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प्रथम अध्याय

भार्याधिकारिक (एकचारिणी वृत प्रकरण)

श्लोक-1. भार्यैकचारिणी गूढ़विश्रम्भा देववत्पतिमानुकूल्यन वर्तेत।।1।।

अर्थ- दो प्रकार की भार्या (पत्नी) होती हैं। 1. पहली एकचारिणी अर्थात अकेली। 2. दूसरी सपत्निका (सौतों वाली)। इन दोनों में पहले एकचारिणी अर्थात अकेली वाली पत्नी को सर्वश्रेष्ठ माना गया है।

    जो पत्नी अपने पति को देवता के समान मानती है, पति की विश्वासपात्र होती है वही पतिव्रता होती है।

श्लोक-2. तन्मतेन कुटुम्बचिन्तामात्मानि संनिवेशयेत।।2।।

अर्थ- इसके अंतर्गत एकचारिणी अर्थात अकेली वाली पत्नी के आचरण का वर्णन किया जाता है। ऐसी पत्नी को अपने पति की आज्ञानुसार घर की जिम्मेदारी ले लेनी चाहिए।

श्लोक-3. वेश्म च शुचि सुसंमृष्टस्थानं विरचितविविधकुसुमं श्लक्ष्णभूमितलं ह्रद्यदर्शनं त्रिषवणाचरित बलिकर्म पूजिदेवतायतनं कुर्यात।।3।।

अर्थ- जिन घरेलू कार्य़ों में स्त्री लगी रहती है। उसका वर्णन इस श्लोक में किया गया है- स्त्री को अपने घर को साफ-सुथरा रखना चाहिए। घर में फूल सजाकर रखे। आंगन को साफ-सुथरा तथा सुंदर बनाये। घर में सुबह- दोपहर तथा शाम को पूजा-अर्चना करे तथा घर के अंदर पूजा-अर्चना की व्यवस्था सही रखे।

श्लोक-4. न ह्यतोऽन्यद्गृहस्थानां चित्त ग्राहकमस्तीत गोनर्दीयः।।4।।

अर्थ- आचार्य़ गोनर्दीय का कथन है कि जिस गृहस्थी को देखकर मन प्रसन्न हो उठता है। उससे बढ़कर और कुछ भी नहीं होता है।

श्लोक-5. गुरुष भृत्यवर्गेषु नायकभगनीषु तत्पतिषु व य़थार्हं प्रतिपत्तिः।।5।।

अर्थ- इस श्लोक में दो प्रकार के आचरणों का वर्णन किया गया है।

    स्त्री को सास-ससुर, नंद-नंदोई तथा नौकरों के साथ उचित व्यवहार करना चाहिए।

श्लोक-6. परिपूतेषु च हरितशाकवप्रानिक्षुस्तम्बाञ्जीरकसर्षपाजमोदशतपुष्पातमालगुल्मश्चिकारयेत्।।6।।

अर्थ- प्रतिदिन उपयोग में आने वाली सब्जियों की क्यारियां साफ-सुथरी पर बनाना चाहिए। इन क्यारियों में गन्ना, जीरा, सरसों, अजमोद, सौंफ तथा तमाल के पौधों को भी लगाना चाहिए।

श्लोक-7. कुब्जकामलकमल्लिकाजातीकुरण्टकनवमालिकातरगरन्नद्यावर्तजपागुल्मानन्यांश्च बहुपुष्पान्बालकोशीरकपातलिकांश्च वृक्षवाटिकायां च स्थण्डिलानि मनोज्ञानि कारयेत्।।7।।

अर्थ- स्त्रियों को घर के पास की क्यारियों में गुलाब बास, मोतिया, चमेली, नेवारी, वासंती, तगर, कदम्ब, जवाकुसुम के पौधे लगाने चाहिए। इसके अतिरिक्त अन्य फूलों के पौधे तथा नेत्रबाला, खश, पातालिका के पेड़ घर के पास की क्यारियों में लगायें तथा क्यारियों की सुंदरता बढ़ाने के लिए पगडण्डियां भी बनाएं।

श्लोक-8. मध्ये कूपं वापीं दीर्घिकां वा खानयेत्।।8।।

अर्थ- गृह वाटिका के बीच में कुआं, बावड़ी या चौकोर बैठने के स्थान का निर्माण करायें।

