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पंचम अध्याय

विवाह योग प्रकरण

श्लोक-1. प्राचुर्येण कन्याया विविक्तदर्शनस्यालाभे धात्रेयिकां प्रियहिताभ्यामुपगृह्योपसर्पेत्।।1।।

अर्थः यदि कोई लड़का किसी लड़की से प्यार करता है लेकिन अकेले में उससे बाते करने का मौका नहीं मिलता हो तो उसे चाहिए कि लड़की की सहेली के साथ दोस्ती करके उससे अपने मन की बाते बताएं।

श्लोक-2. सा चैनामविदिता नाम नायकस्य भूत्वा तद्गुणैरनुरञ्जयेत्। तस्याश्च रुच्यात्र्नयकगुणान्भूयिष्ठमुपवर्णयेत्।।2।।

अर्थः लड़की की सहेली ऐसी होनी चाहिए जो लड़के के गुणों के बारे में, उसके अच्छे व्यवहार के बार में लड़की को बताएं। उसके बारे में इस तरह की बातें बनाकर बताएं जो लड़की को अच्छी लगे।

श्लोक-3. अन्येषां वरयितृणां दोषानभिप्रायविरुद्धान्प्रतिपादयेत्।।3।।

अर्थः लड़की की सहेली ऐसी हो जो उन अवगुणों की निन्दा करें जिन्हें प्रेमिका पसंद न करती हो। इस तरह सहेली के द्वारा प्रेमी की अच्छी बाते सुनकर प्रेमिका उसकी ओर आकर्षित होने लगती हैं।

श्लोक-4. मातापित्रोश्च गुणानभिज्ञतां लुब्धतां च चपलतां च बान्धवानाम्।।4।।

अर्थः सहेली को प्रेमिका को यह भी बताना चाहिए कि उसके माता-पिता नासमझी और लालच की वजह से तुम्हारी शादी किसी अमीर लड़के के साथ कर देगा, फिर तुम क्या करोगी जबकि वह लड़का तुमसे प्यार करता है और तुम्हें खुश रखेगा।

श्लोक-5. याश्चान्या अपि समानजातीयाः कन्याः शकुन्तलाद्याः स्वबुद्धम्या भर्तारं प्राप्य संप्रयुक्ता मोदन्तेस्म ताश्चास्या निदर्शयेत्।।5।।

अर्थः प्रेमिका के मन में प्रेमी के लिए रुचि तेज करने के लिए स्वयं अपना वर चुनने वाली उसकी जाति की लड़कियों और शकुन्तला आदि की प्राचीन कहानियां सुनाकर उसे अपनी इच्छा से पति चुनने के लिए उकसाना चाहिए।

श्लोक-6. महाकुलेषु सापत्नकैर्बाध्यमाना विद्विष्टाः दुःखिताः परित्यक्ताश्च दृश्यन्ते।।6।।

अर्थः सहेली को चाहिए कि प्रेमिका को बताए कि अच्छे और अमीर घरों में शादी करने वाली स्त्रियां कितनी दुखी रहती हैं, दूसरी शादी करने के बाद किस तरह पहली पत्नी को सताया जाता है। अमीर घरों में शादी करने से किस तरह का कलह तथा दुखों का सामना करना पड़ता है।

श्लोक-7. आयतिं चास्य वर्णयेत्।।7।।

अर्थः प्रेमिका की सहेली को चाहिए कि वह प्रेमी के उन गुणों के बारे में भी बताए जिसकी वजह से शादी के बाद उसका भविष्य उज्ज्वल होगा।

श्लोक-8. सुखमनुपहतमेकचारितायां नायकानुरागं च वर्णयेत्।।8।।

अर्थः उसे कहे कि अनुरक्त पति की अकेली पत्नी बनने में बड़ा आनन्द मिलता है इसलिए कि सौतनों का झमेला नहीं रहता है। इसके साथ ही प्रेमी के एक पत्नीव्रत वाले गुण तथा स्वभाव भी उससे बताएं।

