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नवम अध्याय

औपरिष्टक प्रकरण (मुख मैथुन)

श्लोक (1)- द्विविधा तृतीया प्रकृतिः स्त्रीरूपिणी पुरुषरूपिणो च।।

अर्थ- अब तक आपको चारों प्रकार की स्त्रियों के बारे में आलिंगन से लेकर विपरीत सेक्स के बारे में बताया गया है। अब आपको तीसरी प्रकार अर्थात किन्नरों के लिए औपरिष्टक योग बताया जा रहा है-

किन्नर प्रकृति 2 तरह की होती है स्त्री और पुरुष।

श्लोक (2)- तत्र स्त्रीरूपिणी स्त्रिया वेषमालापं लीलां भावं मृवत्वं भीरुत्वं मुग्धतामसहिष्णुता व्रीड़ां चानुकुर्वीत।।

अर्थ- जिसकी चाल-ढाल, रंग-रूप, शरीर की बनावट बिल्कुल स्त्री की तरह ही हो लेकिन उसके यौन अंग पुरुष के साथ संभोग करने में विफल हो तो उस किन्नर को चाहिए कि वह स्त्रियों की तरह ही कपड़े पहने और उसी की तरह हाव-भाव, शर्मो-हय्या, डर आदि को प्रकट करे।

श्लोक (3)- तस्या वदने जघनकर्म। तदौपरिष्टकमोचक्षते।।

अर्थ- औपरिष्टक-

किन्नर स्त्री के मुख में जो बुरा काम किया जाता है उसे औपरिष्टक कहा जाता है।

फलमाह-

श्लोक (4)- सा ततो रतिमाभिमानिकीं वृत्तिं च लिप्सेत्।।

अर्थ- ऐसी किन्नर स्त्री को स्तनों को दबाना, चुंबन करना आदि क्रियाओं द्वारा अभिमाननी का संभोग सुख प्राप्त करने के साथ ही मुखमैथुन द्वारा ही अपना जीवन बिता सकती है।

श्लोक (4)- वेश्यावच्चरितं प्रकाशयेत्। इतिं स्त्रीरूपिणी।।

अर्थ- किन्नर स्त्री को हरदम वेश्याओं जैसा व्यवहार ही करना चाहिए। यहां पर किन्नर का विषय समाप्त होता है।

श्लोक (6)- पुरुषरूपिणी तु प्रच्छन्नकामा पुरुषं लिप्समानां संवाहक-भावमुपजीवेत्।।

अर्थ- जो किन्नर पुरुष जैसे होते हैं वह किन्नर होने की वजह से अपनी इच्छाओं को दबाकर रखते हैं लेकिन वह पुरुष से संभोग करने की इच्छा रखते हैं। ऐसे में उस किन्नर को पुरुष के पांव आदि दबाने का काम करना चाहिए।

श्लोक (7)- संवाहने परिष्वजमानेव गात्रैरूरू नायकस्य मृद्गीयात्।।

अर्थ- पुरुष के पांव दबाते समय अपने शरीर को पुरुष के शरीर से छुआते रहे और उसकी जांघों को भी दबाए।

श्लोक (8)- प्रसतपरिचया चोरुमूलं सजघनमिति संस्पृशेत्।।

अर्थ- इसके बाद धीरे-धीरे करके पुरुष की जांघों के जोड़ो तथा जांघों को धीरे-धीरे सहलाते हुए मसलना चाहिए।

श्लोक (9)- तत्र स्थिरलिङग्तामुपलभ्य चास्य पाणिमऩ्थेन परिघट्टेयेत्। चापलमस्य कुत्सन्तीव हसेत्।।

अर्थ- इस तरह करने से अगर पुरुष के लिंग में उत्तेजना आ जाती है तो उसकी चापलूसी करते हुए उसके लिंग को अपनी मुट्ठी में दबाकर हिलाएं।