श्लोक-9. भिक्षुकीश्रमणाक्षपणाकुलटाकुहकेतक्षणिकामूलकारिकाभिर्न संसृज्येत।।9।।

अर्थ-  भिखारिनों, बौद्ध तथा जैन संयासिनियों, नाच-गान, तमाशा दिखाने वाली, बुरे आचरण करने वाली, सगुन घराने वाली तथा तंत्र-मंत्र और जादू-टोना करने वाली स्त्रियों से किसी भी प्रकार का संपर्क नहीं करना चाहिए।

श्लोक-10. भोजने च रुचितमिदमस्मै द्वेष्यमिदं पथ्यमिदमपथ्यमिदमिति च विन्द्यात्।।10।।

अर्थ- स्त्रियों को अपने पति की रुचि तथा पसंद-नापसंद के अनुसार ही भोजन पकाना चाहिए।

श्लोक-11. स्वरं बहिरुपश्रुत्य भवनमागच्छतः किं कृत्यमिति ब्रुवती सज्जा भवनमध्ये तिष्थेत।।11।।

अर्थ- यदि बाहर से घर आते ही पति किसी काम के लिए आवाज दे तो पत्नी को शीघ्र ही पति के पास जाकर पूछना चाहिए कि वे किस काम के लिए आवाज दे रहे थे।

श्लोक-12. परिचारिकामपनुद्य स्वयं पादौ प्रक्षालयेत्।।12।।

अर्थ- पति के पैरों को नौकरानी आदि से न धुलवाकर पत्नी को स्वयं ही धोना चाहिए।

श्लोक-13. नायकस्य च न विमुक्तभूषणं विजने संदर्शने तिष्ठेत्।।13।।

अर्थ- पत्नी को अकेले में अपने पति के पास सज-संवर कर ही जाना चाहिए।

श्लोक-14. अतिव्ययमद्ययं वा कुर्वाणुं रहसि बोधयेत्।।4।।

अर्थ- यदि पति आवश्यकता से अधिक खर्च करता है तो उसे पत्नी को अकेले में और प्यार से समझाना चाहिए।

श्लोक-15. आवाहे विवाहे यज्ञे गमनं सखीभिः सह गोष्ठीं देवताभिगमनमित्यनुज्ञाता कु्र्मात।।15।।

अर्थ- जिसकी शादी हो रही हो ऐसे दूल्हा के या लड़की के घर सखी-सहेलियों के साथ खान-पान, गोष्ठी जाना हो या मंदिर जाना हो तो इसके लिए पत्नी को अपने पति से पूछकर ही जाना चाहिए।

श्लोक-16. सर्वक्रीड़ासु च तदानुलोम्येन प्रवृत्तिः।।16।।

अर्थ- पति की आज्ञा लेकर ही पत्नी को किसी खेल में भाग लेना चाहिए।

श्लोक-17. पश्चात्संवेशनं पूर्वमुत्थानमनवबोधनं च सुप्तस्य।।17।।

अर्थ- पति के सो जाने के बाद ही पत्नी को सोना चाहिए तथा जागने से पहले जागना चाहिए।

श्लोक-18. महानसं च सुगुप्तं स्याहद्दर्शनीयं च।।18।।

अर्थ- घर का किचन साफ-सुथरा और सुसज्जित होना चाहिए तथा ऐसी जगह पर हो, जहां पर घर से बाहर आदमी प्रवेश न कर सके।

श्लोक-19. नायकापचारेषु किंचित्कलुषिता नात्यर्थ निर्वदेत्।।19।।

अर्थ- यदि पति सेक्स के समय कोई भी विपरीत कार्य करता है तो पत्नी को धैर्य रखते हुए उसे प्यार से समझाए तथा मधुर वार्तालाप के द्वारा दुबारा ऐसा न करने की सलाह दें।

श्लोक-20. साधिक्षेपवचनं त्वेनं मित्रजनमध्यस्थमेकाकिनं वाप्युपालभेतय। न च मूलकारिका स्यात।।20।।

अर्थ- किसी कारणवश यदि पति को किसी बात की उलाहना देनी हो तो पत्नी उलाहना उसे अकेले में या उसके दोस्तों के बीच दें। लेकिन अपने पति को तंत्र-मंत्र के द्वारा अपने वश में करने की कोशिश न करें।

