Android app on Google Play iPhone app Download from Windows Store

 

दशम अध्याय

रतारम्भावसानिक प्रकरण

श्लोक (1)- नागरकः सहमित्रजनेन परिजारकैक्ष कृतपुष्पोपहारे संचारितसुरभिधूपे रत्यावासे प्रसाधिते वासगृह कृतस्त्रानप्रसाधनां युक्तयापीतां स्त्रियं सान्त्वनैः पुनः पानेन चोपक्रमत्।।

अर्थ- नागरक को अपने नौकरों तथा दोस्तों द्वारा फूलों से सजाए गए सुगंधित संभोग क्रिया करने वाले कमरे में अपनी खूबसूरत, महंगे वस्त्रों में सजी, गहनों से लदी हुई, शराब का सेवन की हुई स्त्री के पास जाकर बैठे तथा उससे दुबारा उससे शराब पीने के लिए कहें।

श्लोक (2)- दक्षिणतक्ष्चास्या उपवेशनम्। केशहस्ते वस्त्रान्ते नीव्यामित्यवलम्बनम्। रत्यर्थ सव्येन बाहुनानुद्धतः परिष्वग्ड़।।

अर्थ- स्त्री के दाईं तरफ बैठ जाएं। फिर उसके बालों को हाथों से सहलाएं, उसके कपड़ों पर हाथ फेरें। इसके बाद उसकी साड़ी की गांठ पर हाथ लगाएं। संभोग क्रिया का आनंद बढ़ाने के लिए अपनी बाईं भुजा से उसको मजबूती से जकड़ लें।

श्लोक (3)- पूर्वप्रकरणसंबद्धैः परिहासानुरागैर्वचोभिरनुवृत्तिः। गूढाश्र्लीलानां च वस्तूनां समस्यया परिभाषणम्।।

अर्थ- संभोग के समय के आनंद को बढ़ाने के लिए किसी गहरी तथा अश्लील बात को किसी भी समस्या के रूप में बात करें। इसके साथ ही हंसी-मजाक भी जारी रहना चाहिए।

श्लोक (4)- सनृत्तमनृत्तं व गीतं वादिन्नम्। कलासु संकथाः। पुनः पानेनोपच्छन्दनम्।।

अर्थ- किसी तरह के संगीत को बजाने की व्यवस्था करें चाहे तो नाच भी करवा सकते हैं, सुकुमार कलाओं पर किसी तरह की बातचीत करें और फिर शराब का सेवन कराकर उसका उत्साह बढ़ाएं।

श्लोक (5)- जातानुरगायां कुसुमानुलेपनताम्बूलदानेन च शेषजनविसृष्टिः। विजने च यथोक्तैरालिग्ड़नादिभिरेनामुद्धर्षयेत्।ततो नीवीविश्र्लेषणादि यथोक्तमुपक्रमेत। इत्ययं रतारम्भः।।

अर्थ- किसी तरह की खुशबू, इत्र, परफ्यूम आदि को स्त्री के ऊपर छिड़ककर उसकी उत्तेजना को बढ़ाए। फालतू बैठे हुए लोगों को विदा कर दें। इसके बाद किसी खाली कमरे में उसकी उत्तेजना को और बढ़ाने के लिए उसके साथ आलिंगन, चुंबन आदि करें। इसके बाद संभोग करने से पहले की क्रियाएं साड़ी खोलना, कपडे़ उतारना आदि करें।

श्लोक (6)- रतावसानिकं रागमतिवाह्यासंत्तुतयोरिव सव्रीडयोः परस्परमपश्यतोः पृथक्पृथगाजारभूमिगमनम्। प्रतिनिवृत्त्यचाव्रीडायमानयोरुचितदेशो- पविष्टयोस्ताम्बूलग्रहणमच्छीकृतं चंदनमन्यद्वानुलेपनं तस्या गात्रे स्वयमेव निवेशयेत्।।