श्लोक (10)- कृतलक्षणेनाप्युपलब्धवैकृतेनापि न चोद्यत इति चेत्स्वयमुपक्रमेत्।।

अर्थ- पुरुष का लिंग उसी अवस्था में उत्तेजित हो सकता है जब उत्तेजना पैदा होती है। इस तरह किन्नर द्वारा उत्तेजना पैदा करने और इस बात की जानकारी देते हुए भी कि वह मुख मैथुन करना चाहता है फिर भी पुरुष उस किन्नर को मुख मैथुन करने के लिए कहे लेकिन किन्नर को खुद ही मुख मैथुन करने के लिए आगे बढ़ना चाहिए।

श्लोक (11)- पुरुषेण च चोद्यमाना विवदेत्। कृच्छ्रेण चाभ्युपगच्छेत्।।

अर्थ- कभी-कभी अगर पुरुष पहले ही किन्नर से मुख मैथुन करने के लिए कहता है तो किन्नर को आनाकानी करते हुए बहुत मुश्किल के मुख मैथुन करना चाहिए।

श्लोक (12)- तत्र कर्माष्टविधं समुच्चयप्रयोज्यम्।।

अर्थ- औपरिष्टक काम 8 तरह के होते हैं इसलिए उनका बारी-बारी से प्रयोग करना चाहिए।

श्लोक (13)- निमितं पार्श्चतोदष्टं बहिःसंदंशोऽन्तुःसंदंशश्चुम्बितकं परिमृष्टकमाम्रचूषितकं संगर इति।।

अर्थ-

    निमित्त
    पार्श्वोदष्टं
    बहिःसंदंश
    अंतःसंदंश
    चुम्बितक
    परिमृष्टक
    आम्रचूषितक
    सङगर

श्लोक (14)- तेष्वेकैमभ्युपगम्य विरामाभीप्सां दर्शयेत्।।

अर्थ- इन 8 क्रियाओं में से किन्नर को एक-एक क्रिया करते हुए आराम करना चाहिए जिससे कि पुरुष ज्यादा उत्सुक हो जाए।

श्लोक (15)- इतरश्च पूर्वस्मिन्नभ्युपगते तदुत्तरमेवापरं निदिशेत्। तस्मिन्नपि सिद्धे तदुत्तरमिति।।

अर्थ- पुरुष को एक क्रिया के पूरी हो जाने के बाद किन्नर से दूसरी क्रिया करने के लिए कहना चाहिए। इसी तरह से उससे बाकी क्रियाएं करने के लिए कहना चाहिए।

श्लोक (16)- करावलम्बितमोष्ठयोरुपरि विन्यस्तमपविध्य मुखं विधुनुयात्। तन्निमितम्।।

अर्थ- निमित

           पुरुष के लिंग को अपने हाथों से पकड़कर उस किन्नर को होठों को गोल-गोल आकार में बनाकर लिंग पर रख देना चाहिए और फिर अपना मुंह हिलाना चाहिए। इसे निमित मुख मैथुन कहते हैं।

श्लोक (17)- हस्तेनाग्रमवच्छाद्य पार्श्वतो निर्दशनमोष्ठाभ्यामवपीडय भवत्वेतावदिति सान्वयेत्। तत्पार्श्वतोदष्ट।

अर्थ- पार्श्वतोदष्ट-

           किन्नर को पुरुष के लिंग के आगे वाले भाग को अपने हाथ से दबाकर तथा उसके दोनों भागों को सिर्फ होठों से दबाकर छोड़ देना चाहिए और कहना चाहिए कि अब इतना ही करना है। इसे पार्श्वतोदष्ट कहते हैं।

श्लोक (18)- भूयश्चोदिता संमीलितौष्ठी तस्यांग्र निष्पीडच्य कर्षयन्तीव चुम्बेत्। इति बहिःसंदंश।।