श्लोक-21. नह्यतोऽन्यदप्रत्ययकारणमस्तीति गोनर्दीयः।।12।।

अर्थ- आचार्य गोनर्दीय के अनुसार- तंत्र-मंत्र के द्वारा ही पति-पत्नी के बीच में परस्पर अविश्वास उत्पन्न होता है।

श्लोक-22. दुर्व्याहृतं दुर्निरीक्षितमन्यतो मंत्रण द्वारदेशावस्थानं निरीक्षणं वा निष्कुटेषु मंत्रण विविक्तेषु चिरमवस्थानामिति वर्जयेत।।22।।

अर्थ- बुरी बातों को बोलना, आंखे तिरक्षी करके बोलना, मुंह घुमाकर बाते करना, दरवाजे को पकड़कर खड़ी रहना तथा घर की एकांत वाटिका में किसी दूसरे से चुपचाप बातें करना- ये सभी आदतें बुरी होती हैं। इसलिए पतिव्रता स्त्रियों को ऐसी आदतों से दूर रहना चाहिए।

श्लोक-23. स्वेददन्तपंकदुर्गंधांश्च बुध्येतेति विरागकारणम्।।23।।

अर्थ- यदि शरीर से बदबूदार पसीना आता हो, दांतों में मैल के साथ दुर्गंध आती हो तो इसे शीघ्र ही शरीर से दूर कर देना चाहिए। क्योंकि इन सभी से पति को अरुचि होती है।

श्लोक-24. बहुभूषणं विविधकुसुमानुलेपनं विविधाड़्गरागसमुज्जवलं वास इत्याभिगामिको वेषः।।24।।

अर्थ- पत्नी को जब पति के पास जाने की इच्छा हो तो उसे विभिन्न प्रकार के आभूषण, विभिन्न प्रकार के सुगंधित लेप तथा अंगराग धारण करके और स्वच्छ और साफ कपड़े पहनकर अपने पति के पास जाना चाहिए।

श्लोक-25. प्रतनुश्लक्षणाल्पदुकूलता परमितिमाभरणं सुगंन्धिता नात्युल्वऩणमनुलेपनम्। तथा शुक्लान्यन्यानि पुष्पाणीति वैहारिको वेषः।।25।।

अर्थ- यदि स्त्री को किसी कार्यक्रम या कहीं घूमने जाना हो तो वह हल्का, पतला तथा चिकना वस्त्र ही पहने। सिर्फ कान तथा गले में ही आभूषण पहने। बालों में सफेद फूल गुंथे हो तथा शरीर पर चंदन का हल्का लेप लगा हो।

श्लोक-26. नायकस्य व्रतमुपवासं च स्वयमपि करणेनानुवर्तेत। वारितायां च नाहमात्र निर्बंधनीयेति तद्वचसो निवर्तनम्।।26।।

अर्थ- पति भक्त प्रकट करने के लिए पति की तरह व्रत और नियम पत्नी को भी करना चाहिए। यदि पति व्रत या उपवास करने से मना करे तो पत्नी को अपनी पति भक्ति प्रकट करते हुए कहना चाहिए कि मैं कैसे मान सकती हूं। मैं तो आपकी अनुगामिनी हूं।

श्लोक-27. मृद्विदलकाष्ठचर्मलोहभाण्डानां च काले समर्घग्रहणम्।।27।।

अर्थ- मिट्टी के बर्तन, बांस की दोहरी पिटारी, पीढ़ा, पलंग, तख्त आदि लकड़ी की वस्तु तथा लोहे का तवा, करछुल चिमटा, कड़ाही आदि उपयोगी बर्तन जब भी सस्ते मिले तो उन्हें खरीद लें।  

श्लोक-28. तथा लवणस्नेहयोश्च गंधद्रव्यकटुकभाण्डानां च दुर्लभानां भवनेषु प्रच्छन्नं निधानम्।।28।।

अर्थ- सेंधानमक, सांभर नमक, घी, तेल आदि रस पदार्थ, तगर, अछरीला, दारूहल्दी आदि सुगंधित वस्तुएं, लौकी की तुम्बी आदि कड़वी चीजें, द्विमूल, पंचमूल, दशमूल आदि दवाइयां और जो चीजें मुश्किल से प्राप्त होती हैं, उन्हें सूचित करके बर्तनों में छिपाकर रखें।

