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चतुर्थ अध्यायः

एक पुरुषाभियोग प्रकरण

श्लोक-1. दर्शितेग्ङिताकारां कन्यामुपायोऽमियुञ्जीत।।1।।

अर्थः  प्रेमी अपने प्यार की बाते अपनी प्रेमिका से करता है और जब प्रेमिका उसके प्यार को स्वीकार कर लेती हैं तब दोनों में प्यार का संबंध बन जाता है।

श्लोक-2. ते क्रीडनकेषु च विवदमानः साकारमस्याः पाणिमवलम्बेत।।2।।

अर्थः इसके बाद दोनों मौका मिलने पर एक साथ खेलते हैं। प्रेमिका और प्रेमी जब एक साथ कोई खेल खेल रहे हों तो प्रेमी को चाहिए कि प्रेमिका का हाथ इस तरह प्यार से पकड़े कि उसके मन में प्यार का अनुभव होने लग जाए।

श्लोक-3. यथोक्तं च स्पृष्टकादिकमालिग्ङनविधि विदध्यात्।।3।।

अर्थः वात्स्यायन ने आलिंगन करने के चार प्रकार बताये हैं- स्पृष्टक, विद्धक, उदृष्टक तथा पीड़ितक। प्रेमिका का हाथ पकड़ने के बाद यदि वह प्रेमी के मनोभावों को समझ जाए तो प्रेमी को चाहिए कि इन चार प्रकार के आलिंगनों में से जो सही लगे उसी रूप में प्रेमिका को आलिंगन करें।

श्लोक-4. पत्रच्छेद्यक्रियां च स्वाभिप्रायसूचकं मिथुनमस्या दर्शयेत्।।4।।

अर्थः अपनी इच्छा को व्यक्त करने के लिए प्रेमी को चाहिए कि प्रेमिका को चित्र बनाकर अपनी इच्छाओं को बताएं।

श्लोक-5. एबमन्यद्विरलशो दर्शयेत्।।5।।

अर्थः प्रेमी को चाहिए कि अपनी प्रेमिका को कभी-कभी मिथुन चित्र द्वारा भी अपनी बाते समझाएं।

श्लोक-6. जलक्रीडायां तददूरतोऽप्सु निमग्नः समीपमस्या गत्व स्पृष्टवा चैनां तत्रैवोन्मञ्जेत्।।6।।

अर्थः यदि नदी, तालाब या स्वमिंगपूल में आप नहा रहे हैं और आपकी प्रेमिका भी वहां नहां रही हो तो प्रेमी को चाहिए कि वह प्रेमिका से दूर डुबकी लगाकर प्रेमिका के पास आकर उसका स्पर्श करे और अपना सिर पानी से बाहर निकालकर प्रेमिका को चौका दें।

श्लोक-7. नबपत्रिकादिषु च सविशेषभावनिवेदनम्।।7।।

अर्थः प्रेमी को चाहिए कि अपनी प्रेमिका को नए कोमल पत्तों पर अपने मन की इच्छा और भाव लिखकर दें।

श्लोक-8. आत्मदुःखस्यानिर्वेदेन कथनम्।।8।।

अर्थः प्रेमी को चाहिए कि वह अपनी बातों को बिना किसी दुखभाव से अपनी प्रेमिका से कहे।

श्लोक-9. स्वप्नस्य च भावयुक्तस्यान्यापदेशेन।।9।।

अर्थः प्रेमी को अपने मन की बाते अपनी प्रेमिका को किसी कहानी या सपने के द्वारा भी बतानी चाहिए।

श्लोक-10. प्रेक्षणके स्वजनसमाजे वा समीपोपवेशनम्। तत्रान्यापदिष्टं स्पर्शनम्।।10।।

अर्थः प्रेमी को चाहिए कि खेल-तमाशे देखते समय या परिवारों के बीच कोई कार्यक्रम हो तो प्रेमिका पास ही बैठे। इसके बाद मौका मिलने या किसी बहाने से प्रेमिका के अंगों को स्पर्श करने की कोशिश करें।

श्लोक-11. पाश्रयार्थं च चरणेन चरणस्य पीडनम्।।11।।

अर्थः इसके साथ ही प्रेमिका के शरीर के अंगों को अपने अंगों पर रखने के लिए उसके पैरों को अपने पैरों से दबाना चाहिए।