अर्थ- बहिःसंदंश

           अगर पुरुष दुबारा से किन्नर को यह क्रिया करने के लिए कहता है तो उसे पुरुष के लिंग को मुंह के अंदर लेकर दोनों होठों से दबाकर खींचते हुए उसे चूमना चाहिए। इस क्रिया को बहिःसंदंश कहते हैं।

श्लोक (19)- तस्मिभेवाभ्यर्थनया किञ्ञिदधिकं प्रवेशयेत्। सापि चाग्रमोष्ठायां निष्पीडय निष्ठीवेत्। इत्यन्तःसंदंशः।।

अर्थ- अन्तःसंदंश

           पुरुष के फिर दुबारा से कहने पर किन्नर को पुरुष के लिंग के आगे के भाग को थोडा़ मुंह के अंदर रखकर होठों से दबाकर निकाल देने को अन्तःसंदंश कहते हैं।

श्लोक (20)- करावलम्बितस्यौष्ठवद्ग्रहणं चुम्बितकम्।।

अर्थ- चुम्बितक

           अपने हाथों में पुरुष के लिंग को पकड़कर होठों को गोल आकृति में बनाकर लिंग को उनसे चूमने को चुम्बित कहते हैं।

श्लोक (21)- तत्कृत्वा जिह्वाग्रेण सर्वतो घट्टनमग्रे च व्यधनमिति

अर्थ- परिमृष्टकम्

           चुम्बितक क्रिया को करते समय लिंग को जीभ से रगड़ना या उस पर जीभ से प्रहार करने को परिमृष्टक कहते हैं।

श्लोक (22)- तथाभूतमेव रागवशादर्धप्रविष्टं निर्दयमवपीडयावपीडय मुञ्ञेत। इत्याम्रसुषितकम्।।

अर्थ- आम्रचूषितक

पूरी तरह से उत्तेजना के बढ़ जाने के बाद लिंग को मुंह में थोड़ा सा पूरा डालकर आम की गुठली की तरह चूसने को आम्रचूषितक कहते हैं।

श्लोक (23)- पुरुषाभिप्रायादेव गिरेत्पीडयेच्चपरिसमाप्तेः। इति संगरः।।

अर्थ- संगर-

किन्नर को पुरुष की इच्छा के मुताबिक ही लिंग को मुंह में डालकर स्खलित होने तक दबाने को संगर कहते हैं।

श्लोक (24)- यथार्थ चात्र स्तननप्रहणनयोः प्रयोगः। इत्यौपरिष्टकम्।।

अर्थ- उत्तेजना के अनुसार ही कम या तेज गति से मुख मैथुन करते समय किन्नर को सिसकियां तथा प्रहणन क्रिया करनी चाहिए।

श्लोक (25)- कुल्टाः स्वैरिण्यः परिचारिकाः संवाहिकाश्चाप्येतत् प्रयोजयन्ति।।

अर्थ- किन्नरों के अलावा कुल्टा आदि स्त्रियों के मुख मैथुन कर्म कुल्टा, स्वैरिणी, परिचारिका तथा संवाहिका स्त्रियां भी मुख मैथुन कराती है।

श्लोक (26)- तदेतत्तु न कार्यम्। समयविरोधासभ्यत्वाच्च। पुनरपि ह्यासां वदनंसंसर्गे स्वयमेवर्तिं प्रपद्येत। इत्याचार्याः।।

अर्थ- आचार्यों के मतानुसार-

           इस मुखमैथुन जैसे कार्य को बिल्कुल भी नहीं करना चाहिए। शास्त्रों नें भी इस काम को गलत बताया है। जो स्त्री या किन्नर मुख मैथुन करवाते हैं इसको करने के बाद अगर इनका मुंह चूमा जाता है तो बहुत ज्यादा दुख होता है।