श्लोक-29. मूलकालुकपालड़्की-दमनकाम्रात कैर्वारुकत्रपुसवार्ताककृष्माण्डाला बुसूरण-शुकनासास्वयंगुप्तातिलपर्णिकाग्निमन्थलशुनपलाण्डुप्रभृतीनां सर्वौषधीनां च बीजग्रहणं काले वापश्च।।29।।

अर्थ- मूली, आलू, पालक, दौना, आमड़ा, मरसा, बैंगन, कोहड़ा (कद्दू) लौकी, सूरन, सोनापाठा, केवांच, खभारी, अरणी, लहसुन, प्याज तथा दवाइयों के बीज संभालकर रखें तथा उचित समय पर उन्हें बोयें।

श्लोक-30. स्वस्य च सारस्य परेभ्यो नाख्यानं भर्तृमन्त्रितस्य च।।30।।

अर्थ- अपने धन को तथा पति द्वारा बतायी गयी गुप्त बातों का उल्लेख किसी भी दूसरे व्यक्ति से न करें।

श्लोक-31. सामानाश्च स्त्रियः कौशलेनोज्जवलतया पाकेन मानेन तथापचारैरतिशयीत।।31।।

अर्थ- पत्नी को चाहिए कि वह अपनी समान उम्र तथा हैसियत की स्त्रियों से अपनी कुशलता, पवित्रता, विविध व्यंजन बनाने की कुशलता, स्वाभिमान तथा दूसरे व्यवहारों से आगे बढ़ जाना चाहिए।

श्लोक-32. सांवत्सरिकमायं संख्याय तदनुरूपं व्ययं कुर्यात्।।32।।

अर्थ- स्त्रियों को पूरे साल भर की अपनी आमदनी का बजट बनाकर उसी के अनुसार खर्च करना चाहिए।

श्लोक-33. भोजनावशिष्टाग्दोरसादघृतकरणम् तथा तेलगुडयोः। कर्पासस्य च सूत्रकर्तनम् सूत्रस्य वानम्। शिक्यरञ्जुपाशवल्कलसंग्रहणम्। कुट्टनकण्डनावेक्षणम्। आमचामणडतुषकखकुटय्डंगाराणामुपयोजनम्। भृत्यवेतनभरणज्ञानम्। कृषि पशु पालनचिंतावाहनविधानयोगाः। मेषकुक्कुटलावकशकशारिकापरभ़ृतमयूरवानरमृगाणामवेक्षणम्। दैवसिकायव्ययपिण्डीकरणमिति च विद्याति्।।33।।

अर्थ- स्त्रियों को भोजन से बचे हुए दूध से घी, गन्ने से गुड़ और सरसों से तेल निकलवाना चाहिए। चरखे के द्वारा कपास के सूत कातना, तथा उस सूत के कपड़े बनावाना, भिकहर, रस्सी, फंदा तथा मूंज, पटसन आदि उपयोगी चीजें बनाकर रखना, नौकरानियों को अनाज कूटते, पीसते, छानते तथा फटकते हुए देखते रहना, पके चावल का मांड, धान की भूसी, चावल की किनकी, कोयला तथा जला हुआ कोयला न फेंककर उसका दोबारा उपयोग करना, नौकर की नौकरी तथा उसके भोजन की जानकारी रखना, खेती तथा पशुओं के पालन की चिंता करना, घर के पालतू मेंढा, मुर्गा, लवा, तोता, मैना, कोयल, मोर, वानर तथा हिरनों की देखभाल करना। पूरे दिन की आमदनी के खर्च का हिसाब-किताब रखना- ये सभी बातें साध्वी पत्नी को हमेशा ध्यान में ऱखनी चाहिए।

श्लोक-34. तञ्जुघन्यानां च जीर्णवाससां संचयस्तैर्विविधरागैः शुद्धैर्वाकृतकर्मणां परिचारकाणामनुग्रहो मानार्थेषु च दानमन्यत्र वोपयोगः।।34।।