श्लोक-12. ततः शनकैरेकैकामग्ङलिमभिस्पृशेत्।।12।।

अर्थः इसके बाद प्रेमी को चाहिए कि प्रेमिका को धीरे-धीरे एक-एक अंगुली से छुएं।

श्लोक-13. पादाग्ङष्ठेन च नखाग्राणि घट्टयेत्।।13।।

अर्थः इसके बाद पैर के अंगूठे के नाखून की नोक से प्रेमिका के पैर पर भी चुभाना चाहिए।

श्लोक-14. तत्र सिद्धः पदात्पदमधिकमाकाङक्षेत्।।14।।

अर्थः यदि प्रेमिका के पास बैठकर उसके अंगों को स्पर्श करने पर वह कोई ऐतराज नहीं करती हो तो फिर अपने पैर को उसके पैर के ऊपर रखकर दबाना चाहिए।

श्लोक-15. क्षान्त्यर्थ च तदेवाभ्यसेत्।।15।।

अर्थः प्रेमिका के अंगों के स्पर्श करने और अपने पैरों से उसके पैरों पर घर्षण करने और अंगों को दबाने की क्रिया बार-बार करनी चाहिए।

श्लोक-16. पादशौचे पादाग्ङलिसंदेशेम तदङ्गुलिपीडनम्।।16।।

अर्थः प्रेमिका के पैरों को अपने पैर से दबाने के बाद पैर की अंगुलियों में उसके पैर की अंगुलियां फंसाकर दबाना चाहिए।

श्लोक-17. आचमनान्ते चोदकेनासेकः।।17।।

अर्थः प्रेमी को पानी पीते समय अपनी प्रेमिका पर थोड़ा सा पानी छिड़कना चाहिए।

श्लोक-18. विजने तमसि च द्वन्द्वमासीनः क्षार्न्ति कुर्वीत। समानदेशशय्यायां च।।18।।

अर्थः यदि अकेले में अथवा अन्धेरे में एक-दूसरे से सटकर बैठे हुए हों तो प्रेमिका के अंगों को धीरे-धीरे इस प्रकार दबाएं कि वह सहन कर सके और साथ ही उससे आनन्द भी मिले सके। यदि एक ही चारपाई पर दोनों बैठे अथवा लेटे हों तो भी उसे नाखूनों से धीरे-धीरे उसके पैर पर चुभाते रहें।

श्लोक-19. तत्र यथार्थमुद्वेजयतो भावनिवेदनम्।।19।।

अर्थः प्रेमी को अपनी प्रेमिका को बिना उत्तेजित किए ही अपने मन की बाते बता देनी चाहिए।

श्लोक-20. विविक्ते च किंचिदस्ति कथयितव्यमित्युक्तवा विर्वचनं भावं च तत्रोपलक्षयेत्।।20।।

अर्थः प्रेमिका जब कभी एकांत में मिले तो उससे प्रेमी को इतना ही कहना चाहिए कि मैं तुमसे कुछ कहना चाहता हूँ। जब प्रेमिका पूछे कि क्या कहना चाहते हो तो प्रेमी को अपने मन की बाते बता देनी चाहिए और यह भी अनुभव करना चाहिए कि उसकी बातों का क्या प्रभाव पड़ता है।

श्लोक-21. यथा पारदारिक वक्ष्यामः।।21।।

अर्थः इस तरह प्रेमिका से बात करने पर उस बात का क्या प्रभाव पड़ता है इसके बारे में आगे बताते हैं।

श्लोक-22. विदितभावस्तु व्याधिमपदिश्यैनां वार्ताग्रहणार्थ स्वमुदवसितमानयेत्।।22।।

अर्थः जब आप प्रेमिका को अपनी मन की बाते बता दें और उस बातों की प्रतिक्रिया अपने अनुकूल हो तो सिरदर्द आदि के बहाने अपने प्यार भरी बातों को बताने और उससे प्यार की बाते सुनने के लिए अपने घर बुलाएं।

श्लोक-23. आगतायाश्चशिरःपीडनेनियोगः। पाणिमवलम्ब्य चास्याः साकारं नयनयोर्ललाटे च निदध्यात्।।23।।

अर्थः घर आ जाने के बाद प्रेमिका से अपना सिर दबवाएं और उसका हाथ पकड़कर अपनी दोनों आंखों तथा सिर पर फेरे।