अर्थ- संभोग क्रिया की समाप्ति के बाद काम-उत्तेजना को बढ़ाने वाली क्रियाओं को छोड़कर दोनों को एक-दूसरे से अंजान बने हुए शर्म सी करते रहें और एक-दूसरे को न देखते हुए अलग-अलग शौचालयों में जाकर मूत्रत्याग करें तथा अपने-अपने जननांगों को साफ करें। इसके बाद शर्मो-हय्या को छोड़कर संभोग करने वाले स्थान के अलावा किसी दूसरे स्थान पर बैठकर पान का सेवन करें। फिर अपने हाथों से स्त्री के शरीर पर चंदन का या किसी दूसरे तेल आदि को लगाएं।

श्लोक (7)- स्वयेन बाहुना चैनां परिरभ्य चषकहस्तः सान्त्वयन् पापयेत्। जलानुपानं वा खण्डखाद्दकमन्यद्धा प्रकृतिसात्म्ययुक्तमुभावप्युञ्ञयाताम्।।

अर्थ- इसके बाद अपने बाएं हाथ से स्त्री का अलिंगन करके उसे सांत्वना दें। फिर अपनी पसंद तथा मौसम के अनुसार मीठे पदार्थ या फल आदि का सेवन करें।

श्लोक (8)- अच्छरसकयूषमम्यलयवागूं भृष्टमांसोपदंशानि पानकानि चूतफलानि शुष्कामांसं मातुलुग्डंचुक्रकाणि सशर्कराणि य यथादेशसात्म्यं च। तत्र मधुरमिदं मृदु विशदमिति च विदश्य विदश्य तत्तदुपाहरेत्।।

अर्थ- स्त्री को कोई भी खाने वाला फल आदि यह कहकर कि इस आम मे कितना रस भरा हुआ है, यह कितना मीठा है, यह कितना सुंदर और बड़ा है, इसे चखकर और चूसकर देखो कहकर देते रहें।

श्लोक (9)- हर्म्यलस्थितयोर्वा    चन्द्रिकासेवनार्थमासनम्।तत्रानुकूलाभिः कथाभिरनुवर्तेत। तदक्डंसंलीनायाश्र्चन्द्रमसं  पश्यन्त्या नक्षत्रपंडिक्तव्यक्तीकरणम्। अरुन्धतीध्रुवसप्तर्षिमालादर्शनं च। इति रतावसानिकम्।।

अर्थ- स्त्री और पुरुष दोनों को मौसम का या चांदनी रात का आनंद लेने के लिए घर की छत पर बैठ जाना चाहिए और प्यार भरी बातें करनी चाहिए। फिर स्त्री को पुरुष की गोद में अपना सिर रखकर लेट जाना चाहिए और चांद की रोशनी को देखते रहना चाहिए। पुरुष को स्त्री को नक्षत्रमालाओं के नाम बताते हुए कहना चाहिए कि देखो वह अरुंधती है, वह ध्रुव तारा है, वह सप्तर्षि है और वह आकाश गंगा है। इस तरह शरीर और मन को शांत और सुस्थिर बनाकर अलग-अलग पलंग पर सो जाना चाहिए।

श्लोक (10)- तत्रैतद्धवति- अवसानेऽपि च प्रीतिरुपचारैरुपस्कृता। विस्त्रम्भकथायोगै रतिं जनयते पराम्।।

इस विषय में कही गई कहावते प्रसिद्ध है-

अर्थ- अलिंगन, चुंबन और मीठी-मीठी प्यार भरी बातों से और प्यार की कहानियों से दोबारा शरीर में काम-उत्तेजना पैदा हो जाया करती है।

श्लोक (11)- परस्परप्रीतिकरैरात्मभावानुवर्तनैः क्षणात्क्रधपरावृत्तैः क्षणात्तप्रीतविलोकितैः।।