श्लोक-9. समनोरथायाश्चास्या अपायं साध्वसं व्रीडां च हेतुभिपवच्छिन्द्यात्।।9।।

अर्थः जब प्रेमिका की सहेली यह समझ ले कि प्रेमिका उसके बताए हुए प्रेमी की तरफ आकर्षित हो रही है तो समुचित निमित्तों द्वारा वह प्रेमिका के डर तथा लज्जा को दूर करने की कोशिश करे।

श्लोक-10. दूतीकल्पं च सकलमाचरेत्।।10।।

अर्थः उस सहेली को चाहिए कि पारदारिक अधिकरण में बताए गए सभी दूती (दूत) कार्य को उस वक्त काम में लाए।

श्लोक-11. त्वामजानतीमिव नायको वलाद्ग्रहीष्यतीति तथा सुपरिगृहीतं स्यादिति योजयेत्।।11।।

अर्थः उससे कह दें कि प्रेमी तुम्हें अपरिचिता की तरह उठाकर ले जाएगा तो लोग तुम्हे दोषी भी नहीं ठहराएगा और तेरा मनोरथ भी पूर्ण हो जाएगा।

श्लोक-12. प्रतिपत्र्नामभिप्रेतावकाशवर्तिनीं नायकः श्रोत्रियागारादग्निमानाय्य कुशानास्तीर्य यथास्मृति हुत्व च त्रिः परिक्रमेत्।।12।।

अर्थः इस प्रकार बताने के बाद जब प्रेमिका अपने पिता के घर से निकल जाए, किसी तरह का डर एवं आशंका बाकी न रह जाए तब किसी अग्निहोत्री ब्राह्मण के घर से यज्ञ, अग्नि लाकर धर्मशास्त्र के मुताबिक हवन करके प्रेमी-प्रेमिका दोनों को उसे अग्नि की तीन बार परिक्रमा कराकर शादी करा देनी चाहिए।  

श्लोक-13. ततोमातरि पितरि च प्रकाशयेत्।।13।।

अर्थः शादी हो जाने के बाद प्रेमी-प्रेमिका दोनों को अपने-अपने माता-पिता को इसकी सूचना दे देनी चाहिए।

श्लोक-14. अग्निसाक्षिका हि विवाहा न निवर्तन्त इत्याचार्यसमयः।।14।।

अर्थः आचार्यों का मत है कि अग्नि की साक्षी में किया गया विवाह अवैध नहीं होता।

श्लोक-15. दृषयित्वा चैनां शनैः स्वजने प्रकाशयेत्।।15।।

अर्थः इस तरह प्रेमी जब प्रेमिका से शादी करने के बाद उसके साथ सुहागरात मना ले तो फिर प्रेमिका और अपने परिवार बालों से सच्ची बात बता दें।

श्लोक-16. तद्वान्धवाश्च यथा कुलस्याघं परिहरन्तो दण्डभयाच्च तस्मा एवैनां दद्युस्तथा योजयेत्।।16।।

अर्थः या फिर कोई ऐसा काम करना चाहिए कि प्रेमिका के माता-पिता कुल कलंक से भयभीत होकर उसी को अपनी लड़की का वर मान लें। जब इस तरह कूटनीति से वह लड़की उस प्रेमी को मिल जाए तो प्रेमी व्यवहार और सुन्दर उपहारों द्वारा प्रेमिका के बन्धु-बान्धवों को राजी करें।  

श्लोक-17. गान्धर्वेण विवाहेन वा चेष्टेत।।17।।

अर्थः यदि इस तरह के उपायों से प्रेमिका के माता-पिता को शादी के लिए राजी करने में सफलता मिलना मुमकिन न हो तो प्रेमी-प्रेमिका को गन्धर्व विवाह कर लेना चाहिए।