श्लोक-24. औषध्यापदेशार्थं चास्याः कर्म विनिर्दिशेत्।।24।।

अर्थः इसके बाद प्रेमिका से प्यार से बाते करते हुए प्रेमी को कहना चाहिए कि दवा से अधिक शक्ति तुम्हारे हाथों में हैं। तुम्हारे हाथों के छूने से ही सिर का दर्द अच्छा हो जाता है।

श्लोक-25. इदं त्वया कर्त्तव्यम्। नह्येतदूते कन्याया अन्येन कार्यमिति गच्छन्तीं पुनरागमनानुबन्धमेनां विसृजेत्।।25।।

अर्थः इस कार्य को तुम्हें ही स्वयं करना चाहिए। इस तरह की बाते कुवारी स्त्री को छोड़कर किसी और से नहीं करनी चाहिए। जब प्रेमिका घर से जाने लगे तो उसे दोबारा आने का आग्रह करना चाहिए।  

श्लोक-26. अस्य च योगस्य त्रिरात्रं त्रिसंध्यं च प्रयुक्तिः।।26।।

अर्थः प्रेमिका को अपना बनाने के लिए प्रेमी को यह तरकीब तीन दिन तथा तीन रात अपनाना चाहिए।

श्लोक-27. अभीक्ष्णदर्शनार्थमागतायाश्च गोष्ठीं वर्धयेत्।।27।।

अर्थः घर आई प्रेमिका को बार-बार देखने के लिए प्रेमी को चाहिए कि उससे बातें करने की योजना बनाएं और बहाने करके उसे बार-बार घर बुलाएं।

श्लोक-28. अन्याभिरपि सह विश्वासनार्थमधिकमधिकं चाभियुञ्जीत। न तु वाचा निर्वदेत्।।28।।

अर्थः प्रेमिका को अपने पर विश्वास दिलाने और प्यार जताने के लिए प्रेमी को चाहिए कि अन्यायन्य गप्पे करें लेकिन अपने मुख से मतलब की बात न करें।        

श्लोक-29. दूरगतभावोऽपि हि कन्यासु न निर्वेदेन सिद्धम्यतीतिघोटकमुखः।।29।।

अर्थः इस अधिकरण के सलाहकार आचार्य घोटकमुख का मानना है कि स्त्री को चाहे जितना भी यकीन दिलाया जाए तथा उनका पूरा यकीन हासिल कर लिया जाए लेकिन उससे दुख सहन करने तथा घर बार को त्याग करने की उम्मीद नहीं की जा सकती है।

श्लोक-30. यदा तु बहुसिद्धां मन्येत तदैवोपक्रमेत्।।30।।

अर्थः प्रेमिका के ऊपर किए गए सभी प्रयोग जब सफल हो जाएं तभी उसके साथ सम्भोग के लिए तैयारी करनी चाहिए।

श्लोक-31. तत्र कालमाहः

प्रदोषे निशि तमसि च योषितो मन्दसाध्वसाः सुरतव्यवसायिन्यो रागवत्यश्च भवन्ति। न च पुरुषं प्रत्याचक्षते। तस्मात्तत्कालं प्रयोजयितव्य इति प्रायोवादः।.31।।

अर्थः प्रदोषकाल, रात के समय तथा अंधेरे में जब कोई दूसरा नहीं दिखाई पड़ता हो ऐसे समय में प्रेमिका अपने प्रेमी से मिलने और संभोग करने की ख्वाहिश करती है। ऐसे समयों में युवती में सेक्स की उत्तेजना बढ़ती है जिसका परिणाम यह होता है कि वह सेक्स के लिए मना नहीं कर पाती।

श्लोक-32. एकपुरुषाभियोगानां त्वसंभवे गृहीतार्थया धात्रेयिकया संख्या वा तस्यामन्तर्भूतया तमर्थमनिर्वदन्त्या सहैनामङ्कमानाययेत्। ततो यथोक्तमभियुञ्जीत्।।32।।

अर्थः यदि प्रेमी-प्रेमिका एक-दूसरे से दूर हो और प्रेमिका को अपने प्रेमी के पास अकेले जाना मुमकिन न हो तो उसे अपनी सहेली के साथ प्रेमी के घर जाना चाहिए। इसके बाद प्रेमी-प्रेमिका को मिलन करना चाहिए।   