अर्थ- अपने पति के गंदे कपड़ों को स्त्रियां धुलवाकर रखें। यदि कपड़ों में कोई चीज हो तो उन्हें खंगाले, फिर अच्छा कार्य करने वाले नौकरों को देकर उन पर अपना अनुग्रह प्रकट करें। जो कपड़े देने योग्य न हो उनका प्रयोग दूसरे कार्यों में करना चाहिए।

श्लोक-35. सुराकुम्भीनामासवकुम्भीनां च स्थापनं तदुपयोगः क्रयविक्रयावायव्ययवेक्षणम्।।35।।

अर्थ- सुरा (शराब) तथा आसव की सुराहियों को रखना तथा उनका उपयोग करना या उन्हें किसी दूसरे को बेच देना अथवा आवश्यकता पड़ने पर खरीदना और खरीदने तथा बेचने में हुई हानि और लाभ को देखते रहना चाहिए।

श्लोक-36. नायकामित्राणां त स्त्रगनुलेपनताम्बूलदानैः पूजनं न्यायतः ।।36।।

अर्थ- अपने पति के दोस्तों का फूलों के हार, चंदन तथा पान आदि से उचित आदर सत्कार करें।

श्लोक-37. श्वश्रूश्वशुरपरिचर्या तत्पारतन्त्र्यमनुत्तरवादिता परिमिताप्रचण्डालापकरणनुच्चैर्हासः तत्प्रियाप्रियेषु स्वप्रिया प्रियेष्किकववृत्तिः।।37।।

अर्थ- स्त्री को अपने सास-ससुर की सेवा करना, उनकी आज्ञा मानना, उनकी किसी भी बात का पलटकर जवाब न देना। सास-ससुर के सामने धीरे से बोलना चाहिए। जो उन्हें प्रिय हो उनके साथ प्रेम व्यवहार रखें तथा जो उन्हें प्रिय न हो उनके साथ प्रेम व्यवहार न रखें।

श्लोक-38. भोगष्वनुत्सेकः।।38।।

अर्थ- भोग सुखों के संबंध में किसी भी प्रकार का गर्व न करें।

श्लोक-39. परिजने दाक्षिण्यम्।।39।।

अर्थ- परिवार के सभी लोगों के साथ अच्छे संबंध बनाये रखें।

श्लोक-40. नायकस्यानिवेद्य।।40।।

अर्थ- पति की आज्ञा के बिना घर की कोई भी वस्तु किसी को भी न दें।

श्लोक-41. स्वकर्मसु भृत्यजननियमनमुत्सवेष चास्य पूजनमित्येकचारिणीवृत्तम्।।41।।

अर्थ- नौकरों को उनके काम पर रखें, तिथि-त्यौहारों तथा जश्नों में उन्हें भी आदर से घर पर आमंत्रित करें। एकचारिणी वृत्त समाप्त हुआ।

श्लोक-42. प्रवासे मड़गलमात्राभरणा देवतोपवासपरा वार्तायां स्थिता गृहानवेक्षेत।।42।।

अर्थ- जिसका पति परदेश में रहता हो, उस पत्नी को सौभाग्य चिंह को छोड़कर बाकी सभी अलंकारों को उतारकर रख देना चाहिए। देवताओं की पूजा-उपासना तथा उनका व्रत करें। इसके साथ ही पति ने जो सीख दी है उसके अनुसार ही उसे रहना चाहिए।

श्लोक-43. शय्या च गुरुजनमूले। तदभिमता कार्यानिष्पत्तिः नायकाभिमतानां चार्थानामर्जने प्रतिसंस्कारें च यत्नः।।43।।

अर्थ- पति के परदेश में रहने पर पत्नी को चाहिए कि वह अपने सास-ससुर के निकट चारपाई बिछाकर सोये। उनके सुझाव तथा सलाह से कार्य करें। पति को अच्छी लगने वाली चीजें इकट्ठी करे और उनकी रखवाली रखें।

श्लोक-44. नित्यनैमित्तिकेषु कर्मसुचितो व्ययः। तदारब्धानां च कर्मणां समापने पतिः।।44।।

अर्थ- रोजाना के दैनिक कार्यों में सही या पति के बताये अनुसार ही खर्च करना चाहिए। परदेश जाने से पहले पति ने जिन कार्यों को शुऱू किया था। उन कार्यों को पूरा करने की कोशिश करनी चाहिए।