श्लोक-18. अप्रतिद्यमानायामन्तश्चारिणीमन्यां कुलप्रमदां पूर्व संसृष्टाप्रीयमाणां चोपगृह्य तथा सह विषह्यमवकाशमेनामन्यकार्यापदेशेनानाययेत्।।18।।

अर्थः यदि प्रेमिका अपने आप प्रेम विवाह करने में असमर्थ हो तो दोनों के बीच की बाते बताने वाले और प्रेमिका के माता-पिता से घनिष्ठ स्नेह संबंध रखने वाली किसी कुलवधु को मध्यस्थ बनाकर उसे धन का लालच देकर किसी बहाने गुप्तचरों द्वारा उस लड़की को अपने यहां बुलाएं।

श्लोक-19. ततः श्रोत्रियागारादग्निमिति समानं पूर्वेण।।19।।

अर्थः इसके बाद प्रेमी-प्रेमिका को ब्राह्यण के घर से अग्नि लाकर दोनों के फेरे लगवाकर शादी करा देनी चाहिए।

श्लोक-20. आसत्र्ने च विवाहे मातरमस्यास्तदभिमतदोषैरनुशयं ग्राहयेत्।।20।।

अर्थः यदि प्रेमिका के माता-पिता ने किसी और के साथ उसकी शादी तय कर दी हो और विवाह का समय पास आ गया हो तो उस वक्त प्रेमिका की सहेली या जो भी दोनों के बारे में सोचने वाले हो उसे चाहिए कि जिस लड़के से उसकी शादी होने वाली हो उसके बारे में प्रेमिका की मां को उलटी-सीधी बाते करके मन और मस्तिष्क बिगाड़ दें। इस तरह की बाते करने पर जब यह पता चल जाए कि उसकी मां प्रेमिका की शादी उस लड़के से नहीं होने देगी तो फिर प्रेमी के गुणों का बखान करना शुरू कर दें। इस तरह की कूटनीत से प्रेमिका की मां और परिवार वालों को दोनों की शादी के लिए राजी कराना चाहिए।

श्लोक-21. ततस्तदनुमतेन प्रातिवेश्याभवने निशि नायकामामाय्य श्रेत्रियागारादग्निमिति सधानं पूर्वेण।।21।।

अर्थः प्रेमिका की मां पहले से शादी तय हुए लड़के से मन हटाकर जब लड़की की सहेली के द्वारा बताए प्रेमी से अपनी लड़की की शादी करने के लिए तैयार हो जाए तो उसी के पड़ोसिन के घर में यज्ञ कुंड बनाकर आग जलाकर प्रेमी-प्रेमिका की शादी चुपचाप करा दें।

श्लोक-22. भ्रातरमस्या वा समानवयसं वेश्यासु परस्त्रीषु वा प्रसक्त मसुकरेण साहाय्यदानेन प्रियोपग्रहैश्च सुदीर्घकालमनुरञ्जयेत्। अन्ते च स्वाभिप्रायं ग्राहयेत्।।22।।

अर्थः यदि कोई पुरुष किसी वेश्या या किसी दूसरे स्त्री से प्यार करता है और उसे अपना बनाकर रखना चाहता है तो प्रेमी को चाहिए कि वह उस स्त्री के किसी ऐसे भाई का सहारा ले जो लगभग उसी के उम्र का हो। प्रेमिका के भाई को कुछ मदद देकर काफी दिनों तक उसे अपनी तरफ आकर्षित और अनुरक्त बनाने के बाद उससे अपनी इच्छा बता दें।

श्लोक-23. प्रायेण हि युवानः समानशीलव्यसनलयसां वयस्यानामर्थे जीवितमपि त्यजन्ति। ततस्तेनैवान्यकार्यत्तामानाययेत्। विपह्यं सावकाशमिति समानं पूर्वेण।।23।।