श्लोक (27)- वेश्याकामिनोऽयमदोषः। अंतयतोऽपि परिहार्यः स्यात्। इति वात्स्यायनः।।

अर्थ- आचार्य वात्स्यायन के अनुसार वेश्यागमन करने वालों के लिए शास्त्रों को न मानना गलत नहीं माना जा सकता। इसके अलावा यह भी कहा जाता है कि जानवरों का है तथा ऐसी स्त्रियों के मुंह को चूमने से दुख होता है। जिस देश में इस काम को करना जायज माना जा सकता है वहां के लोगों को यह काम करने पर दोषी नहीं ठहराया जा सकता।

श्लोक (28)- तस्माद्यास्तवौपरिष्टकमाचरन्ति न ताभिः सह संसृज्यन्ते प्राच्याः।

अर्थ- प्राच्य देश के लोग मुखमैथुन न करवाने वाली स्त्रियों के साथ संभोग नहीं करते हैं।

श्लोक (29)- वेश्याभिरेव नसंसृज्यन्ते आहिच्छत्रिकाः संसृष्टा अपि मुखकर्म तासां परिहरन्ति।।

अर्थ- अहिच्छत्र देश में रहने वाले लोग वेश्यावृति नहीं करते हैं और अगर कोई स्त्री करती भी है तो उसका मुंह नहीं चूमा जाता है।

श्लोक (30)- निरपेक्षाः साकेताः संसृज्यन्ते।।

अर्थ- साकेत देश के लोगों की प्रवृत्ति-

अवध (साकेत) देश के लोग अपनी मनमर्जी के मुताबिक वेश्यावृति करते हैं।

श्लोक (31)- न तु स्वयमौपरिष्टकमाचरन्ति नागरकाः।।

अर्थ- नागरक देश के लोग अपने आप में कोई बुरा काम नहीं करते हैं।

श्लोक (32)- सर्वमविशङक्या प्रयोजयन्ति सौरसेनाः।।

अर्थ- सूरसेन देश के लोग हर काम को बिना डरे करते हैं।

श्लोक (33)- एवं ह्याहुः- को हि योपितां शीलं शौजमाचारं चरित्रं प्रत्ययं वचनं वा श्रद्धातुमर्हति। निसर्गादेव हि मलिनदृष्टयो भवन्त्येता न परित्याज्याः। तस्मादासां स्मृतित एव शौचमन्वेष्टव्यम्। एवं ह्याहुः-

    वत्सः प्रस्त्रवणे मेध्यः श्वा मृगग्रहणे शुचिः। शकुनि फलपाते तु स्त्रीमुखं रतिसंगमें।।

अर्थ- इसी वजह से कहा जाता है कि ऐसा कौन है जो स्त्रियों के शील, शौच, आचार, चरित्र और वचन पर भरोसा करेगा क्योंकि स्त्रियां स्वभाव से ही मलिन स्वभाव की होती है फिर भी छोडने लायक नहीं होती है। इसलिए इनकी पवित्रता को धर्मशास्त्रों में ढूंढना चाहिए।

धर्मशास्त्रों के मुताबिक-

     दूध निकालते समय बछड़ा पवित्र होता है, हिरन को पकड़ते समय कुत्ता पवित्र होता है, फलों के गिरने के समय पक्षी पवित्र होता है और संभोग क्रिया के समय स्त्री पवित्र होती है। इसी वजह से संभोग के समय स्त्रियों के मुख को पवित्र समझना चाहिए।

श्लोक (34)- शिष्टाविप्रतिपत्तेः स्मृतिवाक्यस्य च सावकाशत्वाद्देशास्थितेरात्मनश्च वृत्तिप्रत्ययानुरूपं प्रवर्तेत। इति वात्स्यायनः।।

अर्थ- आचार्य वात्स्यायन कहते हैं-

           शिष्टजनों के अनुसार स्त्रियों का मुख नहीं चूमना चाहिए लेकिन धर्मशास्त्र में संभोग क्रिया के समय मुख को चूमना बहुत जरूरी है। ऐसे में अपनी इच्छा और स्त्री के भरोसे के अनुसार ही बर्ताव करना चाहिए।