श्लोक-45. ज्ञातिकुलस्यानभिगमनमन्यत्र व्यसनोत्सवाभ्याम्। तत्रापि नायकपरिजनाधिष्ठिताया नातिकालमवस्थानपरिवर्तितप्रवासवेषता च।।45।।

अर्थ- पत्नी को अपने पिता के घर तभी जाना चाहिए जब वहां पर कोई जश्न या त्यौहार हो। वहां जाने पर ससुराल का कोई व्यक्ति उसके साथ होना चाहिए। उसे अधिक दिनों तक पिता के घर नहीं रुकना चाहिए। उत्सव तथा विवाह आदि में भी प्रोषित पूतिका के समान ही रहे, तथा साज-श्रृंगार बिल्कुल भी न करें।

श्लोक-46.गुरुजनानुज्ञातानां करणमुपवासानाम्। परिचारकैः शुचिभिराज्ञाधितैरनुमतेन क्रयविक्रयकर्मणा सारस्यपूरणं तनुकरणं च शक्तया व्यायानाम् ।।46।।

अर्थ- पत्नि को उपवास तथा व्रत आदि करना हो तो अपने सास-ससुर से पूछकर की करें। ईमानदार नौकरों के मार्फत क्रय-विक्रय करके घटी को पूरा करे। जहां तक हो सके, खर्च में कमी कर दें।

श्लोक-47. आगते च प्रकृतिस्थाया एवं प्रथमतो दर्शनं देवतपूजनमुपहाराणां चाहरणमिति प्रवासचर्या।।47।।

अर्थ- विदेश से लौटकर आया हुआ पति अपनी पत्नी को प्रोषितपतिका के रूप में देखें। उनके घर पहुंचने पर पत्नी को देवताओं की पूजा करनी चाहिए। प्रवासाचर्या समाप्त होती है।

श्लोक-40. भवतश्पात श्लोकौ

तद्तवृत्तमनवर्तेत नायकस्य हितैषिणी। कुलयोषा पुनर्भूर्वा वेश्या वाष्येकचारिणी।।

धर्ममर्थ तथा कामं लभंते स्थानमेव च। निःसपत्न च भर्तारं नार्यः सद्वत्तमाश्रिताः ।।48।।

अर्थ- इस विषय के अंतर्गत दो श्लोक हैं-

           एकचारिणी पत्नी का यह कर्तव्य होता है कि वह अपने पति की कुशलता की कामना करते हुए सदाचार का पालन करें। चाहे वह कुलवधू हो या वेश्या हो। स्त्रियां अपने स्त्री-धर्म पर रहकर, अर्थ, धर्म, काम, स्थान तथा बिना सौतन का पति प्राप्त करे।

           आचार्य वात्स्यायन द्वारा अनुमोदित वैधानिक विवाह पद्धति द्वारा जिस स्त्री की शादी हो गयी हो, उसे अपने पति के साथ कैसा आचरण करना चाहिए। इसी बात को इस अध्याय में बताया गया है। आचार्य वात्स्यायन के अनुसार- दो प्रकार की पत्नी होती है। एक तो एकचारिणी अर्थात अकेली तथा दूसरी वह जिसके एक या अनेक सौते हों। इस अध्याय के अंतर्गत एकचारिणी अर्थात अकेली पत्नी के आचरणों तथा व्यवहारों के बारे में वर्णन किया गया है। पत्नी का सबसे पहला कर्तव्य का यह है कि वह अपने पति का पूरा विश्वास प्राप्त कर ले।

           पति को संतुष्ट करने के लिए पत्नी को उसके इशारों को समझना चाहिए तथा वह इशारों के अनुसार ही उसके कार्यों को पूरा करना चाहिए।

           धर्म के अनुसार जब कन्या और पुरुष का विवाह होता है। उस समय सप्तपदी नामक एक कृत्य संपादित होता है। इसमें वर औऱ वधू एक-दूसरे से प्रतिज्ञा करते हैं। उस प्रतिज्ञा में कामसूत्रकार पत्नी को सलाह देते हैं कि पत्नी को कहीं भी जाना हो तो उसे पति से पूछकर ही जाना चाहिए। ऐसा न करने पर पति को संदेह हो सकता है। इसलिए पत्नी कहीं भी जाए तो पति की इच्छानुसार ही जाए। इससे दाम्पत्य जीवन आनन्दमय हो जाता है। जहां तक हो सके पत्नी को पति के साथ ही जाना चाहिए।