श्लोक-33. स्वां वा परिचारिकामादावेव सर्खत्वेनास्याः प्रणिदध्यात्।।33।।

अर्थः या फिर प्रेमी को चाहिए कि वह अपने विश्वासपात्र लड़की या लड़के को उसके पास छोड़ दें।  

श्लोक-34. यज्ञे विवाहे यात्रायामुत्सवे व्यसने प्रेक्षणकव्यापृते जने तत्र तख च दृष्टेग्ङिताकारां परीक्षितभावामेकाकिनीमुपक्रमेत।।34।।

अर्थः यज्ञ, शादी, यात्रा, उत्सव, मुसीबत आदि में लोग प्रायः व्यग्र हो जाते हैं। इस तरह के मौकों पर प्रेमी अपनी प्रेमिका से उस स्थिति में गान्धर्व विवाह कर सकता है लेकिन ऐसा तभी करना चाहिए कि जब प्रेमिका को अपने बारे में सब कुछ बता दिया हो और वह भी आप पर विश्वास करती हो।

श्लोक-35. नहि दृष्टभावा योषितो देशो काले च प्रत्युज्यमाना व्यावर्तन्त इति वात्स्यायनः। इत्येकपुरुषाभियोगाः।।35।।

अर्थः आचार्य वात्स्यायन के अनुसार यदि प्रेमिका के भावों की परीक्षा अनेक बार हो चुकी हो। ऐसी प्रेमिका यज्ञ आदि के समय संकेत पाकर भी उस पर ध्यान नहीं देती हैं। वात्स्यायन द्वारा प्रेमी-प्रेमिका के मिलन का यह उपाय बताया है। इन उपयों द्वारा एक प्रेमी अपनी प्रेमिका से अपने प्यार की बाते कर सकता है और उसे पा सकता है।

श्लोक-36. मन्दापदेशा गुणवत्यपि कन्या धनहीना कुलीनापि समानैरयाच्यमाना मातापितृवियक्ता वा ज्ञातिकुलवर्तिनी वा प्राप्त-यौवनापाणिग्रहणं स्वयमभीत्सेत।।36।।

अर्थः लड़की नीचकुल में जन्म लेने के बाद भी गुणवती हो लेकिन उसके घर वाले कुल न मिलने के कारण उसकी शादी उस लड़के से नहीं करना चाहते हों जिसे वह पसंद करती है या लड़का-लड़की एक कुल का होने के बाद भी गरीबी के कारण लड़के की शादी उससे न हो रही हो या अन्य कुल में जन्म होते हुए भी उसके माता-पिता न हो और वह युवती हो तो ऐसी लड़कियों को स्वयं ही अपने पसंद के लड़के से शादी कर लेनी चाहिए।

श्लोक-37. सा तु गुणवन्तं शक्तं सुदर्शन बालप्रीत्याभियोजयेत्।।37।।

अर्थः इस तरह की युवती किसी ऐसे गुणवान, शक्तिशाली सुन्दर युवक के साथ शादी कर सकती है जो उसके बचपन का साथी हो।  

श्लोक-38. यं वा मन्येत मातापित्रोरसमीक्षया स्वयमप्ययमिन्द्रियदौर्बल्यान्मयि प्रवर्तिष्यत इति प्रियहितोपचारैरभीक्ष्णस्रंदर्शनेन च तमावर्जयेत्।।38।।

अर्थः युवती को वैसे युवक पर विश्वास करना चाहिए जो अपने माता-पिता की परवाह किए बिना उसकी ओर आकर्षित हो गया हो और उस पर विश्वास करता हो। ऐसे युवक को युवती अपने हाव-भाव दिखाकर तथा अन्य उपायों से अपनी तरफ आकर्षित कर उससे शादी कर सकती हैं।

श्लोक-39. विमुक्तकन्याभावा च विश्वास्येषु प्रकाशयेत्। इति प्रयोज्यस्योपावर्तनम्।।39।।

अर्थः इस तरह प्रेमी-प्रेमिका के मिलने के बाद जब दोनों सेक्स संबंध बना लेते हैं तो प्रेमिका को चाहिए कि वह अपने विश्वस्त सहेलियों को यह बात बता दें कि उसने अपने प्रेमी के साथ पहला सेक्स संबंध बनाया है।