अर्थ- प्यार पैदा करने वाले भावों को दिखाने से थोडी़ ही देर में नाराज होकर मुंह मोड़ने और दूसरे ही पल हंसकर प्यार भरी नजर से देखने से आपस में प्यार बढ़ता है।

श्लोक (12)- हल्लीसंकक्रीड़नकैर्गायनैर्लाटरासकैः। रागलोलार्द्रनयनैश्चन्द्रमंडलवीक्षणैः।।

अर्थ- स्त्री और पुरुष के पहली बार मिलने पर मन में किस प्रकार की भावनाएं पैदा हुई थी या पहली बार एक-दूसरे से बिछड़ने पर कितना दुख हुआ। इस प्रकार की बातें करने से शरीर में उत्तेजना बढ़ती है।

श्लोक (13)- आद्ये संदर्शने जाते पूर्व ये स्यु्र्मनोरथाः पुनर्वियोगे दुःखं च तस्य सर्वस्य कीर्तनः।।

कीर्तनान्ते च रागेण परिष्बग्ङैः सचुम्बनैः। तैस्तैश्र्च भावैः संयुक्तो यूनो रागो विवर्धते।।

अर्थ- इस तरह से प्यार भरी बातें करने से और आपस में एक-दूसरे को अलिंगन और चुंबन आदि करने से आनंद और उत्तेजना बढ़ जाते हैं।

श्लोक (14)- रागवदाहार्यरागं कृत्रिमरागं व्यवहितरागं पोयारतं खलरतमयन्त्रितरतमिति रताविशेषाः।।

अर्थ-

रागवत- सबसे पहले एक-दूसरे को देखने से ही आपस में प्यार पैदा हो जाता है।

आहार्यराग- किसी स्त्री से धीरे-धीरे प्यार बढ़ाकर उसके साथ संबंध जोड़ लेना चाहिए।

कृत्रिमराग- प्यार के बिना ही किसी खास मकसद से संबंध जोड़ना चाहिए।

व्यवहितराग- किसी कारण से अपनी पत्नी के अलगाव हो जाने पर किसी दूसरी स्त्री के साथ अपनी पत्नी की ही तरह संबंध रखने चाहिए।

पोटारत- काम-उत्तेजना में अंधे होकर किसी दुष्ट स्त्री के साथ संबंध जोड़ना।

खलरत- अपने अंदर उठने वाली काम-उत्तेजनाओं को शांत करने के लिए किसी छोटी जाति की स्त्री या नीच व्यक्ति से संबंध जोड़ना।

अयन्त्रितरतम- जिन पुरुषों और स्त्रियों के आपस में संबंध जुड़ने में किसी तरह की परेशानी नहीं आती है।

श्लोक (15)- संदर्शनात्प्रभृत्युभयोरपि प्रवृद्धरागयोः प्रयत्नकृते समागमे प्रवासप्रत्यागमने वा कलहवियोगयोगे तद्रागवत्।।

अर्थ- सबसे पहले स्त्री और पुरुष की आपस में बातचीत, एक-दूसरे को देखना, एक-दूसरे की आंखों में दोनों को समा जाना, एक-दूसरे से मिलने के लिए दिल में तड़प पैदा होना, दोनों की तड़प बढ़ने से बहुत मुश्किलों से आपस में संभोग करना, किसी दूर देश से वापिस आने पर बिछड़ने की तड़प को भूलकर दोबारा से उत्तेजना भरी हुई बातें करना रागावत कहलाया जाता है।

श्लोक (16)- तत्रात्माभिप्रायाद्यावदर्थ च प्रवृत्तिः।।

अर्थ- रागावत (उत्तेजना) अपने आप ही बढ़ती है। इस प्रकार स्त्री और पुरुष संभोग करते हुए जब तक स्खलित नहीं होते तब तक संभोग करने में लगे रहते हैं।