श्लोक (35)- भवन्ति चात्र श्लोकः-

प्रमृष्टकुण्डलाश्चापि युवानाः परिचारकाः। केपांचिदेव कुर्वन्ति नराणामौपरिष्टकम्।।

अर्थ- इस विषय में 4 श्लोक बताए गए है-

         कानों में कुंडल आदि पहनने वाले या सजकर रहने वाले पुरुष भी मुखमैथुन करते हैं।

श्लोक (36)- तथा नागरकाः केचिदन्योन्यस्य हितैषिणीः। कुर्वन्ति रूढिविश्वासाः परस्परपरिग्रहम्।।

अर्थ- इसी तरह कुछ भोगविलासी तथा एक-दूसरे के प्यारे बनने वाले लोग भी आपस में मुखमैथुन करते हैं।

श्लोक (37)- पुरुषाश्च तथा स्त्रीसु कमैंतत्किल कुर्वते। व्यासम्चत्स्य च विज्ञेयो मुखचुम्बनबद्विधिः।।

अर्थ- बहुत से पुरुष भी स्त्री के साथ मुख मैथुन करते है मतलब की वह स्त्री की योनि का चुंबन लेते है या उसे जीभ से चाटते हैं।

श्लोक (38)- परिवर्तितेदेहौ तु स्त्रीपुंसौ यत्परस्परम्। युगपत्संप्रयुज्येते स कामः काकिलः स्मृतः।।

अर्थ- जिस क्रिया में स्त्री और पुरुष एक-दूसरे के सामने मुंह करके लेट जाते हैं और पुरुष स्त्री की योनि का और स्त्री पुरुष के लिंग का चुंबन करती है तो उस मुख मैथुन को काकिल कहते हैं।

श्लोक (39)- तस्माद गुणवतस्त्यक्तवा चतुरांस्त्यागिनो नरान्। वेश्याः खलेषु रज्येन्ते दास्हस्तिकादिपु।।

अर्थ- इसी वजह से ज्यादातर वेश्याएं शिष्ट, कलाकुशल और गुणी व्यक्तियों को छोड़कर नौकरों, साइसों आदि खल व्यक्तियों में ज्यादा दिलचस्पी रखती है।

श्लोक (40)- न त्वेतदब्राह्मणो विद्वान्मन्त्री वा राजधूर्धरः। गृहीतप्रत्ययो वापि कारचेदौपरिष्टकम्।।

अर्थ- मुख मैथुन जैसे कार्यों को विद्वानों को, ब्राह्मणों को, राज्य के मंत्री को तथा जिससे सब प्यार करते हैं आदि को नहीं करना चाहिए।

श्लोक (41)- न शास्त्रमस्तीत्येतावत्प्रयोगे कारणं भवेत्। शास्त्रार्थान्व्यापिनो विद्यात्प्रयोगांस्तवेकदेशिकान्।।

अर्थ- इस विषय का शास्त्र बना हुआ है सिर्फ यहीं नहीं, इन विषयों के प्रयोग का कारण नहीं हुआ करता क्योंकि शास्त्र तो व्यापक होता है उनके अंतर्गत अच्छाई बुराई सभी कुछ रहती है, लेकिन प्रयोग सीमित तथा देशीय होते हैं।

श्लोक (42)- रसवीर्यविपाका हि श्वमांसस्यापि वैद्यके। कीर्तिता इति तत्कि स्याद्धक्षणीयं विचक्षणैः।।

अर्थ- आयुर्वेद में तो कुत्ते के मांस को भी वीर्य और रस बढ़ाने वाला बताया गया है क्योंकि जब मांस के गुण और दोषों के बारे में बताया जाता है तो उसमें कुत्ते के मांस के गुण और दोष भी बताने चाहिए लेकिन क्या इतना बता देने से लोगों को कुत्ते का मांस खाना चाहिए।