भवन्ति चात्र श्लोकाः-

इस संबंध में कुछ श्लोक हैः-

श्लोक-40. कन्याभिय़ुज्यमाना तु यं मन्येताश्रयं सुखम्। अनुकूलं च वश्यं च तस्य कुर्यात्परिग्रहम्।।40।।

अर्थः इस श्लोक के अनुसार वात्स्यायन कहते हैं कि लड़की अपनी इच्छा के अनुसार अपनी जीवन साथी चुनने के लिए स्वतंत्र होती है।

श्लोक-41. अनपेक्ष्य गुणान्यत्र रूपमौचित्यमेव च। कुर्वीत धनलोभेन पति सापत्नकेष्वापि।।41।।

अर्थः जिस स्त्री को धन का लोभ हो उसे चाहिए कि रूप और गुण को न देखकर किसी भी पैसे वाले पुरुष के साथ विवाह कर लें।

श्लोक-42. तत्र युक्तगुणं वश्यं शक्तं बलवदर्थिनम्। उपायैरभियुञ्जानं कन्या न प्रतिलोभयेत्।।42।।

अर्थः स्त्री को ऐसे पुरुष को अपना पति बनाने की इच्छा रखनी चाहिए जो गुणवान हो, वशवर्ती हो, सामर्थ्यवान हो और जो आपकी ओर आकर्षित हो।

श्लोक-43. वरं वश्यो दरिद्रोऽपि निर्गुणोऽप्यात्मधारणः। गुणैर्युक्तोऽपि न त्वेवं बहुसाधारणः पतिः।।43।।

अर्थः जिस युवक में गुण की कमी हो, गरीब हो, आत्मनिर्भर हो और वश में रहने वाला हो उससे युवती को शादी कर लेनी चाहिए। लेकिन जो व्यक्ति गुणवान होते हुए भी व्यभिचारी हो उससे शादी कभी नहीं करनी चाहिए।

श्लोक-44. प्रायेण धनिनां दारा बहवो  निरवग्रहाः। बाहो सत्युपभोगेऽपि निर्विस्त्रम्भा बहिःसुखाः।।44।।

अर्थः अमीर लोगों के घरों में काफी सारी स्त्रियां रहती हैं लेकिन प्रायः वे निरंकुश हुआ करती हैं क्योंकि उन्हें बाहरी सुख मिलते हुए भी भीतरी सुख नहीं मिल पाता है।

श्लोक-45. नीचो यस्त्वभियुञ्जीत पुरुषः पत्नितोऽपि् वा। विदेशगतिशीलश्च न स संयोगमर्हतिः।।45।।

अर्थः जो छोटे वर्ग के लोग होते हैं या बूढ़े या परदेश में रहने वाले लोग होते हैं उनसे शादी नहीं करनी चाहिए।

श्लोक-46. यद्दच्छयाभियक्तो यो दम्भद्यताधिकोऽपि वा। सपत्नीकश्च सापत्यो न स संयोगनमर्हति।।46।।

अर्थः स्त्री को ऐसे पुरुष से कभी भी शादी नहीं करनी चाहिए जो स्त्री के इच्छा के खिलाफ सेक्स संबंध बनाता हो। ऐसे पुरुष जो प्यार करता हो लेकिन शादी के लिए कहने पर बहाने बनाते हो तथा कपटी और जुआरी पुरुष से भी शादी नहीं करनी चाहिए। विवाहित पुरुष जिसके बच्चे हो उससे भी शादी नहीं करनी चाहिए।

श्लोक-47. गुणसाम्येऽभियोक्तृणामेको वरयिता वरः। तत्रामियोक्तरि श्रैष्ठम्यमनुरागात्मको हि सः।।55।।

अर्थः यदि युवती की शादी करने वाले पुरुषों में सभी गुणवान हो तो युवती को उसी से विवाह करनी चाहिए जिससे वह ज्यादा प्यार करती हो।