श्लोक (17)- मध्यस्थरागयोरारब्धं यदनुरज्यते तदाहार्यरागम्।।

अर्थ- जब स्त्री या पुरुष एक-दूसरे को देख लेते हैं तो उनमें एक-दूसरे के प्रति सिर्फ चाहत पैदा होती है किसी तरह की काम-उत्तेजना नहीं।  इसे मध्यस्थराग कहा जाता है। इस तरह से मध्यस्थराग के द्वारा किए गए उपायों से उत्तेजना पैदा होने से जिस समय दोनों आपस में मिल जाते हैं तो उसे आहार्यराग कहते हैं।

श्लोक (18)- तत्र चातुःषष्टिकैर्योगैः सात्मयानुविद्धैः संघुक्ष्य संघुक्ष्यरागं प्रवर्तेत।।

अर्थ- इस तरह के अवसर मिलने पर पहले के अनुभव के आधार पर किये गए अलिंगन आदि के जरिये अपनी तथा स्त्री की काम-उत्तेजना को जगाकर संभोग क्रिया में लीन हो जाना चाहिए।

श्लोक (19)- तत्कार्यपेतोरन्यत्र सक्तयोर्वा कृत्रिमरागम्।।

अर्थ- अगर पुरुष किसी और पर फिदा हो जाए तथा स्त्री भी किसी और पर फिदा हो जाए तो इस मकसद के तहत जब दोनों आपस में संभोग करते हैं तो उसे कृत्रिम राग कहा जाता है।

श्लोक (20)- तत्र समुच्चयेन योगाञ्शास्त्रतः पश्येत्।।

अर्थ- कृत्रिम आदि उत्तेजनात्मक संभोग क्रिया में कामशास्त्रीय योगों या तरीकों का प्रयोग करना चाहिए।

श्लोक (21)- पुरुषस्तु ह्रदयप्रियामन्यां मनसि निधाय व्यवहरेत्। संप्रयोगात्प्रभृति रतिं यावत्। अतस्तद्यवहितरागम्।।

अर्थ- पुरुष जिस स्त्री से पहले प्यार करता था, उसकी छवि को अपने मन में रखकर दूसरी स्त्री के साथ संभोग करते समय संभोग की सारी क्रियाओं का इस्तेमाल करें और स्त्री भी अपने पहले की प्रेमी को मन में बसाकर दूसरे पुरुष के साथ संभोग क्रिया करे। इसे रत व्यवहितराग कहते हैं।

श्लोक (22)- न्यूनायां कुम्भदास्यां परिचारिकायां वा यावदर्थ संप्रयोगस्तत्पोटारतम्।।

अर्थ- नीची जाति की स्त्री के साथ या अपने घर आदि में काम करने वाली स्त्री के साथ जब संभोग क्रिया की जाती है उसे पोटारत कहते हैं।

श्लोक (23)- तत्रोपचारात्राद्रियेत।।

अर्थ- इस प्रकार की स्त्रियों के साथ संभोग करते समय चुंबन, अलिंगन आदि का प्रयोग नहीं करना चाहिए क्योंकि इस तरह की संभोग क्रिया सिर्फ प्रयोजनपरक (किसी उदेश्य को पूरा करने के लिए) ही मानी जाती हैं।

श्लोक (24)- तथा वेश्याया ग्रामीणेन सह यावदर्थ खलरतम्।।

अर्थ- इसी प्रकार वेश्या का किसी गंवार के साथ सिर्फ संभोग करने तक मतलब रहता है। इसे खलरत कहते हैं।

श्लोक (25)- ग्रामव्रयप्रत्यन्तयोषिद्धिकश्च।।

अर्थ- किसी गंवार स्त्री, गाय चराने वाली स्त्री, भीलनी आदि के साथ संभोग क्रिया में निपुण व्यक्ति जब संभोग करता है तो उसे भी खलरत कहते हैं।