श्लोक (43)-सन्त्येव पुरुषाः केचित्सन्ति देशास्ताथाविधाः। सन्ति कालाश्च येष्वेते योगा न स्युर्निरर्थकाः।

अर्थ- कुछ इस प्रकार के देशों में, इस प्रकार के लोगों पर इस प्रकार का समय आता है जब उनके लिए ऐसे काम कोई बुरा नहीं होता है।

श्लोक (44)- तस्माद्देशं च कालं च प्रयोगं शास्त्रमेव च। आत्मनं चापि संप्रेक्ष्य योगान्युञ्ञीत वा न वा।।

अर्थ- इसी वजह से देश, समय, शास्त्र तथा अपने आपको देखकर जो सही लगे उन्हीं विधियों और योगों को अपनाना चाहिए और जो सही नहीं लगे उन्हे छोड़ देना चाहिए।

श्लोक (45)- अर्थस्यास्य रहस्यत्वाच्चलत्वान्मनसस्तथा। कः कदा किं कुतः कुर्यादिति को ज्ञातुमर्हिति।।

अर्थ- इस प्रकार की मुख मैथुन की क्रिया को छिपाकर ही करना चाहिए और किसी को इसके बारे में बताना भी नहीं चाहिए। मन तो वैसे भी कब, क्या करा डाले यह कोई नहीं जान सकता।

जानकारी-

           मुख मैथुन को औपरिष्टक कहा जाता है। यह क्रिया ज्यादातर किन्नर करते हैं। विद्वानों के मुताबिक मुख मैथुन को बहुत ही बुरा बताया गया है और इसका विरोध धर्मशास्त्रों में भी किया गया है। इसी वजह से इस क्रिया को नहीं करनी चाहिए। जो लोग इस क्रिया को करने में आनंद प्राप्त करते हैं वह लोग बहुत ही दुष्ट प्रवृति के कहे जा सकते हैं।

श्लोक- इति श्रीवात्स्यायनीये कामसूत्रे साम्प्रयोगिके द्वितीयेऽधिकरणे औपरिष्टकं नवमोऽध्यायः।

श्लोक (1)- द्विविधा तृतीया प्रकृतिः स्त्रीरूपिणी पुरुषरूपिणो च।।

कामसूत्र

Vātsyāyana
Chapters
कामसूत्र
कामसूत्र का परिचय
1
नागरकवृन्त प्रकरण 1
नागरकवृन्त प्रकरण 2
विद्या समुदेश प्रकरण 1
विद्या समुदेश प्रकरण 2
विद्या समुदेश प्रकरण 3
विद्या समुदेश प्रकरण 4
त्रिवर्ग प्रतिपत्ति प्रकरण 1
त्रिवर्ग प्रतिपत्ति प्रकरण 2
त्रिवर्ग प्रतिपत्ति प्रकरण 3
शास्त्र संग्रह 1
शास्त्र संग्रह 2
नायक सहायदूतकर्म विमर्श प्रकरण 1
नायक सहायदूतकर्म विमर्श प्रकरण 2
2
प्रथम अध्याय
द्वितीय अध्याय
तृतीय अध्याय
चतुर्थ अध्याय
पंचम अध्याय
षष्ठम अध्याय
सप्तम अध्याय
अष्टम अध्याय
नवम अध्याय
दशम अध्याय
3
प्रथम अध्याय
द्वितीय अध्याय
तृतीय अध्याय
चतुर्थ अध्यायः
पंचम अध्याय
4
प्रथम अध्याय
द्वितीय अध्याय
5
प्रथम अध्याय
द्वितीय अध्याय
चतुर्थ अध्याय
पंचम अध्याय
षष्ठम अध्याय
6
प्रथम अध्याय
द्वितीय अध्याय
तृतीय अध्याय
चतुर्थ अध्याय
पंचम अध्याय
षष्ठम अध्याय
7
प्रथम अध्याय
द्वितीय अध्याय