           आचार्य वात्स्यायन ने प्रेमी-प्रेमिका को एक होने के लिए दो प्रकार बताया है- बाह्य तथा आभ्यांतर। बाहरी उपायों के द्वारा प्रेमी-प्रेमिका आपस में शतरंज या पत्ते खेलते हैं और प्रेमी खेल के बीच में ही वह बातों का ऐसा विवाद छिड़ देता है जिसमें दोनों ही अपनी मन की बाते कह देते हैं। इसके बाद जब प्रेमिका जाने लगती है तो प्रेमी उसका हाथ इस तरह पकड़ता है जिसे विवाह के समय युवक-युवती का हाथ पकड़ता है। इस तरह हाथ पकड़ने से प्रेमिका को यह अहसास हो जाता है कि यह मेरे साथ गन्धर्व विवाह करना चाहता है। इसके अतिरिक्त प्रेमी, प्रेमिका को अपने मन की बाते बताने के लिए विभिन्न प्रकार का चित्र दिखाता है, कभी मौका मिलते ही उसे आलिंगन करता है, जलक्रीड़ा करते समय उसके अंगों को छूटा है, कभी अपने दिल के दर्द बहाने उसे अपने पास बुलाता है। उत्सव आदि में प्रेमी-प्रेमिका एक साथ बैठते हैं, अपने पैर से उसके पैर को छूता है, पैरों को पैर से दबाता है। अंधेरे में जब कोई न देख रहा हो तो उस समय प्रेमी-प्रेमिका के पैरों के ऊपर हाथ फेरता है, फिर उसके जांघों, नितम्बों, पेट, पीठ तथा स्तनों पर हाथ फेरता है और नाखूनों को गड़ाता है। जब प्रेमी के द्वारा किए गए हरकतों को प्रेमिका चुपचाप सहन करती है तो फिर प्रेमी नीचे, ऊपर शरीर के अंग-अंग पर हाथ फेरता है।

           जब प्रेमी इन बाहरी स्पर्शों द्वारा प्रेमिका को अपने प्यार के बंधन में बांध लेता है तो बाहरी और भीतरी दोनों उपायों का प्रयोग करता है। बाहरी और भीतरी उपायों में प्रेमिका जिस जगह भी मिल जाती है प्रेमी उससे छेड़छाड़ शुरू करने लगता है। प्रेमी जब मिलने पर कोई चीज उसे देता है तो वह उस पर शर्म व लज्जा भाव पैदा करने वाले निशान लगा देता है। प्रेमी-प्रेमिका जब किसी कार्यक्रम के दौरान अंधेरे में एक-दूसरे से सटकर बैठे हुए होते हैं तो प्रेमी प्रेमिका के नितम्ब या स्तनों पर इस तरह से चुटकी काटता है कि वह उसे सहन कर सके तथा उसे अनुभूति भी हो। इस तरह अंधेरे के मौके का फायदा उठाकर प्रेमिका के साथ छेड़छाड़ करने से उसे शर्म नहीं आती क्योंकि अंधेरे और अकेले में प्रेमिका के मन में शर्म का भाव पैदा नहीं होता बल्कि प्रेमी के इस तरह चुटकी काटने और सहलाने से उसे आनन्द व सकून मिलता है। इसलिए अंधेरे का फायदा उठाकर प्रेमी-प्रेमिका सेक्स संबंध भी बना सकते हैं।

           वात्स्यायन ने इस प्रकार के प्रेमी-प्रेमिकाओं के लिए सेक्स संबंध का उचित समय और मौका बताते हुए कहा है कि उचित समय, रात और अंधेरे में यदि प्रेमिका से सेक्स संबंध के लिए अनुरोध किया जाए तो वह इन्कार नहीं करती है क्योंकि प्रेमिका सेक्स के लिए ऐसा स्थान चाहती है कि उसे कोई न देख सके। इसके अतिरिक्त प्रेमी के द्वारा सेक्स के लिए कहने पर प्रेमिका मना नहीं करती जब प्रेमिका के मन में उत्तेजन का भाव पैदा होता है, काम वासनाएं उमड़ पड़ती हैं और वह स्वयं सेक्स के लिए लालायित हो उठती है। इस तरह की मनोदशा में प्रेमिका अपने आप तो कुछ कहती नहीं है लेकिन जब प्रेमी उससे सेक्स के लिए कहता है तो वह मना नहीं करती।