श्लोक (26)- उत्पन्नविस्त्रम्भयोश्र्च परसपरानुकूल्यादयन्त्रितरतम्। इति रतानि।।

अर्थ- स्त्री और पुरुष जब काफी दिनों से एक-दूसरे को जानने के कारण आपस में एक-दूसरे पर बहुत भरोसा करने लग जाते हैं तो उन दोनों का एक साथ संभोग करना अयन्त्रितरत कहलाता है।

श्लोक (27)- वर्धमानप्रणया तु नायिका सपत्नीनामग्रहणं तदाश्रयमालार्प वा गोत्रस्खलितं वा न मर्षयेत्। नायकव्यलीकं।

अर्थ- जो प्रेमी अपनी प्रेमिका पर बहुत ज्यादा भरोसा करने लग गया हो ऐसे में प्रेमिका को अपने प्रेमी द्वारा अपनी सौतनों का नाम लेना, उनके बारे में बात करना या उनके नाम से खुद को बुलाया जाना आदि को बर्दाश्त नहीं करना चाहिए।

श्लोक (28)- तत्र सुभृशः कलहो रुदितामायासः शिरोरुहाणामवक्षोदनं प्रहणनमासनाच्छयनाद्वा मह्यां पतनं माल्यभूषणावमोक्षो भूमौ शय्या च।।

अर्थ- ऐसी स्थिति आ जाने पर स्त्रियां बोलकर तथा दूसरी हरकतों के जरिये अपना गुस्सा जाहिर करती है जैसे मैने कह दिया न कि दुबारा ऐसी बात मत करना, यह बोली द्वारा गुस्सा जाहिर करना होता है। रोना, चिल्लाना, हाथ-पैरों को पटकना यह सब दूसरी तरह से गुस्सा जाहिर करना है। शरीर का गुस्से में कांपना, सिर में दर्द होना आयास कहलाता है। अपने बालों को खोलकर बिखेर देना, पुरुष के बालों को पकड़कर खींच देना अवक्षोदन कहलाता है। अपनी छाती को हाथों से पीटना प्रहणन कहलाता है। इस प्रकार के क्लेश में स्त्री जब पलंग आदि से उतरकर जमीन पर लेट जाती है तो उसे कोई दुख नहीं होता है। जमीन पर लेटना, गहने उतारकर फैंक देना आदि क्लेश पैदा करते हैं।

श्लोक (29)- तत्र युक्तरूपण साम्रा पादपतनेन वा प्रसन्नमनास्तामनुनयुन्नुपक्रम्य शयनमारोहयेत्।।

अर्थ- स्त्री के इस तरह गुस्से में आकर क्लेश करने पर पुरुष को चाहिए कि वह प्यार भरी बातों से या उसके पैरों में पड़कर उसे बहला-फुसलाकर पलंग पर सुला दे।

श्लोक (30)- तस्य च वचनमुत्तरेण योजयन्ती विवृद्धक्रोधा सकचग्रहमस्यास्यमुन्नमय्य पादेन बाहौ शिरसि वक्षसि पृष्ठे वा सकृदद्विस्त्रिरवहन्यात्। द्वारदेश गच्छेत्। तत्रोपविश्यश्रुकरणमिति।।

अर्थ- पुरुष की हर बात पर गुस्से में लड़ती हुई स्त्री, पुरुष के बालों को पकड़कर उसके मुंह को ऊपर उठाकर अपने पैरों से उसके हाथों, सिर, छाती या पीठ में 2-3 बार ठोकर मारकर दरवाजे तक चली जाती है और वहां बैठकर आंसू बहाती रहती है।

श्लोक (31)- अतिक्रद्धापि तु न द्वारदेशाद्धूयो गच्छेत्। दोषवत्त्वात्। इति दत्तकः। तत्र युक्तितोऽनुनीयमाना प्रसादमाकांक्षेत्। प्रसन्नाति तु सकषायैरेव वाक्यैरेनं तुदतीव प्रसन्नरतिकाक्षिणी नायकेन परिरभ्येतः।।

