पति न मिला हो, जो बिना किसी कारण के अपमान सहती हो, जिसका पति उससे कहीं दूर रहता हो, झगड़ालू स्वभाव का हो, नपुंसक हो, डरपोक हो, कद में छोटा हो, बदसूरत हो, दूसरी स्त्रियों की तरफ आकर्षित हो जाता हो, पढ़ा-लिखा न हो, लंबे समय से बीमार हो, ऐसी स्त्रियां दूसरे पुरुषों की तरफ आकर्षित हो जाती हैं।

श्लोक (46)- श्लोकावत्र भवतः-

इच्छा स्वभावतो जाता क्रियया परिवृंहिता। वुद्धया संशोधितोद्वेगा स्थिरा स्यादनपायिनी।

अर्थ- इस विषय के अंदर 2 बहुत ही पुराने और मशहूर श्लोक हैं- यह बात तो स्वाभाविक ही है कि किसी भी सुन्दर स्त्री को पुरुष चाहता है और किसी भी खूबसूरत पुरुष को स्त्री चाहती है। ऐसी इच्छाएं परिचय और उपायों द्वारा बढ़ाई जा सकती हैं और बुद्धि से उद्वेगों का संशोधन करके इस तरह की ख्वाहिश स्थायी बनाई जा सकती है।

श्लोक (47)- सिद्धतामात्मनो ज्ञात्वा लिंगान्युत्रीय योषिताम्। व्यावृत्तिकारणोच्छेदी नरोयोषित्सु सिध्यति।।

अर्थ- खुद को मिलने वाली सफलताओं को समझकर स्त्री के हाव-भाव, कटाक्ष का अंदाजा करके मुश्किलों को दूर करने का उपाय करके पुरुष दूसरी स्त्रियों से संभोग करने में सफल हो सकता है।

           पराई स्त्रियों से साथ किस तरह जान-पहचान बनाई जा सकती है उसके बारे में इस अधिकरण में बताया गया है लेकिन पहले अध्याय में पहले स्त्री और पुरुष के शील-स्वभाव की व्यवस्था बताई गई है। फिर उन कारणों के बारे में पता किया जाए जिनसे चाहने वाली स्त्री भी पुरुष से दूर रहती है। इसके बाद यह बताया जा रहा है कि ऐसी कौन सी स्त्री है जो बिना किसी कोशिश के पराए पुरुष से सहवास कराने के लिए तैयार हो जाती है।

           इस प्रसंग में वात्स्यायन ने संभोग की 10 दशाएं बताई हैं। यह 10 दशाएं जुदाई के समय होती हैं। यह जरूरी नहीं है कि काम की ये 10 दशाएं सिर्फ पराई स्त्री से लेकर ही प्रवृत्त हुआ करती हैं। जहां कहीं भी इच्छा होती है वहीं संभोग की 10 दशाएं भी उत्पन्न हो जाती हैं।

           आचार्य वात्स्यायन द्वारा बताई गई असली बात यही है कि युवक, युवती, अपना, पराया कोई भी हो, मनचाही चीज के न मिलने पर कामसूत्र का यह अधिकरण सर्व-साधारण दशाओं में लेकर प्रवृत्त हुआ है। इस अधिकरण का मकसद सिर्फ पराई स्त्री ही नहीं है लेकिन चाहत की सर्वसाधारण चीजों को समझना चाहिए।

           आचार्य वात्स्यायन ने संभोग की जिन 10 दशाओं के बारे में बताया है वह सिर्फ पुरुषों को ही नहीं परेशान करती बल्कि स्त्रियों को भी परेशान करती हैं क्योंकि जिस तरह से पुरुष दूसरी स्त्रियों के साथ संबंध बनाने के लिए उत्सुक रहते हैं उसी तरह स्त्रियां भी दूसरे पुरुषों के साथ संबंध बनाने की इच्छा रखती हैं।

इति श्रीवात्स्यायनीये कामसूत्रे पारदारिके पश्चमेऽधिकरणे स्त्री-पुरुषशीलावस्थापनं व्यावर्त्तनकारणानि स्त्रीषु सिद्धाः पुरुषा अयत्नसाध्या योषितः प्रथमोऽध्यायः।।

श्लोक (1)- तेषु साध्यत्वमनत्ययं गम्यत्वमायतिं वृत्ति चादित एवं परीक्षेत।।

कामसूत्र

Vātsyāyana
Chapters
कामसूत्र
कामसूत्र का परिचय
1
नागरकवृन्त प्रकरण 1
नागरकवृन्त प्रकरण 2
विद्या समुदेश प्रकरण 1
विद्या समुदेश प्रकरण 2
विद्या समुदेश प्रकरण 3
विद्या समुदेश प्रकरण 4
त्रिवर्ग प्रतिपत्ति प्रकरण 1
त्रिवर्ग प्रतिपत्ति प्रकरण 2
त्रिवर्ग प्रतिपत्ति प्रकरण 3
शास्त्र संग्रह 1
शास्त्र संग्रह 2
नायक सहायदूतकर्म विमर्श प्रकरण 1
नायक सहायदूतकर्म विमर्श प्रकरण 2
2
प्रथम अध्याय
द्वितीय अध्याय
तृतीय अध्याय
चतुर्थ अध्याय
पंचम अध्याय
षष्ठम अध्याय
सप्तम अध्याय
अष्टम अध्याय
नवम अध्याय
दशम अध्याय
3
प्रथम अध्याय
द्वितीय अध्याय
तृतीय अध्याय
चतुर्थ अध्यायः
पंचम अध्याय
4
प्रथम अध्याय
द्वितीय अध्याय
5
प्रथम अध्याय
द्वितीय अध्याय
चतुर्थ अध्याय
पंचम अध्याय
षष्ठम अध्याय
6
प्रथम अध्याय
द्वितीय अध्याय
तृतीय अध्याय
चतुर्थ अध्याय
पंचम अध्याय
षष्ठम अध्याय
7
प्रथम अध्याय
द्वितीय अध्याय