           आचार्य वात्स्यायन का कहना है कि जिस तरह गरीब और हीन कुल का युवक अपने से ऊंचे कुल या समान वर्ग की लड़की से शादी करना चाहता है लेकिन किसी कारण वश वह नहीं मिल पाती। ऐसी लड़की को पाने के लिए युवक को चाहिए कि उस लड़की को प्यार से अपनी ओर आकर्षित करके उसे पाने की कोशिश करें। उसी तरह यदि कोई लड़की गरीब या अनाथ हो और उसकी शादी मनोभिलाषित युवक से होना संभव न हो तो लड़की को भी अपने पसंद के युवक को अपने प्यार से आकर्षित करके पाने की कोशिश करनी चाहिए। आचार्य वात्स्यायन ने लड़की और लड़के दोनों के लिए ही बाहरी और आंतरिक उपायों को बताया है जिससे वह अपनी इच्छे के अनुसार लड़की या लड़के से शादी कर सकता है। ऐसी युवती जो किसी पुरुष के साथ प्यार करती है और उससे शादी करना चाहती है और वह उसे एकांत अंधेरे में मिल जाता है जिसके साथ लड़की गान्धर्व विवाह करना चाहती है, ऐसे युवक का ऐसा स्वागत करना चाहिए जिसमें कामशास्त्र के 64 कलाओं में से किसी एक कला का कौशल प्रकट हो।

           आकर्षित पुरुष की तरह ही बातें करे, उसकी हर बात का अनुमोदन करें। हर काम का अनुकरण करें लेकिन उसे थोड़े कहने पर या संकेत मात्र से ही सेक्स के लिए तैयार न हो जाएं। ज्यादा कामातुर होने पर भी अपने आप संभोग के लिए कोई कोशिश नहीं करें और न कोई उतावलापन दिखाएं।

           आचार्य वात्स्यायन का मत है कि खुद संभोग के लिए प्रयत्न करने वाली स्त्रियां का सौभाग्य नष्ट हो जाता है अर्थात पुरुष उसे गलत समझने लगता है और उसकी अवहेलना करने लग जाता है। उससे अपना मन बिल्कुल हटा लेता है। हां यदि पुरुष सेक्स की कोई क्रियाएं करना चाहता है तो स्त्री उन क्रियाओं को अनुकूलता से स्वीकार कर ले, नहीं-नहीं की ज्यादा जिद्द न करें।

           इस प्रकार युवती को एक बात का ख्याल रखना चाहिए कि जब उसे यह पूरा यकीन हो जाए कि प्रेमी हर कीमत पर मेरा साथ निभाएगा तभी उसके साथ सेक्स संबंध बनाएं अन्यथा न करें।

     इति श्रीवात्स्यायनीये कामसूत्रे कन्यासम्प्रयुक्तके तृतीयेऽधिकरणे एकपुरुषभियोगा अभियोगतश्च कन्यायाः प्रतिपत्तिश्चतुर्थोऽध्यायः।।

कामसूत्र

Vātsyāyana
Chapters
कामसूत्र
कामसूत्र का परिचय
1
नागरकवृन्त प्रकरण 1
नागरकवृन्त प्रकरण 2
विद्या समुदेश प्रकरण 1
विद्या समुदेश प्रकरण 2
विद्या समुदेश प्रकरण 3
विद्या समुदेश प्रकरण 4
त्रिवर्ग प्रतिपत्ति प्रकरण 1
त्रिवर्ग प्रतिपत्ति प्रकरण 2
त्रिवर्ग प्रतिपत्ति प्रकरण 3
शास्त्र संग्रह 1
शास्त्र संग्रह 2
नायक सहायदूतकर्म विमर्श प्रकरण 1
नायक सहायदूतकर्म विमर्श प्रकरण 2
2
प्रथम अध्याय
द्वितीय अध्याय
तृतीय अध्याय
चतुर्थ अध्याय
पंचम अध्याय
षष्ठम अध्याय
सप्तम अध्याय
अष्टम अध्याय
नवम अध्याय
दशम अध्याय
3
प्रथम अध्याय
द्वितीय अध्याय
तृतीय अध्याय
चतुर्थ अध्यायः
पंचम अध्याय
4
प्रथम अध्याय
द्वितीय अध्याय
5
प्रथम अध्याय
द्वितीय अध्याय
चतुर्थ अध्याय
पंचम अध्याय
षष्ठम अध्याय
6
प्रथम अध्याय
द्वितीय अध्याय
तृतीय अध्याय
चतुर्थ अध्याय
पंचम अध्याय
षष्ठम अध्याय
7
प्रथम अध्याय
द्वितीय अध्याय