अर्थ- महान आचार्य दत्तक का कहना है कि बहुत ही ज्यादा गुस्से में वह स्त्री जब न तो घर के अंदर ही जाए और न ही घर के बाहर ही कदम रखे। उसे वहीं घर के अंदर दरवाजे पर खुश हो जाना चाहिए। खुश हो जाने के बाद स्त्री को अपनी तीखी बोली के प्रहारों से पुरुष के ह्रदय को चीरती हुई संभोग क्रिया करने की लालसा में पुरुष से परिरम्भण शुरू करना चाहिए।

श्लोक (32)- स्वभवनस्था तु निमित्तात्कलाहिता तथाविधचेष्टैव नायकमभिगच्छेत् ।।

अर्थ- अपने सगे-संबंधियों के घर पर रहने वाली स्त्री, पुरुष से दूरी में तड़पती हुई उससे मिलने की कोशिश करते हुए उस तक पहुंच ही जाए।

श्लोक (33)- तत्र पीठमर्दविटविदूषेकैर्नायकप्रयुक्तैरूपशमितरोषा तैरेवानुनीता तैः सहैव तद्धवनमधिगच्छेत्। तत्र च वसेत्। इति प्रणयकलहः।।

अर्थ- इस तरह के दूरी में तड़पते हुए अवसरों पर अगर पुरुष अपने दोस्तों या जानने वालों को उसको मनाने के लिए भेजे तो स्त्री को गुस्सा छोड़कर पुरुष के पास चले जाना चाहिए तथा पूरी रात पुरुष के पास ही रहना चाहिए। अब प्रणय कलह समाप्त होता है।

श्लोक (34)- भवन्ति चात्र श्लोकाः-

एवमेतां चतुःषष्टिं बाभ्रव्येण प्रकीर्तिताम्। प्रयुञ्ञानो वरस्त्रीथु सिद्धिं गच्छति नायकः ।।

अर्थ- वाभ्रव्य आचार्यों के द्वारा बताई गई पान्वालिकी चतुःषष्टि का इस्तेमाल स्त्री पर करके पुरुष सफलता हासिल कर सकता है।

श्लोक (35)- वजिंतोऽप्यन्यविज्ञानैरेतया यस्त्वलंकृतः। स गोष्ठयां नरनारीणां कथास्वग्रं निगाहते।।

अर्थ- जो पुरुष बहुत सी विद्याओं का ज्ञाता होते हुए भी अलिंगन, चुंबन आदि जैसी संभोग की 64 कलाओं को नहीं जानता है तो वह विद्वानों की अर्थ, धर्म, काम की गोष्ठियों में सम्मान नहीं हासिल नहीं कर पाता।

श्लोक (36)- ब्रुवन्नप्यन्यशास्त्राणि चतुःषष्टिविवर्जितः। विद्वत्संसदि नात्यर्थ कथासु परिपूज्यते।।

अर्थ- दूसरी विद्याओं में निपुण न होने के बावजूद भी जो पुरुष काम-शास्त्र का ज्ञान रखता है वह स्त्री-पुरूषों की कामविषयक गोष्ठियों में सम्मान के अधिकारी बनते हैं।

श्लोक (37)- विद्वद्धिः पूजितामेनां खलैरपि सुपूजिताम्। पूजितां गणिकासड्गनर्ननिन्दीं को न पूजयेत्।।

अर्थ- तीनों लोकों के ज्ञाता विद्वान संभोग की इन 64 कलाओं को स्त्री की रक्षा का उपाय समझकर सम्मान देते हैं। गणिकाएं (वेश्याएं) भी इनको जीविका का साधन मानकर पूजती हैं। जब ऐसे बुरे लोग भी इनकी उपयोगिता को जानकर इनका सम्मान करते हैं तो भला ऐसे महान कलाओं को कौन नहीं पूजेगा।