           आचार्य वात्स्यायन के अनुसार घर की लक्ष्मी मानी जाने पत्नी के किसी भी कार्य में फूहड़पन नहीं होना चाहिए। वह हमेशा मधुर वाणी में बोले। दरवाजे पर खड़ी होकर अथवा किसी से अकेले में बातें न करें। प्रत्येक बात का शिष्टतापूर्वक जवाब दे। किसी भी आदमी को छिपकर न देखें। जो स्त्रियां इन बातों पर ध्यान नहीं देती हैं, वे अपने पति की नजरों में गिर जाती हैं।

           पत्नी हमेशा इस बात का ध्यान रखें कि उसका शरीर साफ-सुथरा रहे। उसके पसीने में तथा मुंह में किसी भी प्रकार की गंध न हो। यदि उसका ध्यान शारीरिक गंदगी की ओर नहीं जाता है तो उसका मन धीरे-धीरे करके मलीन होता जाएगा। पति भी उससे दूर रहने की कोशिश करने लगता है। धीरे-धीरे करके उसका शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य गिरने लगता है। इसलिए शारीरिक तथा मानसिक स्वास्थ्य और शरीर की सुंदरता पर ध्यान देना स्त्री का प्रमुख कर्तव्य होता है।

           पत्नी को घर के बजट में भी संतुलन बनाकर रखना चाहिए। घर की मासिक आमदनी को जरूरी चीजों पर खर्च करके बचत भी करनी चाहिए। घी और तेल बाजार से खरीदने की कोशिश न करें। प्रतिदिन प्रयोग होने वाले दूध में से थोड़ा-थोड़ा दूध बचाकर उसे जमाकर घी तैयार कर लें। घर के छोटे-मोटे कपड़ों की सिलाई पत्नी स्वयं करे। मूंज तथा सन आदि को एकत्र करके उसकी रस्सियां तैयार कर लें। घर में काम करने वाले नौकरों के काम पर ध्यान रखें तथा उनकी सैलरी और खुराक का भी हिसाब रखें। खेतों के बारे में भी पूरी जानकारी रखे।

           आचार्य वात्स्यायन के अनुसार जो पत्नी अपने पति की भलाई चाहती है। वही पत्नी उपरोक्त बातों का अनुसरण करती है। इस प्रकार की औरत धर्म, अर्थ तथा काम को अपने जीवन में साबित करके प्रसिद्धि को प्राप्त करती है।

कामसूत्र

Vātsyāyana
Chapters
कामसूत्र
कामसूत्र का परिचय
1
नागरकवृन्त प्रकरण 1
नागरकवृन्त प्रकरण 2
विद्या समुदेश प्रकरण 1
विद्या समुदेश प्रकरण 2
विद्या समुदेश प्रकरण 3
विद्या समुदेश प्रकरण 4
त्रिवर्ग प्रतिपत्ति प्रकरण 1
त्रिवर्ग प्रतिपत्ति प्रकरण 2
त्रिवर्ग प्रतिपत्ति प्रकरण 3
शास्त्र संग्रह 1
शास्त्र संग्रह 2
नायक सहायदूतकर्म विमर्श प्रकरण 1
नायक सहायदूतकर्म विमर्श प्रकरण 2
2
प्रथम अध्याय
द्वितीय अध्याय
तृतीय अध्याय
चतुर्थ अध्याय
पंचम अध्याय
षष्ठम अध्याय
सप्तम अध्याय
अष्टम अध्याय
नवम अध्याय
दशम अध्याय
3
प्रथम अध्याय
द्वितीय अध्याय
तृतीय अध्याय
चतुर्थ अध्यायः
पंचम अध्याय
4
प्रथम अध्याय
द्वितीय अध्याय
5
प्रथम अध्याय
द्वितीय अध्याय
चतुर्थ अध्याय
पंचम अध्याय
षष्ठम अध्याय
6
प्रथम अध्याय
द्वितीय अध्याय
तृतीय अध्याय
चतुर्थ अध्याय
पंचम अध्याय
षष्ठम अध्याय
7
प्रथम अध्याय
द्वितीय अध्याय