अर्थः यह बात तय है कि प्रायः युवक अपने समान स्वभाव और समान उम्र के दोस्तों के लिए आवश्यकता पड़ने पर जान तक न्यौछावर कर देते हैं। इसलिए प्रेमिका के भाई को ही जरिया बनाकर प्रेमिका को किसी अकेले स्थान में बुलाकर अग्नि को साक्षी मानकर शादी कर लेनी चाहिए।

श्लोक-24. अष्टमीचन्द्रिकादिषु च धात्रेयिका मदनीयमेनां पाययित्वा किंचिदात्मनः कार्यमुद्देश्य नायकस्य विषह्यं देशममानयेत्। तत्रैनां पदात्संज्ञामप्रतिपद्यमानां दूषयित्वेति समानं पूर्वेण।।24।।

अर्थः दशहरा, दिवाली आदि उत्सवों पर प्रेमिका की सहेली को चाहिए कि वह प्रेमिका को मादक पदार्थ पिलाकर अपने किसी कार्य के बहाने उसे किसी अंधेरे व खाली स्थान पर ले जाएं। इसके बाद प्रेमी-प्रेमिका का मिलन कराकर उसे दूषित करा दें अर्थात दोनों आपस में संबंध बना लें। फिर लड़की की सहेली को चाहिए कि वह इस बात को प्रेमिका के परिवार वाले को बता दें।

श्लोक-25. सुप्तां चैकचारिणीं धात्रेयिकां वारयित्वा संज्ञामप्रतिपद्यमानां दुषयित्वेति समानं पूर्वेण।।24।।

अर्थः सोई हुई, अकेले कहीं जाती हुई या नशीली वस्तुएं खिलाकर बेहोश की हुई प्रेमिका को दूषित करके, फिर लोगों से प्रकट कर देना तथा उसे अपनी बना लेना पैशाच विवाह है।

श्लोक-26. ग्रामान्तरमुद्यानं वा गच्छन्तीं विदित्वा सुसंभृतसहायो नायकस्तदा रक्षिणो वित्रास्य हत्वा वा कन्यामपहरेत्। इति विवाहयोगः।।26।।

अर्थः जब प्रेमी को यह मालूम हो जाए कि प्रेमिका बगीचे या किसी दूसरे स्थान पर घूमने जा रही है तो अपने सहायकों के साथ जाकर उसके साथ जाने वाली सहेली आदि को डराकर उसका अपहरण करके शादी कर लें। इस तरह का विवाह राक्षस विवाह कहलाता है।

श्लोक-27. पूर्वः पूर्वः प्रधानं स्याद्विवाहो धर्मतः स्थितेः। पूर्वाभावे ततः कार्यों यो य उत्तर उत्तरः।।27।।

अर्थः धार्मिक दृष्टि से विचार विधि की अपेक्षा पश्चात् के सभी विवाह उत्तरोत्तर निकृष्ट हैं।

श्लोक-28. व्यूढानां हि विवाहानामनुरागः फल यतः। मध्यमोऽपि हि सद्योगो गान्धर्वस्ते पूजितः।।28।।

अर्थः विवाह का उद्देश्य होता है प्रेमी-प्रेमिका के बीच प्यार बढ़ाना। यदि प्रेमी-प्रेमिका के बीच प्यार न हो तो उनका विवाह निष्फल होता है। इस प्रेमी-प्रेमिका के बीच गन्धर्व विवाह उपयुक्त माना जाता है क्योंकि इसमें प्रेम और विश्वास का सुन्दर योग होता है।

श्लोक-29. सुखत्वादबहुरक्लेशादपि चावरणादिह। अनुरागात्मकत्वाच्च गान्धर्वः प्रवरो मतः।।29।।

अर्थः प्रेमी-प्रेमिका द्वारा गान्धर्व विवाह करना सुखद, थोड़े से कोशिश से विवाह होने वाले, बिना किसी कष्ट या झंझट तथा रीतिरिवाजों से हटकर प्रेम प्रधान होता है।