श्लोक (38)- नन्दिनी सुभगा सिद्धा सुभगंकरणीति च। नारीप्रियेति चाचार्यः शास्त्रेप्वेषा निरुच्यतें।।

अर्थ- संभोग की इन 64 कलाओं का ज्ञान हर पति-पत्नी को करना चाहिए। क्योंकि यह कलाएं सुभणा है, सिद्धा है, संभंगकरणी है, स्त्रियों को प्यारी है तथा आचार्यों ने शास्त्रों के अंतर्गत इनकी इस तरह की व्याख्या की है।

श्लोक (39)- कन्याभिः परयोषिद्धर्गणिकाभिश्च भावतः। वीक्ष्यते बहुमानेन चतुःषष्टिविचक्षणः।।

अर्थ- जो पुरुष संभोग की 64 कलाओं में पूरी तरह से निपुण होते हैं उन्हें पुनर्भू लड़कियां, परस्त्रियां (पराई स्त्रियां) तथा मणिकाएं बहुत ही सम्मान की नजर से देखती है।

प्राक् क्रीड़ा-

          प्राक् क्रीड़ा को यौन-जीवन की नींव कहा जा सकता है क्योंकि इसका संबंध कहीं न कहीं स्खलन और संभोग के समय मिलने वाले चरम सुख से होता है।

स्पर्श-

          जीवन का एक बहुत ही प्रमुख उपादान होता है स्पर्शभाव। प्राक् क्रीड़ा के समय वैसे तो स्त्रियां बहुत ज्यादा शर्माती है, नखरें करती है, पुरुष की बाजुओं से छूटने की कोशिश करती है। लेकिन उनके इस तरह के विरोध में उनकी हर न में स्पर्श बिंदुओं को बढ़ाने का ही मकसद मौजूद रहता है। इस बात को तो सभी को मानना पड़ेगा कि स्पर्श ही असल में काम-उत्तेजना को जगाने की पहली सीढ़ी है।

चुंबन-

          महान आचार्य वात्स्यायन नें प्राक् क्रीड़ा तथा संभोग करने के समय में चुंबन को बहुत ज्यादा महत्व दिया है। इसकी वजह यह है कि यौन-क्षेत्र में स्नायविक, शक्ति को जागृत करने के लिए चुंबन से बढ़कर कोई दूसरा साधन नहीं है।

होंठ-

          होठों की त्वचा तथा श्लैष्मिक झिल्ली के बीच में एक बहुत ही अनुभूतिपूर्ण भाग होता है जो ज्यादातर नजरिये से योनि तथा योनिगह्वर के बीच के भाग की तरह होता है। इस भाग में जब पुरुष अपनी जीभ से स्पर्श करता है तो स्त्री के शरीर में एक बहुत ही उत्तेजना की लहर दौड़ पड़ती है जो संभोग क्रिया में बहुत ही खास भूमिका निभाती है।

गंध-

          हर स्त्री और पुरुष के शरीर में अपनी-अपनी एक अलग तरह की गंध होती है जो पुरुष या स्त्री में युवावस्था की शुरूआत में ही पैदा हो जाती है। यही गंध पुरुष या स्त्री के स्नायुओं में उत्तेजना पैदा करके उनकी संभोग करने की इच्छा को तेज करती है। बहुत बार देखने या सुनने में आता है कि किसी बहुत ही सुंदर स्त्री ने किसी साधारण लड़के से विवाह कर लिया या किसी बड़ी उम्र की स्त्री ने किसी छोटी उम्र के लड़के के साथ भागकर विवाह कर लिया। इस तरह की खबरों के पीछे ज्यादातर इस तरह की गंध का ही हाथ होता है।