           सामाजिक रूप से चार दिव्य विवाहों का उल्लेख किया गया है जिनमें युवक-युवती को विवाह करने के लिए कोशिश नहीं करना पड़ता। लेकिन जिन युवक या युवतियों को अपनी इच्छा के अनुसार युवती या युवक नहीं मिलते हैं, उनके लिए वात्स्यायन ने गान्धर्व विवाह बताया है। आचार्य ने प्रेमी-प्रेमिका को सुझाव दिया है कि इस हालत में उन्हें गान्धर्व विवाह कर लेना चाहिए। जो प्रेमी मनचाही प्रेमिका से विवाह न कर सकता हो वे उसके माता-पिता को धन देकर विवाह कर लें। इस तरह का विवाह असुर विवाह कहलाता है। यदि प्रेमिका के माता-पिता को धन देने पर भी वह उसको हासिल न हो तो प्रेमी को चाहिए कि प्रेमिका का अपहरण करके उसके साथ शादी कर ले। इस तरह जो प्रेमी अपने प्रेमिका से शादी करता है उसे राक्षस तथा पैशाच विवाह कहते हैं।

           यदि बाह्य आदि दिव्य विवाह विधि से प्रेमी को अपने मन पसंद प्रेमिका से विवाह करना संभव न हो तो प्रेमिका के इच्छा होने पर गान्धर्व विवाह कर लेना चाहिए। यदि आसुर, राक्षस, पैशाच विधि से शादी करना सर्वथा वर्ज्य समझते हैं। गान्धर्व विवाह में सबसे पहले प्रेमिका को विवाह के लिए राजी करना आवश्यक होता है, बिना उसके राजी हुए गान्धर्व विवाह मुमकिन नहीं हो सकता।

           भारत में गान्धर्व विवाह का प्रचलन काफी समय से चला आ रहा है और इस विवाह की लोकप्रियता चारों ओर फैली है। राजपूत और क्षत्रिय जो स्वयंवर द्वारा शादी करते थे, वह भी गान्धर्व विवाह ही था। इस स्वयंवर में लड़की जिसको वरमाला पहना देती थी, उसी से उसकी शादी हो जाती थी। लेकिन स्वयंवर के बाद विधिवत गृहसूत्र के आधार पर अग्नि को साक्षी मानकर विवाह संस्कार भी किया जाता था। नल दमयन्ती, अज-इन्दुमती, राम-सीता, मालती-माधव आदि के विवाह इसी प्रकार सम्पन्न हुए थे।

           प्रथम कोटि के गान्धर्व विवाह- आचार्य वात्स्यायन के अनुसार युवक-युवती का गान्धर्व विवाह हो जाने के बाद जब दोनों सुखीपूर्वक एक साथ रहने लग जाए तो युवती के माता पिता को इसके बारे में सूचित कर देना चाहिए। इसके अतिरिक्त उसके माता-पिता को खुश करने का भी उपाय करना चाहिए। गान्धर्व विवाह कर लेने का अर्थ यह नहीं कि विवाहिता युवती का संबंध उसके परिवार वालों से छूट जाता है। यही कारण है कि वात्स्यायन ने गान्धर्व विवाह को सर्वश्रेष्ठ बताया है।    

           मध्यम कोटि के गान्धर्व विवाह- प्रथम कोटि के गान्धर्व विवाह का वर्णन करने के बाद आचार्य वात्स्यायन मध्यम कोटि के गान्धर्व विवाह के अंतर्गत प्रेमिका के सहेली के द्वारा प्रेमी का वर्णन करके उसे प्रेमी की ओर आकर्षण बढ़ाता है। यदि प्रेमी-प्रेमिका के विवाह के बीच में उसके माता-पिता बाधा डालतें हैं तो प्रेमिका की सहेली या किसी अन्य की सहायता लेकर युवती की मां को धन आदि देकर प्रेमी-प्रेमिका के विवाह के लिए तैयार करके उनकी इच्छा के अनुसार प्रेमिका को किसी बहाने से घर से बाहर ले जाकर प्रेमी के साथ अग्नि को साक्षी मानकर गान्धर्व विवाह करा देना चाहिए।