हास्य-व्यंग-

          किसी तरह का हंसी-मजाक, संगीत, कहानियां आदि शरीर में एक प्रकार की उत्तेजना पैदा करती है। इस प्रकार जिन कारणों से आनंद की छंद-प्रवृति बढ़ती है उनका हम पर निश्चित रूप से उत्तेजक तथा उत्साह बढ़ाने वाला प्रभाव पड़ता है। यह बात पूरी तरह से सामने आ चुकी है कि संगीत में स्त्रियों का असीम प्यार भरा होता है।

आवाज-

          पुरुष की आवाज का स्त्री पर बहुत ज्यादा असर पड़ता है। असल जिंदगी में बहुत बार स्त्रियों को सिर्फ पुरुषों की आवाज सुनकर ही फिदा होते पाया गया है। इसलिए वात्सयायन ने संभोग क्रिया में आनंद बढ़ाने के लिए आवाज पर ज्यादा जोर दिया है।

नजर-

          नजर से एक-दूसरे के प्रति आसक्त होकर संभोग क्रिया तक पहुंचने का एक बहुत बड़ा अंग माना जाता है। जब स्त्री और पुरुष एक-दूसरे के प्यार में पड़ते हैं तो उनकी सबसे पहले नजरें ही आपस में मिलती हैं।

          बूढ़ा हो या जवान हर कोई किसी न किसी प्रकार के उत्तेजक दृश्यों को देखने के लिए बेचैन रहते हैं। सुंदर चीज को देखने की प्यास हर आंख को रहती हैं।

          आचार्य वात्सयायन ने संभोग क्रिया करने के बाद अलिंगन, चुंबन या प्यार भरी बातों के बारे में कहा है। इसे खावसानिक कहा जाता है। अगर विवेक के नजरिये से देखा जाए तो काम-वासनाएं अपनी प्यास बुझाना चाहती हैं। इसके लिए वह हर समय बेचैन रहती है। पुरुष की काम-शक्ति ऐसी वासनाओं की प्यास बुझाने में कामयाब नहीं हो पाती। उस संक्षोम से ही उन दोनों की काम-शक्ति में कमी आती है। जीवन में खुशी तथा उत्साह बनाने के लिए चुस्ती-फुर्ती तथा खोई हुई ताकत को दुबारा पाने के लिए रतावसानिक क्रियाएं बहुत जरूरी हैं।

कामसूत्र

Vātsyāyana
Chapters
कामसूत्र
कामसूत्र का परिचय
1
नागरकवृन्त प्रकरण 1
नागरकवृन्त प्रकरण 2
विद्या समुदेश प्रकरण 1
विद्या समुदेश प्रकरण 2
विद्या समुदेश प्रकरण 3
विद्या समुदेश प्रकरण 4
त्रिवर्ग प्रतिपत्ति प्रकरण 1
त्रिवर्ग प्रतिपत्ति प्रकरण 2
त्रिवर्ग प्रतिपत्ति प्रकरण 3
शास्त्र संग्रह 1
शास्त्र संग्रह 2
नायक सहायदूतकर्म विमर्श प्रकरण 1
नायक सहायदूतकर्म विमर्श प्रकरण 2
2
प्रथम अध्याय
द्वितीय अध्याय
तृतीय अध्याय
चतुर्थ अध्याय
पंचम अध्याय
षष्ठम अध्याय
सप्तम अध्याय
अष्टम अध्याय
नवम अध्याय
दशम अध्याय
3
प्रथम अध्याय
द्वितीय अध्याय
तृतीय अध्याय
चतुर्थ अध्यायः
पंचम अध्याय
4
प्रथम अध्याय
द्वितीय अध्याय
5
प्रथम अध्याय
द्वितीय अध्याय
चतुर्थ अध्याय
पंचम अध्याय
षष्ठम अध्याय
6
प्रथम अध्याय
द्वितीय अध्याय
तृतीय अध्याय
चतुर्थ अध्याय
पंचम अध्याय
षष्ठम अध्याय
7
प्रथम अध्याय
द्वितीय अध्याय