           तीसरी कोटि के गान्धर्व विवाह- इस गान्धर्व विवाह के बारे में वात्स्यायन कहते हैं कि इस गान्धर्व विवाह में युवक जिस युवती से प्यार करता है, उसके भाई को उपहार आदि देकर अपने वश में कर लेता है। इसके बाद युवक युवती के भाई को साफ-साफ बता देता है कि वह उसकी बहन से प्यार करता है और उससे शादी करना चाहता है। इस तरह भाई का सहारा लेकर अपनी प्रेमिका तक अपनी बातों को पहुंचाकर उससे गान्धर्व विवाह कर लिया जाता है। यह तीसरे प्रकार का गान्धर्व विवाह कहलाता है।

           गान्धर्व विवाह के इन तीनों प्रकार को बताने के बाद वात्स्यायन कुछ अन्य प्रकार के विवाह के बारे में कहते हैं कि किसी लड़की का अपहरण करके उसके साथ जहरदस्ती शादी करता है या उसके सतीत्व को नष्ट करके विवाह करता है उसे राक्षस विवाह कहते हैं। यह भी धर्म के विरुद्ध है क्योंकि इसमें अग्नि का आवाहन तथा हवन आदि कोई धार्मिक कार्य नहीं होता है। आचार्य वात्स्यायन ने राक्षस विवाह को पैशाच से अच्छा माना है क्योंकि इस विवाह में साहस कार्य प्रधान है।

           आचार्य मध्यम कोटि के गान्धर्व विवाह को ही सबसे प्रधान मान है क्योंकि शादी का चरम परिणाम वैवाहिक प्रेम ही है जबकि गान्धर्व विवाह शुरू से ही प्रेम का माध्यम है।

इति श्रीवात्स्यायनीये कामसूत्रे कन्यासम्प्रयुक्तके तृतीयेऽधिकरणे विवाहयोगः पश्चमोध्यायः।।

कामसूत्र

Vātsyāyana
Chapters
कामसूत्र
कामसूत्र का परिचय
1
नागरकवृन्त प्रकरण 1
नागरकवृन्त प्रकरण 2
विद्या समुदेश प्रकरण 1
विद्या समुदेश प्रकरण 2
विद्या समुदेश प्रकरण 3
विद्या समुदेश प्रकरण 4
त्रिवर्ग प्रतिपत्ति प्रकरण 1
त्रिवर्ग प्रतिपत्ति प्रकरण 2
त्रिवर्ग प्रतिपत्ति प्रकरण 3
शास्त्र संग्रह 1
शास्त्र संग्रह 2
नायक सहायदूतकर्म विमर्श प्रकरण 1
नायक सहायदूतकर्म विमर्श प्रकरण 2
2
प्रथम अध्याय
द्वितीय अध्याय
तृतीय अध्याय
चतुर्थ अध्याय
पंचम अध्याय
षष्ठम अध्याय
सप्तम अध्याय
अष्टम अध्याय
नवम अध्याय
दशम अध्याय
3
प्रथम अध्याय
द्वितीय अध्याय
तृतीय अध्याय
चतुर्थ अध्यायः
पंचम अध्याय
4
प्रथम अध्याय
द्वितीय अध्याय
5
प्रथम अध्याय
द्वितीय अध्याय
चतुर्थ अध्याय
पंचम अध्याय
षष्ठम अध्याय
6
प्रथम अध्याय
द्वितीय अध्याय
तृतीय अध्याय
चतुर्थ अध्याय
पंचम अध्याय
षष्ठम अध्याय
7
प्रथम अध्याय
द्वितीय अध्याय